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| سطر ۴۴: |
سطر ۴۴: |
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| | == تفسیر آیه == | | == تفسیر آیه == |
| − | <tabber> | + | <tafsir sura="2" ayeh="64" /> |
| − | تفسیر نور=
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| − | ===تفسیر نور (محسن قرائتی)===
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| − | {{ نمایش فشرده تفسیر|
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| − | «64» ثُمَّ تَوَلَّيْتُمْ مِنْ بَعْدِ ذلِكَ فَلَوْ لا فَضْلُ اللَّهِ عَلَيْكُمْ وَ رَحْمَتُهُ لَكُنْتُمْ مِنَ الْخاسِرِينَ
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| − | سپس شما بعد از اين جريان (كه كوه طور را بالاى سر خود ديديد، بازهم) روىگردان شديد و اگر فضل و رحمت خداوند بر شما نبود قطعاً از زيانكاران بوديد.
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| − | ===پیام ها===
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| − | 1- انسانِ غافل، مهمترين تهديدها را فراموش مىكند. «ثُمَّ تَوَلَّيْتُمْ مِنْ بَعْدِ ذلِكَ»
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| − | 2- نوميد نشويد، زيرا كه خداوند با متخلّفان نيز با فضل و رحمت برخورد مىكند. «فَلَوْ لا فَضْلُ اللَّهِ عَلَيْكُمْ»
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| − | 3- نجات از خسارت، در سايهى فضل و رحمت الهى است. «فَلَوْ لا فَضْلُ اللَّهِ عَلَيْكُمْ وَ رَحْمَتُهُ لَكُنْتُمْ مِنَ الْخاسِرِينَ»
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| − | اثنی عشری=
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| − | ===تفسیر اثنی عشری (حسینی شاه عبدالعظیمی)===
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| − | {{نمایش فشرده تفسیر|
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| − | ثُمَّ تَوَلَّيْتُمْ مِنْ بَعْدِ ذلِكَ فَلَوْ لا فَضْلُ اللَّهِ عَلَيْكُمْ وَ رَحْمَتُهُ لَكُنْتُمْ مِنَ الْخاسِرِينَ (64)
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| − | بعد از آن، نقض ميثاق و عهد ايشان را بيان مىفرمايد:
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| − | ثُمَّ تَوَلَّيْتُمْ مِنْ بَعْدِ ذلِكَ: پس پشت نموديد و اعراض كرديد از وفاى به آن ميثاق، و نقض عهد نموديد بعد از قبولى آن و تعهّد به وفاى به آن. فَلَوْ لا فَضْلُ اللَّهِ عَلَيْكُمْ وَ رَحْمَتُهُ: و اگر نبود فضل خدا بر شما و بخشايش او نسبت به شما، به توفيق دادن به توبه و يا به وجود مقدّس محمد صلّى اللّه عليه و آله و سلّم كه شما را به حق دعوت نموده و راه مستقيم را مبرهن ساخته، لَكُنْتُمْ مِنَ الْخاسِرِينَ: هر آينه بوديد از زيانكاران و مغبونان، به انهماك در معاصى و گمراهى.
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| − | از ابو العاليه نقل شده كه مراد به فضل اللّه سلام و مراد به رحمت قرآن مىباشد. يعنى اگر نبود اسلام و قرآن كه از فضل و رحمت سبحانى به شما
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| − | تفسير اثنا عشرى، ج1، ص: 166
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| − | شده، هر آينه از زيانكاران بوديد در زمان فترت «1».
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| − | روان جاوید=
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| − | ===تفسیر روان جاوید (ثقفى تهرانى)===
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| − | {{نمایش فشرده تفسیر|
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| − | ثُمَّ تَوَلَّيْتُمْ مِنْ بَعْدِ ذلِكَ فَلَوْ لا فَضْلُ اللَّهِ عَلَيْكُمْ وَ رَحْمَتُهُ لَكُنْتُمْ مِنَ الْخاسِرِينَ (64)
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| − | ترجمه
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| − | پس رو گردانديد بعد از آن پس اگر نبود فضل خدا بر شما و رحمتش هر آينه بوديد از زيانكاران.
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| − | تفسير
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| − | رو گرداندند پيشينيان شما از قيام بعهد الهى و وفاى بآن و اگر خداوند تفضّل نمىفرمود و مهلت نميداد بشما براى توبه و انابه از مغبوبان بوديد.
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| − | اطیب البیان=
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| − | ===اطیب البیان (سید عبدالحسین طیب)===
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| − | {{نمایش فشرده تفسیر|
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| − | ثُمَّ تَوَلَّيتُم مِن بَعدِ ذلِكَ فَلَو لا فَضلُ اللّهِ عَلَيكُم وَ رَحمَتُهُ لَكُنتُم مِنَ الخاسِرِينَ (64)
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| − | (سپس اعراض نموديد بعد از اخذ ميثاق پس اگر فضل و رحمت خدا بر شما نبود هر آينه از زيانكاران بوديد).
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| − | تولّي بمعني استدبار (پشت كردن) كنايه از اعراض و مخالفت است و (من بعد ذلک) يعني از اخذ ميثاق.
