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| سطر ۴۳: |
سطر ۴۳: |
| | يستخلف: استخلاف: جانشين كردن. «يستخلف» جانشين مى كند.<ref>تفسیر احسن الحدیث، سید علی اکبر قرشی</ref> | | يستخلف: استخلاف: جانشين كردن. «يستخلف» جانشين مى كند.<ref>تفسیر احسن الحدیث، سید علی اکبر قرشی</ref> |
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| − | ==تفسیر آیه== | + | == تفسیر آیه == |
| − | <tabber> | + | <tafsir sura="6" ayeh="133" /> |
| − | تفسیر نور=
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| − | ===تفسیر نور (محسن قرائتی)===
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| − | {{ نمایش فشرده تفسیر|
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| − | وَ رَبُّكَ الْغَنِيُّ ذُو الرَّحْمَةِ إِنْ يَشَأْ يُذْهِبْكُمْ وَ يَسْتَخْلِفْ مِنْ بَعْدِكُمْ ما يَشاءُ كَما أَنْشَأَكُمْ مِنْ ذُرِّيَّةِ قَوْمٍ آخَرِينَ «133»
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| − | و پروردگار تو بىنياز و صاحبِ رحمت است. اگر بخواهد، شما را مىبرد و پس از شما هر كه را بخواهد جايگزين مىكند، همان گونه كه شما را از نسل قوم ديگرى پديد آورد.
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| − | إِنَّ ما تُوعَدُونَ لَآتٍ وَ ما أَنْتُمْ بِمُعْجِزِينَ «134»
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| − | به راستى آنچه وعده داده مىشويد، آمدنى است و شما نمىتوانيد (خدا را) ناتوان سازيد (و از كيفر و عدل او بگريزيد).
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| − | ===پیام ها===
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| − | 1- تنها خداوند بىنياز مطلق است، پس هرگز خود را بىنياز نبينيم. «رَبُّكَ الْغَنِيُّ» در جاى ديگر مىفرمايد: «يا أَيُّهَا النَّاسُ أَنْتُمُ الْفُقَراءُ إِلَى اللَّهِ وَ اللَّهُ هُوَ الْغَنِيُّ الْحَمِيدُ» «1» اى مردم! همهى شما نيازمند خداييد و تنها اوست كه بىنياز و ستودنى است.
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| − | 2- گناهكاران، بايد در همين دنيا هم بترسند، زيرا محو آنان توسط قدرت الهى بسيار ساده است. «يُذْهِبْكُمْ»
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| − | 3- ريشهى ظلم (كه در دو آيهى قبل آمده بود)، يا نياز است، يا سنگدلى و هيچ يك از اين دو در خدا وجود ندارد. «الْغَنِيُّ ذُو الرَّحْمَةِ»
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| − | 4- بقاى اجتماعات بشرى، به مشيّت الهى بستگى دارد. «إِنْ يَشَأْ يُذْهِبْكُمْ»
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| − | 5- بود و نبود انسانها، نفع و زيانى براى خداوند ندارد. الْغَنِيُ ... إِنْ يَشَأْ يُذْهِبْكُمْ
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| − | 6- خداوند از عبادات ما بىنياز است، دستورهاى عبادى، عامل رشد خودماست. «الْغَنِيُّ»
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| − | «1». فاطر، 15.
