|
|
| سطر ۵۶: |
سطر ۵۶: |
| | حسن بصرى گوید: مشرکین به رسول خدا صلى الله علیه و آله و سلم گفتند: آیا آباء و اجداد تو در گمراهى بوده اند؟ سپس این آیات در جواب آنها نازل گردید.<ref> کتاب الدلائل از بیهقى.</ref> سبب نزول این آیات در [[سوره کافرون]] نیز آمده است. | | حسن بصرى گوید: مشرکین به رسول خدا صلى الله علیه و آله و سلم گفتند: آیا آباء و اجداد تو در گمراهى بوده اند؟ سپس این آیات در جواب آنها نازل گردید.<ref> کتاب الدلائل از بیهقى.</ref> سبب نزول این آیات در [[سوره کافرون]] نیز آمده است. |
| | == تفسیر آیه == | | == تفسیر آیه == |
| − | <tabber> | + | <tafsir sura="39" ayeh="66" /> |
| − | تفسیر نور=
| |
| | | | |
| − | ===تفسیر نور (محسن قرائتی)===
| |
| | | | |
| − | {{ نمایش فشرده تفسیر|
| |
| − | بَلِ اللَّهَ فَاعْبُدْ وَ كُنْ مِنَ الشَّاكِرِينَ «66»
| |
| | | | |
| − | بلكه تنها خدا را پرستش كن و از سپاس گزاران باش.
| |
| − |
| |
| − | وَ ما قَدَرُوا اللَّهَ حَقَّ قَدْرِهِ وَ الْأَرْضُ جَمِيعاً قَبْضَتُهُ يَوْمَ الْقِيامَةِ وَ السَّماواتُ مَطْوِيَّاتٌ بِيَمِينِهِ سُبْحانَهُ وَ تَعالى عَمَّا يُشْرِكُونَ «67»
| |
| − |
| |
| − | و خدا را آن گونه كه حقّ اوست قدردانى نكردند (و او را نشناختند)، در حالى كه روز قيامت زمين يكسره در قبضهى قدرت اوست و آسمانها به دست قدرت او در هم پيچيدهاند. او منزه است و از آن چه شريك او قرار مىدهند، برتر است.
| |
| − |
| |
| − | ===نکته ها===
| |
| − |
| |
| − | امام صادق عليه السلام فرمود: مراد از «يمين» دست قدرت خداست. «1»
| |
| − |
| |
| − | فرمانهاى خداوند دو نوع است:
| |
| − |
| |
| − | 1. دستور مولوى كه خداوند به عنوان مولا صادر مىكند و عقل را به اسرار آن راهى نيست، نظير فرمان طواف در مكّه. «وَ لْيَطَّوَّفُوا بِالْبَيْتِ الْعَتِيقِ» «2»
| |
| − |
| |
| − | 2. دستور ارشادى، كه عقل نيز راز و رمز آن را درك مىكند و حكم خداوند، ارشاد به حكم عقل است، نظير جمله «كُنْ مِنَ الشَّاكِرِينَ» زيرا تشكّر در برابر ولى نعمت را عقل حكم مىكند.
| |
| − |
| |
| − | ===پیام ها===
| |
| − |
| |
| − | 1- يكتا پرستى راه نجات از خسارت است. «لَتَكُونَنَّ مِنَ الْخاسِرِينَ بَلِ اللَّهَ فَاعْبُدْ»
| |
| − |
| |
| − | 2- بهترين راه تشكّر از خداوند عبادت است. «فَاعْبُدْ وَ كُنْ مِنَ الشَّاكِرِينَ»
| |
| − |
| |
| − | 3- توحيد، نشانهى شناخت درست و قدرشناسى است و شرك، برخاسته از عدم شناخت و قدردانى است. «وَ ما قَدَرُوا اللَّهَ حَقَّ قَدْرِهِ»
| |
| − |
| |
| − | 4- آسمان و زمين در برابر قدرت الهى ناچيزند. «قَبْضَتُهُ- مَطْوِيَّاتٌ بِيَمِينِهِ»
| |
| − |
| |
| − | «1». توحيد صدوق، ص 161.
| |
| − |
| |
| − | «2». حج، 29.
| |
| − |
| |
| − | جلد 8 - صفحه 199
| |
| − |
| |
| − | 5- براى شناخت بهتر خداوند، بايد به قدرت و احاطهى مطلقهى او توجّه كنيم.
| |
| − | وَ ما قَدَرُوا اللَّهَ حَقَّ قَدْرِهِ وَ الْأَرْضُ جَمِيعاً ... وَ السَّماواتُ ...
