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| سطر ۴۴: |
سطر ۴۴: |
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| | == تفسیر آیه == | | == تفسیر آیه == |
| − | <tabber> | + | <tafsir sura="37" ayeh="39" /> |
| − | تفسیر نور=
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| − | ===تفسیر نور (محسن قرائتی)===
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| − | {{ نمایش فشرده تفسیر|
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| − | وَ ما تُجْزَوْنَ إِلَّا ما كُنْتُمْ تَعْمَلُونَ «39» إِلَّا عِبادَ اللَّهِ الْمُخْلَصِينَ «40»
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| − | و جز آن چه انجام دادهايد، كيفر نمىبينيد. مگر بندگان خالص شدهى خدا (كه از كيفر بر كنارند).
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| − | أُولئِكَ لَهُمْ رِزْقٌ مَعْلُومٌ «41» فَواكِهُ وَ هُمْ مُكْرَمُونَ «42»
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| − | آنانند كه برايشان رزق معلوم است. انواع ميوهها و آنان مورد احترامند.
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| − | فِي جَنَّاتِ النَّعِيمِ «43» عَلى سُرُرٍ مُتَقابِلِينَ «44»
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| − | در باغهاى پر نعمت (بهشت). بر تختهايى در برابر يكديگر (تكيه زدهاند).
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| − | جلد 8 - صفحه 28
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| − | ===نکته ها===
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| − | «مخلِص» به افرادى گفته مىشود كه از انواع شرك و ريا و نفاق دورى مىكنند و خود را بندهى خدا قرار مىدهند، امّا «مخلَص» به افرادى گفته مىشود كه به خاطر كمالاتى كه دارند خداوند آنان را خالص كرده و برمىگزيند.
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| − | ===پیام ها===
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| − | 1- كيفرهاى الهى عادلانه است. «وَ ما تُجْزَوْنَ إِلَّا ما كُنْتُمْ تَعْمَلُونَ» (آرى عذاب دردناك قيامت تجسم همان رفتار شرك آلود و استكبارى در دنياست).
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| − | 2- در كنار تهديد، بشارت لازم است. «إِلَّا عِبادَ اللَّهِ الْمُخْلَصِينَ»
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| − | 3- آنچه سبب برگزيدگى انسان نزد خداوند مىشود، بندگى است. «إِلَّا عِبادَ اللَّهِ الْمُخْلَصِينَ»
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| − | 4- پاداش متناسب و برابر براى خلافكاران است، امّا پاداش بندگان برگزيده خدا فراتر از عملكردشان است. «وَ ما تُجْزَوْنَ إِلَّا ما كُنْتُمْ تَعْمَلُونَ إِلَّا عِبادَ اللَّهِ»
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| − | 5- در بهشت، كاميابى مادى و معنوى در كنار هم قرار دارند. فَواكِهُ ... مُكْرَمُونَ
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| − | 6- ديدار اولياى خداوند، يكى از لذّتهاى معنوى بهشت است. «سُرُرٍ مُتَقابِلِينَ»
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| − | 7- در تقابلهاى دنيوى گاهى خصومت است، ولى در تقابلهاى اخروى بزم خوش و لذّت است. «عَلى سُرُرٍ مُتَقابِلِينَ»
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| − | 8- كاميابى بهشتيان همه جانبه است:
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| − | الف) برگزيدگى خدا «مخلصين» (برگزيدگان خدا از مقامى بس والا برخوردارند. «أُولئِكَ» براى اشاره به دور و نشانه مقام والاى آنان است.)
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| − | ب) رزق «مَعْلُومٌ» كه به فرموده امام باقر عليه السلام خدمت گزاران بهشتى آن را مىدانند و آن را براى اولياى خدا قبل از آنكه درخواست كنند مىآورند. «1»
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| − | ج) مادى و معنوى بودن رزق. «فَواكِهُ وَ هُمْ مُكْرَمُونَ»
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| − | «1». تفسير نورالثقلين.
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| − | جلد 8 - صفحه 29
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| − | د) جايگاهى نيكو. «جَنَّاتِ النَّعِيمِ»
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| − | ه) حضور در جمع دوستان بهشتى همراه با انس و محبت و بزم خوش.
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| − | اثنی عشری=
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| − | ===تفسیر اثنی عشری (حسینی شاه عبدالعظیمی)===
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| − | {{نمایش فشرده تفسیر|
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| − | وَ ما تُجْزَوْنَ إِلاَّ ما كُنْتُمْ تَعْمَلُونَ (39)
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| − | وَ ما تُجْزَوْنَ: و جزا داده نشويد، إِلَّا ما كُنْتُمْ تَعْمَلُونَ: مگر آنچه بوديد كه مىكرديد، يعنى پاداش شما بر وفق اعمال و بر قدر اعمال شماست.
