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| سطر ۴۴: |
سطر ۴۴: |
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| | == تفسیر آیه == | | == تفسیر آیه == |
| − | <tabber> | + | <tafsir sura="59" ayeh="16" /> |
| − | تفسیر نور=
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| − | ===تفسیر نور (محسن قرائتی)===
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| − | {{ نمایش فشرده تفسیر|
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| − | كَمَثَلِ الشَّيْطانِ إِذْ قالَ لِلْإِنْسانِ اكْفُرْ فَلَمَّا كَفَرَ قالَ إِنِّي بَرِيءٌ مِنْكَ إِنِّي أَخافُ اللَّهَ رَبَّ الْعالَمِينَ «16»
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| − | (فريب اهل كتاب از منافقان،) مثل (اغفال) شيطان است آنگاه كه به انسان گفت: كافر شو، پس چون كفر ورزيد، گفت: من از تو تبرّى مىجويم، من از خداوندى كه پروردگار جهانيان است مىترسم.
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| − | فَكانَ عاقِبَتَهُما أَنَّهُما فِي النَّارِ خالِدَيْنِ فِيها وَ ذلِكَ جَزاءُ الظَّالِمِينَ «17»
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| − | پس سرانجام آن دو، (شيطان و منافقان كافر) آن است كه آن دو جاودانه در آتشند و اين كيفر ستمگران است.
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| − | ===نکته ها===
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| − | اين آيه در ادامه آيه قبل، منافقان را به شيطان تشبيه كرده است كه همواره به مردم وعده
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| − | جلد 9 - صفحه 557
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| − | مىدهد، ولى وعدههايش جز فريب نيست. چه بسيارند افراد و حكومتهاى شيطان صفت كه وعدههايى به وابستگان خود مىدهند، ولى روز خطر آنان را به حال خود رها مىكنند.
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| − | ابن عباس در ذيل اين آيات، اين ماجرا را نقل مىكند:
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| − | در بنىاسرائيل، عابدى بود به نام برصيصا كه سالها عبادت مىكرد و مشهور شد و مردم بيماران خود را براى شفا و درمان نزد او مىآوردند. تا اين كه روزى زنى از اشراف را نزد او آوردند، شيطان او را وسوسه كرد و او به آن زن تجاوز كرد. سپس او را كشت و در بيابان دفن كرد. برادران زن فهميدند و مسئله شايع شد و عابد از موقعيّت خود سرنگون گشت. حاكم وقت او را احضار و او به گناه خود اقرار كرد و حكم صادر شد كه به دار آويخته شود. در اين هنگام شيطان نزد او مجسّم شد كه وسوسه من تو را به اين روز انداخت، اگر به من سجده كنى تو را آزاد مىسازم. عابد گفت: توان سجده ندارم، شيطان گفت: با اشاره ابرو به من سجده كن، او چنين كرد و به كلى دين خود را از دست داد و سرانجام نيز كشته شد. «1»
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| − | شيطان، هر كس را به گونهاى گمراه و از راه به دور مىكند:
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| − | عابد بنىاسرائيل از راه عبادتش به گناه گرفتار مىشود.
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| − | قارون به علم و مديريّتش مغرور مىشود. «عَلى عِلْمٍ عِنْدِي» «2»
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| − | بلعمباعورا با داشتن اسم اعظم به سراغ هوسهاى خود مىرود. «آتَيْناهُ آياتِنا فَانْسَلَخَ مِنْها» «3»
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| − | سامرى به علم و هنر خود مغرور مىشود. «بَصُرْتُ بِما لَمْ يَبْصُرُوا» «4»
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| − | يكى به مال و ثروتش مغرور مىشود. «فَلَمَّا آتاهُمْ مِنْ فَضْلِهِ بَخِلُوا بِهِ» «5»
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| − | ديگرى به فرزندان پسر. «وَ بَنِينَ شُهُوداً» «6»
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| − | ديگرى به حكومت. «أَ لَيْسَ لِي مُلْكُ مِصْرَ» «7»
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| − | و ديگرى به تجهيزات و برج و بارو. «جابُوا الصَّخْرَ بِالْوادِ» «8»، «تَنْحِتُونَ مِنَ الْجِبالِ بُيُوتاً» «9»
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| − | «1». تفاسير مجمع البيان، قرطبى و روح البيان.
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| − | «2». قصص، 78.
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| − | «3». اعراف، 175.
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| − | «4». طه، 96.
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| − | «5». توبه، 76.
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| − | «6». مدثر، 13.
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| − | «7». زخرف، 51.
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| − | «8». فجر، 9.
