آیه 43 سوره نساء: تفاوت بین نسخهها
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عائشة گويد: درباره عده اى نازل شده كه آب نمى يافتند<ref> در كتاب البرهان في تفسير القرآن از كلينى بعد از چهار واسطه از ابواسامة زيد الشحام او از [[امام صادق]] عليهالسلام روايت كند كه فرمود: منظور از سكارى در آيه مستى خواب است و نيز از على بن ابراهيم بعد از پنج واسطه از زرارة او از [[امام باقر]] عليهالسلام نقل نمايد كه فرمود: مقصود از سكارى در اين آيه مستى خواب است و نيز در تفسير عياشى از زرارة او از امام باقر عليهالسلام نيز موضوع مستى خواب را از سكارى نقل و روايت كرده است.</ref><ref> صاحب كشف الاسرار از عامه به نقل از ضحاك بن مزاحم گويد: كه مراد از سكارى در آيه مستى خمر نيست بلكه مستى خواب است و نيز از عبيدة السلمانى روايت كند كه مقصود از مستى در آيه شخص حاقن است (حاقن كسى است كه بول و غائط خود را نگهدارد و [[نماز]] بخواند) چنانكه حديثى از [[رسول خدا]] صلی الله علیه و آله نقل كنند كه فرمود: (لايصليّين احدكم و هو يدافع الاخبثين؛ نبايد نماز بگذارد كسى كه بول و غائط خود را نگهدارد و نماز بخواند) و درباره اين قسمت از آية «وَلاجُنُباً إِلَّا عابِرِي سَبِيلٍ» در تفسير ابن مردويه از اسلع بن شريك روايت شده كه گويد: ناقه رسول خدا صلی الله علیه و آله را مى بردم در شبى كه خيلى سرد بود در بين راه خوابم برد، جنب شدم. ترسيدم اگر با آب سرد غسل كنم، مريض شوم يا بميرم. موضوع خود را به رسول خدا صلی الله علیه و آله عرض كردم. اين آيه نازل گرديد و نيز طبرانى هم اين خبر را از اسلع نقل كند و گويد: بعد از نزول آيه، پيامبر فرمود: اى اسلع برخيز و تيمّم كن، و باز صاحب كشف الاسرار و صاحب جامع البيان از عامه و صاحب روض الجنان از خاصه بنا به نقل از يزيد بن حبيب يا زيد بن حبيب گويند: در اوائل اسلام بعضى از مردم كه درب خانه آنها به طرف مسجد باز ميشد، جنب مى شدند و راهى جز عبور از مسجد نداشتند و از طرفى كراهت داشتند كه با حالت جنابت از آن بگذرند. اين آية نازل گرديد و عبور از مسجد در حالت جنابت بدون مانع گرديد و صاحب روض الجنان گويد: پس از چندى درب هاى خانه اطراف مسجد بسته شد يعنى بنا به دستور پيامبر درهائى كه به طرف مسجد باز ميشد، بستند مگر درب خانه على و فاطمه.</ref><ref> راجع به اين قسمت از آية «وَ إِنْ كُنْتُمْ مَرْضى » در تفسير ابن ابىحاتم از عامه از مجاهد نقل شده كه مردى از انصار مريض شد و قدرت آن را نداشت كه برخيزد و [[وضو]] سازد. اين خبر به پيامبر رسيد، سپس اين آية نازل گرديد و نيز در تفسير طبرى از عامه از ابراهيم نخعى روايت شده كه به يكى از اصحاب جراحتى در بدن او وارد آمد و سپس به جنابت مبتلا گرديد. موضوع را به پيامبر گفتند: اين آية نازل گرديد ولى راجع به اين موضوع صاحبان كشف الاسرار و روض الجنان از جابر بن عبدالله انصارى نقل كنند كه سنگى بر سر يك نفر از صحابه افتاد و سخت مجروح گرديد و سپس به او جنابتى رخ داد. از عده اى سؤال كرد كه با اين حالت، چسان [[نماز]] بگذارد. به او گفتند: به ناچار بايد [[غسل]] كند. لذا آن مرد با آب سرد غسل كرد و بعد از آن وفات يافت. خبر به [[رسول خدا]] صلی الله علیه و آله دادند، بسيار دلتنگ و غمگين شد و فرمود: با دستور غلط او را كشتند، خدا بكشد او را كه چنين دستورى را بدون اين كه سؤال كند، داده است. سپس اين آيه نازل گرديد.</ref>.<ref> محمدباقر محقق، [[نمونه بینات در شأن نزول آیات]] از نظر [[شیخ طوسی]] و سایر مفسرین خاصه و عامه، ص 198.