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| سطر ۴۳: |
سطر ۴۳: |
| | سلطان: تسلط، حجت، دليل. سلطه به معنى تمكن و قدرت است.<ref>تفسیر احسن الحدیث، سید علی اکبر قرشی</ref> | | سلطان: تسلط، حجت، دليل. سلطه به معنى تمكن و قدرت است.<ref>تفسیر احسن الحدیث، سید علی اکبر قرشی</ref> |
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| − | ==تفسیر آیه== | + | == تفسیر آیه == |
| − | <tabber> | + | <tafsir sura="6" ayeh="81" /> |
| − | تفسیر نور=
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| − | ===تفسیر نور (محسن قرائتی)===
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| − | {{ نمایش فشرده تفسیر|
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| − | وَ كَيْفَ أَخافُ ما أَشْرَكْتُمْ وَ لا تَخافُونَ أَنَّكُمْ أَشْرَكْتُمْ بِاللَّهِ ما لَمْ يُنَزِّلْ بِهِ عَلَيْكُمْ سُلْطاناً فَأَيُّ الْفَرِيقَيْنِ أَحَقُّ بِالْأَمْنِ إِنْ كُنْتُمْ تَعْلَمُونَ «81»
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| − | و چگونه از چيزى كه شريك خدا ساختهايد بترسم و حال آنكه شما آنچه را كه خدا هيچ دليلى دربارهى آن بر شما نازل نكرده است شريك او گرفته و نمىترسيد؟ اگر مىدانيد (بگوييد كه) كدام يك از ما دو دسته به ايمنى (در قيامت) سزاوارتر است؟
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| − | ===نکته ها===
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| − | كلمهى «سلطان»، به معناى دليل و حجّت و برهان است.
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| − | بر خلاف آنان كه ترس را انگيزهى اعتقاد به خداوند مىدانند، اين آيه، ترس را انگيزهى شرك مىداند.
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| − | ===پیام ها===
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| − | 1- از تهديدات موهوم، نهراسيد. «كَيْفَ أَخافُ ما أَشْرَكْتُمْ»
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| − | 2- امنيّت روحى، در پرتو توحيد حاصل مىگردد. «كَيْفَ أَخافُ ما أَشْرَكْتُمْ»
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| − | 3- عقائد دينى بايد بر اساس دليل و برهان باشد. «كَيْفَ ما أَشْرَكْتُمْ بِاللَّهِ ما لَمْ يُنَزِّلْ بِهِ عَلَيْكُمْ سُلْطاناً»
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| − | 4- در بحث و مناظره، نبايد تعصّب مردم را تحريك كرد. «فَأَيُّ الْفَرِيقَيْنِ» و نفرمود: ما در امان هستيم و شما در خطر.
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| − | 5- علم صحيح، وسيله راهيابى به خداست، اگر آن را درست به كار گيريم، به نتايج صحيح مىرسيم. «إِنْ كُنْتُمْ تَعْلَمُونَ»
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| − | تفسير نور(10جلدى)، ج2، ص: 501
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| − | اثنی عشری=
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| − | ===تفسیر اثنی عشری (حسینی شاه عبدالعظیمی)===
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| − | {{نمایش فشرده تفسیر|
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| − | وَ كَيْفَ أَخافُ ما أَشْرَكْتُمْ وَ لا تَخافُونَ أَنَّكُمْ أَشْرَكْتُمْ بِاللَّهِ ما لَمْ يُنَزِّلْ بِهِ عَلَيْكُمْ سُلْطاناً فَأَيُّ الْفَرِيقَيْنِ أَحَقُّ بِالْأَمْنِ إِنْ كُنْتُمْ تَعْلَمُونَ (81)
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| − | بعد از آن به أكد حجج بر ايشان احتجاج فرمايد:
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| − | وَ كَيْفَ أَخافُ ما أَشْرَكْتُمْ: و چگونه بترسم از آنچه شما به شرك اختيار نموديد از جمادات وَ لا تَخافُونَ أَنَّكُمْ أَشْرَكْتُمْ بِاللَّهِ: و نمىترسيد از آنكه شرك مىآوريد به خدا و شريك او مىدانيد ما لَمْ يُنَزِّلْ بِهِ عَلَيْكُمْ سُلْطاناً: آن چيزى را كه نازل ننموده است به شريك قرار دادن آن بر شما كتابى و حجتى و دليلى غالب، يعنى چگونه ترسم از معبودان شما كه بديهه عقل حاكم است كه نفع و ضرر از آنها منصور نيست و شما اولى هستيد كه بترسيد از خداى قاهر و غالب كه شرك مىآوريد به او و حال آنكه نمىترسيد از او. مراد آنكه او احق است از آنكه از او بترسيد جهت اشراك مصنوع به صانع و تسويه ميان مقدور و عاجز به قادر ضار و نافع فَأَيُّ الْفَرِيقَيْنِ أَحَقُّ بِالْأَمْنِ: پس كدام يك از اين دو گروه مشرك و موحد سزاوارترند به ايمن بودن. آيا ما كه بتحقيق شناختيم خدا را به ادلّه، و عبادت او نمائيم، يا شما كه مشرك شديد. و اگر عصبيت و حميت كنار گذاريد، هر آينه نيابيد مر اين حجت را دفعى إِنْ كُنْتُمْ تَعْلَمُونَ: اگر هستيد بدانيد ذاتى را كه سزاوار باشد ترسيدن از او كه خداوند قادر متعال باشد.
