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| سطر ۴۶: |
سطر ۴۶: |
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| | == تفسیر آیه == | | == تفسیر آیه == |
| − | <tabber> | + | <tafsir sura="2" ayeh="132" /> |
| − | تفسیر نور=
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| − | ===تفسیر نور (محسن قرائتی)===
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| − | {{ نمایش فشرده تفسیر|
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| − | «132» وَ وَصَّى بِها إِبْراهِيمُ بَنِيهِ وَ يَعْقُوبُ يا بَنِيَّ إِنَّ اللَّهَ اصْطَفى لَكُمُ الدِّينَ فَلا تَمُوتُنَّ إِلَّا وَ أَنْتُمْ مُسْلِمُونَ
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| − | و ابراهيم و يعقوب، فرزندان خود را به همان آئين سفارش نمودند (وگفتند:) فرزندان من! خداوند براى شما اين دين (توحيدى) را برگزيده است. پس (تا پايان عمر بر آن باشيد و) جز در حال تسليم (و فرمانبردارى) نميريد.
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| − | جلد 1 - صفحه 207
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| − | ===پیام ها===
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| − | 1- در فكر سلامت عقيده وايمان نسل وفرزندان خود باشيم و در وصاياى خود تنها به جنبههاى مادّى اكتفا نكنيم. «وَصَّى ... فَلا تَمُوتُنَّ إِلَّا وَ أَنْتُمْ مُسْلِمُونَ»
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| − | 2- راه حقّ، همان راه اسلام و تسليم بودن در برابر خداوند است. انبيا همين راه را سفارش مىنمودند. «وَصَّى بِها إِبْراهِيمُ بَنِيهِ وَ يَعْقُوبُ»
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| − | 3- خداوند در ميان همه راهها، راه دين را براى ما برگزيده است. «إِنَّ اللَّهَ اصْطَفى لَكُمُ الدِّينَ»
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| − | 4- حسن عاقبت ومسلمان مردن مهم است. «1» «فَلا تَمُوتُنَّ إِلَّا وَ أَنْتُمْ مُسْلِمُونَ»
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| − | 5- گرچه زمان ومكان مردن به دست ما نيست، ولى مىتوانيم زمينهى حسنِ عاقبت خود را از طريق عقيده وعمل درست ودعا ودورى از گناه و افراد فاسد، فراهم كنيم. «فَلا تَمُوتُنَّ إِلَّا وَ أَنْتُمْ مُسْلِمُونَ»
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| − | «1». بسيار افرادى كه اهل ايمان بودند، ولى مرتد وكافر شدند. «آمَنُوا ثُمَّ كَفَرُوا» نساء، 137.
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| − | اثنی عشری=
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| − | ===تفسیر اثنی عشری (حسینی شاه عبدالعظیمی)===
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| − | {{نمایش فشرده تفسیر|
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| − | وَ وَصَّى بِها إِبْراهِيمُ بَنِيهِ وَ يَعْقُوبُ يا بَنِيَّ إِنَّ اللَّهَ اصْطَفى لَكُمُ الدِّينَ فَلا تَمُوتُنَّ إِلاَّ وَ أَنْتُمْ مُسْلِمُونَ (132)
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| − | بعد از آن وصيت حضرت ابراهيم عليه السلام به فرزندانش بيان مىفرمايد:
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| − | وَ وَصَّى بِها إِبْراهِيمُ بَنِيهِ: و وصيت نمود ابراهيم عليه السلام در حين
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| − | تفسير اثنا عشرى، ج1، ص: 261
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| − | وفات پسران خود را، وَ يَعْقُوبُ: و يعقوب نيز وصيت كرد اولاد خود را به موافقت جد و پدر خود و مضمون وصيت هر دو اين بود: يا بَنِيَّ إِنَّ اللَّهَ اصْطَفى: اى پسران من بدرستى كه خدا اختيار فرمود، لَكُمُ الدِّينَ: براى شما دين مرضى و مشروع كه امر شده به آن يعنى دين اسلام، فَلا تَمُوتُنَ:
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| − | پس بايد البته نميريد، إِلَّا وَ أَنْتُمْ مُسْلِمُونَ: مگر در حالى كه شما مسلمان باشيد. فرزندان حضرت ابراهيم عليه السلام چهار نفر بودند: اسمعيل و اسحق و مدين و مدان. اسحق از ساره، و اسمعيل از هاجر، و باقى از مقطن كنعانيه. و نزد بعضى هشت نفر بودهاند و نزد جمعى چهارده نفر. و فرزندان يعقوب دوازده نفر بودند و حاصل آنكه اين دو پيغمبر اولادان خود را وصيت نمودند كه البته البته بايد نميريد مگر آنكه مسلمان باشيد.