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| − | روان جاوید=
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| − | ===تفسیر روان جاوید (ثقفى تهرانى)===
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| − | فَحَقَّ عَلَيْنا قَوْلُ رَبِّنا إِنَّا لَذائِقُونَ (31) فَأَغْوَيْناكُمْ إِنَّا كُنَّا غاوِينَ (32) فَإِنَّهُمْ يَوْمَئِذٍ فِي الْعَذابِ مُشْتَرِكُونَ (33) إِنَّا كَذلِكَ نَفْعَلُ بِالْمُجْرِمِينَ (34) إِنَّهُمْ كانُوا إِذا قِيلَ لَهُمْ لا إِلهَ إِلاَّ اللَّهُ يَسْتَكْبِرُونَ (35)
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| − | وَ يَقُولُونَ أَ إِنَّا لَتارِكُوا آلِهَتِنا لِشاعِرٍ مَجْنُونٍ (36) بَلْ جاءَ بِالْحَقِّ وَ صَدَّقَ الْمُرْسَلِينَ (37) إِنَّكُمْ لَذائِقُوا الْعَذابِ الْأَلِيمِ (38) وَ ما تُجْزَوْنَ إِلاَّ ما كُنْتُمْ تَعْمَلُونَ (39) إِلاَّ عِبادَ اللَّهِ الْمُخْلَصِينَ (40)
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| − | ترجمه
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| − | پس لازم شد بر ما وعده پروردگار ما همانا ما چشندگانيم
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| − | پس گمراه كرديم شما را همانا ما بوديم گمراهان
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| − | پس بدرستيكه آنها در چنين روز در عذاب شريكانند
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| − | همانا ما اين چنين رفتار ميكنيم با گناهكاران
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| − | بدرستيكه آنها بودند كه وقتى گفته ميشد بآنها نيست معبودى جز خداوند تكبّر و سركشى مينمودند
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| − | و ميگفتند آيا همانا ما ترككنندگان باشيم خدايان خود را براى شاعرى ديوانه
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| − | نه چنين است بلكه آورد دين حقّ را و تصديق نمود پيمبران را
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| − | همانا شما هر آينه چشندگان عذاب دردناكيد
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| − | و جزا داده نميشويد جز آنچه بوديد كه ميكرديد
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| − | مگر بندگان خدا كه خالص شدگانند.
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| − | تفسير
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| − | بعد از معارضه گمراهشدگان با گمراه كنندگان كه در آيات سابقه ذكر شد گمراه كنندگان اوّلا اقرار نمودهاند كه ما مستحق عذاب شديم و لازم شد كه بچشيم طعم آتش جهنّم را كه خداوند قول داده بود بكفار بچشاند و ثانيا اعتراف كردهاند كه ما گمراهشدگان را گمراه نموديم چون خودمان گمراه بوديم خواستيم آنها را هم مثل خودمان كنيم تا امثال ما در دنيا كم نباشند ولى خدا بآنها عقل داده بود نبايد گوش بحرف ما بدهند بايد بعقل خودشان رجوع نمايند و دريابند بطلان قول ما را و خدا فرموده هر دو دسته امروز با يكديگر در عذاب شريكند نهايت آنكه گمراه كنندگان بيشتر براى گناه گمراه شدن و گمراه كردن و بعدا خدا ميفرمايد ما كلّيّه گناهكاران را باين نحو مجازات ميكنيم كه عذر غير موجّه آنها را نمىپذيريم چه رسد بمشركين مكّه چون آنها اشخاصى بودند كه وقتى پيغمبر صلى اللّه عليه و اله بآنها فرمود بگوئيد لا اله الا اللّه رستگار شويد تكبّر و سركشى و تعصّب بيجا و عناد و لجاج وادار نمود آنها را كه بگويند آيا ما دست از بتها و معبودهاى خود و پدرانمان برداريم بقول يكنفر شاعر ديوانه با آنكه ديده بودند معجزات او را و او دين حق ثابت محقّق بادلّه و براهين عقليّه آورده بود و تصديق نموده بود انبياء سابق را بقول و بوجود خود و كتابش چون منطبق بودند با معرّفى ايشان از آندو در كتب خودشان و بطريقهاش كه دعوت بتوحيد نمود چنانچه انبياء عليهم السلام مينمودند و از اعاظم ايشان حضرت ابراهيم و اسمعيل عليهما السلام جدّ اعلاى اينها بودند كه مؤسّس توحيد در عالم شدند و اين ناخلفان
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| − | جلد 4 صفحه 430
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| − | مشرك شدند پس ميگوئيم بايد بچشيد عذاب اليم آتش دائم جهنّم را و دم نزنيد اين جزاى اعمال شما است كه مرتكب شديد نه زيادتر از آن چون خداوند زياده از ميزان استحقاق جزا نميدهد مگر به بندگان خالص شده از لوث معاصى كه بفضل خود بآنها زيادتر از ميزان استحقاق هم جزاء ميدهد و بنابراين استثناء متّصل و مستثنا مفهوم از كلام است يا خطاب بعموم بندگان ميباشد و محتمل است منقطع باشد يعنى شما معذّب خواهيد بود ليكن بندگانيكه خالص نمودند وجود خود و نيّات خودشان را براى عبادت و اطاعت خدايا خدا ايشانرا موفّق بخلوص نيّت فرموده براى خود مثاب و مأجورند بتفصيلى كه بيايد انشاء اللّه تعالى.