| |
| − |
| |
| − | 6- به سراغ ديگران نرويم، كه همه چيز تنها به دست خداست. وَ الْأَرْضُ ... وَ السَّماواتُ مَطْوِيَّاتٌ ... سُبْحانَهُ وَ تَعالى عَمَّا يُشْرِكُونَ
| |
| − | }}
| |
| − |
| |
| − | |-|
| |
| − | اثنی عشری=
| |
| − |
| |
| − | ===تفسیر اثنی عشری (حسینی شاه عبدالعظیمی)===
| |
| − |
| |
| − | {{نمایش فشرده تفسیر|
| |
| − |
| |
| − |
| |
| − | بَلِ اللَّهَ فَاعْبُدْ وَ كُنْ مِنَ الشَّاكِرِينَ (66)
| |
| − |
| |
| − | جلد 11 - صفحه 267
| |
| − |
| |
| − | بَلِ اللَّهَ فَاعْبُدْ: بلكه خداى را پرستش كن، وَ كُنْ مِنَ الشَّاكِرِينَ: و باش از جمله سپاسداران بر نعمت توحيد و اخلاص در عبادت. و حقيقت معنى آنكه: پرستش مكن آنچه جاهلان مشرك تو را به پرستش آن امر مىكنند، بلكه اگر عاقلى و از اهل خبرت و بصارت هستى، پس پرستش خداى كن و در عبادت غير او را شريك مگردان تا اعمال تو به درجه قبول رسد، زيرا كسانى كه شرك به ساحت كبريائى نسبت دادند و سخنان نالايق در حق او گفتند، هر آينه به مقام عظمت ربوبى توهين نمودند.
| |
| − |
| |
| − |
| |
| − | }}
| |
| − | |-|
| |
| − | روان جاوید=
| |
| − | ===تفسیر روان جاوید (ثقفى تهرانى)===
| |
| − | {{نمایش فشرده تفسیر|
| |
| − | وَ يُنَجِّي اللَّهُ الَّذِينَ اتَّقَوْا بِمَفازَتِهِمْ لا يَمَسُّهُمُ السُّوءُ وَ لا هُمْ يَحْزَنُونَ (61) اللَّهُ خالِقُ كُلِّ شَيْءٍ وَ هُوَ عَلى كُلِّ شَيْءٍ وَكِيلٌ (62) لَهُ مَقالِيدُ السَّماواتِ وَ الْأَرْضِ وَ الَّذِينَ كَفَرُوا بِآياتِ اللَّهِ أُولئِكَ هُمُ الْخاسِرُونَ (63) قُلْ أَ فَغَيْرَ اللَّهِ تَأْمُرُونِّي أَعْبُدُ أَيُّهَا الْجاهِلُونَ (64) وَ لَقَدْ أُوحِيَ إِلَيْكَ وَ إِلَى الَّذِينَ مِنْ قَبْلِكَ لَئِنْ أَشْرَكْتَ لَيَحْبَطَنَّ عَمَلُكَ وَ لَتَكُونَنَّ مِنَ الْخاسِرِينَ (65)
| |
| − |
| |
| − | بَلِ اللَّهَ فَاعْبُدْ وَ كُنْ مِنَ الشَّاكِرِينَ (66)
| |
| − |
| |
| − | ترجمه
| |
| − |
| |
| − | و نجات ميدهد خدا آنانرا كه پرهيزكار شدند بسبب رستگاريشان نميرسد بايشان بدى و نه ايشان اندوهناك مىشوند
| |
| − |
| |
| − | خدا آفريننده همه چيز است
| |
| − |
| |
| − | جلد 4 صفحه 508
| |
| − |
| |
| − | و او بر همه چيز نگهبان و كارگزار است
| |
| − |
| |
| − | براى او است كليدهاى آسمانها و زمين و آنها كه كافر شدند بآيتهاى خدا آن گروه آنها زيانكارانند
| |
| − |
| |
| − | بگو آيا پس غير خدا را امر ميكنيد بمن كه بپرستم اى نادانان
| |
| − |
| |
| − | و هر آينه بتحقيق وحى شد بتو و بآنانكه بودند پيش از تو كه اگر مشرك شوى هر آينه باطل خواهد شد عملت و هر آينه خواهى بود البته از زيانكاران
| |
| − |
| |
| − | بلكه خدا را پس بپرست و بوده باش از شكرگزاران.
