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| سطر ۴۸: |
سطر ۴۸: |
| | این آیه درباره [[ابوجهل]] نازل شده است.<ref>تفاسیر على بن ابراهیم و برهان.</ref> | | این آیه درباره [[ابوجهل]] نازل شده است.<ref>تفاسیر على بن ابراهیم و برهان.</ref> |
| | == تفسیر آیه == | | == تفسیر آیه == |
| − | <tabber> | + | <tafsir sura="22" ayeh="8" /> |
| − | تفسیر نور=
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| − | ===تفسیر نور (محسن قرائتی)===
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| − | {{ نمایش فشرده تفسیر|
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| − | وَ مِنَ النَّاسِ مَنْ يُجادِلُ فِي اللَّهِ بِغَيْرِ عِلْمٍ وَ لا هُدىً وَ لا كِتابٍ مُنِيرٍ «8»
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| − | و از (ميان) مردم كسى است كه دربارهى خدا بدون هيچ دانش و هدايت و كتاب روشنى مجادله مىكند.
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| − | ===پیام ها===
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| − | 1- سعى كنيم كه در انتقاد، همه را توبيخ نكنيم. «وَ مِنَ النَّاسِ»
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| − | 2- جدال اگر از روى علم باشد مانعى ندارد. يُجادِلُ ... بِغَيْرِ عِلْمٍ
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| − | 3- راههاى شناخت انسان متعدّد است، گاهى از راه فكر و تعقّل و تحصيل بدست مىآيد كه شايد كلمه «بِغَيْرِ عِلْمٍ» اشاره به آن باشد و گاهى به دل الهام مىشود كه شايد كلمه «هُدىً» اشاره به آن باشد و گاهى از طريق كتب آسمانى و وحى و نبوّت. «وَ لا كِتابٍ مُنِيرٍ»
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| − | اثنی عشری=
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| − | ===تفسیر اثنی عشری (حسینی شاه عبدالعظیمی)===
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| − | وَ مِنَ النَّاسِ مَنْ يُجادِلُ فِي اللَّهِ بِغَيْرِ عِلْمٍ وَ لا هُدىً وَ لا كِتابٍ مُنِيرٍ «8»
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| − | وَ مِنَ النَّاسِ مَنْ يُجادِلُ فِي اللَّهِ: و از مردمان كسى است كه از روى عناد جدال مىكند در كلام خدا، يا در توحيد و قدرت الهى. نزد ابن عباس مراد ابو جهل است يا أبىّ يا نضر بن حرث «1»، و بنابراين تكرار براى تأكيد است. يا مراد از آيه اول رؤساى كفار، و مراد از آيه دوم تبعه ايشان و ساير مقلدان كه هر يك از ايشان طرح جدال مىافكنند. بِغَيْرِ عِلْمٍ وَ لا هُدىً: بدون دانائى و بىدليلى كه راه نمايد به مقصد. وَ لا كِتابٍ مُنِيرٍ: و نه كتاب روشنى كه بدان صواب از خطا روشن و ممتاز گردد. ممكن است غرض از تكرار دلالت باشد بر آن كه آن مجادل را هيچ سندى نيست بر مدعاى خود از علم ضرورى و استدلال و وحى، بلكه جدال او محض تقليد و تقليد محض مىباشد.
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| − | «1». تفسير ابن عباس در حاشيه درّ المنثور سيوطى، ج 3، ص 284، طبع با افست در كتابفروشى اسلاميّه تهران.
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| − | جلد 9 - صفحه 21
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| − | روان جاوید=
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| − | ===تفسیر روان جاوید (ثقفى تهرانى)===
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| − | {{نمایش فشرده تفسیر|
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| − | وَ مِنَ النَّاسِ مَنْ يُجادِلُ فِي اللَّهِ بِغَيْرِ عِلْمٍ وَ لا هُدىً وَ لا كِتابٍ مُنِيرٍ «8» ثانِيَ عِطْفِهِ لِيُضِلَّ عَنْ سَبِيلِ اللَّهِ لَهُ فِي الدُّنْيا خِزْيٌ وَ نُذِيقُهُ يَوْمَ الْقِيامَةِ عَذابَ الْحَرِيقِ «9» ذلِكَ بِما قَدَّمَتْ يَداكَ وَ أَنَّ اللَّهَ لَيْسَ بِظَلاَّمٍ لِلْعَبِيدِ «10»
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| − | ترجمه
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| − | - و بعضى از مردم كسى است كه مجادله ميكند در خدا بدون دانشى و نه هدايتى و نه كتابى روشن
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| − | با آنكه منحرف كننده باشد جانبش را تا گمراه گرداند از راه خدا مر او را است در دنيا رسوائى و ميچشانيم او را روز قيامت عذاب سوزان
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| − | اين براى آنچيزى است كه پيش فرستاده است دو دست تو و همانا خدا
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| − | جلد 3 صفحه 591
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| − | نيست ستمكار مر بندگانرا.
