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| سطر ۴۱: |
سطر ۴۱: |
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| | ==معانی کلمات آیه== | | ==معانی کلمات آیه== |
| − | «مَوْتَتَنَا الأُولی»: مرگ پیشین ما. گاهی عربها - مثل اینجا - واژه اوّل را به کار میبرند و دومی به دنبال ندارد. لذا مراد همان مرگ بعد از پایان عمر و فرا رسیدن اجل است (نگا: دخان / و ). | + | «مَوْتَتَنَا الأُولی»: مرگ پیشین ما. گاهی عربها - مثل اینجا - واژه اوّل را به کار میبرند و دومی به دنبال ندارد. لذا مراد همان مرگ بعد از پایان عمر و فرا رسیدن اجل است. |
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| | == تفسیر آیه == | | == تفسیر آیه == |
| − | <tabber> | + | <tafsir sura="37" ayeh="59" /> |
| − | تفسیر نور=
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| − | ===تفسیر نور (محسن قرائتی)===
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| − | {{ نمایش فشرده تفسیر|
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| − | أَ فَما نَحْنُ بِمَيِّتِينَ «58» إِلَّا مَوْتَتَنَا الْأُولى وَ ما نَحْنُ بِمُعَذَّبِينَ «59»
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| − | (سپس از روى سرزنش به آن منكر جهنّمى يا از شدّت شادى به ياران بهشتى خود گويد:) آيا ما ديگر نمىميريم؟ مگر همان مرگ اوّلى (دنيا كه گذشت) و ما ديگر عذابى نخواهيم شد؟
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| − | إِنَّ هذا لَهُوَ الْفَوْزُ الْعَظِيمُ «60» لِمِثْلِ هذا فَلْيَعْمَلِ الْعامِلُونَ «61»
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| − | قطعاً اين (نعمتهاى ابدى) رستگارى بزرگى است (كه نصيب ما شده).
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| − | بايد اهل عمل براى چنين جايگاهى كار كنند.
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| − | جلد 8 - صفحه 33
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| − | ===پیام ها===
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| − | 1- اهل بهشت چنان شادند كه گويا نعمتهاى بهشت را باور نمىكنند و از جاودانگى نعمتها تعجّب مىكنند. «أَ فَما نَحْنُ بِمَيِّتِينَ»
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| − | 2- در بهشت مرگ و نيستى راه ندارد. «إِلَّا مَوْتَتَنَا الْأُولى» بر خلاف جهنّم، كه مجرمان در اثر عذاب مىميرند و دوباره زنده مىشوند.
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| − | 3- مؤمنان گنهكار، ابتدا به جهنّم مىروند و سپس به بهشت. زيرا عذاب پس از بهشت معنا ندارد. «وَ ما نَحْنُ بِمُعَذَّبِينَ»
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| − | 4- سالم ماندن انسان در محيطهاى فاسد، كارى ممكن ولى مشكل است. «إِنَّ هذا لَهُوَ الْفَوْزُ الْعَظِيمُ»
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| − | 5- نجات از دوستان بد در دنيا و عذاب دوزخ در آخرت، رستگارى بزرگ است.
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| − | «لَهُوَ الْفَوْزُ الْعَظِيمُ»
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| − | 6- الگوهاى صحيح را به مردم معرّفى كنيم. «لِمِثْلِ هذا»
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| − | 7- عمل براى رسيدن به نعمتهاى بهشتى، منافاتى با اخلاص ندارد. «لِمِثْلِ هذا فَلْيَعْمَلِ»
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| − | 8- كارهاى انسان در دنيا بايد براى رسيدن به هدفى عالى و رستگارى بزرگ باشد وگرنه حسرت و خسارت است. «لِمِثْلِ هذا فَلْيَعْمَلِ»
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| − | 9- ايمان به تنهايى كافى نيست، عمل لازم است. «فَلْيَعْمَلِ الْعامِلُونَ»
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| − | اثنی عشری=
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| − | ===تفسیر اثنی عشری (حسینی شاه عبدالعظیمی)===
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| − | {{نمایش فشرده تفسیر|
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| − | إِلاَّ مَوْتَتَنَا الْأُولى وَ ما نَحْنُ بِمُعَذَّبِينَ (59)
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| − | إِلَّا مَوْتَتَنَا الْأُولى: مگر مردن اول كه در دنيا بود، وَ ما نَحْنُ بِمُعَذَّبِينَ: و نيستيم ما عذاب كرده شدگان، زيرا محشور و مبعوث نخواهيم شد، اكنون ديدى هر چه اعتقاد داشتى و به من مىگفتى، خلاف بود و خدا ما را زنده گردانيد و تو را به دركه عذاب و مرا به درجه ثواب رسانيد. در اكثر تفاسير است كه اين گفتار اهل بهشت باشد كه به جهت اظهار سرور به دوام نعيم بهشت از روى تعجب با يكديگر گويند: ما را به غير از چشيدن موت دنيا موت ديگرى نخواهد بود و در اين بهشت مخلد خواهيم بود.