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| − | و از جمله فَلَو لا فَضلُ اللّهِ عَلَيكُم استفاده ميشود که اينها مستحق عذاب و خسران در اثر اعراض و مخالفت شدند ولي تفضل و رحمت الهي مانع از آن شد و حكمت اينکه تفضل امهال آنان بود تا موفق بتوبه شوند يا براي اينكه مؤمنيني که در نسل آنها بودند بوجود آيند و غير اينها از حكمتهاي ديگر، و مراد از رحمت اعطاء نعم الهي و دفع بليات و عقوبات دنيا و آخرت نسبت بهمه آنها يا بعض آنها است و معني خسران و زيان در ذيل آيه شريفه:
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| − | الَّذِينَ يَنقُضُونَ عَهدَ اللّهِ مِن بَعدِ مِيثاقِهِ الآية بيان شد«1»
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| − | برگزیده تفسیر نمونه=
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| − | ===برگزیده تفسیر نمونه===
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| − | {{نمایش فشرده تفسیر|
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| − | اشاره
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| − | (آیه 64)- ولی شما پیمان خود را به دست فراموشی سپردید «و بعد از این ماجرا، روی گردان شدید» (ثُمَّ تَوَلَّیْتُمْ مِنْ بَعْدِ ذلِکَ).
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| − | «و اگر فضل و رحمت خدا بر شما نبود، از زیانکاران بودید» (فَلَوْ لا فَضْلُ اللَّهِ عَلَیْکُمْ وَ رَحْمَتُهُ لَکُنْتُمْ مِنَ الْخاسِرِینَ).
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| − | 1- چگونه کوه بالای سر بنی اسرائیل قرار گرفت؟
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| − | مفسر بزرگ اسلام مرحوم طبرسی از قول «ابن زید» چنین نقل میکند: هنگامی که موسی (ع) از کوه طور بازگشت و تورات را با خود آورد، به قوم خویش اعلام کرد کتاب آسمانی آوردهام که حاوی دستورات دینی و حلال و حرام است، دستوراتی که خداوند برنامه کار شما قرار داده، آن را بگیرید و به احکام آن عمل کنید.
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| − | یهود به بهانه این که تکالیف مشکلی برای آنان آورده، بنای نافرمانی و سرکشی گذاشتند، خدا هم فرشتگان را مأمور کرد، تا قطعه عظیمی از کوه طور را بالای سر آنها قرار دهند.
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| − | در این هنگام موسی (ع) اعلام کرد چنانچه پیمان ببندید و به دستورات خدا عمل کنید و از سرکشی و تمرّد توبه نمایید این عذاب و کیفر از شما بر طرف میشود و گر نه همه هلاک خواهید شد.
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| − | آنها تسلیم شدند و تورات را پذیرا گشتند و برای خدا سجده نمودند، در حالی که هر لحظه انتظار سقوط کوه را بر سر خود میکشیدند، ولی به برکت توبه
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| − | ج1، ص86
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| − | سر انجام این عذاب الهی از آنها دفع شد».
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| − | اما در چگونگی قرار گرفتن کوه بالای سر بنی اسرائیل: این احتمال وجود دارد که قطعه عظیمی از کوه به فرمان خدا بر اثر زلزله و صاعقه شدید از جا کنده شد، و از بالای سر آنها گذشت بطوری که چند لحظه، آن را بر فراز سر خود دیدند و تصوّر کردند که بر آنها فرو خواهد افتاد.
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| − | 2- پیمان اجباری چه سودی دارد؟
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| − | در پاسخ این سؤال میتوان گفت: هیچ مانعی ندارد که افراد متمرّد و سرکش را با تهدید به مجازات در برابر حق تسلیم کنند، این تهدید و فشار که جنبه موقتی دارد، غرور آنها را در هم میشکند و آنها را وادار به اندیشه و تفکّر صحیح میکند و در ادامه راه با اراده و اختیار به وظایف خویش عمل میکند.
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| − | و به هر حال، این پیمان، بیشتر مربوط به جنبههای عملی آن بوده است و گر نه اعتقاد را نمیتوان با اکراه تغییر داد.
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| − | سایر تفاسیر=
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| − | سایرتفاسیر این آیه را می توانید در سایت قرآن مشاهده کنید:
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| − | ==تفسیر های فارسی==
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| − | ==={{ترجمه تفسیر المیزان|سوره=2 |آیه=64}}===
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| − | ==={{تفسیر خسروی|سوره=2 |آیه=64}}===
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| − | ==={{تفسیر عاملی|سوره=2 |آیه=64}}===
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| − | ==={{تفسیر جامع|سوره=2 |آیه=64}}===
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| − | ==تفسیر های عربی==
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| − | ==={{تفسیر المیزان|سوره=2 |آیه=64}}===
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| − | ==={{تفسیر مجمع البیان|سوره=2 |آیه=64}}===
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| − | ==={{تفسیر نور الثقلین|سوره=2 |آیه=64}}===
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| − | ==={{تفسیر الصافی|سوره=2 |آیه=64}}===
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| − | ==={{تفسیر الکاشف|سوره=2 |آیه=64}}===
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| − | </tabber>
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