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| − | تفسير
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| − | - قمّى ره نقل فرموده كه نازل شد در باره ابو جهل و ثانى عطفه بمعناى روى گرداندن و اعراض نمودن از راه حقّ و طريق خداوند و ايمان است چون كلمه ثانى بمعناى دو تا كننده و عطف بمعناى جانب است و جمعا كنايه از تكبّر و پهلو گرداندن و شانه از زير بار تكليف كشيدن ميباشد و خلاصه مستفاد از آيات شريفه آنستكه بعضى از مردم كور كورانه بدون هيچ دليل و برهان و سند روشنى از راه تقليد و تعصّب در توحيد الهى و صفات جمال و جلال او سخنرانى و خودنمايى ميكنند و با آنكه حقّ بر آنها عرضه شده با تكبّر و نخوت از قبول آن استنكاف و استكبار دارند تا در نتيجه مردم را گمراه نمايند و خودشان هم در گمراهى بمانند چون ليضلّ بفتح ياء نيز قرائت شده است از براى چنين شخصى در دنيا جز رسوائى و خوارى نخواهد بود و در آخرت ما عذاب آتش سوزان را باو خواهيم چشانيد و ميگوئيم اين براى استحقاقى است كه بدست خود در دنيا براى خودت تهيّه و تدارك نمودى و پيش فرستادى و الا خداوند عادل است كسيرا بدون استحقاق عذاب نميكند با آنكه اگر بخواهد بدون سبب بندهئى را مخلّد در جهنّم نمايد ظلم بسيار نموده و خدا هيچ ظلم نميكند چه رسد بآنكه العياذ باللّه بسيار ظلم كننده باشد ..
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| − | اطیب البیان=
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| − | ===اطیب البیان (سید عبدالحسین طیب)===
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| − | وَ مِنَ النّاسِ مَن يُجادِلُ فِي اللّهِ بِغَيرِ عِلمٍ وَ لا هُديً وَ لا كِتابٍ مُنِيرٍ «8»
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| − | تفسير اينکه آيه در آيه سوّم بيان شد فقط تفاوت اينکه دو آيه اينکه است که در آيه سوّم ميفرمايد: «وَ يَتَّبِعُ كُلَّ شَيطانٍ مَرِيدٍ» و در اينکه آيه ميفرمايد:
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| − | (وَ لا هُديً وَ لا كِتابٍ مُنِيرٍ): که هيچگونه مدركي ندارند، هيچ يقيني و هيچ كتاب آسماني در دست ندارند و هادي ندارند.
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| − | برگزیده تفسیر نمونه=
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| − | ===برگزیده تفسیر نمونه===
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| − | {{نمایش فشرده تفسیر|
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| − | (آیه 8)- باز هم مجادله به باطل: در اینجا نیز سخن از مجادله کنندگانی است که پیرامون مبدء و معاد به جدال بیپایه و بیاساس میپردازند.
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| − | نخست میگوید: «گروهی از مردم کسانی هستند که در باره خدا بدون هیچ علم و دانش و هدایت و کتاب روشنی به مجادله بر میخیزند» (وَ مِنَ النَّاسِ مَنْ یُجادِلُ فِی اللَّهِ بِغَیْرِ عِلْمٍ وَ لا هُدیً وَ لا کِتابٍ مُنِیرٍ).
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| − | در حقیقت بحث و جدال علمی در صورتی میتواند ثمر بخش باشد که متکی به یکی از این دلائل گردد. عقل یا کتاب یا سنّت.
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| − | جمله «وَ مِنَ النَّاسِ مَنْ یُجادِلُ فِی اللَّهِ بِغَیْرِ عِلْمٍ» درست همان تعبیری است که در آیه سوم گذشت. و ظاهرا آیه گذشته ناظر به حال پیروان گمراه و بیخبر است در حالی که این آیه ناظر به رهبران این گروه گمراه میباشد.
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| − | سایر تفاسیر=
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| − | سایرتفاسیر این آیه را می توانید در سایت قرآن مشاهده کنید:
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| − | ==تفسیر های فارسی==
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| − | ==={{ترجمه تفسیر المیزان|سوره=22 |آیه=8}}===
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| − | ==={{تفسیر خسروی|سوره=22 |آیه=8}}===
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| − | ==={{تفسیر عاملی|سوره=22 |آیه=8}}===
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| − | ==={{تفسیر جامع|سوره=22 |آیه=8}}===
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| − | ==تفسیر های عربی==
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| − | ==={{تفسیر المیزان|سوره=22 |آیه=8}}===
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| − | ==={{تفسیر مجمع البیان|سوره=22 |آیه=8}}===
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| − | ==={{تفسیر نور الثقلین|سوره=22 |آیه=8}}===
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| − | ==={{تفسیر الصافی|سوره=22 |آیه=8}}===
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| − | ==={{تفسیر الکاشف|سوره=22 |آیه=8}}===
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| − | </tabber>
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| | ==پانویس== | | ==پانویس== |