</ref> | عائشة گويد: درباره عده اى نازل شده كه آب نمى يافتند<ref> در كتاب البرهان في تفسير القرآن از كلينى بعد از چهار واسطه از ابواسامة زيد الشحام او از [[امام صادق]] عليهالسلام روايت كند كه فرمود: منظور از سكارى در آيه مستى خواب است و نيز از على بن ابراهيم بعد از پنج واسطه از زرارة او از [[امام باقر]] عليهالسلام نقل نمايد كه فرمود: مقصود از سكارى در اين آيه مستى خواب است و نيز در تفسير عياشى از زرارة او از امام باقر عليهالسلام نيز موضوع مستى خواب را از سكارى نقل و روايت كرده است.</ref><ref> صاحب كشف الاسرار از عامه به نقل از ضحاك بن مزاحم گويد: كه مراد از سكارى در آيه مستى خمر نيست بلكه مستى خواب است و نيز از عبيدة السلمانى روايت كند كه مقصود از مستى در آيه شخص حاقن است (حاقن كسى است كه بول و غائط خود را نگهدارد و [[نماز]] بخواند) چنانكه حديثى از [[رسول خدا]] صلی الله علیه و آله نقل كنند كه فرمود: (لايصليّين احدكم و هو يدافع الاخبثين؛ نبايد نماز بگذارد كسى كه بول و غائط خود را نگهدارد و نماز بخواند) و درباره اين قسمت از آية «وَلاجُنُباً إِلَّا عابِرِي سَبِيلٍ» در تفسير ابن مردويه از اسلع بن شريك روايت شده كه گويد: ناقه رسول خدا صلی الله علیه و آله را مى بردم در شبى كه خيلى سرد بود در بين راه خوابم برد، جنب شدم. ترسيدم اگر با آب سرد غسل كنم، مريض شوم يا بميرم. موضوع خود را به رسول خدا صلی الله علیه و آله عرض كردم. اين آيه نازل گرديد و نيز طبرانى هم اين خبر را از اسلع نقل كند و گويد: بعد از نزول آيه، پيامبر فرمود: اى اسلع برخيز و تيمّم كن، و باز صاحب كشف الاسرار و صاحب جامع البيان از عامه و صاحب روض الجنان از خاصه بنا به نقل از يزيد بن حبيب يا زيد بن حبيب گويند: در اوائل اسلام بعضى از مردم كه درب خانه آنها به طرف مسجد باز ميشد، جنب مى شدند و راهى جز عبور از مسجد نداشتند و از طرفى كراهت داشتند كه با حالت جنابت از آن بگذرند. اين آية نازل گرديد و عبور از مسجد در حالت جنابت بدون مانع گرديد و صاحب روض الجنان گويد: پس از چندى درب هاى خانه اطراف مسجد بسته شد يعنى بنا به دستور پيامبر درهائى كه به طرف مسجد باز ميشد، بستند مگر درب خانه على و فاطمه.</ref><ref> راجع به اين قسمت از آية «وَ إِنْ كُنْتُمْ مَرْضى » در تفسير ابن ابىحاتم از عامه از مجاهد نقل شده كه مردى از انصار مريض شد و قدرت آن را نداشت كه برخيزد و [[وضو]] سازد. اين خبر به پيامبر رسيد، سپس اين آية نازل گرديد و نيز در تفسير طبرى از عامه از ابراهيم نخعى روايت شده كه به يكى از اصحاب جراحتى در بدن او وارد آمد و سپس به جنابت مبتلا گرديد. موضوع را به پيامبر گفتند: اين آية نازل گرديد ولى راجع به اين موضوع صاحبان كشف الاسرار و روض الجنان از جابر بن عبدالله انصارى نقل كنند كه سنگى بر سر يك نفر از صحابه افتاد و سخت مجروح گرديد و سپس به او جنابتى رخ داد. از عده اى سؤال كرد كه با اين حالت، چسان [[نماز]] بگذارد. به او گفتند: به ناچار بايد [[غسل]] كند. لذا آن مرد با آب سرد غسل كرد و بعد از آن وفات يافت. خبر به [[رسول خدا]] صلی الله علیه و آله دادند، بسيار دلتنگ و غمگين شد و فرمود: با دستور غلط او را كشتند، خدا بكشد او را كه چنين دستورى را بدون اين كه سؤال كند، داده است. سپس اين آيه نازل گرديد.</ref>.<ref> محمدباقر محقق، [[نمونه بینات در شأن نزول آیات]] از نظر [[شیخ طوسی]] و سایر مفسرین خاصه و عامه، ص 198.</ref> | ||
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محتویات
ترجمه های فارسی
ای اهل ایمان، هرگز در حال مستی به نماز نیایید تا بدانید چه میگویید (و چه میکنید) و نه در حال جنابت (به مساجد آیید) مگر آنکه رهگذر باشید تا وقتی که غسل کنید. و اگر بیمار بودید یا آنکه در سفر باشید یا قضاء حاجتی دست داده باشد یا با زنان مباشرت کردهاید و آب برای تطهیر و غسل نیافتید پس به خاک پاک تیمم کنید، آنگاه صورت و دستها را (بدان) مسح کنید، که خدا بخشنده و آمرزنده است.
