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| سطر ۴۳: |
سطر ۴۳: |
| | سكن: سكون، آرام گرفتن بعد از حركت. به معنى وطن و قرار گرفتن نيز آيد. مراد از آن در آيه، معناى دوم است.<ref>تفسیر احسن الحدیث، سید علی اکبر قرشی</ref> | | سكن: سكون، آرام گرفتن بعد از حركت. به معنى وطن و قرار گرفتن نيز آيد. مراد از آن در آيه، معناى دوم است.<ref>تفسیر احسن الحدیث، سید علی اکبر قرشی</ref> |
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| − | ==تفسیر آیه== | + | == تفسیر آیه == |
| − | <tabber> | + | <tafsir sura="6" ayeh="13" /> |
| − | تفسیر نور=
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| − | ===تفسیر نور (محسن قرائتی)===
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| − | {{ نمایش فشرده تفسیر|
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| − | وَ لَهُ ما سَكَنَ فِي اللَّيْلِ وَ النَّهارِ وَ هُوَ السَّمِيعُ الْعَلِيمُ «13»
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| − | و تنها براى اوست آنچه در شب و روز قرار گرفته و او شنواى داناست.
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| − | ===نکته ها===
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| − | شب و روز، مانند گهواره، انسان و موجودات را در دامن خود آرامش مىبخشد. برخى موجودات در شب، و بعضى در روز استراحت مىكنند.
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| − | ===پیام ها===
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| − | 1- هم كلّ نظام از خداوند است؛ «وَ لَهُ ما سَكَنَ»، هم نظارت و كنترل از آنِ اوست.
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| − | «هُوَ السَّمِيعُ الْعَلِيمُ»
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| − | اثنی عشری=
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| − | ===تفسیر اثنی عشری (حسینی شاه عبدالعظیمی)===
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| − | {{نمایش فشرده تفسیر|
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| − | وَ لَهُ ما سَكَنَ فِي اللَّيْلِ وَ النَّهارِ وَ هُوَ السَّمِيعُ الْعَلِيمُ «13»
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| − | وَ لَهُ ما سَكَنَ فِي اللَّيْلِ وَ النَّهارِ: و مر ذات الهى راست خاصّه آنچه آرام دارد در شب و روز، يعنى او است مالك مكان و زمان و آنچه آن را فرا گرفته است. وَ هُوَ السَّمِيعُ الْعَلِيمُ: و ذات احديت او است شنواى همه مسموعات، عالم به همه موجودات، پس شنوا باشد به اقوال كافران و دانا به مقاصد ايشان و همه را بر وفق آن جزا و سزا خواهد داد.
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| − | شأن نزول «1»- جمعى از كفار قريش به خدمت پيغمبر صلى اللّه عليه و آله جسارت نمودند كه احتياج و مسكنت، تو را بر اين كار مىدارد؛ ما به طريق توزيع براى تو از اشراف چندان مال حاصل كنيم كه با ثروت و از جمله خويشان شوى به شرط آنكه از اين ادعا رجوع نمائى. حق تعالى فرمود: هر چه شب و روز بر آن مشتمل است خاصه الهى است، اگر خواهد، پيغمبر خود را چندان مال دهد كه از تمام اغنيا بسر آيد.
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| − | حضرت امير المؤمنين عليه السّلام در ذيل خطبهاى فرمايد: اگر بخواهد
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| − | «1» مجمع البيان ج 2 ص 279.
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| − | تفسير اثنا عشرى، ج3، ص: 233
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| − | خداوند سبحان به پيغمبران خود وقت بعثت آنها، اينكه بگشايد براى ايشان گنجهاى طلا و معدنهاى زر پاك را و محلهاى نشاندن درخت كه آن بساتين شجر است و جمع فرمايد با ايشان مرغان آسمان و جانوران زمينها را، هر آينه مىكرد بىگمان؛ و اگر چنين چيزها را مىنمودى هر آينه ساقط شدى آزمايش كردن آن به مستضعفان از دوستان به جهت عدم ادراك آنها، و نيز ساقط شدى بلاى انبيا به فقر و صبر بر آزار مستكبران، و باطل شدى جزا و پاداش بليه در عبادات بسبب سقوط بلا در طاعات، و نيست شدى پيغام و خبر وحىها، زيرا انبيا گرچه افضل خلايقند، لكن محتاجند به رياضت و اعراض از دنيا در نزول وحى بر آنها، و هر آينه واجب نشدى براى قبول كنندگان اوامر و نواهى اجرهاى امتحان شدگان، و مستحق نشدى مؤمنان ثواب نيكوكاران را كه حاصل شده از مجاهده با نفس و شيطان. «1»
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| − | روان جاوید=
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| − | ===تفسیر روان جاوید (ثقفى تهرانى)===
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| − | {{نمایش فشرده تفسیر|
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| − | وَ لَهُ ما سَكَنَ فِي اللَّيْلِ وَ النَّهارِ وَ هُوَ السَّمِيعُ الْعَلِيمُ «13»
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| − | جلد 2 صفحه 303
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| − | ترجمه
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| − | و مر او را است آنچه قرار دارد در شب و روز و او است شنواى دانا.