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| − | روان جاوید=
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| − | ===تفسیر روان جاوید (ثقفى تهرانى)===
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| − | {{نمایش فشرده تفسیر|
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| − | وَ كَيْفَ أَخافُ ما أَشْرَكْتُمْ وَ لا تَخافُونَ أَنَّكُمْ أَشْرَكْتُمْ بِاللَّهِ ما لَمْ يُنَزِّلْ بِهِ عَلَيْكُمْ سُلْطاناً فَأَيُّ الْفَرِيقَيْنِ أَحَقُّ بِالْأَمْنِ إِنْ كُنْتُمْ تَعْلَمُونَ (81)
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| − | ترجمه
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| − | و چگونه بترسم از آنچه شريك گرفتيد با آنكه نميترسيد از آنكه شما شريك قرار داديد با خدا چيزيرا كه نفرستاده است بآن بر شما حجتى را پس كدام يك از اين دو فرقه سزاوارترند بايمنى اگر هستيد كه ميدانيد.
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| − | تفسير
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| − | حضرت ابراهيم (ع) تعجب فرمود از توقع اقوام مشرك خود از او كه بترسد آنحضرت از معبودهاى باطل آنها كه قادر بر هيچ امرى نيستند تا بتوانند ضرر و نفعى بكسى برسانند با آنكه خودشان نميترسند از آنكه شرك آوردند بخدا و شريك
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| − | جلد 2 صفحه 344
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| − | قرار دادند با او چيزيرا كه نفرستاده است خدا بر شركت آن چيز در امر الوهيّت يا عبادت بر آنها كتاب يا حجتى را خلاصه آنكه بسيار توقع بيجائى داشتند كه مىخواستند آنحضرت بترسد در جائيكه ترس مورد و محل ندارد با آنكه خودشان نميترسيدند در جائيكه ترس بمورد و محل است چون بايد از فعل ناشايسته ترسيد در برابر قادر بر ضرر و نفع و آن شرك است كه اعظم معاصى است در مقابل قادريكه در مقابل او قدرتى نيست پس جاى سؤال است از آنكه كدام يك از اين دو فرقه كه موحّد و مشرك باشد سزاوارترند بآنكه نترسند و ايمن باشند از ضرر در صورتى كه كسانيكه از آنها سؤال ميشود اهل دانش باشند و انصاف بدهند و بگويند واضح است كه بايد از حىّ قادر ترسيد نه از جماد عاجز.
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| − | اطیب البیان=
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| − | ===اطیب البیان (سید عبدالحسین طیب)===
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| − | {{نمایش فشرده تفسیر|
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| − | وَ كَيفَ أَخافُ ما أَشرَكتُم وَ لا تَخافُونَ أَنَّكُم أَشرَكتُم بِاللّهِ ما لَم يُنَزِّل بِهِ عَلَيكُم سُلطاناً فَأَيُّ الفَرِيقَينِ أَحَقُّ بِالأَمنِ إِن كُنتُم تَعلَمُونَ (81)
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| − | و چگونه ميترسم آنچه را که شما شريك قرار دادهايد و شما نميترسيد که بر خدا شريك قائل شدهايد با اينكه هيچگونه مدركي و دليلي بر شما از جانب خدا نازل نشده که بفرمايد اينها شريك من هستند پس كدام يك از ما دو فرقه سزاوارتريم بايمني اگر بوديد ميدانستيد.
