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| سطر ۵۳: |
سطر ۵۳: |
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| | == تفسیر آیه == | | == تفسیر آیه == |
| − | <tabber> | + | <tafsir sura="7" ayeh="111" /> |
| − | تفسیر نور=
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| − | ===تفسیر نور (محسن قرائتی)===
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| − | {{ نمایش فشرده تفسیر|
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| − | قالُوا أَرْجِهْ وَ أَخاهُ وَ أَرْسِلْ فِي الْمَدائِنِ حاشِرِينَ «111»
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| − | (اطرافيان فرعون) گفتند: (مجازات) او و برادرش را به تأخير انداز و مأموران را در شهرها براى جمعكردن (ساحران) بفرست.
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| − | يَأْتُوكَ بِكُلِّ ساحِرٍ عَلِيمٍ «112»
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| − | تا هر ساحر دانا و كارآزمودهاى را نزد تو بياورند.
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| − | جلد 3 - صفحه 136
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| − | ===نکته ها===
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| − | كلمهى «أرج»، فعل امر از ريشهى «رجاء»، هم به معناى حبس كردن و هم به معناى تأخير انداختن است. امّا با توجّه به موج گستردهى دعوت موسى و معجزاتش، به زندان انداختن موسى براى فرعون مناسب نبود، لذا معناى تأخير انداختن مناسبتر است.
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| − | در اينجا آمده است: «ساحِرٍ عَلِيمٍ» ولى در آيهى 37 سورهى شعراء با تعبير «سَحَّارٍ عَلِيمٍ» آمده كه نشان دهندهى كمال تخصّص و كار آزمودگى جادوگران است.
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| − | ===پیام ها===
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| − | 1- در حكومتهاى طاغوتى فرعونى، روشنگرى مردم و هر صداى حقّى، مجازاتى در پىدارد. «قالُوا أَرْجِهْ»
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| − | 2- تخريب شخصيّت، مهمتر از قتل ومجازات است. «أَرْجِهْ» (بنا بر اينكه مراد از «أرجه»، پيشنهاد تأخير مجازات موسى، براى رسوا كردن او در اجتماع باشد.)
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| − | 3- طاغوتها براى شكستن حقّ، گردهمايى سراسرى و جهانى از متخصّصان تشكيل مىدهند. «يَأْتُوكَ بِكُلِّ ساحِرٍ عَلِيمٍ»
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| − | 4- كفّار هم مىدانند براى مقابله با كار فرهنگى، بايد كار فرهنگى قوىترى انجام داد. «بِكُلِّ ساحِرٍ عَلِيمٍ»
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| − | 5- گاهى علم و تخصّص، در دست افراد منحرف و در مسير مبارزه با حقّ قرار مىگيرد. «يَأْتُوكَ بِكُلِّ ساحِرٍ عَلِيمٍ»
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| − | اثنی عشری=
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| − | ===تفسیر اثنی عشری (حسینی شاه عبدالعظیمی)===
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| − | {{نمایش فشرده تفسیر|
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| − | قالُوا أَرْجِهْ وَ أَخاهُ وَ أَرْسِلْ فِي الْمَدائِنِ حاشِرِينَ (111)
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| − | قالُوا أَرْجِهْ وَ أَخاهُ: گفتند تأخير كن مهم موسى و برادرش را و در كار آنها تعجيل منما، يا حبس كن ايشان را. و اول اصح است به جهت آنكه ارجاء، به معنى تأخير اوست. ايضا فرعون مىدانست قادر بر حبس ايشان نيست. به سبب مشاهده آن دو معجزه عظيمه، وَ أَرْسِلْ فِي الْمَدائِنِ حاشِرِينَ: و
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| − | جلد 4 صفحه 160
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| − | بفرست در شهرهاى مصر گروهى جمع كنندگان را.