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| − | تفسير
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| − | خداوند پس از بيان مالكيت خود نسبت بمكان و مكانيات بيان مالكيت خود را نسبت بزمان و زمانيات فرموده و مراد از سكون تمكن و استقرار و حلول است نه آرامش و وقوف و شب و روز شامل تمام ازمنه است چنانچه آسمانها و زمين شامل تمام امكنه است و تقديم شب بر روز بملاحظه ترتيب طبيعى است كه شب هر روزى مقدم بر آنست و تاريكى در بدو خلقت مقدم بوده است بر روشنى و او شنوا است تمام مسموعات را و دانا است تمام معلومات را ناله بينوايان را ميشنود و سوزدل آنها را ميداند و داد مظلوم را از ظالم ميستاند ..
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| − | اطیب البیان=
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| − | ===اطیب البیان (سید عبدالحسین طیب)===
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| − | {{نمایش فشرده تفسیر|
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| − | وَ لَهُ ما سَكَنَ فِي اللَّيلِ وَ النَّهارِ وَ هُوَ السَّمِيعُ العَلِيمُ «13»
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| − | و از براي خدا است آنچه سكونت پيدا ميكند در شب و روز و او است خداوند شنوا و دانا.
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| − | وَ لَهُ ما سَكَنَ لام اختصاص است مختص باو است خالق و رازق و مبقي و حافظ همه اشياء او است و بس، و كلمه ما شامل ذوي العقول و غير ذوي العقول از حيوانات بحري و برّي، هوايي و زميني. و سكونت بعضي گفتند مقابل حركت نيست زيرا ساكن و متحرك هر دو مملوك حق هستند اختصاص بساكن ندارد بلكه بمعني استقرار است ميگويي فلان ساكن اصفهان است و فلان ساكن طهران و هكذا تمام بلاد و قري و بحار و جبال و صحاري و براري لكن اينکه معني بنظر تمام نيست زيرا مناسب با فِي اللَّيلِ وَ النَّهارِ نيست شب و روز مدخليت ندارد. و بعضي گفتند سكونت مقابل حركت است و دفع اشكال مذكور را نمودند به اينكه مراد اعم از ساكن و متحرك است غاية الامر در آيه بواسطه اختصار يكي را بيان فرموده که ديگر که ما تحرك باشد بواسطه وضوحش ذكر نفرموده، اينکه وجه هم بنظر تمام نيست زيرا تقدير خلاف ظاهر است و اولوية هم متحرك بر ساكن ندارد بلكه آنچه بنظر ميرسد و اللّه العالم مراد استراحت است چون كليه حيوانات برّي و بحري، هوايي و زميني، جنّي و انسي دو دسته هستند بعضي استراحت آنها در شب است و روز در تلاش روزي و اشتغالات و بعضي در روز است و شب اشتغال دارند.
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| − | وَ هُوَ السَّمِيعُ بمعني اجابت حوائج آنها و ارزاق آنها و اصلاح امور آنها العليم عالم بجميع حالات و افعال آنها است.
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| − | برگزیده تفسیر نمونه=
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| − | ===برگزیده تفسیر نمونه===
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| − | {{نمایش فشرده تفسیر|
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| − | (آیه 13)
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| − | در آیه قبل اشاره به مالکیت خداوند نسبت به همه موجودات از طریق قرار گرفتن آنها در افق «مکان» شده بود، و این آیه اشاره به مالکیت او از طریق قرار گرفتن در افق و پهنه «زمان» کرده، می گوید: «و از آن اوست آنچه در شب و روز قرار گرفته است» (وَ لَهُ ما سَکنَ فِی اللَّیلِ وَ النَّهارِ).
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| − | و در پایان آیه پس از ذکر توحید اشاره به دو صفت بارز خداوند کرده می گوید: «و اوست شنونده دانا» (وَ هُوَ السَّمِیعُ العَلِیمُ).
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| − | اشاره به این که وسعت جهان هستی و موجوداتی که در افق زمان و مکان قرار گرفته اند هیچ گاه مانع از آن نیست که خدا از اسرار آنها آگاه باشد.
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| − | سایر تفاسیر=
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| − | سایرتفاسیر این آیه را می توانید در سایت قرآن مشاهده کنید:
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| − | ==تفسیر های فارسی==
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| − | ==={{ترجمه تفسیر المیزان|سوره=6 |آیه=13}}===
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| − | ==={{تفسیر خسروی|سوره=6 |آیه=13}}===
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| − | ==={{تفسیر عاملی|سوره=6 |آیه=13}}===
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| − | ==={{تفسیر جامع|سوره=6 |آیه=13}}===
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| − | ==تفسیر های عربی==
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| − | ==={{تفسیر المیزان|سوره=6 |آیه=13}}===
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| − | ==={{تفسیر مجمع البیان|سوره=6 |آیه=13}}===
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| − | ==={{تفسیر نور الثقلین|سوره=6 |آیه=13}}===
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| − | ==={{تفسیر الصافی|سوره=6 |آیه=13}}===
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| − | ==={{تفسیر الکاشف|سوره=6 |آیه=13}}===
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| − | </tabber>
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| | ==پانویس== | | ==پانویس== |