آیه 197 سوره اعراف: تفاوت بین نسخهها
مهدی موسوی (بحث | مشارکتها) |
(جایگزینی تفاسیر) |
||
| سطر ۴۳: | سطر ۴۳: | ||
== تفسیر آیه == | == تفسیر آیه == | ||
| − | < | + | <tafsir sura="7" ayeh="197" /> |
| − | |||
| − | |||
| − | |||
| − | |||
| − | |||
| − | |||
| − | |||
| − | |||
| − | |||
| − | |||
| − | |||
| − | |||
| − | |||
| − | |||
| − | |||
| − | |||
| − | |||
| − | |||
| − | |||
| − | |||
| − | |||
| − | |||
| − | |||
| − | |||
| − | |||
| − | |||
| − | |||
| − | |||
| − | |||
| − | |||
| − | |||
| − | |||
| − | |||
| − | |||
| − | |||
| − | |||
| − | |||
| − | |||
| − | |||
| − | |||
| − | |||
| − | |||
| − | |||
| − | |||
| − | |||
| − | |||
| − | |||
| − | |||
| − | |||
| − | |||
| − | |||
| − | |||
| − | |||
| − | |||
| − | |||
| − | |||
| − | |||
| − | |||
| − | |||
| − | |||
| − | |||
| − | |||
| − | |||
| − | |||
| − | |||
| − | |||
| − | |||
| − | |||
| − | |||
| − | |||
| − | |||
| − | |||
| − | |||
| − | |||
| − | |||
| − | |||
| − | |||
| − | |||
| − | |||
| − | |||
| − | |||
| − | |||
| − | |||
| − | |||
| − | |||
| − | |||
| − | |||
| − | |||
| − | |||
| − | |||
| − | |||
| − | |||
| − | |||
| − | |||
| − | |||
| − | |||
| − | |||
| − | |||
| − | |||
| − | |||
| − | |||
| − | |||
| − | |||
| − | |||
| − | |||
| − | |||
| − | |||
| − | |||
| − | |||
| − | |||
| − | |||
| − | |||
| − | |||
| − | |||
| − | |||
| − | |||
==پانویس== | ==پانویس== | ||
نسخهٔ کنونی تا ۲۱ ژوئن ۲۰۲۶، ساعت ۱۲:۱۰
| <<196 | آیه 197 سوره اعراف | 198>> | |||||||||||||
| |||||||||||||||
ترجمه های فارسی
و آنهایی را که شما خدا میخوانید جز خدای یکتا هیچ یک قدرت بر یاری شما بلکه بر یاری خود ندارند.
و کسانی را که به جای خدا می خوانید، نه می توانند شما را یاری دهند و نه خود را یاری رسانند.
و كسانى را كه به جاى او مىخوانيد، نمىتوانند شما را يارى كنند و نه خويشتن را يارى دهند.
آنان را كه به جاى اللّه به خدايى مىخوانيد، نه شما را مىتوانند يارى كنند و نه خود را.
و آنهایی را که جز او میخوانید، نمیتوانند یاریتان کنند، و نه (حتی) خودشان را یاری دهند؛
ترجمه های انگلیسی(English translations)
تفسیر آیه
تفسیر نور (محسن قرائتی)
وَ الَّذِينَ تَدْعُونَ مِنْ دُونِهِ لا يَسْتَطِيعُونَ نَصْرَكُمْ وَ لا أَنْفُسَهُمْ يَنْصُرُونَ «197»
(بتها) و كسانى كه به جاى خدا مىخوانيد (و مىپرستيد)، نه مىتوانند شما را يارى نمايند و نه خود را يارى مىكنند.
وَ إِنْ تَدْعُوهُمْ إِلَى الْهُدى لا يَسْمَعُوا وَ تَراهُمْ يَنْظُرُونَ إِلَيْكَ وَ هُمْ لا يُبْصِرُونَ «198»
و اگر آنان (بتپرستان يا بتها) را به هدايت فراخوانى، نمىشنوند و مىبينى كه آنان به تو نگاه مىكنند، و حال آنكه نمىبينند (گويا به تو مىنگرند، ولى نگاهشان خالى از هرگونه شعور و دقّت است).
«1». محمّد، 11.
«2». بقره، 257.
جلد 3 - صفحه 248
نکته ها
از مجموع آيات گذشته استفاده مىشود كه معبود و ربّ، بايد:
الف: خالق و مالك باشد. «أَ يُشْرِكُونَ ما لا يَخْلُقُ شَيْئاً وَ هُمْ يُخْلَقُونَ»
ب: ناصر و ياور باشد. «لا يَسْتَطِيعُونَ نَصْرَكُمْ»
ج: به خواستهها و دعاها ترتيب اثر دهد. سَواءٌ عَلَيْكُمْ أَ دَعَوْتُمُوهُمْ أَمْ ...
د: توانگر و قدرتمند باشد. أَمْ لَهُمْ أَيْدٍ يَبْطِشُونَ بِها ...
ه: شنوا و بينا باشد. «أَمْ لَهُمْ آذانٌ يَسْمَعُونَ بِها، أَمْ لَهُمْ أَعْيُنٌ يُبْصِرُونَ بِها»
و: قدرت خنثى كردن مكر دشمن را داشته باشد. «ادْعُوا شُرَكاءَكُمْ ثُمَّ كِيدُونِ»
ز: كتاب و قانون عرضه كند. «نَزَّلَ الْكِتابَ»
ح: خوبان و شايستگان را حمايت كند. «يَتَوَلَّى الصَّالِحِينَ»
پیام ها
1- هدف بتپرستان، يارى جستن از بتهاست كه قرآن آن را رد مىكند. «وَ الَّذِينَ تَدْعُونَ مِنْ دُونِهِ لا يَسْتَطِيعُونَ نَصْرَكُمْ»
2- بتها و معبودها، حدّاقل بايد خودشان از حوادث مصون باشند كه نيستند. «وَ لا أَنْفُسَهُمْ يَنْصُرُونَ»
3- معبودهاى فاقد شعور واراده وقدرت، شايستهى پرستش نيستند. «لا يَسْتَطِيعُونَ، لا يَسْمَعُوا، لا يُبْصِرُونَ»
پانویس
منابع
- تفسیر نور، محسن قرائتی، تهران:مركز فرهنگى درسهايى از قرآن، 1383 ش، چاپ يازدهم
- اطیب البیان فی تفسیر القرآن، سید عبدالحسین طیب، تهران:انتشارات اسلام، 1378 ش، چاپ دوم
- تفسیر اثنی عشری، حسین حسینی شاه عبدالعظیمی، تهران:انتشارات ميقات، 1363 ش، چاپ اول
- تفسیر روان جاوید، محمد ثقفی تهرانی، تهران:انتشارات برهان، 1398 ق، چاپ سوم
- برگزیده تفسیر نمونه، ناصر مکارم شیرازی و جمعي از فضلا، تنظیم احمد علی بابایی، تهران: دارالکتب اسلامیه، ۱۳۸۶ش
- تفسیر راهنما، علی اکبر هاشمی رفسنجانی، قم:بوستان كتاب(انتشارات دفتر تبليغات اسلامي حوزه علميه قم)، 1386 ش، چاپ پنجم