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| − | «9». شعراء، 149.
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| − | جلد 9 - صفحه 558
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| − | شباهتهاى منافقان با شيطان
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| − | 1. هر دو دشمن انسان هستند: «إِنَّهُ لَكُمْ عَدُوٌّ مُبِينٌ»* «1»، «هُمُ الْعَدُوُّ» «2»
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| − | 2. هر دو مردم را به فحشا و منكر مىخوانند: «يَأْمُرُكُمْ بِالْفَحْشاءِ» «3»، «يَأْمُرُونَ بِالْمُنْكَرِ» «4»
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| − | 3. از هر دو بايد دور شد: «وَ لا تَتَّبِعُوا خُطُواتِ الشَّيْطانِ»* «5»، «فَاحْذَرُوهُمْ» «6»
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| − | 4. هر دو چند چهره و ظاهر فريبند: كَمَثَلِ الشَّيْطانِ إِذْ قالَ لِلْإِنْسانِ اكْفُرْ ... قالَ إِنِّي بَرِيءٌ مِنْكَ، «وَ إِذا لَقُوا الَّذِينَ آمَنُوا قالُوا آمَنَّا وَ إِذا خَلَوْا إِلى شَياطِينِهِمْ قالُوا إِنَّا مَعَكُمْ» «7»
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| − | 5. هر دو با شعار خيرخواهى، اغفال مىكنند: «هَلْ أَدُلُّكَ عَلى شَجَرَةِ الْخُلْدِ» «8»، «قالُوا إِنَّما نَحْنُ مُصْلِحُونَ» «9»
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| − | 6. جايگاه هردو دوزخ است: «أَنَّهُما فِي النَّارِ» «10»، «إِنَّ الْمُنافِقِينَ فِي الدَّرْكِ الْأَسْفَلِ مِنَ النَّارِ» «11»
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| − | ===پیام ها===
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| − | 1- براى اثبات مطلب يا نفوذ بيشتر در مخاطب، مىتوان از چند نمونه و تجربه استفاده كرد. كَمَثَلِ الَّذِينَ مِنْ قَبْلِهِمْ ... كَمَثَلِ الشَّيْطانِ
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| − | 2- وسوسهها و تحريكات منافقان، نمونهاى از وسوسههاى شيطان است. كَمَثَلِ الَّذِينَ ... كَمَثَلِ الشَّيْطانِ
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| − | 3- شيطان، فقط دعوت به انحراف مىكند، اين انسان است كه با اختيار خود، انحراف را مىپذيرد. اكْفُرْ ... فَلَمَّا كَفَرَ
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| − | «1». يس، 60.
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| − | «2». منافقون، 4.
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| − | «3». بقره، 268.
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| − | «4». توبه، 67.
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| − | «5». بقره، 208.
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| − | «6». منافقون، 4.
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| − | «7». بقره، 14.
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| − | «8». طه، 120.
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| − | «9». بقره، 11.
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| − | «10». حشر، 17.
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| − | «11». نساء، 145.
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| − | جلد 9 - صفحه 559
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| − | 4- شيطان، رفيق نيمه راه است. «اكْفُرْ فَلَمَّا كَفَرَ قالَ إِنِّي بَرِيءٌ»
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| − | 5- كار انسان بىدين به جايى مىرسد كه شيطان هم از او برائت مىجويد. «إِنِّي بَرِيءٌ مِنْكَ»
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| − | 6- شيطان و منافقان، خوف از خدا را توجيهى براى خلف وعده و يارى نكردن خود قرار مىدهند. «إِنِّي أَخافُ اللَّهَ» سرانجام نفاق و كفر، آتش جاودان است
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| − | اثنی عشری=
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| − | ===تفسیر اثنی عشری (حسینی شاه عبدالعظیمی)===
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| − | {{نمایش فشرده تفسیر|
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| − | كَمَثَلِ الشَّيْطانِ إِذْ قالَ لِلْإِنْسانِ اكْفُرْ فَلَمَّا كَفَرَ قالَ إِنِّي بَرِيءٌ مِنْكَ إِنِّي أَخافُ اللَّهَ رَبَّ الْعالَمِينَ «16»
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| − | جلد 13 - صفحه 108
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| − | كَمَثَلِ الشَّيْطانِ: مانند شيطان است، إِذْ قالَ لِلْإِنْسانِ اكْفُرْ: چون گفت مر آدمى را كه كافر بشو و بر كفر خود ثابت باش كه من معاون و مصاحب توام فَلَمَّا كَفَرَ: پس چون بر كفر ثبات ورزيد و نهال كفر در قلبش استحكام يافت، قالَ إِنِّي بَرِيءٌ مِنْكَ: گفت شيطان بدرستى كه من بيزارم از تو، إِنِّي أَخافُ اللَّهَ: بدرستى كه من مىترسم از خدا، رَبَّ الْعالَمِينَ: كه پروردگار عالميان است، يعنى ترسناكم از آنكه حق تعالى روز قيامت مرا شريك تو سازد در عذاب و عقاب.