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| − | روان جاوید=
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| − | ===تفسیر روان جاوید (ثقفى تهرانى)===
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| − | {{نمایش فشرده تفسیر|
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| − | سوره الأعراف «7»: آيات 111 تا 114
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| − | قالُوا أَرْجِهْ وَ أَخاهُ وَ أَرْسِلْ فِي الْمَدائِنِ حاشِرِينَ (111) يَأْتُوكَ بِكُلِّ ساحِرٍ عَلِيمٍ (112) وَ جاءَ السَّحَرَةُ فِرْعَوْنَ قالُوا إِنَّ لَنا لَأَجْراً إِنْ كُنَّا نَحْنُ الْغالِبِينَ (113) قالَ نَعَمْ وَ إِنَّكُمْ لَمِنَ الْمُقَرَّبِينَ (114)
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| − | ترجمه
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| − | گفتند واگذار او و برادرش را و بفرست در شهرها جمعآورندگان را
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| − | كه بياورند نزد تو هر جادوگر دانائى را
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| − | و آمدند جادوگران نزد فرعون گفتند بدرستيكه براى ما هر آينه مزدى است اگر باشيم غالبان
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| − | گفت بلى و بدرستيكه شما هر آينه از مقربانيد.
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| − | تفسير
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| − | خلاصه راى صادر از مجلس شورا اين بود كه فرعون حضرت موسى و هارون را بحال خودشان واگذار نمايد و بامر آنها نپردازد ضمنا عدّه را مأمور نمايد كه در بلاد مصر تفحّص نمايند هر جا ساحرى است بهر وسيله ممكن است او را ببارگاه فرعون حاضر نمايند و آن زمان سحر بقدرى رواج داشت كه در اندك زمانى از دوازده هزار تا هشتاد هزار ساحر ماهر گفتهاند جمعآورى شد و بزرگان آنها كه گفتهاند پنج نفر بودند و اعلم از همه شمعون نام بود ببارگاه فرعون راه يافتند و از او تقاضاى اجر مهمّى نمودند كه در صورت غلبه بآنها انعام شود و اين تقاضا يا بصورت اخبار بوده كه فرض مسلّميّت آن را نمودهاند يا بصورت سؤال چون جمعى از قراء ائنّ لنا لأجرا قرائت
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| − | جلد 2 صفحه 460
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| − | نمودهاند در هر حال فرعون علاوه بر آنكه ملتزم باجر و انعام شد قول داد كه آنها را از مقربان درگاه خود قرار دهد كه بىاجازه وارد بر او شوند و هر حاجتى داشته باشند براى خودشان و كسان ديگر برآورده شود و اين كاشف از نهايت طمع آنها و تشويش خاطر آن ملعون است و كلمه ارجه امر از ارجاء بمعنى تأخير است كه متصل بضمير مفعول شده است و بعضى از علماء نحو منع از اسكان هاء ضمير نمودهاند و بعضى از قراء بكسر هاء با اشباع و بدون آن قرائت نمودهاند و ارجئه بهمزه و ضمها نيز قرائت شده است.
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| − | اطیب البیان=
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| − | ===اطیب البیان (سید عبدالحسین طیب)===
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| − | {{نمایش فشرده تفسیر|
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| − | قالُوا أَرجِه وَ أَخاهُ وَ أَرسِل فِي المَدائِنِ حاشِرِينَ (111)
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| − | گفتند نگاهدار موسي و برادرش را و بفرست در شهرستانها همه مجتمع شوند.
