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| سطر ۴۳: |
سطر ۴۳: |
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| | == تفسیر آیه == | | == تفسیر آیه == |
| − | <tabber> | + | <tafsir sura="7" ayeh="23" /> |
| − | تفسیر نور=
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| − | ===تفسیر نور (محسن قرائتی)===
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| − | {{ نمایش فشرده تفسیر|
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| − | قالا رَبَّنا ظَلَمْنا أَنْفُسَنا وَ إِنْ لَمْ تَغْفِرْ لَنا وَ تَرْحَمْنا لَنَكُونَنَّ مِنَ الْخاسِرِينَ «23»
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| − | (آدم و حوّا) گفتند: پروردگارا! ما بر خويشتن ستم كرديم و اگر ما را نبخشايى و رحم نكنى، قطعاً از زيانكاران خواهيم بود.
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| − | ===نکته ها===
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| − | شيطان و آدم هر دو نافرمانى كردند؛ امّا شيطان نسبت به نافرمانى خود (ترك سجده)، به عدل و حكمت الهى اعتراض و استكبار كرد و برترى نژاد خود را مطرح ساخت و پشيمان هم نشد؛ امّا حضرت آدم و حوّا، به كار خلاف خود اعتراف كردند و از خداوند تقاضاى
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| − | جلد 3 - صفحه 41
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| − | بخشايش كردند. «1»
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| − | ===پیام ها===
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| − | 1- در برابر ستمهايى كه به خود روا مىداريم بايد از خداوند استمداد جوييم و آنها را جبران كنيم. قالا رَبَّنا ظَلَمْنا ...
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| − | 2- آدم و حوّا، هم در تخلّف شريك بودند، هم در جبران گذشته و عذرخواهى.
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| − | «ذاقَا، قالا رَبَّنا»
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| − | 3- هرگونه خلافى، ظلم به خويشتن است، چون مخالفت با فرمان خدا مخالفت با تكامل و سعادت واقعى خود است. «ظَلَمْنا أَنْفُسَنا»
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| − | 4- از آداب دعا و استغفار، ابتدا اعتراف به گناه است. «قالا رَبَّنا ظَلَمْنا أَنْفُسَنا»
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| − | 5- نخستين خواستهى بشر از خدا، تقاضاى عفو ورحمت بود. «وَ إِنْ لَمْ تَغْفِرْ لَنا»
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| − | 6- مهمترين مسأله براى گناهكار، مغفرت الهى است، سپس درخواستهاى ديگر. «إِنْ لَمْ تَغْفِرْ لَنا وَ تَرْحَمْنا»
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| − | 7- عنايت و لطف و مهربانى خدا، جلوى خسارت ابدى را مىگيرد. إِنْ لَمْ تَغْفِرْ لَنا ... لَنَكُونَنَّ مِنَ الْخاسِرِينَ
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| − | «1». تفسير نمونه.}}
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| − | اثنی عشری=
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| − | ===تفسیر اثنی عشری (حسینی شاه عبدالعظیمی)===
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| − | {{نمایش فشرده تفسیر|
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| − | قالا رَبَّنا ظَلَمْنا أَنْفُسَنا وَ إِنْ لَمْ تَغْفِرْ لَنا وَ تَرْحَمْنا لَنَكُونَنَّ مِنَ الْخاسِرِينَ «23»
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| − | قالا رَبَّنا ظَلَمْنا أَنْفُسَنا: عرض كردند آدم و حوا اى پروردگار، ما ستم نموديم به نفسهاى خود به نقص ثوابى كه مترتب مىشد بر فعل مندوب و نقصان عوايد و فوايد و عيش واسع، به سبب اكل شجره منهيه كه مباح الاصل بود. وَ إِنْ لَمْ تَغْفِرْ لَنا وَ تَرْحَمْنا لَنَكُونَنَّ مِنَ الْخاسِرِينَ: و اگر عفو و تجاوز نفرمائى از ما به تفضل رحمت و كرم خود با عطا و اعاده آنچه فوت كرديم، هر آينه باشيم از زيانكاران به نقصان ثواب.
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| − | تنبيه: بنابر مذهب حقّه اماميه، توبه آدم بر ترك اولى بوده، چه ترك اولى
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| − | جلد 4 صفحه 35
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| − | نسبت به انبيا مانند گناه، و توبه از آن براى عود ثواب جايز است؛ و لذا فرمودهاند: حسنات الابرار سيّئات المقرّبين. و دلايل قطعيه عقليه و نقليه بر عصمت انبيا از گناه مطلقا بسيار است از جمله:
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| − | 1- اگر صادر شود از پيغمبر گناه، لازم آيد اجتماع ضدين، وجوب متابعت و مخالفت او. اما اول: اجماع و آيه: قُلْ إِنْ كُنْتُمْ تُحِبُّونَ اللَّهَ فَاتَّبِعُونِي يُحْبِبْكُمُ اللَّهُ. و چون ثابت شود در حق پيغمبر ما صلّى اللّه عليه و آله و سلّم ثابت گردد در حق باقى انبيا به جهت عدم قائل بالفرق. اما ثانى: بدليل آنكه متابعت عاصى حرام است.