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| − | روان جاوید=
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| − | ===تفسیر روان جاوید (ثقفى تهرانى)===
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| − | {{نمایش فشرده تفسیر|
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| − | قالَ قائِلٌ مِنْهُمْ إِنِّي كانَ لِي قَرِينٌ (51) يَقُولُ أَ إِنَّكَ لَمِنَ الْمُصَدِّقِينَ (52) أَ إِذا مِتْنا وَ كُنَّا تُراباً وَ عِظاماً أَ إِنَّا لَمَدِينُونَ (53) قالَ هَلْ أَنْتُمْ مُطَّلِعُونَ (54) فَاطَّلَعَ فَرَآهُ فِي سَواءِ الْجَحِيمِ (55)
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| − | قالَ تَاللَّهِ إِنْ كِدْتَ لَتُرْدِينِ (56) وَ لَوْ لا نِعْمَةُ رَبِّي لَكُنْتُ مِنَ الْمُحْضَرِينَ (57) أَ فَما نَحْنُ بِمَيِّتِينَ (58) إِلاَّ مَوْتَتَنَا الْأُولى وَ ما نَحْنُ بِمُعَذَّبِينَ (59) إِنَّ هذا لَهُوَ الْفَوْزُ الْعَظِيمُ (60)
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| − | ترجمه
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| − | گفت گويندهاى از آنان همانا بود براى من همنشينى
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| − | ميگفت آيا همانا تو از تصديق كنندگانى
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| − | كه آيا چون مرديم و گشتيم خاكى و استخوانهائى
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| − | جلد 4 صفحه 432
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| − | آيا هر آينه ما جزا داده شدگانيم
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| − | گفت آيا شما از او اطلاع دارندگانيد
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| − | پس مطّلع شد پس ديد او را در وسط جهنم
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| − | گفت بخدا قسم همانا نزديك بود كه هلاك گردانى مرا
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| − | و اگر نبود نعمت پروردگارم هر آينه بودم از احضار شدگان
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| − | آيا پس نيستيم ما ديگر مردگان
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| − | جز مردن اوّل بارمان و نيستيم ما عذابشدگان
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| − | همانا اينست آن كاميابى بزرگ.
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| − | تفسير
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| − | در ذيل آيات سابقه ذكر شد كه اهل بهشت با يكديگر صحبت ميكنند و خداوند در اين آيات شمهاى از آنرا بيان فرموده باين تقريب كه يكى از ايشان گويد من در دنيا همنشين بدى داشتم كه بر سبيل انكار بمن ميگفت واقعا تو باور كردى كه وقتى ما مرديم و خاك شديم دو مرتبه زنده ميشويم براى پاداش اعمال بد و خوب چنين امرى محال است آيا شما رفقاى من در بهشت جائى را كه مشرف باشد بآن شخص داريد كه بتوانيم از حال او باخبر شويم آنها گويند بلى ما هر چه بخواهيم بحكم خدا آماده ميگردد پس بخواست خدا مشرف ميشود آن گوينده بهمنشين خود و ميبيند او را در وسط جهنّم و بعضى گفتهاند بعد از آنكه گوينده گفت من يك همنشينى در دنيا داشتم كه چنين ميگفت خدايا ملكى باو و رفقايش در بهشت ميفرمايد شما مطّلع بر او هستيد و آنها ميگويند خير و خدا مشرف ميفرمايد آنها را باو در جهنّم چون اصل اطّلاع مشرف شدن بچيزى است براى ديدن آن و در هر حال پس از ديدن او رفيقش را در وسط جهنّم باو ميگويد قسم بخدا نزديك بود مرا مانند خودت بقعر جهنّم افكنى و هلاك كنى و اگر حفظ الهى نبود هر آينه مرا هم مانند تو در اينجا ملك دوزخ احضار مينمود و بعدا رفقاى بهشتى از نهايت فرح و خوشحالى با يكديگر ميگويند از روى تعجّب از موفقيّت خودشان بنعيم ابدى كه آيا ما ديگر نميميريم همان مردن اوّلى فقط براى ما بود در دنيا و ديگر هرگز معذّب نخواهيم شد بعذابى با آنكه يقين دارند چنين خواهند بود و اخيرا تصديق مينمايند و ميگويند كه حقّا كاميابى بزرگ اين بود كه بتوفيق الهى نصيب ما شد و براى چنين نتيجهاى بايد كار كنند كاركنان قمّى ره از امام باقر عليه السّلام نقل نموده كه چون اهل بهشت داخل بهشت شوند و اهل آتش داخل آتش مرگ را بصورت قوچى بياورند و ذبح نمايند بين بهشت و دوزخ پس
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| − | جلد 4 صفحه 433
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| − | منادى ندا كند كه ديگر خلود است و مرگ هرگز نخواهد بود و اهل بهشت باين آيات فلمثل هذا فليعمل العاملون مترنّم شوند و كلمه ان در ان كدت مخفّفه از مثقّله است بدلالت مصاحبت لام ابتدا با آن و گفتهاند احضار بطور اطلاق استعمال نميشود مگر در شرّ و اينجا مراد احضار در جهنّم است.
