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| سطر ۵۶: |
سطر ۵۶: |
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| | == تفسیر آیه == | | == تفسیر آیه == |
| − | <tabber> | + | <tafsir sura="2" ayeh="163" /> |
| − | تفسیر نور=
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| − | ===تفسیر نور (محسن قرائتی)===
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| − | {{ نمایش فشرده تفسیر|
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| − | «163» وَ إِلهُكُمْ إِلهٌ واحِدٌ لا إِلهَ إِلَّا هُوَ الرَّحْمنُ الرَّحِيمُ
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| − | و معبود شما خدايى يگانه است، جز او معبودى نيست، بخشندهى مهربان است.
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| − | «164» إِنَّ فِي خَلْقِ السَّماواتِ وَ الْأَرْضِ وَ اخْتِلافِ اللَّيْلِ وَ النَّهارِ وَ الْفُلْكِ الَّتِي تَجْرِي فِي الْبَحْرِ بِما يَنْفَعُ النَّاسَ وَ ما أَنْزَلَ اللَّهُ مِنَ السَّماءِ مِنْ ماءٍ فَأَحْيا بِهِ الْأَرْضَ بَعْدَ مَوْتِها وَ بَثَّ فِيها مِنْ كُلِّ دَابَّةٍ وَ تَصْرِيفِ الرِّياحِ وَ السَّحابِ الْمُسَخَّرِ بَيْنَ السَّماءِ وَ الْأَرْضِ لَآياتٍ لِقَوْمٍ يَعْقِلُونَ
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| − | همانا در آفرينش آسمانها و زمين و در پى يكديگر آمدن شب و روز و كشتىهايى كه براى سودرسانى به مردم در دريا در حركتند و آبى كه خداوند از آسمان نازل كرده و با آن زمين مرده را زنده نموده و انواع جنبندگان را در آن گسترده و (همچنين) در تغيير مسير بادها و ابرهايى كه ميان آسمان و زمين معلّقند، براى مردمى كه مىانديشند، نشانههايى گوياست.
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| − | ===نکته ها===
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| − | هماهنگى ميان عناصر طبيعت و اجزاى هستى و قوانين حاكم بر آنها، همه نشاندهندهى حاكميّت وقدرت وارادهى خداى يگانه است.
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| − | آفرينش آسمانها و توسعهى دائمى آنها «1» كه دست انسان تاكنون فقط به قسمتى از اوّلين آسمان رسيده، و استحكام «2» و طبقات هفتگانه «3» و نظام حاكم «4» و تناسبات و ارتباطات ميان هريك و بىستون بودن «5» و حفاظت آنها «6» و حركات ستارگان در مدارهاى خود و
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| − | «1». «وَ إِنَّا لَمُوسِعُونَ» ذاريات، 47.
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| − | «2». «سَبْعاً شِداداً» نبأ، 12.
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| − | «3». «سَبْعَ سَماواتٍ طِباقاً» ملك، 3.
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| − | «4». «أَوْحى فِي كُلِّ سَماءٍ أَمْرَها» فصّلت، 12.
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| − | «5». «بِغَيْرِ عَمَدٍ تَرَوْنَها» رعد، 2.
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| − | «6». «سَقْفاً مَحْفُوظاً» انبيا، 32.
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| − | جلد 1 - صفحه 251
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| − | فاصله هريك از آنها، همه نشانههاى قدرت خداوند يكتاى حكيم است.
