آیه 20 سوره نمل: تفاوت بین نسخهها
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نسخهٔ کنونی تا ۲۱ ژوئن ۲۰۲۶، ساعت ۱۶:۲۲
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محتویات
ترجمه های فارسی
و سلیمان (از میان سپاه خود) جویای حال مرغان شد (هدهد را در مجمع مرغان نیافت، به رئیس مرغان) گفت: هدهد کجا شد که به حضور نمیبینمش؟ بلکه (بیاجازه من) غیبت کرده است؟
و [سلیمان] جویای پرندگان شد [و هدهد را در میان پرندگان بارگاهش نیافت] پس گفت: مرا چه شده که هدهد را نمی بینم [آیا هست و او را نمی بینم] یا از غایبان است؟
و جوياى [حال] پرندگان شد و گفت: «مرا چه شده است كه هدهد را نمىبينم؟ يا شايد از غايبان است؟
در ميان مرغان جستجو كرد و گفت: چرا هدهد را نمىبينم، آيا از غايبشدگان است؟
(سلیمان) در جستجوی آن پرنده [= هدهد] برآمد و گفت: «چرا هدهد را نمیبینم، یا اینکه او از غایبان است؟!
ترجمه های انگلیسی(English translations)
معانی کلمات آیه
- تفقد: فقد: غائب شدن و گم شدن. تفقد آنست كه در حال غائب بودن چيزى، از آن جويا شويم.
- هدهد: شانه سر، پرنده معروفى است، درك و فهم عجيب او در آيات خواهد آمد.[۱]
تفسیر آیه
تفسیر نور (محسن قرائتی)
وَ تَفَقَّدَ الطَّيْرَ فَقالَ ما لِيَ لا أَرَى الْهُدْهُدَ أَمْ كانَ مِنَ الْغائِبِينَ «20»
و (سليمان) جوياى حال پرندگان شد و (هدهد را نديد،) گفت: مرا چه شده كه هدهد را نمىبينم؟ (آيا حضور دارد و من نمىبينم) يا از غايبان است.
لَأُعَذِّبَنَّهُ عَذاباً شَدِيداً أَوْ لَأَذْبَحَنَّهُ أَوْ لَيَأْتِيَنِّي بِسُلْطانٍ مُبِينٍ «21»
قطعاً او را كيفرى سخت خواهم داد يا او را ذبح مىكنم، مگر آن كه (براى غيبت خود) دليل روشنى (و عذر موجّهى) براى من بياورد.
تفسير نور(10جلدى)، ج6، ص: 408
فَمَكَثَ غَيْرَ بَعِيدٍ فَقالَ أَحَطْتُ بِما لَمْ تُحِطْ بِهِ وَ جِئْتُكَ مِنْ سَبَإٍ بِنَبَإٍ يَقِينٍ «22»
پس ديرى نپاييد كه (هدهد آمد و) گفت: از چيزى آگاهى يافتم كه تو (با همهى عزّت و شوكتى كه دارى) از آن آگاه نشدهاى و براى تو از (منطقهى) سبا گزارشى مهم و درست آوردهام.
نکته ها
بعضى گفتهاند: مراد از هدهد در اين جا، هدهد خاصّى است؛ و دليل خود را الف و لام در «الْهُدْهُدَ» و قدرت انسانشناسى و مكتبشناسى او دانستهاند كه توضيح اين مطلب را در آيات بعد خواهيم خواند. «1»
ابوحنيفه از امام صادق عليه السلام سؤال كرد: چرا حضرت سليمان از ميان پرندگان تنها سراغ هدهد را گرفت؟ امام فرمودند: زيرا او آب را در درون زمين مىبيند، همان گونه كه ما روغن را در ظرف بلورين مىبينيم. «2»
بعضى براى عذاب هدهد نمونههايى را ذكر كردهاند از جمله: جدا كردن او از جفتش، كندن پرهاى او، در معرض آفتاب قرار دادن، طرد كردن او از دربار سليمان يا قرار دادن او با دشمن در يك قفس. «3»
پیام ها
1- تفقّد از زيردست، بازديد از كار آنان و جستوجو از احوالشان، از اصول اسلامى، اخلاقى، اجتماعى، تربيتى و مديريّتى است. «تَفَقَّدَ»
2- مسايل بزرگ، شما را از مسايل كوچك باز ندارد. «تَفَقَّدَ الطَّيْرَ»
3- زود قضاوت نكرده و نيروهاى تحتامر خود را متهم نكنيم؛ شايد مشكلى در
«1». تفاسيرفرقان وفىظلال.
«2». تفسير مجمعالبيان.
«3». تفاسير روحالبيان و كنزالدقائق.
