|
|
| سطر ۴۴: |
سطر ۴۴: |
| | | | |
| | == تفسیر آیه == | | == تفسیر آیه == |
| − | <tabber> | + | <tafsir sura="78" ayeh="4" /> |
| − | تفسیر نور=
| |
| | | | |
| − | ===تفسیر نور (محسن قرائتی)===
| |
| | | | |
| − | {{ نمایش فشرده تفسیر|
| |
| − | عَمَّ يَتَساءَلُونَ «1» عَنِ النَّبَإِ الْعَظِيمِ «2» الَّذِي هُمْ فِيهِ مُخْتَلِفُونَ «3» كَلَّا سَيَعْلَمُونَ «4» ثُمَّ كَلَّا سَيَعْلَمُونَ «5»
| |
| | | | |
| − | درباره چه از يكديگر مىپرسند؟ از خبر بزرگ. همان كه ايشان در باره آن اختلاف دارند. چنين نيست؛ زود است كه بدانند. باز چنين نيست؛ زود است كه بدانند.
| |
| − |
| |
| − | جلد 10 - صفحه 359
| |
| − |
| |
| − | ===نکته ها===
| |
| − |
| |
| − | واژه «نبأ» به معناى خبرِ مهم و حتمى است كه از آيات بعد فهميده مىشود مراد از آن خبر برپاشدن قيامت و رستاخيز است.
| |
| − |
| |
| − | در روايات، حضرت على عليه السلام به عنوان يكى از مصاديقِ «نَبَأٌ عَظِيمٌ» معرّفى شده است. «1»
| |
| − |
| |
| − | درباره معاد، كفار چند گروهند: «الَّذِي هُمْ فِيهِ مُخْتَلِفُونَ» بعضى آنرا محال و برخى بعيد دانسته و برخى ترديد مىورزند و برخى ديگر لجاجت مىكنند.
| |
| − |
| |
| − | سؤال، گاهى براى فهميدن مطلب است كه مورد تأييد و تأكيد قرآن است، چنانكه مىفرمايد: «فَسْئَلُوا أَهْلَ الذِّكْرِ» «2»* امّا گاهى سؤال، براى ايجاد تشكيك و ترديد در ذهن ديگران است، آنهم در امور قطعى و حتمى مانند وقوع قيامت كه قرآن در اين آيات، آن را مورد مذمّت قرار مىدهد.
| |
| − |
| |
| − | ===پیام ها===
| |
| − |
| |
| − | 1- شروع سخن با طرح سؤال، در تأثير كلام مؤثّر است. «عَمَّ يَتَساءَلُونَ»
| |
| − |
| |
| − | 2- تشكيك در قيامت، كار كافران است. «يَتَساءَلُونَ عَنِ النَّبَإِ الْعَظِيمِ»
| |
| − |
| |
| − | 3- اگر سوال طبيعى بود بايد جواب داد: يسئلونك ... قل ولى اگر شيطنت بود.
| |
| − |
| |
| − | برخورد لازم است. «كَلَّا سَيَعْلَمُونَ»
| |
| − |
| |
| − | 4- در برابر طعنه و كنايه به مقدّسات و باورهاى قطعى، با قاطعيّت بايد سخن گفت. «كَلَّا»
| |
| − |
| |
| − | 5- در برابر ترديد، بايد حرف حق را تكرار كرد. كَلَّا سَيَعْلَمُونَ ... كَلَّا سَيَعْلَمُونَ
| |
| − |
| |
| − | 6- قيامت دورنيست. «سَيَعْلَمُونَ» (حرف سين رمز نزديك بودن است)
| |
| − |
| |
| − | 7- قيامت، روز كشف حقائق است. «سَيَعْلَمُونَ»
| |
| − |
| |
| − | «1». تفسير نورالثقلين.
| |
| − |
| |
| − | «2». نحل، 43.
| |
| − |
| |
| − | تفسير نور(10جلدى)، ج10، ص: 360
| |
| − | }}
| |
| − |
| |
| − | |-|
| |
| − | اثنی عشری=
| |
| − |
| |
| − | ===تفسیر اثنی عشری (حسینی شاه عبدالعظیمی)===
| |
| − |
| |
| − | {{نمایش فشرده تفسیر|
| |
| − |
| |
| − |
| |
| − | كَلاَّ سَيَعْلَمُونَ «4»
| |
| − |
| |
| − | كَلَّا سَيَعْلَمُونَ: بايد باز ايستند از اين سؤال؛ نه چنان است كه ايشان گويند، زود باشد كه بدانند نزديك نزع، حقيقت آنچه در آن اختلاف مىكنند.