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| − | سعدى مىگويد:
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| − | آفرينش، همه تدبير خداوند دل است
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| − | دل ندارد، كه ندارد به خداوند اقرار
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| − | كوه و دريا ودرختان، همه در تسبيحند
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| − | نه همه مستمعى، فهم كند اين اسرار
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| − | عقل، حيران شود از خوشه زرين عنب
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| − | فهم، عاجز شود از حبّه ياقوت انار
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| − | پاك وبىعيب، خدايى كه به تقدير عزيز
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| − | ماه وخورشيد، مسخّر كند وليل ونهار
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| − | كلمه «رياح» جمع «ريح» به معناى باد است، ولى در قرآن هر جا كلمه «ريح» آمده همراه قهر و عذاب است، مانند: «ريح صَرصَر» «1» ولى هرجا كلمه «رياح» آمده، همراه باران و لطف الهى است. در حديث مىخوانيم: هرگاه بادى مىوزيد، پيامبر صلى الله عليه و آله مىفرمود: «اللهم اجعلها رياحا و لا تجعلها ريحا» خداوندا! اين باد را رياحِ رحمت قرار ده، نه ريحِ عذاب. «2»
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| − | ===پیام ها===
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| − | 1- شناخت طبيعت، يكى از راههاى خداشناسى است كه شناخت آن، قدرت، حكمت و يكتايى او را در بر دارد. «إِلهُكُمْ إِلهٌ واحِدٌ ... فِي خَلْقِ السَّماواتِ ... لَآياتٍ»
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| − | 2- خداوند، نظير و شبيه ندارد و مركب از اجزا نيست. «إِلهٌ واحِدٌ»
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| − | 3- هم طبيعت و هم صنعتِ دست ساختِ انسان، از اوست. «خَلْقِ السَّماواتِ وَ الْأَرْضِ ... وَ الْفُلْكِ»
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| − | 4- هر موجودى در جهان هستى، آيهاى از آيات كتاب خداوند در طبيعت است. «لَآياتٍ»
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| − | برگ درختانِ سبز، در نظر هوشيار
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| − | هر ورقش دفترى است، معرفت كردگار
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| − | 5- تنها خردمندان از نگاه در هستى، درس خداشناسى مىگيرند. «إِنَّ فِي خَلْقِ السَّماواتِ ... لَآياتٍ لِقَوْمٍ يَعْقِلُونَ»
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| − | «1». حاقّه، 6.
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| − | «2». تفاسير مجمع البيان و صفوةالتفاسير.
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| − | تفسير نور(10جلدى)، ج1، ص: 252
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| − | اثنی عشری=
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| − | ===تفسیر اثنی عشری (حسینی شاه عبدالعظیمی)===
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| − | وَ إِلهُكُمْ إِلهٌ واحِدٌ لا إِلهَ إِلاَّ هُوَ الرَّحْمنُ الرَّحِيمُ (163)
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| − | شأن نزول: ابن عباس نقل نمايد كفار قريش گفتند: اى پيغمبر، وصف نما خداى خود را تا به او ايمان آوريم؛ حق تعالى سوره توحيد و آيه شريفه را نازل فرمود:
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| − | وَ إِلهُكُمْ إِلهٌ واحِدٌ: و خداى شما كه سزاوار پرستش و ستايش باشد، خداى يكتاى بىهمتا كه شريك براى او نيست نه در ذات و نه در صفات و نه در افعال و نه در عبادات، لا إِلهَ إِلَّا هُوَ: نيست خدائى سزاوار پرستش و ستايش مگر ذات يگانه او، الرَّحْمنُ الرَّحِيمُ: يگانه بخشاينده در دنيا به تمامى بندگان از مؤمن و كافر و مطيع و عاصى به اعطاء رزق، مهربان در آخرت نسبت به مؤمنين به ثواب بهشت و مزيد نعمت.
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| − | «1» تفسير صافى، جلد اوّل، صفحه 207- منهج الصادقين، جلد اوّل، صفحه 353.
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| − | تفسير اثنا عشرى، ج1، ص: 304
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| − | تنبيه: وحدانيت الهى در چهار مقام است: 1- توحيد ذاتى، يعنى ذات سبحانى يكه و يكتا و شريك و نظير و مثل و مانند ندارد. 2- توحيد صفاتى، يعنى منفرد و متفرّد در تمام صفات حسنى. 3- توحيد افعالى، يعنى در خالقيّت و رازقيّت و غيره شريكى نخواهد داشت. 4- توحيد عبادتى، يعنى عبادت و پرستش خاصه ذات سبحانى خواهد بود.
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| − | روان جاوید=
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| − | ===تفسیر روان جاوید (ثقفى تهرانى)===
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| − | وَ إِلهُكُمْ إِلهٌ واحِدٌ لا إِلهَ إِلاَّ هُوَ الرَّحْمنُ الرَّحِيمُ (163)
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| − | ترجمه
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| − | و خداى شما خدائيست يگانه نيست خدائى مگر او كه بخشنده مهربان است..