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| − | اطیب البیان=
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| − | ===اطیب البیان (سید عبدالحسین طیب)===
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| − | {{نمایش فشرده تفسیر|
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| − | أَ فَما نَحنُ بِمَيِّتِينَ (58) إِلاّ مَوتَتَنَا الأُولي وَ ما نَحنُ بِمُعَذَّبِينَ (59)
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| − | اينکه دو آيه را دو نحوه تفسير كردهاند يكي كلام اهل بهشت است بيك ديگر که آيا پس ما نميميريم در بهشت مگر همان مردن ما در دنيا که مردن اولي بود و اينکه استفهام از روي يقين است يعني يقينا ديگر مردن نداريم و ما بلطف الهي معذب نميشويم و ما نيستيم بمعذبين و بر طبق اينکه تفسير حديثي از حضرت باقر عليه السلام است مسندا که ميفرمايد
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| − | اذا دخل اهل الجنة الجنة و اهل النار النار جيء بالموت فيذبح كالكبش ثم يقال لهم خلود فلا موت ابدا فيقول اهل الجنة أ فما نحن بميتين الا موتتنا الاولي و ما نحن بمعذبين
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| − | و قريب بهمين حديث حديث ديگريست از آن حضرت که پس از ذبح موت مثل كبش ميفرمايد
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| − | ثم ينادي مناد لا موت ايقنوا بالخلود قال فتفرح اهل الجنة فرحا
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| − | بعد ذكر آيتين را ميفرمايد
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| − | و تشهق اهل النار شهقة الي قوله و هو قول اللّه وَ أَنذِرهُم يَومَ الحَسرَةِ إِذ قُضِيَ الأَمرُ
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| − | مريم آيه 40 نحوه دوم كلام اينکه مؤمن است با قرين خود که در سواء جحيم است که تو ميگفتي که همين مردن اولي است و فاني و زايل ميشويم و ديگر بعث و نشوري نيست.
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| − | أَ فَما نَحنُ بِمَيِّتِينَ إِلّا مَوتَتَنَا الأُولي وَ ما نَحنُ بِمُعَذَّبِينَ نه عذابي هست نه سؤال و جوابي و اينکه استفهام تقريريست که حال ببين عذاب را ذُق إِنَّكَ أَنتَ العَزِيزُ الكَرِيمُ دخان آيه 49 لكن تفسير اول اقرب بنظر ميآيد هم از جهت دو حديث مذكور که حضرت باقر عليه السلام تفسير فرموده و هم از جهت ظاهر آيه شريفه و هم از جهت آيات بعد که شاهد بر اينکه معني است که ميفرمايد:
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| − | برگزیده تفسیر نمونه=
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| − | ===برگزیده تفسیر نمونه===
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| − | {{نمایش فشرده تفسیر|
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| − | (آیه 59)- «و جز همان مرگ اول مرگی به سراغ ما نخواهد آمد، و ما هرگز عذاب نخواهیم شد» (إِلَّا مَوْتَتَنَا الْأُولی وَ ما نَحْنُ بِمُعَذَّبِینَ).
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| − | سایر تفاسیر=
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| − | سایرتفاسیر این آیه را می توانید در سایت قرآن مشاهده کنید:
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| − | ==تفسیر های فارسی==
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| − | ==={{ترجمه تفسیر المیزان|سوره=37 |آیه=59}}===
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| − | ==={{تفسیر خسروی|سوره=37 |آیه=59}}===
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| − | ==={{تفسیر عاملی|سوره=37 |آیه=59}}===
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| − | ==={{تفسیر جامع|سوره=37 |آیه=59}}===
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| − | ==تفسیر های عربی==
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| − | ==={{تفسیر المیزان|سوره=37 |آیه=59}}===
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| − | ==={{تفسیر مجمع البیان|سوره=37 |آیه=59}}===
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| − | ==={{تفسیر نور الثقلین|سوره=37 |آیه=59}}===
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| − | ==={{تفسیر الصافی|سوره=37 |آیه=59}}===
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| − | ==={{تفسیر الکاشف|سوره=37 |آیه=59}}===
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| − | </tabber>
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| | ==پانویس== | | ==پانویس== |