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| − | قالُوا كلام ملاء قوم فرعون است در جواب قول فرعون که بآنها گفت چه رأي ميدهيد و همين دليل است که آيه قبل گفتار فرعون بوده که اينها جواب دادند بخطاب مفرد ارجه ارج از ماده رجاء است و بمعني مهلت است نه نگاهداري که بمعني حبس باشد و در واقع معنا اينست که از موسي مهلت بگير ولي نظر بعظمت
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| − | جلد 7 - صفحه 414
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| − | فرعون تعبير كردند به اينكه او را مهلت بده نه بگير و اخاه هارون که برادر موسي بود و باتفاق آمده بودند براي دعوت در واقع شريك حضرت موسي بود در رسالت بعنوان تبعيت و براي كمك بموسي و اعانت او آمده بود چنانچه در پيشگاه احديت عرض كرد قالَ رَبِّ اشرَح لِي صَدرِي وَ يَسِّر لِي أَمرِي وَ احلُل عُقدَةً مِن لِسانِي يَفقَهُوا قَولِي وَ اجعَل لِي وَزِيراً مِن أَهلِي هارُونَ أَخِي اشدُد بِهِ أَزرِي وَ أَشرِكهُ فِي أَمرِي طه آيه 26- 33، و نيز ميفرمايد وَ لَقَد آتَينا مُوسَي الكِتابَ وَ جَعَلنا مَعَهُ أَخاهُ هارُونَ وَزِيراً فرقان آيه 37. و در حديث منزلة که از اخبار متواتره بين الفريقين است فرمود
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| − | (عليّ منّي بمنزلة هارون من موسي الّا انّه لا نبيّ بعدي).
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| − | وَ أَرسِل فِي المَدائِنِ مدائن فرعون هفت شهر بود، از عياشي حديث نقل شده مفصل است خلاصه محل شاهد اينست که فرعون هفت شهر بنا كرد و بين هر شهري نيزار و بيشهها قرار داد و در آنها شيري گذارد موقعي که حضرت موسي آمد شير نزد موسي تبسبس كرد و كوچكي نمود و هفت قصر تو در تو داشت حضرت موسي چند مرتبه بوّاب را ندا داد که درب قصر را باز كند اعتنايي نكرد حضرت موسي فرمود من رسول ربّ العالمين هستم بوّاب گفت رب العالمين غير از تو كسي را نداشت که با لباس پشمينه و وضع ناهنجار فرستاده موسي در غضب شد و عصا بدرب زد درب باز شد و يك يك قصرها را بهمين نحو تا نزد فرعون رفت و دعوت فرمود تا آخر حديث حاشرين که تمام فرعونيان جمع آوري شوند.
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| − | برگزیده تفسیر نمونه=
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| − | ===برگزیده تفسیر نمونه===
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| − | {{نمایش فشرده تفسیر|
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| − | (آیه 111)- به هر حال نظر همگی بر این قرار گرفت که به فرعون «گفتند: (کار) او و برادرش را به تأخیر انداز، و جمع آوری کنندگان را به همه شهرها بفرست ...»
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| − | (قالُوا أَرْجِهْ وَ أَخاهُ وَ أَرْسِلْ فِی الْمَدائِنِ حاشِرِینَ).
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| − | سایر تفاسیر=
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| − | سایرتفاسیر این آیه را می توانید در سایت قرآن مشاهده کنید:
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| − | ==تفسیر های فارسی==
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| − | ==={{ترجمه تفسیر المیزان|سوره=7 |آیه=111}}===
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| − | ==={{تفسیر خسروی|سوره=7 |آیه=111}}===
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| − | ==={{تفسیر عاملی|سوره=7 |آیه=111}}===
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| − | ==={{تفسیر جامع|سوره=7 |آیه=111}}===
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| − | ==تفسیر های عربی==
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| − | ==={{تفسیر المیزان|سوره=7 |آیه=111}}===
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| − | ==={{تفسیر مجمع البیان|سوره=7 |آیه=111}}===
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| − | ==={{تفسیر نور الثقلین|سوره=7 |آیه=111}}===
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| − | ==={{تفسیر الصافی|سوره=7 |آیه=111}}===
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| − | ==={{تفسیر الکاشف|سوره=7 |آیه=111}}===
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| − | </tabber>
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| | ==پانویس== | | ==پانویس== |