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| − | تبصره: ظاهر آيه شريفه نهى است از مردن بر خلاف دين اسلام، نه آنكه نهى از مردن باشد. و تغيير عبارت به جهت آنست كه موت بر غير دين اسلام موتى است كه هيچ چيز در آن نخواهد بود، و سزاوار آنست كه چنين مرگى كه فاقد سعادت است وارد نشود. اين وصيت عام است نسبت به تمام مكلفين كه سعى و كوشش داشته باشند و ملازم احكام اسلامى بوده تا وقت موت مسلمان از دنيا روند.
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| − | روان جاوید=
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| − | ===تفسیر روان جاوید (ثقفى تهرانى)===
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| − | {{نمایش فشرده تفسیر|
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| − | وَ وَصَّى بِها إِبْراهِيمُ بَنِيهِ وَ يَعْقُوبُ يا بَنِيَّ إِنَّ اللَّهَ اصْطَفى لَكُمُ الدِّينَ فَلا تَمُوتُنَّ إِلاَّ وَ أَنْتُمْ مُسْلِمُونَ (132)
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| − | جلد 1 صفحه 175
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| − | ترجمه
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| − | و وصيت كرد بآن ابراهيم پسرانش را و يعقوب اى پسران من همانا خداوند برگزيد براى شما دين را پس نبايد بميريد مگر آنكه باشيد شما مسلمانان.
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| − | تفسير
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| − | وصيت بملت ابراهيم يا مفاد كلمه اسلمت شد كه نتيجه هر دو اسلام است از آنحضرت و حضرت يعقوب بفرزندانشان كه آن دين برگزيده الهى است و بايد تا نفس آخر بر اين ملت حنيف و دين شريف ثابت و مستقيم باشيد و بايد پيرامون معصيت نگرديد مبادا ايمان شما ضعيف گردد و كمكم از دل شما خارج شود و بىايمان از دنيا برويد.
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| − | اطیب البیان=
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| − | ===اطیب البیان (سید عبدالحسین طیب)===
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| − | {{نمایش فشرده تفسیر|
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| − | وَ وَصّي بِها إِبراهِيمُ بَنِيهِ وَ يَعقُوبُ يا بَنِيَّ إِنَّ اللّهَ اصطَفي لَكُمُ الدِّينَ فَلا تَمُوتُنَّ إِلاّ وَ أَنتُم مُسلِمُونَ (132)
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| − | (و ابراهيم و يعقوب فرزندانشان را بملة حنيفة سفارش نمودند و گفتند اي فرزندان من همانا خداوند براي شما دين اسلام و حنيفة را انتخاب فرموده پس نميريد مگر در حالي که مسلمان باشيد) وصيت در لغت بمعني پيوستن چيزي بغير است چنانچه در كلمات اصحاب ذكر شده و در جواهر بعهد تفسير نموده و ظاهر اينست که نظر او بوصية مصطلح است و معني عام وصيت سفارش و اندرز و نصيحت و قرار داد و معاهد و نحو اينها است چنانچه در آيات شريفه است: يُوصِيكُمُ اللّهُ فِي أَولادِكُم«1» وَ وَصَّينَا الإِنسانَ بِوالِدَيهِ«2» و وَ لَقَد وَصَّينَا الَّذِينَ أُوتُوا الكِتابَ مِن قَبلِكُم وَ إِيّاكُم أَنِ اتَّقُوا اللّهَ«3» و «شَرَعَ لَكُم مِنَ الدِّينِ ما وَصّي بِهِ نُوحاً وَ الَّذِي أَوحَينا إِلَيكَ وَ ما وَصَّينا بِهِ إِبراهِيمَ وَ مُوسي وَ عِيسي أَن أَقِيمُوا الدِّينَ وَ لا تَتَفَرَّقُوا الاية«4» و غير اينها از آيات ديگر و در مرجع ضمير بها از إبن عباس نقل شده که كلمه اخلاص است که مفاد آيه قبل ميباشد ولي ظاهر اينست که مرجع ضمير ملة باشد که در آيه قبل است يعني ابراهيم و يعقوب فرزندان خود را بملت حنيفة سفارش نمودند، و يعقوب عطف بر ابراهيم است و تقدير اينست که و وصي بها يعقوب بنيه ايضا و يعقوب فرزند اسحاق پسر ابراهيم بوده و جمله يا بني الخ موصي بها يعني امري است که ابراهيم و يعقوب فرزندان خود را بآن وصيت نمودند و مراد از دين، دين اسلام بمعني عامّ آنست چنانچه ميفرمايد إِنَّ الدِّينَ عِندَ اللّهِ الإِسلامُ«5»
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| − | 1- سوره نساء آيه 12