| |
| − |
| |
| − | تفسير
| |
| − |
| |
| − | خداوند سبحان بعد از تهديد كفار نويد داده است اهل ايمان و تقوى را بنجات از آتش جهنم براى فلاح و رستگارى ايشان در دنيا بأعمال صالحه و اجتناب از معاصى كبيره و اصرار بر صغيره و آنكه نميرسد به آنان بهيچ وجه شدّت و مكروهى و نه آنها محزون مىشوند در روزى كه غير آنها محزون خواهند شد و خداوند خالق تمام موجودات و نگهبان و نگهدار و متصرّف و مدبّر امور آنها است و هر كس را بمقام لايق خود خواهد رسانيد در دست او است كليدهاى خزانههاى آسمانها و زمين و هر كس را بقدر قابليّت او عطا مى- فرمايد از نعمت و روزى و رحمت و كفار زيانكارانند كه نعيم بهشت را از دست داده و عذاب جهنّم را خريدارى نمودهاند و در جوامع نقل نموده كه اهل شرك به پيغمبر صلى اللّه عليه و اله گفتند تو بعضى از خدايان ما را قبول كن ما بخداى تو ايمان مى- آوريم لذا خداوند فرموده بآنها بگو مرا امر بعبادت غير خداى يگانه ميكنيد اى نادانان و بتحقيق وحى شد بتو و ساير انبياء قبل هر يك در زمان خودش كه اگر در عبادت خداى يگانه غير او را شريك كنى عملت باطل ميگردد و قبول نخواهد شد و البته چنين كسى از زيانكاران ميباشد پس عبادت كن خدا را بدون دخالت غير و بوده باش از شكرگزاران نعم حق بر خود و خانوادهات و معلوم است كه خطاب به پيغمبر اكرم شده براى تأديب و تعليم امّت والا ساحت مقدّس نبوى اجلّ از احتياج باين تكاليف است چنانچه در روايت قمى ره از امام صادق عليه السّلام بيان شده و از امام باقر عليه السّلام نقل شده كه مراد آنستكه اگر با ولايت على عليه السّلام امر بولايت احدى نمائى بعد از خودت عملت باطل ميشود و از زيانكاران خواهى بود و در كافى از امام صادق عليه السّلام اينمعنى تأييد شده و آنكه مراد از بل اللّه فاعبد و كن من الشّاكرين اطاعت
| |
| − |
| |
| − | جلد 4 صفحه 509
| |
| − |
| |
| − | خدا و شكر بر آنستكه خداوند برادر و پسر عمّش را معاضد و كمك براى او قرار داد و الحمد للّه على ما انعمنا به من ولايته.
| |
| − | }}
| |
| − | |-|
| |
| − | اطیب البیان=
| |
| − | ===اطیب البیان (سید عبدالحسین طیب)===
| |
| − | {{نمایش فشرده تفسیر|
| |
| − | بَلِ اللّهَ فَاعبُد وَ كُن مِنَ الشّاكِرِينَ (66)
| |
| − |
| |
| − | بلكه خداوند متعال را پس بايد عبادت كني و بوده باشي از شكرگزاران.
| |
| − |
| |
| − | بَلِ اضراب از ما قبل است يعني چون شرك موجب حبط اعمال ميشود و مورث خسران و زيان است بايد موحد شد.
| |
| − |
| |
| − | اللّهَ فَاعبُد اللّه مفعول فَاعبُد ميشود و تقديم مفعول بر فعل دليل بر اختصاص است مثل إِيّاكَ نَعبُدُ وَ إِيّاكَ نَستَعِينُ و فاء فاعبد تفريع بر ما قبل است يعني بعد از اينكه شرك نياوري که موجب حبط اعمالت ميشود و خاسر ميشوي پس بايد عبادت كني و پرستش نمايي اللّه را که اولين كلمه دين و اسلام توحيد عبادتيست و مفاد كلمه (لا اله الا اللّه) است و توحيد ذاتي و صفاتي و افعالي بدلالت التزامي كلمه توحيد است و از لوازم اوست چنانچه توحيد نظري بدلالت اقتضائيست و مكررا اشاره شده و امر بعبادت امر ارشاديست مثل امر باطاعت بحكم عقل مستقل واجب است عبادت و اطاعت او زيرا امر مولوي موجب تسلسل ميشود مثلا عبادت صلوة امر مولوي دارد که در تركش عقوبت است اگر امر فاعبدهم مولوي باشد آنهم عبادت است بايد كرد و هكذا پس امتثال امر صلاتي هزارها امر دارد الي غير النهايه و تركش هزارها معصيت است الي غير النهاية.