ای اهل ایمان! در حالی که مستید به نماز نزدیک نشوید تا زمانی که [مستیِ شما برطرف شود و از روی هوشیاری] بدانید [که در حال نماز] چه می گویید. و در حال جنابت هم به نماز نزدیک نشوید تا غسل کنید مگر در حال سفر [که آب نیابید، پس با تیمّم نماز بخوانید]. و اگر بیمارید، یا در سفرید، یا یکی از شما از قضای حاجت [دستشویی] آمده، یا با زنان آمیزش کرده اید و آبی [برای وضو یا غسل] نیافتید، به خاکی پاک، تیمم کنید و بخشی از صورت و دست هایتان را [با آن] مسح نمایید؛ یقیناً خدا همواره گذشت کننده و بسیار آمرزنده است.
اى كسانى كه ايمان آوردهايد، در حال مستى به نماز نزديك نشويد تا زمانى كه بدانيد چه مىگوييد؛ و [نيز] در حال جنابت [وارد نماز نشويد] -مگر اينكه راهگذر باشيد- تا غسل كنيد؛ و اگر بيماريد يا در سفريد يا يكى از شما از قضاى حاجت آمد يا با زنان آميزش كردهايد و آب نيافتهايد، پس بر خاكى پاك تيمم كنيد، و صورت و دستهايتان را مسح نماييد، كه خدا بخشنده و آمرزنده است.
اى كسانى كه ايمان آوردهايد، آنگاه كه مست هستيد گرد نماز مگرديد تا بدانيد كه چه مىگوييد. و نيز در حال جنابت، تا غسل كنيد، مگر آنكه راهگذر باشيد. و اگر بيمار يا در سفر بوديد يا از مكان قضاى حاجت بازگشتهايد يا با زنان جماع كردهايد و آب نيافتيد با خاك پاك تيمم كنيد و روى و دستهايتان را با آن خاك مسح كنيد. هرآينه خدا عفو كننده و آمرزنده است.
ای کسانی که ایمان آوردهاید! در حال مستی به نماز نزدیک نشوید، تا بدانید چه میگویید! و همچنین هنگامی که جنب هستید -مگر اینکه مسافر باشید- تا غسل کنید. و اگر بیمارید، یا مسافر، و یا «قضای حاجت» کردهاید، و یا با زنان آمیزش جنسی داشتهاید، و در این حال، آب (برای وضو یا غسل) نیافتید، با خاک پاکی تیمّم کنید! (به این طریق که) صورتها و دستهایتان را با آن مسح نمایید. خداوند، بخشنده و آمرزنده است.
ترجمه های انگلیسی(English translations)
معانی کلمات آیه
سكارى: سكر: مستى . سكران: مست. سكارى : مستان .
جنبا: جنابت در اثر خروج منى و آميزش جنسى عارض مي شود . شخص را از آن جنب گويند كه در آن حال از نماز خواندن و سائر محترمات بدور است . پس جنب به معنى مجنوب و كنار شده است.
عابرى : عبور كنندگان. آن جمع عابر است كه در اثر اضافه به «سبيل» نونش ساقط گشته است.
تغتسلوا: غسل (بفتح- ع) شستن و بضم اول نتيجه شستن . اغتسال: غسل كردن.