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| − | 2- سوره عنكبوت آيه 7
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| − | 3- سوره نساء آيه 130
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| − | 4- سوره شوري آيه 11
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| − | 5- سوره آل عمران آيه 17
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| − | جلد 2 - صفحه 206
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| − | فَلا تَمُوتُنَّ إِلّا وَ أَنتُم مُسلِمُونَ اگر گفته شود با اينكه موت امر غير اختياري است چگونه متعلق نهي قرار گرفته! در جواب گوئيم بازگشت اينکه نهي بامر اختياري است و تقدير اينست که «الزموا الاسلام لئلا يقع موتكم الّا في هذا الحال» يعني هميشه ملازم مسلماني باشيد تا اينكه مرگ نيابد شما را مگر در حال مسلماني.
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| − | و اما موت نسبت بحيوة نباتي و حيواني امر عدمي است يعني زوال قوه نمو و انبات و زوال بخار متصاعد از قلب عبارت از موت نباتي و حيواني است ولي نسبت بحيوة انساني عبارت از انتقال از نشئه به نشئهيي ديگر است و تفصيل اينکه مطلب را در كلم الطيب متذكر شدهايم«1»
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| − | برگزیده تفسیر نمونه=
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| − | ===برگزیده تفسیر نمونه===
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| − | {{نمایش فشرده تفسیر|
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| − | (آیه 132)- وصیت و سفارشی که در آخرین ایام عمر خود به فرزندانش نمود آن نیز نمونه بود، چنانکه قرآن میگوید: «ابراهیم و یعقوب فرزندان خود را در باز پسین لحظات عمر به این آیین پاک توحیدی وصیت کردند» (وَ وَصَّی بِها
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| − | ج1، ص125
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| − | إِبْراهِیمُ بَنِیهِ وَ یَعْقُوبُ)
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| − | .هر کدام به فرزندان خود گفتند: «فرزندان من! خداوند این آیین توحید را برای شما برگزیده است» (یا بَنِیَّ إِنَّ اللَّهَ اصْطَفی لَکُمُ الدِّینَ).
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| − | «بنابراین جز بر این آیین رهسپار نشوید و جز با قلبی مملو از ایمان و تسلیم جهان را وداع نگویید» (فَلا تَمُوتُنَّ إِلَّا وَ أَنْتُمْ مُسْلِمُونَ).
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| − | سایر تفاسیر=
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| − | سایرتفاسیر این آیه را می توانید در سایت قرآن مشاهده کنید:
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| − | ==تفسیر های فارسی==
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| − | ==={{ترجمه تفسیر المیزان|سوره=2 |آیه=132}}===
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| − | ==={{تفسیر خسروی|سوره=2 |آیه=132}}===
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| − | ==={{تفسیر عاملی|سوره=2 |آیه=132}}===
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| − | ==={{تفسیر جامع|سوره=2 |آیه=132}}===
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| − | ==تفسیر های عربی==
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| − | ==={{تفسیر المیزان|سوره=2 |آیه=132}}===
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| − | ==={{تفسیر مجمع البیان|سوره=2 |آیه=132}}===
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| − | ==={{تفسیر نور الثقلین|سوره=2 |آیه=132}}===
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| − | ==={{تفسیر الصافی|سوره=2 |آیه=132}}===
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| − | ==={{تفسیر الکاشف|سوره=2 |آیه=132}}===
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| − | </tabber>
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| | ==پانویس== | | ==پانویس== |