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| − | تنبيه: در اين انسان، كه به اغواى شيطان كافر شد، سه قول است:
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| − | 1- جنس انسانى كه شيطان هميشه آدمى را بر كفر مىخواند، و در وقت حاجت از او تبرى كند.
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| − | 2- مراد از انسان، ابو جهل است، چه وقتى به بدر متوجه شد، از بنى كنانه متوهم بود. شيطان به صورت سراقه كه رئيس بنى كنانه بود برآمده، گفت: اى ابو الحكم «لا غالب لكم اليوم من النّاس و انّى جار لكم ... انّى برىء منكم».
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| − | مترس كه هيچكس بر شما غالب نشود و من رفيق و مصاحب شما هستم. چون به بدر رسيدند، شيطان ديد كه ملائكه به مدد اهل اسلام نازل شوند، از عقاب الهى ترسيد، بگريخت و گفت: من از شما بيزارم كه در سوره انفال ذكر شده است.
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| − | 3- طبرسى رحمه اللّه از ابن عباس روايت نموده كه: عابدى در بنى اسرائيل بود كه او را برصيصا مىگفتند. سالها عبادت پروردگار كرد تا آنكه مستجاب الدعوه شد و بيماران و ديوانگان را نزد او مىآوردند و او دعا مىكرد و شفا مىيافتند. پس زنى از اشراف را جنون عارض شد. به نزد او آوردند كه دعا كند. و آن زن برادرانى داشت. چون آن زن را نزد او گذاشتند، شيطان او را وسوسه كرد تا عاقبت با او زنا نمود و حامله شد. ترسيد كه رسوا شود، آن زن را كشت و دفن نمود. پس شيطان به نزد برادران او آمده گفت:
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| − | جلد 13 - صفحه 109
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| − | عابد با خواهر شما زنا نموده، به جهت رسوائى او را كشته و دفن نموده در فلان موضع. اين سخن را به يكديگر گفتند، خبر منتشر شد تا به سلطان رسيد. پس شاه با مردمان به معبد او رفتند و بر آن حال مطلع شدند، و او اقرار نمود كه من چنين كردم. پس شاه امر نمود او را بر دار كشيدند. شيطان ممثّل شده نزد او آمده گفت: من تو را به اين بليه گرفتار كردم و رسوا نمودم، اگر اطاعت من كنى تو را از كشتن خلاص نمايم. عابد گفت: در چه باب اطاعت تو بكنم؟
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| − | گفت: مرا سجده كن. عابد گفت: چگونه تو را سجده كنم با اين حال؟
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| − | گفت: اشاره كن. پس به اشاره سجده نمود براى شيطان و كافر شد. شيطان از او بيزارى جست و او را كشتند، چنانچه آيه شريفه اشاره به اين قصه است:
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| − | كَمَثَلِ الشَّيْطانِ إِذْ قالَ لِلْإِنْسانِ اكْفُرْ.
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| − | تتمه: اين قضيه عبرت و تذكرى است به مكائد شيطان كه شخص مؤمن عاقل، غافل نبايد باشد.
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| − | در فرمايشات خداى تعالى به حضرت موسى عليه السّلام فرمايد: ما دمت لا ترى الشّيطان ميّتا فلا تأمن مكره: مادامى كه علم پيدا نكردى كه شيطان مرده است، پس ايمن مباش از مكر او.