| |
| − |
| |
| − | وَ كُن مِنَ الشّاكِرِينَ اينکه هم امر ارشاديست زيرا عقل حكم ميكند بوجوب شكر منعم و شكر هم درجاتي دارد اولا بداند که از جانب او است مستند به
| |
| − |
| |
| − | جلد 15 - صفحه 341
| |
| − |
| |
| − | اسباب و اقدام خود و ديگران نيست ثانيا بداند که از راه تفضل است نه استحقاق كسي از او طلبكار نيست و ثالثا نعم الهيه بسيار است که إِن تَعُدُّوا نِعمَةَ اللّهِ لا تُحصُوها بالاخص نسبت بپيغمبر اكرم که اشرف مخلوقات است نعم ظاهريه و باطنيه جسمانيه و روحانيه داخليه و خارجيه الي ما شاء اللّه و رابعا بداند که از عهده شكر كوچكترين نعم او بر نميايد چه رسد بنعم عاليه.
| |
| − | }}
| |
| − | |-|
| |
| − | برگزیده تفسیر نمونه=
| |
| − |
| |
| − | ===برگزیده تفسیر نمونه===
| |
| − | {{نمایش فشرده تفسیر|
| |
| − | ]
| |
| − |
| |
| − | (آیه 66)- در این آیه باز برای تأکید بیشتر میافزاید: «بلکه تنها خداوند را عبادت کن و از شکرگزاران باش» (بَلِ اللَّهَ فَاعْبُدْ وَ کُنْ مِنَ الشَّاکِرِینَ).
| |
| − |
| |
| − | ج4، ص243
| |
| − |
| |
| − | یعنی معبود تو باید منحصرا ذات پاک «اللّه» باشد.
| |
| − | }}
| |
| − | |-|
| |
| − |
| |
| − | سایر تفاسیر=
| |
| − | سایرتفاسیر این آیه را می توانید در سایت قرآن مشاهده کنید:
| |
| − |
| |
| − | ==تفسیر های فارسی==
| |
| − | ==={{ترجمه تفسیر المیزان|سوره=39 |آیه=66}}===
| |
| − | ==={{تفسیر خسروی|سوره=39 |آیه=66}}===
| |
| − | ==={{تفسیر عاملی|سوره=39 |آیه=66}}===
| |
| − | ==={{تفسیر جامع|سوره=39 |آیه=66}}===
| |
| − |
| |
| − | ==تفسیر های عربی==
| |
| − | ==={{تفسیر المیزان|سوره=39 |آیه=66}}===
| |
| − | ==={{تفسیر مجمع البیان|سوره=39 |آیه=66}}===
| |
| − | ==={{تفسیر نور الثقلین|سوره=39 |آیه=66}}===
| |
| − | ==={{تفسیر الصافی|سوره=39 |آیه=66}}===
| |
| − | ==={{تفسیر الکاشف|سوره=39 |آیه=66}}===
| |
| − | </tabber>
| |
| | | | |
| | ==پانویس== | | ==پانویس== |
بَلِ اللَّهَ فَاعْبُدْ وَكُنْ مِنَ الشَّاكِرِينَ
ترجمه های فارسی
بلکه تنها خدا را پرستش کن و از شکر گزاران (نعمت الهی) باش.
بلکه فقط خدا را بپرست و از سپاس گزاران باش.
بلكه خدا را بپرست و از سپاسگزاران باش.
بلكه خدا را بپرست و سپاسگزار او باش.
بلکه تنها خداوند را عبادت کن و از شکرگزاران باش!
ترجمه های انگلیسی(English translations)
No, worship Allah, and be among the grateful!’
Nay! but serve Allah alone and be of the thankful.
Nay, but Allah must thou serve, and be among the thankful!
Nay, but worship Allah, and be of those who give thanks.
معانی کلمات آیه
«اللهَ»: مفعول مقدّم (أُعْبُدْ) و تقدیم آن برای حصر است. «بَلْ ...»: پس در این صورت. با توجّه به این.
نزول
شأن نزول آیات 64 تا 66:
از امام زین العابدین علیهالسلام و سدى روایت شده که جماعت قریش نزد ابوطالب آمدند در حالتى که پیامبر هم نزد وى بود. گفتند: اى ابوطالب ما از برادرزاده ات انصاف میخواهیم.
ابوطالب گفت: منظور شما از انصاف چیست که میخواهید او مراعات کند؟ گفتند: او از ما دست بردارد ما نیز از او دست برداریم. او با ما سخن نگوید ما نیز با او سخن نگوئیم. او با ما مبارزه و مقاتله نکند ما نیز با او مقاتله و مبارزه نکنیم. اگر چه این درخواست ما موجب دورى قلب ها از یکدیگر و موجد کینه و بغض خواهد گردید. ابو طالب به پیامبر گفت: اى برادرزاده من سخنان آنها را شنیدى؟
پیامبر فرمود: اى عمّ بزرگوار اگر این خویشاوندان من بخواهند انصاف را رعایت نمایند نشانه رعایت آن اجابت دعوت من و پذیرفتن پند و اندرز من است زیرا خداوند به من امر فرموده که آنان را به دین حنیف ملت ابراهیم دعوت نمایم هر کس چنین دعوتى را اجابت نمود خدا از او خشنود خواهد شد و او را در بهشت جاویدان خود جاى خواهد داد و هر کس دعوت حق را نپذیرفت و عصیان ورزید با او مبارزه و مقاتله خواهم کرد تا این که خداوند میان ما و آنها حکم و داورى کند زیرا او بهترین داوران و قضاوتکنندگان است.
