آیه 83 سوره انعام: تفاوت بین نسخهها
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درجات: درج: راه رفتن. درجه: مرتبه و منزلت، و اگر به پائين باشد درك گويند.<ref>تفسیر احسن الحدیث، سید علی اکبر قرشی</ref> | درجات: درج: راه رفتن. درجه: مرتبه و منزلت، و اگر به پائين باشد درك گويند.<ref>تفسیر احسن الحدیث، سید علی اکبر قرشی</ref> | ||
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نسخهٔ کنونی تا ۲۱ ژوئن ۲۰۲۶، ساعت ۱۲:۳۰
| <<82 | آیه 83 سوره انعام | 84>> | |||||||||||||
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محتویات
ترجمه های فارسی
این است حجّتی که ما ابراهیم را بر قومش دادیم. ما هر که را بخواهیم به درجات رفیع بالا میبریم، که خدای تو به نظام و صلاح عالمیان آگاه و داناست.
و آن [دلایل استوار و محکم] حجت و برهان ما بود که به ابراهیم در برابر قومش عطا کردیم؛ هر که را بخواهیم [به] درجاتی بالا می بریم؛ زیرا پروردگارت حکیم و داناست.
و آن حجّت ما بود كه به ابراهيم در برابر قومش داديم. درجات هر كس را كه بخواهيم فرا مىبريم، زيرا پروردگار تو حكيم داناست.
اين برهان ما بود، كه آن را به ابراهيم تلقين كرديم در برابر قومش. هر كه را بخواهيم به درجاتى بالا مىبريم. هر آينه پروردگار تو حكيم و داناست.
اینها دلایل ما بود که به ابراهیم در برابر قومش دادیم! درجات هر کس را بخواهیم (و شایسته بدانیم،) بالا میبریم؛ پروردگار تو، حکیم و داناست.
ترجمه های انگلیسی(English translations)
معانی کلمات آیه
درجات: درج: راه رفتن. درجه: مرتبه و منزلت، و اگر به پائين باشد درك گويند.[۱]
تفسیر آیه
تفسیر نور (محسن قرائتی)
الَّذِينَ آمَنُوا وَ لَمْ يَلْبِسُوا إِيمانَهُمْ بِظُلْمٍ أُولئِكَ لَهُمُ الْأَمْنُ وَ هُمْ مُهْتَدُونَ «82»
كسانى كه ايمان آورده و ايمانشان را به ستم و شرك نيالودند، آنانند كه برايشان ايمنى (از عذاب) است و آنان هدايت يافتگانند.
وَ تِلْكَ حُجَّتُنا آتَيْناها إِبْراهِيمَ عَلى قَوْمِهِ نَرْفَعُ دَرَجاتٍ مَنْ نَشاءُ إِنَّ رَبَّكَ حَكِيمٌ عَلِيمٌ «83»
اين (نوع استدلال) حجّت ماست كه در برابر قومش به ابراهيم داديم، هر كس را كه بخواهيم (و شايسته بدانيم) به درجاتى بالا مىبريم. همانا پروردگارت حكيم و داناست (و بر اساس علم و حكمت مقام انسانها را بالا مىبرد).
نکته ها
آيات قبل دربارهى توحيد و شرك بود و اين آيات به منزلهى جمعبندى آيات گذشته است، چنانكه امام عليه السلام فرمود: مراد از ظلم در اين آيه شرك است. «1»
در بعضى روايات مراد از ظلم را شك و ترديد گرفتهاند. «2» البتّه شك گاهى غير اختيارى و مقدّمهى تحقيق است، ولى گاهى جنبه بهانه و تشكيك دارد كه اين نوع دوّم، ظلم است. «3»
امام باقر عليه السلام فرمود: اين آيه درباره حضرت على عليه السلام نازل شد كه لحظهاى در طول زندگى به سراغ شرك نرفت. «4»
كلمهى «لَبْسٍ» به معناى پوشاندن است. بنابراين ايمان چون فطرى است، نابود شدنى نيست بلكه غبارهايى آن را مىپوشاند.
«1». تفسير نورالثقلين.
«2». تفسير نورالثقلين؛ كافى، ج 2، ص 399.
«3». تفسير راهنما.
«4». بحار، ج 23، ص 367.
جلد 2 - صفحه 502
پیام ها
1- آفت ايمان، ظلم و شرك و به سراغ رهبران غير الهى رفتن است. «آمَنُوا وَ لَمْ يَلْبِسُوا إِيمانَهُمْ بِظُلْمٍ»
2- ايمان به تنهايى كافى نيست، تداوم لازم است. «لَمْ يَلْبِسُوا إِيمانَهُمْ بِظُلْمٍ أُولئِكَ لَهُمُ الْأَمْنُ»
3- امنيّت و هدايت واقعى، در سايهى ايمان و پرهيز از شرك است. آمَنُوا ... لَهُمُ الْأَمْنُ وَ هُمْ مُهْتَدُونَ
4- تا ايمان خالص نباشد، دلهره است. وَ لَمْ يَلْبِسُوا ... بِظُلْمٍ ... لَهُمُ الْأَمْنُ
5- علم و حكمت دو شرط لازم براى تدبير و مديريّت است. «إِنَّ رَبَّكَ حَكِيمٌ عَلِيمٌ» (با توجّه به اينكه كلمهى «ربّ» در لغت به معناى مدير و مربّى آمده است)
6- موحّدى كه با برهان و دليل در برابر انحرافهاى جامعه بايستد، داراى درجاتى است. «دَرَجاتٍ»
7- درجات الهى، حكيمانه به افراد داده مىشود. «نَرْفَعُ دَرَجاتٍ ... حَكِيمٌ»
پانویس
- ↑ تفسیر احسن الحدیث، سید علی اکبر قرشی
منابع
- تفسیر نور، محسن قرائتی، تهران:مركز فرهنگى درسهايى از قرآن، 1383 ش، چاپ يازدهم
- اطیب البیان فی تفسیر القرآن، سید عبدالحسین طیب، تهران:انتشارات اسلام، 1378 ش، چاپ دوم
- تفسیر اثنی عشری، حسین حسینی شاه عبدالعظیمی، تهران:انتشارات ميقات، 1363 ش، چاپ اول
- تفسیر روان جاوید، محمد ثقفی تهرانی، تهران:انتشارات برهان، 1398 ق، چاپ سوم
- برگزیده تفسیر نمونه، ناصر مکارم شیرازی و جمعي از فضلا، تنظیم احمد علی بابایی، تهران: دارالکتب اسلامیه، ۱۳۸۶ش
- تفسیر راهنما، علی اکبر هاشمی رفسنجانی، قم:بوستان كتاب(انتشارات دفتر تبليغات اسلامي حوزه علميه قم)، 1386 ش، چاپ پنجم