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| − | روان جاوید=
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| − | ===تفسیر روان جاوید (ثقفى تهرانى)===
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| − | {{نمایش فشرده تفسیر|
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| − | كَمَثَلِ الشَّيْطانِ إِذْ قالَ لِلْإِنْسانِ اكْفُرْ فَلَمَّا كَفَرَ قالَ إِنِّي بَرِيءٌ مِنْكَ إِنِّي أَخافُ اللَّهَ رَبَّ الْعالَمِينَ «16» فَكانَ عاقِبَتَهُما أَنَّهُما فِي النَّارِ خالِدَيْنِ فِيها وَ ذلِكَ جَزاءُ الظَّالِمِينَ «17» يا أَيُّهَا الَّذِينَ آمَنُوا اتَّقُوا اللَّهَ وَ لْتَنْظُرْ نَفْسٌ ما قَدَّمَتْ لِغَدٍ وَ اتَّقُوا اللَّهَ إِنَّ اللَّهَ خَبِيرٌ بِما تَعْمَلُونَ «18» وَ لا تَكُونُوا كَالَّذِينَ نَسُوا اللَّهَ فَأَنْساهُمْ أَنْفُسَهُمْ أُولئِكَ هُمُ الْفاسِقُونَ «19» لا يَسْتَوِي أَصْحابُ النَّارِ وَ أَصْحابُ الْجَنَّةِ أَصْحابُ الْجَنَّةِ هُمُ الْفائِزُونَ «20»
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| − | ترجمه
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| − | مانند شيطان هنگاميكه گفت بانسان كافر شو پس چون كافر شد گفت همانا من بيزارم از تو همانا من ميترسم از خدا كه پروردگار جهانيان است
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| − | پس سر انجام كار آن دو آن شد كه هر دو در آتشند جاودانيان در آن و اين جزاى ستمكارانست
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| − | اى كسانيكه ايمان آورديد بترسيد از خدا و بايد نظر كند هر كس و ببيند كه چه پيش فرستاده براى فردا و بترسيد از خدا همانا خدا آگاه است بآنچه ميكنيد
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| − | و مباشيد مانند آنانكه فراموش كردند خدا را پس از ياد آنها برد خودشان را آن گروه آنانند متمرّدان
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| − | برابر نيستند اهل آتش و اهل بهشت اهل بهشت ايشانند كاميابان.
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| − | تفسير
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| − | خداوند متعال در تعقيب احوال بنى نضير مثلى براى منافقين و آنها زده باين تقريب كه مثل منافقين در اغراء يهود و ترك نصرت بنى نضير مثل شيطان است كه بانسان ميگويد كافر شو و كفر را در نظر انسان جلوه ميدهد ولى در دم مرگ يا قيامت از او و عملش تبرّى ميجويد و مدّعى ترس از خدا ميشود براى آنكه در عذاب او شريك نشود ولى براى هيچيك فائده و اثرى ندارد و بالاخره هر دو مخلّد در آتش جهنّم ميشوند چون ستمكار بر خود و خلقند و هر فرد از اهل ايمان در دنيا بايد متوجّه اين امر باشد كه براى فرداى قيامت خود چه عمل خير يا شرّى پيش فرستاده و اينكه از آخرت بفردا تعبير فرموده براى نزديكى و تحقّق وقوع آنست و براى آنكه دنيا مانند يك روز و آخرت فرداى آنروز است و تنكير غد براى تعظيم است و تكرار امر بتقوى يا براى تأكيد است يا براى اشاره به دو ركن توبه كه ندامت از گناه سابق و عزم بر ترك آن در لاحق است و البته خداوند آگاه است از اعمال سابقه و لاحقه بندگان از خير و شرّ در تمام احوال و بر طبق آن پاداش خواهد داد و كيفر خواهد فرمود و نبايد مؤمنين مانند كسانى باشند كه فراموش نمودند اداء حقّ ربوبيّت را و خدا هم آنها را بحال خودشان واگذار فرمود و در نتيجه
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| − | جلد 5 صفحه 180
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| − | فراموش كردند جلب نفع و دفع ضرر از خودشان را و مرتكب معصيت شدند و ترك طاعت نمودند و بمضار آن مبتلا و از منافع اين محروم گشتند و البته كسانيكه باعمال بد مستحق جهنّم شدند مساوى نيستند با كسانيكه باعمال خوب مستحق بهشت شدند آنها محروم از خير و اينها فائز بنعيم ابدى خواهند بود در عيون از امام رضا عليه السّلام نقل نموده كه پيغمبر صلّى اللّه عليه و آله و سلّم اين آيه را تلاوت نمود و فرمود اصحاب جنّت كسى است كه اطاعت نمايد مرا و تسليم شود براى على بن ابى طالب عليه السّلام بعد از من و اقرار كند بولايت او و اصحاب نار كسى است كه دشمنى و عناد نمايد با مقام ولايت و نقض عهد كند و با او مقاتله نمايد.
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| − | اطیب البیان=
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| − | ===اطیب البیان (سید عبدالحسین طیب)===
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| − | {{نمایش فشرده تفسیر|
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| − | كَمَثَلِ الشَّيطانِ إِذ قالَ لِلإِنسانِ اكفُر فَلَمّا كَفَرَ قالَ إِنِّي بَرِيءٌ مِنكَ إِنِّي أَخافُ اللّهَ رَبَّ العالَمِينَ «16»
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| − | مثل مثل شيطان زماني که ميگويد براي انسان که كافر شو پس چون كافر شد ميگويد، من بيزارم از تو من ميترسم از خدايي که پروردگار عالميان است.