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| − | اطیب البیان=
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| − | ===اطیب البیان (سید عبدالحسین طیب)===
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| − | {{نمایش فشرده تفسیر|
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| − | وَ ما تُجزَونَ إِلاّ ما كُنتُم تَعمَلُونَ (39)
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| − | و جزاء داده نميشويد مگر آنچه که بوديد عمل ميكرديد.
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| − | سرتاسر قرآن فرياد ميزند که خداوند ذرهاي ظلم نميكند زيرا عادل است و زائد بر استحقاق عذاب نميفرمايد وَ ما ظَلَمناهُم وَ لكِن ظَلَمُوا أَنفُسَهُم هود آيه 103 وَ ما ظَلَمناهُم وَ لكِن كانُوا أَنفُسَهُم يَظلِمُونَ نحل آيه 119 وَ ما ظَلَمناهُم وَ لكِن كانُوا هُمُ الظّالِمِينَ زخرف آيه 76 إِنَّ اللّهَ لا يَظلِمُ مِثقالَ ذَرَّةٍ نساء آيه 44 إِنَّ اللّهَ لا يَظلِمُ النّاسَ شَيئاً وَ لكِنَّ النّاسَ أَنفُسَهُم يَظلِمُونَ يونس آيه 45 وَ لا يَظلِمُ رَبُّكَ أَحَداً كهف آيه 47 و غير ذلک من الآيات و بالجمله زائد بر استحقاق عذاب نميفرمايد بلكه بسا از بسياري عفو ميفرمايد مثل عصات مؤمنين که ميفرمايد وَ ما أَصابَكُم مِن مُصِيبَةٍ فَبِما كَسَبَت أَيدِيكُم وَ يَعفُوا عَن كَثِيرٍ شوري آيه 29 بلي در طرف مثوبات و اعمال صالحه بسا اضعاف مضاعف خداوند اجر ميدهد مَن جاءَ بِالحَسَنَةِ فَلَهُ عَشرُ أَمثالِها وَ مَن جاءَ بِالسَّيِّئَةِ فَلا يُجزي إِلّا مِثلَها وَ هُم لا يُظلَمُونَ انعام آيه 161 انسان بايد در دنيا خود را باين امراض و اينکه معاصي مبتلا نكند و اگر مبتلا شد تا در دنيا است معالجه كند بتوبه و انابه که ميفرمايد إِنَّمَا التَّوبَةُ عَلَي اللّهِ لِلَّذِينَ يَعمَلُونَ السُّوءَ بِجَهالَةٍ ثُمَّ يَتُوبُونَ مِن قَرِيبٍ وَ لَيسَتِ التَّوبَةُ لِلَّذِينَ يَعمَلُونَ السَّيِّئاتِ حَتّي إِذا حَضَرَ أَحَدَهُمُ المَوتُ قالَ إِنِّي تُبتُ الآنَ وَ لَا الَّذِينَ يَمُوتُونَ وَ هُم كُفّارٌ أُولئِكَ أَعتَدنا لَهُم عَذاباً أَلِيماً نساء آيه 21 و 22 و باعمال صالحه که ميفرمايد إِنَّ- الحَسَناتِ يُذهِبنَ السَّيِّئاتِ هود آيه 116 و بتوسلات.
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| − | برگزیده تفسیر نمونه=
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| − | ===برگزیده تفسیر نمونه===
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| − | {{نمایش فشرده تفسیر|
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| − | (آیه 39)- ولی گمان نکنید که خداوند انتقامجو است و میخواهد انتقام
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| − | ج4، ص140
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| − | پیامبرش را از شما بگیرد چنین نیست شما «جز به آنچه انجام میدادید کیفر داده نمیشوید» (وَ ما تُجْزَوْنَ إِلَّا ما کُنْتُمْ تَعْمَلُونَ).
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| − | در حقیقت همان اعمال شماست که در برابر شما مجسم میشود و با شما میماند و شما را شکنجه و آزار میدهد.
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| − | سایر تفاسیر=
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| − | سایرتفاسیر این آیه را می توانید در سایت قرآن مشاهده کنید:
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| − | ==تفسیر های فارسی==
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| − | ==={{ترجمه تفسیر المیزان|سوره=37 |آیه=39}}===
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| − | ==={{تفسیر خسروی|سوره=37 |آیه=39}}===
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| − | ==={{تفسیر عاملی|سوره=37 |آیه=39}}===
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| − | ==={{تفسیر جامع|سوره=37 |آیه=39}}===
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| − | ==تفسیر های عربی==
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| − | ==={{تفسیر المیزان|سوره=37 |آیه=39}}===
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| − | ==={{تفسیر مجمع البیان|سوره=37 |آیه=39}}===
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| − | ==={{تفسیر نور الثقلین|سوره=37 |آیه=39}}===
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| − | ==={{تفسیر الصافی|سوره=37 |آیه=39}}===
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| − | ==={{تفسیر الکاشف|سوره=37 |آیه=39}}===
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| − | </tabber>
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| | ==پانویس== | | ==پانویس== |