جلد 6 - صفحه 409
ميان باشد كه ندانيم. «ما لِيَ لا أَرَى الْهُدْهُدَ»
4- تيزبينى و دقّت و تسلّط، شرط لازم براى رهبرى است. «ما لِيَ لا أَرَى الْهُدْهُدَ»
5- حاكم وقاضى بايد شرايط خاصّى داشته باشد از جمله:
الف: محبّت و دقّت. «تَفَقَّدَ الطَّيْرَ»
ب: تواضع. «ما لِيَ لا أَرَى الْهُدْهُدَ»
ج: صلابت در برابر متخلّف. «لَأُعَذِّبَنَّهُ أَوْ لَأَذْبَحَنَّهُ»
د: فرصت دادن به متهم. «لَيَأْتِيَنِّي»
6- نظارت دقيق بر حضور و غياب نيروها، در كارهاى تشكيلاتى يك ضرورت است، همان گونه كه تخلّف بىدليل از مقررات و ترك كردن پست خود، گناه نابخشودنى است. «أَمْ كانَ مِنَ الْغائِبِينَ»
7- تنبيه حيوان متخلف، مانعى ندارد. «لَأُعَذِّبَنَّهُ»
8- حيوان، تنبيه را درك مىكند. «لَأُعَذِّبَنَّهُ»
9- وقتى كه غيبت از سوى يك پرنده اين همه تهديد لازم داشته باشد، پس ما با آن همه غيبتها و عدم حضورها چه تكليفى داريم؟ «لَأُعَذِّبَنَّهُ»
10- انبيا، هم قانون مىآورند و هم اجرا مىكنند. «لَأُعَذِّبَنَّهُ»
11- براى مجازات متخلفان، بايد كيفرهاى متعدّدى قرار داد تا در اجراى قانون، به بن بست نرسيم. «لَأُعَذِّبَنَّهُ أَوْ لَأَذْبَحَنَّهُ»
12- قاطعيّت و عذرپذيرى، همراه يكديگر لازم است. «لَأُعَذِّبَنَّهُ- لَيَأْتِيَنِّي»
13- در مديريّت و تشكيلات، سهلانگارى ممنوع. «لَأُعَذِّبَنَّهُ- لَأَذْبَحَنَّهُ- لَيَأْتِيَنِّي» (وجود حرف «لام» در سه جمله، نشانهى قاطعيّت است)
14- براى حفظ نظام و گرفتن زهر چشم از متخلّفان، مانعى ندارد كه براى يك تخلّف كوچك، جريمهى سنگينى قرار دهيم. «عَذاباً شَدِيداً»
15- راه دفاع را به روى متهم نبنديد. «أَوْ لَيَأْتِيَنِّي بِسُلْطانٍ مُبِينٍ»
16- حيوانات، شعورى دارند كه مىتوانند براى كارهاى خود استدلال و توجيه
جلد 6 - صفحه 410
داشته باشند. «لَيَأْتِيَنِّي بِسُلْطانٍ»
17- با وجود منطق و استدلال، حتّى سليمان در برابر هدهد تسليم مىشود. «لَيَأْتِيَنِّي بِسُلْطانٍ»
18- در يك تشكيلات، براى هر كار و مأموريّتى، حكم و مجوزى لازم است. «بِسُلْطانٍ مُبِينٍ»
19- آن را كه حساب پاك است، از محاسبه چه باك است. «فَمَكَثَ غَيْرَ بَعِيدٍ فَقالَ»
20- حيوان مىتواند به چيزى برسد كه انسان نرسيده باشد. «أَحَطْتُ بِما لَمْ تُحِطْ»
21- سير و سياحت، كليد كسب اطلاعات جديد است. «احط»
22- آزادى بيان، يكى از ويژگىهاى حكومت صالحان است. «أَحَطْتُ بِما لَمْ تُحِطْ بِهِ»
23- علم و دانايى، به سن و جنس و شكل ربطى ندارد. «أَحَطْتُ بِما لَمْ تُحِطْ»
24- انبيا نيز تحت تربيت الهى هستند. سليمانى كه مىگفت: «أُوتِينا مِنْ كُلِّ شَيْءٍ» به من همه چيز داده شده، پرندهاى به او مىگويد: من چيزى مىدانم كه تو هم نمىدانى. «أَحَطْتُ بِما لَمْ تُحِطْ بِهِ»
25- در حكومت انبيا، تملّق و ترس وجود ندارد. «أَحَطْتُ بِما لَمْ تُحِطْ بِهِ»
26- بزرگان ومسئولان حكومت نبايد منبع اطلاعات خودرا در افراد يا گروههاى خاصّى منحصر كنند. (هدهد براى سلطان گزارش دارد) «أَحَطْتُ- جِئْتُكَ»
27- در گزارشها، اخبار قطعى و تأييد شده را بگوييد. «بِنَبَإٍ يَقِينٍ»
28- وجود افراد يا سازمانى براى خبرگيرى از خارج از منطقهى حكومتى لازم است. (البتّه نه براى جاسوسى، بلكه براى دعوت وارشاد يا آمادگى دفاعى) «مِنْ سَبَإٍ»
29- آنچه در خبر مهم است، قطعى بودن آن است؛ خبرنگار بزرگ باشد يا كوچك، انسان باشد يا حيوان. «بِنَبَإٍ يَقِينٍ»
30- مسئولان حكومت، تنها بر خبرهاى قطعى تكيه كنند. «بِنَبَإٍ يَقِينٍ»
تفسير نور(10جلدى)، ج6، ص: 411
پانویس
- ↑ تفسير احسن الحديث، سید علی اکبر قرشی، ج7، ص441
منابع
- تفسیر نور، محسن قرائتی، تهران:مركز فرهنگى درسهايى از قرآن، 1383 ش، چاپ يازدهم
- اطیب البیان فی تفسیر القرآن، سید عبدالحسین طیب، تهران:انتشارات اسلام، 1378 ش، چاپ دوم
- تفسیر اثنی عشری، حسین حسینی شاه عبدالعظیمی، تهران:انتشارات ميقات، 1363 ش، چاپ اول
- تفسیر روان جاوید، محمد ثقفی تهرانی، تهران:انتشارات برهان، 1398 ق، چاپ سوم
- برگزیده تفسیر نمونه، ناصر مکارم شیرازی و جمعي از فضلا، تنظیم احمد علی بابایی، تهران: دارالکتب اسلامیه، ۱۳۸۶ش
- تفسیر راهنما، علی اکبر هاشمی رفسنجانی، قم:بوستان كتاب(انتشارات دفتر تبليغات اسلامي حوزه علميه قم)، 1386 ش، چاپ پنجم