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| − | جلد 2 - صفحه 559
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| − | 7- رحمت خداوند، فراگير است، ولى گاهى بشر كار را به جايى مىرساند كه خداوند همه را نابود مىكند. ذُو الرَّحْمَةِ ... يُذْهِبْكُمْ
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| − | 8- وعدههاى الهى قطعى است، نه شوخى. «إِنَّ ما تُوعَدُونَ لَآتٍ»
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| − | 9- مجرم در قيامت نمىتواند با قدرت الهى در افتد. «وَ ما أَنْتُمْ بِمُعْجِزِينَ»
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| − | اثنی عشری=
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| − | ===تفسیر اثنی عشری (حسینی شاه عبدالعظیمی)===
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| − | {{نمایش فشرده تفسیر|
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| − | وَ رَبُّكَ الْغَنِيُّ ذُو الرَّحْمَةِ إِنْ يَشَأْ يُذْهِبْكُمْ وَ يَسْتَخْلِفْ مِنْ بَعْدِكُمْ ما يَشاءُ كَما أَنْشَأَكُمْ مِنْ ذُرِّيَّةِ قَوْمٍ آخَرِينَ (133)
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| − | تفسير اثنا عشرى، ج3، ص: 380
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| − | وَ رَبُّكَ الْغَنِيُّ ذُو الرَّحْمَةِ: و پروردگار تو بىنياز است از بندگان و عبادت آنان. صاحب رحمت است بر ايشان، چه تكليف طاعت بر آنها بسبب تكميل و وصول ايشان است به درجات عاليه، يا پروردگار بىنياز است از طاعت مطيعان، و صاحب رحمت است بر مجرمان و عاصيان.
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| − | تنبيه- آيه شريفه دال است بر آنكه ارسال رسل و تكليف و وعد و وعيد، عين لطف و مرحمت است نسبت به بندگان، زيرا ذات اقدس سبحانى غنى است در ذات و صفات و افعال، و ما سواى او ممكن بالذات و مفتقرند در وجود و بقا و آثار. پس غنى ذاتى نخواهد بود مگر او سبحانه. و صاحب رحمت است؛ زيرا: هر چيزى كه داخل در وجود است از خيرات و راحات و كرامات و سعادات از روحانيات و جسمانيات، پس آن از حق، و به ايجاد خلق او است، و استقراء دال است بر غلبه خير مثل صحت و وسعت و آسايش و غيره، و آن نيست مگر رحمت كامله و رأفت شامله، و آنچه از رحمت و بخشش از مخلوق تراوش كند، از پرتو رحمت واسعه او است إِنْ يَشَأْ يُذْهِبْكُمْ: اگر بخواهد خدا و مصلحت اقتضا كند، ببرد شما را اى كفار به جهت عدم احتياج او به شما وَ يَسْتَخْلِفْ مِنْ بَعْدِكُمْ ما يَشاءُ: و جانشين سازد از بعد شما هر كه را خواهد از مخلوقات و مردمان كَما أَنْشَأَكُمْ مِنْ ذُرِّيَّةِ قَوْمٍ آخَرِينَ: همچنانكه آفريد و ايجاد كرد شما را از ذريه قومى ديگر كه پدران شما بودند، لكن حق سبحانه ابقاى شما فرمايد به جهت ترحم بر شما.
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| − | روان جاوید=
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| − | ===تفسیر روان جاوید (ثقفى تهرانى)===
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| − | {{نمایش فشرده تفسیر|
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| − | وَ رَبُّكَ الْغَنِيُّ ذُو الرَّحْمَةِ إِنْ يَشَأْ يُذْهِبْكُمْ وَ يَسْتَخْلِفْ مِنْ بَعْدِكُمْ ما يَشاءُ كَما أَنْشَأَكُمْ مِنْ ذُرِّيَّةِ قَوْمٍ آخَرِينَ (133)
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| − | ترجمه
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| − | و پروردگار تو بىنياز صاحب رحمت است اگر خواهد مىبرد شما را و جانشين ميگرداند بعد از شما آنچه را خواهد چنانچه پديد آورد شما را از نسل گروه ديگران.
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| − | تفسير
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| − | خداوند بىنياز است از بندگان و عبادت آنها و مهربان و عطوف است نسبت بايشان و براى اين است كه خير و شرّ آنها را بيان ميفرمايد و ايشان را مكلّف باطاعت و عبادت خود ميكند تا نائل بمنافع و مأمون از مضار شوند و اگر اراده فرمايد ميتواند تمام كفّار و فجّار را در يك آن هلاك فرمايد و قوم ديگرى را خلق نمايد كه آنها همگى
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| − | جلد 2 صفحه 384
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| − | عبادت و اطاعت حق را نمايند چنانچه شما را از نسل اصحاب سفينه نوح خلق فرمود كه آنها همگى اطاعت حق را مينمودند ولى مصلحت در آنستكه امر و نهى و وعد و وعيد و مطيع و عاصى و بهشت و دوزخ و ثواب و عقاب باشد و هر كس باستحقاق بمقام لايق خود برسد ..