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| − | وَ كَيفَ أَخافُ ما أَشرَكتُم اصنامي که من و شما ميدانيم و ميبينيم که يك جمادي که تراشيده و مصنوع بشر است بيشتر نيست و اگر آنها را در هم بكوبند ادراك ندارند چگونه من از آنها بترسم وَ لا تَخافُونَ أَنَّكُم أَشرَكتُم بِاللّهِ خداوند قاهر متعالي که من و شما يقين داريم که بر همه چيز قادر و توانا است و علمش بهمه چيز احاطه دارد شما نميترسيد که براي او شريك قرار دادهايد ما لَم يُنَزِّل بِهِ
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| − | جلد 7 - صفحه 125
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| − | عَلَيكُم سُلطاناً كانه دفع دخلي است که مشركين بگويند خداوند بما امر فرموده که عبادت اينکه اصنام را بكنيم و در ترك آن خدا ما را عذاب كند و اينها مقرب درگاه الهي هستند چنانچه گفتند ما نَعبُدُهُم إِلّا لِيُقَرِّبُونا إِلَي اللّهِ زُلفي زمر آيه 4، چنانچه در اعمال زشت خود هم استناد كردند و گفتند وَ اللّهُ أَمَرَنا بِها اعراف آيه 27، جواب ميدهد که چه مدركي براي اينکه دعوي داريد آيا وحيي بر شما نازل شد يا نبيّي بشما خبر داده يا عقل شما حكم كرده که مدرك عقلي داريد هيچگونه مدركي نداريد جز همان حميت و عصبيت و تقليد آباء.
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| − | فَأَيُّ الفَرِيقَينِ موحد و مشرك أَحَقُّ بِالأَمنِ البته موحدين چون بادله متقنه معرفت بتوحيد پيدا كرده و تمام انبياء که آمدند دعوت بتوحيد اولين وظيفه آنها بود و نفي شرك سزاوارترند بامنيت نسبت بكساني که بدون مدرك و دليل و بر خلاف حسّ و و جدان قائل بشرك شدند إِن كُنتُم تَعلَمُونَ اگر دست از جهالت و حماقت و عصبيت و عناد برداريد و بخود بيائيد خواهيد دانست.
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| − | برگزیده تفسیر نمونه=
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| − | ===برگزیده تفسیر نمونه===
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| − | {{نمایش فشرده تفسیر|
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| − | (آیه 81)
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| − | در این آیه منطق و استدلال دیگری را از ابراهیم بیان می کند که به جمعیت بت پرست می گوید: «چگونه ممکن است من از بتها بترسم و در برابر تهدیدهای شما وحشتی به خود راه دهم با این که هیچ گونه نشانه ای از عقل و شعور و قدرت در این بتها نمی بینم، اما شما با این که به وجود خدا ایمان دارید و قدرت و علم او را می دانید، و هیچ گونه دستوری به شما در باره پرستش بتها نازل نکرده است، با این همه از خشم او نمی ترسید من چگونه از خشم بتها بترسم»! (وَ کیفَ أَخافُ ما أَشرَکتُم وَ لا تَخافُونَ أَنَّکم أَشرَکتُم بِاللّهِ ما لَم ینَزِّل بِهِ عَلَیکم سُلطاناً).
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| − | اکنون انصاف بدهید کدام یک از این دو دسته (بت پرستان و خداپرستان) شایستهتر به ایمنی (از مجازات) هستند اگر می دانید»؟ (فَأَیُّ الفَرِیقَینِ أَحَقُّ بِالأَمنِ إِن کنتُم تَعلَمُونَ).
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| − | در واقع منطق ابراهیم در اینجا یک منطق عقلی بر اساس این واقعیت است که شما مرا تهدید به خشم بتها می کنید در حالی که تأثیر وجودی آنها موهوم است، ولی از خشم خداوند بزرگ که من و شما هر دو او را پذیرفته ایم- و هیچ گونه دستوری از طرف او در باره پرستش بتها نرسیده- ترس و وحشتی ندارید.
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| − | سایر تفاسیر=
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| − | سایرتفاسیر این آیه را می توانید در سایت قرآن مشاهده کنید:
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| − | ==تفسیر های فارسی==
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| − | ==={{ترجمه تفسیر المیزان|سوره=6 |آیه=81}}===
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| − | ==={{تفسیر خسروی|سوره=6 |آیه=81}}===
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| − | ==={{تفسیر عاملی|سوره=6 |آیه=81}}===
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| − | ==={{تفسیر جامع|سوره=6 |آیه=81}}===
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| − | ==تفسیر های عربی==
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| − | ==={{تفسیر المیزان|سوره=6 |آیه=81}}===
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| − | ==={{تفسیر مجمع البیان|سوره=6 |آیه=81}}===
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| − | ==={{تفسیر نور الثقلین|سوره=6 |آیه=81}}===
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| − | ==={{تفسیر الصافی|سوره=6 |آیه=81}}===
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| − | ==={{تفسیر الکاشف|سوره=6 |آیه=81}}===
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| − | </tabber>
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| | ==پانویس== | | ==پانویس== |