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| − | تفسير
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| − | گفته شده است يعنى مستحق عبادت شما يكى است شريكى ندارد كه سزاوار عبادت باشد يا ناميده شود خدا و براى اثبات وحدانيت و رفع توهم از وجود خداوندى كه مستحق عبادت نباشد فرموده است نيست خدائى جز او و دليل وحدانيت بخشش تام و رحمت عام است حقير عرض ميكنم عموم رحمت رحمانيه و رحيميه دلالت دارد بر آنكه مبدء آن يكى است و الا لازم مىآيد رحمت هر رحيمى مخصوص بدسته باشد كه مشمول آنند و سايرين از آن محروم باشند و همچنين است ساير صفات كماليه كه هر يك بايد منتهى به مبدئى شوند كه مصداق تمام آنصفات باشد و آن نور جمال حق است كه حقيقت وجود و اصل خيرات است و غير از آن چيزى نيست و هر چه هست او است كه بر كائنات تابيده و عالم را روشن و هويدا نموده است.
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| − | اطیب البیان=
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| − | ===اطیب البیان (سید عبدالحسین طیب)===
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| − | {{نمایش فشرده تفسیر|
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| − | وَ إِلهُكُم إِلهٌ واحِدٌ لا إِلهَ إِلاّ هُوَ الرَّحمنُ الرَّحِيمُ (163)
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| − | (و معبود شما معبود يكتاست و نيست معبودي جز او که صاحب رحمت عامّ و خاصّ است) اينکه آيه در مقام بيان توحيد است و در اثبات توحيد خداوند دانشمندان مسالكي اتخاذ و ادله اقامه نمودهاند حكماء از طريق لزوم تركيب که متعدد بايد داراي ما به الاشتراك و ما به الامتياز باشد و از اينجهت تركيب لازم ميآيد و تركيب با واجب الوجودي منافات دارد. متكلمين از طريق قاعده تمانع
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| − | 1- سورة النساء آيه 59
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| − | [.....]
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| − | 2- مجلد اول ص 282- 301
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| − | 3- سوره آل عمران آيه 71
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| − | جلد 2 - صفحه 272
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| − | بتقريراتي مختلفي که نمودهاند و ديگران از راه وحدت نظام عالم و تفصيل اينکه ادله را در كلم الطيب بيان نمودهايم«1» و در اينجا فقط بذكر حديثي که جامعترين احاديث در باب توحيد است اكتفاء ميكنيم در تفسير برهان از صدوق ره بسند متصل بهاني که از اصحاب امير المؤمنين است نقل ميكند «
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| − | قال ان اعرابيا قام يوم الجمل الي امير المؤمنين (ع) أ تقول ان اللّه واحد قال فحمل النّاس اليه و قالوا يا اعرابي ما تري ما فيه امير المؤمنين من تقسم القلب فقال امير المؤمنين (ع) دعوة فان الذي يريده الاعرابي هو الذي نريده من القوم، ثم قال يا اعرابي ان القول في ان اللّه واحد علي اربعة اقسام:
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| − | فوجهان منها لا يجوز ان علي اللّه عز و جل و وجهان يثبتان فيه فاما اللذان لا يجوز ان عليه فقول القائل واحد يقصد به باب الاعداد فهذا ما لا يجوز لانّ من لا ثاني له لا يدخل في باب الاعداد اما تري انه كفر من قال انّه ثالث ثلاثة و قول القائل الواحد من النّاس يريد به النوع من الجنس فهذا ما لا يجوز عليه لانه تشبيه جل ربنا عن ذلک و تعالي، و امّا الوجهان اللذان يثبتان فيه فقول القائل هو واحد ليس له في الاشياء شبه كذلك ربنا و قول القائل انه ربنا احدي المعني يعني به انّه لا ينقسم في وجود و لا عقل و لا وهم كذلك ربنا عز و جل
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| − | » شرح حديث: وحدت را امير المؤمنين (ع) در اينکه حديث بچهار قسم تقسيم نموده:
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| − | وحدت عددي، وحدت نوعي، وحدت بمعني بي همتايي و وحدت بمعني بساطت و داراي جزء و تركيب نبودن، و دو قسم اول را از خدا سلب، و دو قسم ديگر را براي او ثابت نموده است.
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| − | واحد عددي چيزي است که تحت شماره در آيد و چيزي که شبيه و نظير نداشته
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| − | 1- مجلد اول ص 100- 120
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| − | جلد 2 - صفحه 273
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| − | باشد در شماره نخواهد آمد و شايد مراد از عبارتي که در زبان عوام است:
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| − | «يكي بود و يكي نبود» همين باشد.