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| − | اطیب البیان=
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| − | ===اطیب البیان (سید عبدالحسین طیب)===
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| − | {{نمایش فشرده تفسیر|
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| − | وَ رَبُّكَ الغَنِيُّ ذُو الرَّحمَةِ إِن يَشَأ يُذهِبكُم وَ يَستَخلِف مِن بَعدِكُم ما يَشاءُ كَما أَنشَأَكُم مِن ذُرِّيَّةِ قَومٍ آخَرِينَ (133)
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| − | و پروردگار تو دارندهايست صاحب رحمت اگر بخواهد شماها را ببرد و جاي شما بعد از شما آنچه را که ميخواهد قرار دهد همين نحوي که شما را ايجاد فرمود از ذريّه قوم ديگران.
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| − | وَ رَبُّكَ الغَنِيُّ نوع حكماء و علماء غني را از صفات سلبيه و بمعني بينيازي گرفتند يعني عدم احتياج چنانچه گفتند:
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| − | نه مركّب بود نه جسم نه جوهر نه عرض || بي شريك است و معاني تو غني دان خالق
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| − | و در نصاب گويد
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| − | (چون غني دان بينيازي || ور بمد خواني سرود)
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| − | لكن بعقيده اينجانب غني از صفات ثبوتيه ذاتيه غير اضافيه است و اعظم صفات است بمعني
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| − | جلد 7 - صفحه 211
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| − | دارندگي و داراييست شامل جميع صفات ذاتيه است داراي علم، قدرت، حيات، اراده، عظمت، كبريايي و ساير صفات ربوبي است بلي لازمه غني بينيازيست دارنده احتياج ندارد و دليل بر اينکه مدعي اينكه فقر و احتياج امر عدمي است بمعني نيستي در مقابلش غني امر وجوديست در آيه شريفه هم ميفرمايدأنبه يا أَيُّهَا النّاسُ أَنتُمُ الفُقَراءُ إِلَي اللّهِ وَ اللّهُ هُوَ الغَنِيُّ فاطر آيه 16، زيرا غني در مقابل فقر داراييست بلكه همين آيه هم دلالت دارد چون توصيف فرموده ذُو الرَّحمَةِ زيرا صاحب رحمت مناسب با داراييست و همين نحو که در لغت استعمال شده در بينيازي استعمال در دارندگي هم شده، احكامي که بر غني و فقير بار شده اغنياء و فقراء تمام باين معنا است حتي در نصاب که استشهاد كرده بود در جاي ديگر ميگويد (غني مالدار است و مسكين گدا) و امّا رحمت بقدري توسعه دارد که از صفات بارزه حق در بِسمِ اللّهِ الرَّحمنِ الرَّحِيمِ است که شرح آن در تفسير بسمله اول سوره حمد مفصلا ذكر شده و در آيه شريفه وَ رَحمَتِي وَسِعَت كُلَّ شَيءٍ اعراف آيه 155، و از قول ملائكه رَبَّنا وَسِعتَ كُلَّ شَيءٍ رَحمَةً وَ عِلماً مؤمن آيه 7، که بقدر توسعه علم رحمت وسعت دارد در اول دعاء كميل
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| − | (اللهم انّي اسئلك برحمتك الّتي وسعت کل شيء)
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| − | و در حديث است رحمت صد جزء دارد يك جزء آن را خداوند در دنيا فرستاده که باين يك جزء محبتهاي باولاد و آباء و امّهات و ارحام و افراد نسبت بيكديگر دارند و فرداي قيامت باتمام رحمت نسبت بمؤمنين رفتار ميشود و تعبير بصد جزء هم براي كثرت است نه اينكه محدود باشد.
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| − | إِن يَشَأ يُذهِبكُم دنيا دار ممرّ است بايد در هر زماني يك دسته بروند و دسته ديگر جايگير شوند.