مرضى: بيماران. جمع مريض.
غائط: محل خلوت . غوط: غائب شدن . مراد از آن مستراح است (قاموس قرآن).
لامستم: لمس: دست زدن. دست ماليدن. مراد از آن آميزش جنسى است.
تيمموا: قصد كنيد. تيمّم به معنى قصد است.
صعيد: روى زمين. خاك نيز گفته اند (قاموس قرآن) صعد و صعود: بالا رفتن. روى زمين را ظاهرا بعلّت بالاى زمين و قشر ظاهر آن بودن صعيد گفته اند.
طيب: پاك و دلچسب.
عفو: بسيار آمرزنده.[۱]
نزول
محل نزول:
این آیه همچون دیگر آیات سوره نساء در مدینه بر پیامبر اسلام صلی الله علیه و آله نازل گردیده است. [۲]
شأن نزول:
«شیخ طوسى» گوید: در سبب نزول آيه، ابراهيم چنين گويد: درباره قومى از صحابه نازل گرديد كه داراى خستگى زيادى بودند.
عائشة گويد: درباره عده اى نازل شده كه آب نمى يافتند[۳][۴][۵].[۶]
تفسیر آیه
تفسیر نور (محسن قرائتی)
يا أَيُّهَا الَّذِينَ آمَنُوا لا تَقْرَبُوا الصَّلاةَ وَ أَنْتُمْ سُكارى حَتَّى تَعْلَمُوا ما تَقُولُونَ وَ لا جُنُباً إِلَّا عابِرِي سَبِيلٍ حَتَّى تَغْتَسِلُوا وَ إِنْ كُنْتُمْ مَرْضى أَوْ عَلى سَفَرٍ أَوْ جاءَ أَحَدٌ مِنْكُمْ مِنَ الْغائِطِ أَوْ لامَسْتُمُ النِّساءَ فَلَمْ تَجِدُوا ماءً فَتَيَمَّمُوا صَعِيداً طَيِّباً فَامْسَحُوا بِوُجُوهِكُمْ وَ أَيْدِيكُمْ إِنَّ اللَّهَ كانَ عَفُوًّا غَفُوراً «43»
اى كسانى كه ايمان آوردهايد! در حال مستى به نماز نزديك نشويد، تا آنكه بدانيد چه مىگوييد. و نيز در حال جنابت نزديك (مكان) نماز، (مسجد) نشويد، مگر به طور عبورى (و بىتوقّف) تا اينكه غسل كنيد. و اگر بيمار يا در سفر بوديد، يا يكى
«1». انعام، 23.
جلد 2 - صفحه 74
از شما از جاى گودى (كنايه از قضاى حاجت) آمد، يا تماسى (و آميزش جنسى) با زنان داشتيد و (در اين موارد) آب نيافتيد، پس بر زمين (و خاك) پاك و دلپسندى تيمّم كنيد، (دو كف دست بر خاك زنيد) آنگاه صورت و دستهايتان را مسح كنيد، همانا خداوند، بخشنده و آمرزنده است.
نکته ها
چون تحريم شراب، در صدر اسلام به صورت تدريجى انجام گرفت. ابتدا شراب به عنوان نوشابه نامطلوب معرّفى شد؛ «وَ مِنْ ثَمَراتِ النَّخِيلِ وَ الْأَعْنابِ تَتَّخِذُونَ مِنْهُ سَكَراً وَ رِزْقاً حَسَناً» «1» سپس اين آيه نازل شد «2» ونماز در حال مستى را نهى كرد، آنگاه زيان آن را بيش از منافعش دانست، «يَسْئَلُونَكَ عَنِ الْخَمْرِ وَ الْمَيْسِرِ قُلْ فِيهِما إِثْمٌ كَبِيرٌ وَ مَنافِعُ لِلنَّاسِ وَ إِثْمُهُما أَكْبَرُ مِنْ نَفْعِهِما» «3» سپس از مصرف آن به عنوان عنصرى پليد و شيطانى نهى شد. إِنَّمَا الْخَمْرُ وَ الْمَيْسِرُ ... رِجْسٌ مِنْ عَمَلِ الشَّيْطانِ «4»
در روايات آمده كه از نماز خواندن در حالت خواب آلودگى و كسالت و سنگينى پرهيز كنيد. «5»
آيات ديگر نيز نماز خواندن از روى كسالت را از نشانههاى منافقان دانسته است. «6»
«غائط» يعنى مكان گود. چون در قديم گودالهايى براى قضاى حاجت فراهم مىكردند، غائط كنايه از رفتن براى تخلّى است.