| |
| − |
| |
| − |
| |
| − | }}
| |
| − | |-|
| |
| − | روان جاوید=
| |
| − | ===تفسیر روان جاوید (ثقفى تهرانى)===
| |
| − | {{نمایش فشرده تفسیر|
| |
| − | بِسْمِ اللَّهِ الرَّحْمنِ الرَّحِيمِ
| |
| − |
| |
| − | عَمَّ يَتَساءَلُونَ «1» عَنِ النَّبَإِ الْعَظِيمِ «2» الَّذِي هُمْ فِيهِ مُخْتَلِفُونَ «3» كَلاَّ سَيَعْلَمُونَ «4»
| |
| − |
| |
| − | ثُمَّ كَلاَّ سَيَعْلَمُونَ «5» أَ لَمْ نَجْعَلِ الْأَرْضَ مِهاداً «6» وَ الْجِبالَ أَوْتاداً «7» وَ خَلَقْناكُمْ أَزْواجاً «8» وَ جَعَلْنا نَوْمَكُمْ سُباتاً «9»
| |
| − |
| |
| − | وَ جَعَلْنَا اللَّيْلَ لِباساً «10» وَ جَعَلْنَا النَّهارَ مَعاشاً «11» وَ بَنَيْنا فَوْقَكُمْ سَبْعاً شِداداً «12» وَ جَعَلْنا سِراجاً وَهَّاجاً «13» وَ أَنْزَلْنا مِنَ الْمُعْصِراتِ ماءً ثَجَّاجاً «14»
| |
| − |
| |
| − | لِنُخْرِجَ بِهِ حَبًّا وَ نَباتاً «15» وَ جَنَّاتٍ أَلْفافاً «16»
| |
| − |
| |
| − | ترجمه
| |
| − |
| |
| − | از چه سؤال ميكنند از يكديگر
| |
| − |
| |
| − | از خبر بزرگى
| |
| − |
| |
| − | كه آنان در آن اختلاف دارند
| |
| − |
| |
| − | نه چنين است زود است كه بدانند
| |
| − |
| |
| − | پس نه چنين است زود است كه بدانند
| |
| − |
| |
| − | آيا قرار نداديم زمين را فرشى گسترده
| |
| − |
| |
| − | و كوهها را ميخها
| |
| − |
| |
| − | و آفريديم شما را جفتها مرد و زن
| |
| − |
| |
| − | و قرار داديم خوابتان را آسايش
| |
| − |
| |
| − | و قرار داديم شب را پوشش
| |
| − |
| |
| − | و قرار داديم روز را وقت معيشت
| |
| − |
| |
| − | و بنا كرديم بالاى سر شما هفت طبقه محكم
| |
| − |
| |
| − | و قرار داديم چراغى درخشان
| |
| − |
| |
| − | و فرو فرستاديم از ابرهاى متراكم بفشار بر يكديگر آب ريزان پى در پى را
| |
| − |
| |
| − | تا بيرون آوريم بآن حبوبات و گياه را
| |
| − |
| |
| − | و بوستانهائى كه بهم پيچيده باشد درختان آنها.
| |
| − |
| |
| − | تفسير
| |
| − |
| |
| − | گفتهاند بعد از بعثت حضرت ختمى مرتبت و اخبار او از توحيد خدا و حشر مردم در روز جزا و تلاوت آيات قرآن كفّار مكه از يكديگر بر سبيل تعجّب و انكار سؤال مينمودند كه اين چه سخنانى است محمّد ميگويد لذا خداوند براى اهميّت دادن بقضيّه و آنچه از آن سؤال مينمودند ميفرمايد از چه امر اين مردم از يكديگر سؤال ميكنند و بيان ميفرمايد از خبر بزرگى كه در آن اختلاف دارند و عمّ در اصل عن ما بوده نون قلب بميم و در ميم ادغام شده و الف براى اتّصال ما بحرف جرّ حذف شده و گفتهاند عمده نظر آنها باخبار پيغمبر صلّى اللّه عليه و آله و سلّم از اوضاع
| |
| − |
| |
| − | جلد 5 صفحه 331
| |
| − |
| |
| − | قيامت بوده ولى در روايات ائمه اطهار نبأ عظيم بولايت امير المؤمنين عليه السّلام و وجود مبارك آنحضرت تفسير شده و آنكه نبأ و آيتى بزرگتر از او نيست و آنكه پيغمبر صلّى اللّه عليه و آله و سلّم بآن تصريح نموده و ظاهرا نبأ عظيم شامل است تمام معارف حقّه را از توحيد و عدل و نبوّت و امامت و معاد روز قيامت و آنچه را مورد اختلاف است در بين مردم و در روايات بيان مصداق شده كه اختصاص بمعاد داده نشود و اختلاف در مقام امير المؤمنين عليه السّلام بيشتر از ساير معارف حقّه شده لذا با آنحضرت انسب است و بعدا خداوند منع فرموده سؤال از يكديگر را و به اشاره وعده مجازات بر آن داده چون فرموده نه چنين است كه تصوّر نمودهاند بعد از اين ميدانند كه حق است آنچه پيغمبر صلّى اللّه عليه و آله و سلّم از آن خبر داده و باز تأكيد فرموده اينمعنى را براى مبالغه