سخن رسول خدا صلی الله علیه و آله به اینجا که رسید، قریش همگى گفتند: اى ابوطالب به برادرزاده ات بگو که از شتم و بدگوئى خدایان ما دست بردارد و آنها را به بدى یاد نکند سپس آیه 64 نازل گردید.[۱]
حسن بصرى گوید: مشرکین به رسول خدا صلى الله علیه و آله و سلم گفتند: آیا آباء و اجداد تو در گمراهى بوده اند؟ سپس این آیات در جواب آنها نازل گردید.[۲] سبب نزول این آیات در سوره کافرون نیز آمده است.
تفسیر آیه
تفسیر نور (محسن قرائتی)
بَلِ اللَّهَ فَاعْبُدْ وَ كُنْ مِنَ الشَّاكِرِينَ «66»
بلكه تنها خدا را پرستش كن و از سپاس گزاران باش.
وَ ما قَدَرُوا اللَّهَ حَقَّ قَدْرِهِ وَ الْأَرْضُ جَمِيعاً قَبْضَتُهُ يَوْمَ الْقِيامَةِ وَ السَّماواتُ مَطْوِيَّاتٌ بِيَمِينِهِ سُبْحانَهُ وَ تَعالى عَمَّا يُشْرِكُونَ «67»
و خدا را آن گونه كه حقّ اوست قدردانى نكردند (و او را نشناختند)، در حالى كه روز قيامت زمين يكسره در قبضهى قدرت اوست و آسمانها به دست قدرت او در هم پيچيدهاند. او منزه است و از آن چه شريك او قرار مىدهند، برتر است.
نکته ها
امام صادق عليه السلام فرمود: مراد از «يمين» دست قدرت خداست. «1»
فرمانهاى خداوند دو نوع است:
1. دستور مولوى كه خداوند به عنوان مولا صادر مىكند و عقل را به اسرار آن راهى نيست، نظير فرمان طواف در مكّه. «وَ لْيَطَّوَّفُوا بِالْبَيْتِ الْعَتِيقِ» «2»
2. دستور ارشادى، كه عقل نيز راز و رمز آن را درك مىكند و حكم خداوند، ارشاد به حكم عقل است، نظير جمله «كُنْ مِنَ الشَّاكِرِينَ» زيرا تشكّر در برابر ولى نعمت را عقل حكم مىكند.
پیام ها
1- يكتا پرستى راه نجات از خسارت است. «لَتَكُونَنَّ مِنَ الْخاسِرِينَ بَلِ اللَّهَ فَاعْبُدْ»
2- بهترين راه تشكّر از خداوند عبادت است. «فَاعْبُدْ وَ كُنْ مِنَ الشَّاكِرِينَ»
3- توحيد، نشانهى شناخت درست و قدرشناسى است و شرك، برخاسته از عدم شناخت و قدردانى است. «وَ ما قَدَرُوا اللَّهَ حَقَّ قَدْرِهِ»
4- آسمان و زمين در برابر قدرت الهى ناچيزند. «قَبْضَتُهُ- مَطْوِيَّاتٌ بِيَمِينِهِ»
«1». توحيد صدوق، ص 161.
«2». حج، 29.
جلد 8 - صفحه 199
5- براى شناخت بهتر خداوند، بايد به قدرت و احاطهى مطلقهى او توجّه كنيم.
وَ ما قَدَرُوا اللَّهَ حَقَّ قَدْرِهِ وَ الْأَرْضُ جَمِيعاً ... وَ السَّماواتُ ...
6- به سراغ ديگران نرويم، كه همه چيز تنها به دست خداست. وَ الْأَرْضُ ... وَ السَّماواتُ مَطْوِيَّاتٌ ... سُبْحانَهُ وَ تَعالى عَمَّا يُشْرِكُونَ
پانویس
- ↑ کتاب النبوة از ابن بابویه و ابن شهر آشوب و واحدى صاحب اسباب النزول.
- ↑ کتاب الدلائل از بیهقى.
منابع