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| − | ايكه در پشت زميني همه وقت آن تو نيست || ديگران در رحم مادر و پشت پدرند
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| − | امير المؤمنين عليه السّلام فرمود
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| − | (الدنيا دار ممرّ و الاخرة دار مقرّ فخذوا من ممركم
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| − | جلد 7 - صفحه 212
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| − | لمقركم و اخرجوا من الدنيا قلوبكم قبل ان يخرج منها ابدانكم)
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| − | البته بموقع رسيدن اجل شما بايد برويد.
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| − | وَ يَستَخلِف مِن بَعدِكُم ما يَشاءُ آنچه حكمت اقتضاء كند و اراده حق تعلق گيرد كَما أَنشَأَكُم انشاء ايجاد است و انشاءات حق دو قسم است تكويني ايجاد مخلوقات و تشريعي جعل احكام و قوانين مِن ذُرِّيَّةِ قَومٍ آخَرِينَ که آباء و امّهات و اجداد و جدات تا حضرت آدم و حوّاء و از اينکه طرف اولاد و احفاد تا آخر دنيا و بالجمله دنيا سرائيست دو درب مثل گمركات از درب رحم وارد ميشوند و از درب قبر خارج ميشوند و پيغمبر صلّي اللّه عليه و آله و سلّم فرمود
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| − | (و السير بكم سريع)
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| − | که مفصلا اينکه حديث را در مقدمه كتاب در باب وجوب تمسك بقرآن شرح كرديم.
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| − | برگزیده تفسیر نمونه=
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| − | ===برگزیده تفسیر نمونه===
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| − | {{نمایش فشرده تفسیر|
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| − | (آیه 133)
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| − | این آیه در واقع استدلالی است برای آنچه در آیات پیش در زمینه عدم ظلم پروردگار بیان شد، می گوید: «پروردگار تو، هم بینیاز است، و هم رحیم و مهربان» (وَ رَبُّکَ الغَنِیُّ ذُو الرَّحمَةِ).
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| − | بنابراین، دلیلی ندارد که بر کسی کوچکترین ستم روا دارد، زیرا کسی ستم می کند که یا نیازمند باشد یا خشن و سنگدل به علاوه نه نیازی به اطاعت شما دارد و نه بیمی از گناهانتان، زیرا «اگر بخواهد همه شما را می برد و به جای شما کسان دیگری را که بخواهد جانشین می سازد همان طور که شما را از دودمان انسانهای دیگری که در بسیاری از صفات با شما متفاوت بودند آفرید» (إِن یشَأ یذهِبکم وَ یستَخلِف مِن بَعدِکم ما یشاءُ کما أَنشَأَکم مِن ذُرِّیةِ قَومٍ آخَرِینَ).
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| − | بنابراین، او هم بی نیاز و هم مهربان و هم قادر بر هر چیز است با این حال تصور ظلم در باره او ممکن نیست.
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| − | سایر تفاسیر=
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| − | سایرتفاسیر این آیه را می توانید در سایت قرآن مشاهده کنید:
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| − | ==تفسیر های فارسی==
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| − | ==={{ترجمه تفسیر المیزان|سوره=6 |آیه=133}}===
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| − | ==={{تفسیر خسروی|سوره=6 |آیه=133}}===
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| − | ==={{تفسیر عاملی|سوره=6 |آیه=133}}===
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| − | ==={{تفسیر جامع|سوره=6 |آیه=133}}===
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| − | ==تفسیر های عربی==
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| − | ==={{تفسیر المیزان|سوره=6 |آیه=133}}===
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| − | ==={{تفسیر مجمع البیان|سوره=6 |آیه=133}}===
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| − | ==={{تفسیر نور الثقلین|سوره=6 |آیه=133}}===
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| − | ==={{تفسیر الصافی|سوره=6 |آیه=133}}===
| |
| − | ==={{تفسیر الکاشف|سوره=6 |آیه=133}}===
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| − | </tabber>
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| | ==پانویس== | | ==پانویس== |