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| − | كَمَثَلِ الشَّيطانِ که در قلوب وسوسه ميكند.
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| − | إِذ قالَ لِلإِنسانِ اكفُر که اغوي ميكند و قسم ياد كرده که تمام را اغوي ميكنم: قالَ فَبِعِزَّتِكَ لَأُغوِيَنَّهُم أَجمَعِينَ إِلّا عِبادَكَ مِنهُمُ المُخلَصِينَ ص آيه 83 و 84.
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| − | فَلَمّا كَفَرَ الانسان (قال) الشيطان.
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| − | إِنِّي بَرِيءٌ مِنكَ همين نحوي که منافقين برائت جستند از يهود.
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| − | إِنِّي أَخافُ اللّهَ رَبَّ العالَمِينَ اينکه كلام هم از شيطان كذب است اگر شيطان خردلي خوف داشت همان وقتي که رانده درگاه شد توبه ميكرد و سجده بآدم مينمود با اينكه جهنّم را مشاهده ميكرد و عذابهاي آن را و خود را مشمول وَ إِنَّ عَلَيكَ لَعنَتِي إِلي يَومِ الدِّينِ ص آيه 79 نميكرد با اينكه خداوند باو فرمود:
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| − | لَأَملَأَنَّ جَهَنَّمَ مِنكَ وَ مِمَّن تَبِعَكَ مِنهُم أَجمَعِينَ ص آيه 85 و در جاي ديگر مكالمه شيطان را با اتباعش فرداي قيامت بيان ميفرمايد: وَ قالَ الشَّيطانُ لَمّا قُضِيَ الأَمرُ الي قوله تعالي: إِنَّ الظّالِمِينَ لَهُم عَذابٌ أَلِيمٌ ابراهيم آيه 26 و 27 و از اينکه آيه و آيات ديگر، بلكه حسّ و و جدان و عقل و برهان استفاده ميشود که بدتر از شيطان و اتباعش و منافقين و يهود نفس اماره است و هواي نفس که اگر نبود نه فريب شيطان را ميخوردند و نه فريب منافقين را.
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| − | 480
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| − | برگزیده تفسیر نمونه=
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| − | ===برگزیده تفسیر نمونه===
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| − | {{نمایش فشرده تفسیر|
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| − | (آیه 16)- با طناب پوسیده شیطان به چاه نروید! در این آیه به تشبیهی در باره منافقان پرداخته، میگوید: داستان آنها نیز «همچون شیطان است که به انسان گفت: کافر شو (تا مشکلات تو را حل کنم) اما هنگامی که کافر شد گفت: من از تو بیزارم، من از خداوندی که پروردگار عالمیان است بیم دارم» (کمثل الشیطان اذ قال للانسان اکفر فلما کفر قال انی بریء منک انی اخاف الله رب العالمین).
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| − | منظور از «انسان» مطلق انسانهائی است که تحت تأثیر شیطان قرار گرفته، فریب وعدههای دروغین او را میخورند و راه کفر میپویند، و سر انجام شیطان آنها را تنها گذاشته و از آنان بیزاری میجوید! آری! چنین است حال منافقان که دوستان خود را با وعدههای دروغین و نیرنگ به وسط معرکه میفرستند، سپس آنها را تنها گذارده فرار میکنند چرا که در نفاق وفاداری نیست.
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| − | سایر تفاسیر=
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| − | سایرتفاسیر این آیه را می توانید در سایت قرآن مشاهده کنید:
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| − | ==تفسیر های فارسی==
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| − | ==={{ترجمه تفسیر المیزان|سوره=59 |آیه=16}}===
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| − | ==={{تفسیر خسروی|سوره=59 |آیه=16}}===
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| − | ==={{تفسیر عاملی|سوره=59 |آیه=16}}===
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| − | ==={{تفسیر جامع|سوره=59 |آیه=16}}===
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| − | ==تفسیر های عربی==
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| − | ==={{تفسیر المیزان|سوره=59 |آیه=16}}===
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| − | ==={{تفسیر مجمع البیان|سوره=59 |آیه=16}}===
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| − | ==={{تفسیر نور الثقلین|سوره=59 |آیه=16}}===
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| − | ==={{تفسیر الصافی|سوره=59 |آیه=16}}===
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| − | ==={{تفسیر الکاشف|سوره=59 |آیه=16}}===
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| − | </tabber>
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| | ==پانویس== | | ==پانویس== |