امام صادق عليه السلام فرمود: «صَعيد»، موضع بلندى است كه آب از آنجا جارى شود. «7»
امام صادق عليه السلام فرمود: مقصود از «لامَسْتُمُ» جماع و آميزش جنسى است، ولى خداوند ستّار است و ستر را دوست دارد. «8»
«1». نحل، 67.
«2». تفسير عيّاشى.
«3». بقره، 219.
«4». مائده، 90.
«5». كافى، ج 3، ص 371.
«6». نساء، 142 و توبه، 54.
«7». بحار، ج 76، ص 347.
«8». وسائل، ج 20، ص 133.
جلد 2 - صفحه 75
پیام ها
1- مقام نماز به حدى رفيع است كه شرابخوار نبايد به آن نزديك شود. «لا تَقْرَبُوا الصَّلاةَ وَ أَنْتُمْ سُكارى»
2- در نماز، تنها اذكار وحركات كافى نيست، توجّه وشعور لازم است. حَتَّى تَعْلَمُوا ...
3- عبادات ناآگاهانه، از ارزش بالا برخورددار نيست، گرچه تكليف را ساقط مىكند. «حَتَّى تَعْلَمُوا ما تَقُولُونَ»
4- در مسجد، نبايد با حالت جنابت وارد شد. وَ لا جُنُباً ...
5- در غسل، شستن تمام بدن لازم است. چون در آيه نام عضو خاصّى برده نشده است. «تَغْتَسِلُوا»
6- احتمال خطر وضرر، يا تكليف را از انسان برمىدارد و يا سبب تخفيف تكليف مىشود. وَ إِنْ كُنْتُمْ مَرْضى ... فَتَيَمَّمُوا
7- در تعبيرات و گفتار، بايد ادب را رعايت كرد. «مِنَ الْغائِطِ أَوْ لامَسْتُمُ النِّساءَ» (تعبير برگشت از گودى براى قضاى حاجت و لمس زنان، كنايه از آميزش جنسى است. «1»)
8- احكام خدا، ترخيص دارد ولى تعطيل ندارد. اگر آب نبود، بايد تيمم كرد. «فَلَمْ تَجِدُوا ماءً فَتَيَمَّمُوا»
9- شرط ارتباط با خدا از طريق نماز، طهارت و پاكى است، وضو يا تيمّم. «فَلَمْ تَجِدُوا ماءً فَتَيَمَّمُوا»
10- تخفيف احكام، نمودى از رحمت و مغفرت الهى است. فَلَمْ تَجِدُوا ماءً فَتَيَمَّمُوا ... عَفُوًّا غَفُوراً
«1». تهذيبالاحكام، ج 1، ص 22.
تفسير نور(10جلدى)، ج2، ص: 76
پانویس
- ↑ تفسیر احسن الحدیث، سید علی اکبر قرشی
- ↑ طبرسی، مجمع البیان فی تفسیر القرآن، ج 3، ص 3.
- ↑ در كتاب البرهان في تفسير القرآن از كلينى بعد از چهار واسطه از ابواسامة زيد الشحام او از امام صادق عليهالسلام روايت كند كه فرمود: منظور از سكارى در آيه مستى خواب است و نيز از على بن ابراهيم بعد از پنج واسطه از زرارة او از امام باقر عليهالسلام نقل نمايد كه فرمود: مقصود از سكارى در اين آيه مستى خواب است و نيز در تفسير عياشى از زرارة او از امام باقر عليهالسلام نيز موضوع مستى خواب را از سكارى نقل و روايت كرده است.