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| − | و واحد نوعي فردي است از نوع که با افراد ديگر در آن مشترك باشد يا نوعي که با انواع ديگر از حيث جنس مشترك باشند مانند فردي از افراد انسان و نوعي از انواع حيوان و نحو آن و اينکه نيز بر خدا روا نيست زيرا هر فردي با افراد ديگر وجه مشاركتي در نوع خود دارند و همچنين هر نوعي با انواع ديگر ما به الاشتراكي دارند بنا بر اينکه تركيب لازم آيد و تركيب با واجب الوجودي سازگار نباشد.
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| − | و امّا واحد بمعني بيهمتا و كسي که شبيه و نظير و عديل و مثل و مانندي ندارد، معنايي است که بر خدا رواست و همچنين واحد باين معني که بسيط است و هيچ قسم تركيبي در ذات او راه ندارد نه تركيب خارجي مانند تركيب اجسام که از اجزاء متشتتة مركب شدهاند و نه تركيب ذهني مانند تركيب انواع که از جنس و فصل مركب شدهاند و نه تركيب و همي مانند اجناس عاليه که از آنها ببسائط تعبير ميكنند و از وجود و ماهيت مركب شدهاند يعني وجود آنها غير ذات آنهاست زيرا خداوند وجود او عين ذات اوست يعني او صرف وجود و وجود محض است و از اينجهت ضدّي براي او نيست چون ضدّ وجود يا عدم است يا ماهيت و عدم که عدم است و ماهيت هم بالذات معدوم است «الماهية من حيث ذاته ليس و من علته ايس» بنا بر اينکه ضدي براي وجود محض تعقل نميشود و جواب شبهه إبن كمونه هم از اينجا معلوم ميگردد زيرا تعقل دوئيت در وجود محض نميشود تا بتوان دو هويت مختلف بتمام ذات تصور نمود و تفصيل آن در كلم الطيب ذكر شده«1».
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| − | 1- مجلد اول ص 104
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| − | جلد 2 - صفحه 274
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| − | و در اينکه آيه شريفه تعبير بواحد فرموده و در سوره توحيد باحد و ممكن است فرق بين احد و واحد اينکه باشد که احد بمعني احدي الذات و مبرا بودن از تركيب باشد و واحد بمعني يكتا و بي همتا و بيشريك باشد و بقيه كلمات آيه در ضمن آيات سابقه بيان شد.
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| − | برگزیده تفسیر نمونه=
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| − | ===برگزیده تفسیر نمونه===
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| − | {{نمایش فشرده تفسیر|
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| − | (آیه 163)- و از آنجا که اصل توحید به همه این بدبختیها پایان میدهد در این آیه میگوید: «معبود شما خداوند یگانه است» (وَ إِلهُکُمْ إِلهٌ واحِدٌ).
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| − | باز برای تأکید بیشتر اضافه میکند: «هیچ معبودی جز او نیست، و هیچ کس غیر او شایسته پرستش نمیباشد» (لا إِلهَ إِلَّا هُوَ).
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| − | و در آخرین جمله به عنوان دلیل میفرماید: «او خداوند بخشنده مهربان است» (الرَّحْمنُ الرَّحِیمُ).
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| − | آری! کسی که از یکسو رحمت عامش همگان را فرا گرفته و از دیگر سو برای مؤمنان رحمت ویژهای قرار داده، شایسته عبودیت است نه آنها که سر تا پا نیازند و محتاج.
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| − | سایر تفاسیر=
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| − | سایرتفاسیر این آیه را می توانید در سایت قرآن مشاهده کنید:
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| − | ==تفسیر های فارسی==
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| − | ==={{ترجمه تفسیر المیزان|سوره=2 |آیه=163}}===
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| − | ==={{تفسیر خسروی|سوره=2 |آیه=163}}===
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| − | ==={{تفسیر عاملی|سوره=2 |آیه=163}}===
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| − | ==={{تفسیر جامع|سوره=2 |آیه=163}}===
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| − | ==تفسیر های عربی==
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| − | ==={{تفسیر المیزان|سوره=2 |آیه=163}}===
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| − | ==={{تفسیر مجمع البیان|سوره=2 |آیه=163}}===
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| − | ==={{تفسیر نور الثقلین|سوره=2 |آیه=163}}===
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| − | ==={{تفسیر الصافی|سوره=2 |آیه=163}}===
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| − | ==={{تفسیر الکاشف|سوره=2 |آیه=163}}===
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| − | </tabber>
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| | ==پانویس== | | ==پانویس== |