و بكلمه ثمّ اشاره فرموده به اشدّيّت وعيد دوّم از اوّل و محتمل است اوّل اشاره ببعد از مرگ باشد و دوم اشاره بقيامت و بيان فرموده آيات توحيد و قدرت كامله خود را باين تقريب كه آيا قرار نداديم زمين را بساط گسترده مهيّا براى سكونت و آرامش و تصرّفات شما و نگردانيديم كوهها را ميخهاى محكم زمين تا متزلزل و متمايل به اطراف نگردد و آفريديم شما را جفتها مرد و زن تا با يكديگر مأنوس شويد و نسل شما در زمين باقى بماند و قرار داديم خواب شما را قاطع حس و حركت براى آسايش و استراحت و قرار داديم شب را براى شما مانند پوششى كه مستور دارد شما را از انظار يكديگر اگر بخواهيد از هم مخفى شويد و قمّى ره نقل فرموده كه قرار ميدهد شب را لباس براى روز و قرار داديم روز را وقت معيشت يعنى طلب معاش حلال براى شما و قرار داديم در بالاى سر شما هفت سقف محكم معظم مبرم را كه بمرور ايّام كهنه و خراب نگردد و قرار داديم خورشيد را چراغى پر نور و درخشان و با حرارت كه منافع آن بيشمار است و نازل نموديم از ابرهاى متراكم بفشار بر يكديگر باران شديد پى در پى را تا بيرون آوريم بسبب آن حبوباتى را كه ارزاق مردم است و روئيدنيهائى را كه خوراك حيوانات است و باغهائى را كه درختان سبز و خرّم آن سر در گريبان يكديگر كرده و بهم پيچيده شدهاند اينها همه براى آنستكه شما بوظائف خود عمل نمائيد و مستحق مقام
| |
| − |
| |
| − | جلد 5 صفحه 332
| |
| − |
| |
| − | برترى شويد.
| |
| − | }}
| |
| − | |-|
| |
| − | اطیب البیان=
| |
| − | ===اطیب البیان (سید عبدالحسین طیب)===
| |
| − | {{نمایش فشرده تفسیر|
| |
| − | كَلاّ سَيَعلَمُونَ «4»
| |
| − |
| |
| − | چنين نيست زود باشد که بدانند.
| |
| − |
| |
| − | كَلّا اينکه اختلاف باقي نميماند بزودي زود:
| |
| − |
| |
| − | سَيَعلَمُونَ همان حال احتضار که امير المؤمنين بالاي سر آنها حاضر ميشود و دستور به ملك الموت ميدهد که اينکه دوست من است براحتي قبض روح او را بكن يا دشمن من است بسختي جان او را بگير چنانچه به حارث همداني فرمود: من بالاي سر هر محتضر حاضر هستم:
| |
| − |
| |
| − | يا حار همدان من يمت يرني || من مؤمن او منافق قبلا
| |
| − |
| |
| − | و مرگ نزديكترين چيز است بانسان و پرده از چشم محتضر برداشته ميشود و جاي خود را در بهشت يا جهنم ميبيند، و ملائكه رحمت يا عذاب را مشاهده ميكند بر او معلوم ميشود لذا تعبير به سيعلمون فرمود که سين از براي نزديك است.
| |
| − | }}
| |
| − | |-|
| |
| − | برگزیده تفسیر نمونه=
| |
| − |
| |
| − | ===برگزیده تفسیر نمونه===
| |
| − | {{نمایش فشرده تفسیر|
| |
| − | ]
| |
| − |
| |
| − | (آیه 4)- سپس میافزاید: «چنین نیست که آنها فکر میکنند و به زودی میفهمند» (کلا سیعلمون).
| |
| − | }}
| |
| − | |-|
| |
| − |
| |
| − | سایر تفاسیر=
| |
| − | سایرتفاسیر این آیه را می توانید در سایت قرآن مشاهده کنید:
| |
| − |
| |
| − | ==تفسیر های فارسی==
| |
| − | ==={{ترجمه تفسیر المیزان|سوره=78 |آیه=4}}===
| |
| − | ==={{تفسیر خسروی|سوره=78 |آیه=4}}===
| |
| − | ==={{تفسیر عاملی|سوره=78 |آیه=4}}===
| |
| − | ==={{تفسیر جامع|سوره=78 |آیه=4}}===
| |
| − |
| |
| − | ==تفسیر های عربی==
| |
| − | ==={{تفسیر المیزان|سوره=78 |آیه=4}}===
| |
| − | ==={{تفسیر مجمع البیان|سوره=78 |آیه=4}}===
| |
| − | ==={{تفسیر نور الثقلین|سوره=78 |آیه=4}}===
| |
| − | ==={{تفسیر الصافی|سوره=78 |آیه=4}}===
| |
| − | ==={{تفسیر الکاشف|سوره=78 |آیه=4}}===
| |
| − | </tabber>
| |
| | | | |
| | ==پانویس== | | ==پانویس== |