- ↑ صاحب كشف الاسرار از عامه به نقل از ضحاك بن مزاحم گويد: كه مراد از سكارى در آيه مستى خمر نيست بلكه مستى خواب است و نيز از عبيدة السلمانى روايت كند كه مقصود از مستى در آيه شخص حاقن است (حاقن كسى است كه بول و غائط خود را نگهدارد و نماز بخواند) چنانكه حديثى از رسول خدا صلی الله علیه و آله نقل كنند كه فرمود: (لايصليّين احدكم و هو يدافع الاخبثين؛ نبايد نماز بگذارد كسى كه بول و غائط خود را نگهدارد و نماز بخواند) و درباره اين قسمت از آية «وَلاجُنُباً إِلَّا عابِرِي سَبِيلٍ» در تفسير ابن مردويه از اسلع بن شريك روايت شده كه گويد: ناقه رسول خدا صلی الله علیه و آله را مى بردم در شبى كه خيلى سرد بود در بين راه خوابم برد، جنب شدم. ترسيدم اگر با آب سرد غسل كنم، مريض شوم يا بميرم. موضوع خود را به رسول خدا صلی الله علیه و آله عرض كردم. اين آيه نازل گرديد و نيز طبرانى هم اين خبر را از اسلع نقل كند و گويد: بعد از نزول آيه، پيامبر فرمود: اى اسلع برخيز و تيمّم كن، و باز صاحب كشف الاسرار و صاحب جامع البيان از عامه و صاحب روض الجنان از خاصه بنا به نقل از يزيد بن حبيب يا زيد بن حبيب گويند: در اوائل اسلام بعضى از مردم كه درب خانه آنها به طرف مسجد باز ميشد، جنب مى شدند و راهى جز عبور از مسجد نداشتند و از طرفى كراهت داشتند كه با حالت جنابت از آن بگذرند. اين آية نازل گرديد و عبور از مسجد در حالت جنابت بدون مانع گرديد و صاحب روض الجنان گويد: پس از چندى درب هاى خانه اطراف مسجد بسته شد يعنى بنا به دستور پيامبر درهائى كه به طرف مسجد باز ميشد، بستند مگر درب خانه على و فاطمه.
- ↑ راجع به اين قسمت از آية «وَ إِنْ كُنْتُمْ مَرْضى » در تفسير ابن ابىحاتم از عامه از مجاهد نقل شده كه مردى از انصار مريض شد و قدرت آن را نداشت كه برخيزد و وضو سازد. اين خبر به پيامبر رسيد، سپس اين آية نازل گرديد و نيز در تفسير طبرى از عامه از ابراهيم نخعى روايت شده كه به يكى از اصحاب جراحتى در بدن او وارد آمد و سپس به جنابت مبتلا گرديد. موضوع را به پيامبر گفتند: اين آية نازل گرديد ولى راجع به اين موضوع صاحبان كشف الاسرار و روض الجنان از جابر بن عبدالله انصارى نقل كنند كه سنگى بر سر يك نفر از صحابه افتاد و سخت مجروح گرديد و سپس به او جنابتى رخ داد. از عده اى سؤال كرد كه با اين حالت، چسان نماز بگذارد. به او گفتند: به ناچار بايد غسل كند. لذا آن مرد با آب سرد غسل كرد و بعد از آن وفات يافت. خبر به رسول خدا صلی الله علیه و آله دادند، بسيار دلتنگ و غمگين شد و فرمود: با دستور غلط او را كشتند، خدا بكشد او را كه چنين دستورى را بدون اين كه سؤال كند، داده است. سپس اين آيه نازل گرديد.
- ↑ محمدباقر محقق، نمونه بینات در شأن نزول آیات از نظر شیخ طوسی و سایر مفسرین خاصه و عامه، ص 198.
منابع
- تفسیر نور، محسن قرائتی، تهران:مركز فرهنگى درسهايى از قرآن، 1383 ش، چاپ يازدهم
- اطیب البیان فی تفسیر القرآن، سید عبدالحسین طیب، تهران:انتشارات اسلام، 1378 ش، چاپ دوم
- تفسیر اثنی عشری، حسین حسینی شاه عبدالعظیمی، تهران:انتشارات ميقات، 1363 ش، چاپ اول
- تفسیر روان جاوید، محمد ثقفی تهرانی، تهران:انتشارات برهان، 1398 ق، چاپ سوم
- برگزیده تفسیر نمونه، ناصر مکارم شیرازی و جمعي از فضلا، تنظیم احمد علی بابایی، تهران: دارالکتب اسلامیه، ۱۳۸۶ش
- تفسیر راهنما، علی اکبر هاشمی رفسنجانی، قم:بوستان كتاب(انتشارات دفتر تبليغات اسلامي حوزه علميه قم)، 1386 ش، چاپ پنجم
- محمدباقر محقق، نمونه بینات در شأن نزول آیات از نظر شیخ طوسی و سایر مفسرین خاصه و عامه.