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| − | 2- اگر پيغمبر عاصى باشد، هر آينه از ظالمين خواهد بود؛ و حال آنكه حق تعالى فرموده: لا يَنالُ عَهْدِي الظَّالِمِينَ. «1» فخر رازى گويد: مراد به اين عمد يا عهد نبوت يا عهد امامت است؛ اگر اولى باشد، ثابت شود مطلوب؛ و اگر ثانى باشد ايضا همچنين؛ زيرا هر نبى لابد امام و مقتدا باشد، پس آيه بر هر تقدير دلالت دارد كه نبى گناهكار نخواهد بود.
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| − | 3- اگر نبى معصيت نمايد، لازم آيد منع و زجر و انكار او به جهت عموم ادله امر به معروف و نهى از منكر، و لكن حرام است به جهت استلزام ايذائى كه حرام است به اجماع و به دليل آيه: إِنَّ الَّذِينَ يُؤْذُونَ اللَّهَ وَ رَسُولَهُ لَعَنَهُمُ اللَّهُ فِي الدُّنْيا وَ الْآخِرَةِ. «2» 4- خداى تعالى حكايت فرموده از ابليس: فَبِعِزَّتِكَ لَأُغْوِيَنَّهُمْ أَجْمَعِينَ إِلَّا عِبادَكَ مِنْهُمُ الْمُخْلَصِينَ. «3» پس اگر نبى عصيان نمايد، هر آينه از مغوين شيطان و مخرجين از مخلصين خواهند بود؛ با آن كه انبيا از مخلصينند به جهت اجماع و آيه: وَ اذْكُرْ عِبادَنا إِبْراهِيمَ وَ إِسْحاقَ وَ يَعْقُوبَ أُولِي الْأَيْدِي وَ الْأَبْصارِ إِنَّا أَخْلَصْناهُمْ بِخالِصَةٍ ذِكْرَى الدَّارِ وَ إِنَّهُمْ عِنْدَنا لَمِنَ الْمُصْطَفَيْنَ الْأَخْيارِ. «4» و چون ثابت شود وجوب عصمت در بعض، ثابت گردد در كل به
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| − | «1» سوره بقره، آيه 124.
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| − | «2» سوره احزاب، آيه 57.
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| − | «3» سوره ص، آيه 82 و 83.
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| − | «4» سوره ص، آيات 45 تا 47.
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| − | جلد 4 صفحه 36
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| − | جهت عدم قائل به فرق.
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| − | تذكره: ظلم به معنى نقص و ستم؛ و در اصل، وضع شىء است در غير موضوع، و متعلق خواهد. و آن: يا نفس خود ظالم باشد مانند ترك نفعى از خود، به عبارت ديگر ترك مندوب و ترك اولى. و يا متعلق غير؛ و آن غير، يا خالق باشد مثل شرك به خداى تعالى به اقسامه، و يا مخلوق مثل ضرب و قتل ناحق و تعديات. پس ظلم نسبت به انبياء، ترك اولى است؛ چه به ترك مندوب نقص ثواب آنها مىشود. و به ترك مندوب فاعل مكروه گردد. و از آن توبه جايز است و اين قانون كليّه است نزد جمهور اماميه. و شيخ أبو الفتوح رازى رحمه اللّه همين را پسند فرمود.
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| − | روان جاوید=
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| − | ===تفسیر روان جاوید (ثقفى تهرانى)===
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| − | {{نمایش فشرده تفسیر|
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| − | قالا رَبَّنا ظَلَمْنا أَنْفُسَنا وَ إِنْ لَمْ تَغْفِرْ لَنا وَ تَرْحَمْنا لَنَكُونَنَّ مِنَ الْخاسِرِينَ «23»
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| − | ترجمه
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| − | گفتند پروردگار ما ستم كرديم بر خودهامان و اگر نيامرزى ما را و رحم نكنى بر ما هر آينه باشيم البتّه از زيانكاران.
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| − | تفسير
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| − | معذرت از ترك اولى است كه از آن بملاحظه مقامشان تعبير بظلم شده است چون حسنات الابرار سيّئات المقرّبين و اوّل طلب آمرزش نمودند پس از آن طلب مزيد فضل و رحمت و تدارك زيان وارد بر خودشان را از ثواب اطاعت تا زيان كار نباشند ..
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| − | اطیب البیان=
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| − | ===اطیب البیان (سید عبدالحسین طیب)===
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| − | قالا رَبَّنا ظَلَمنا أَنفُسَنا وَ إِن لَم تَغفِر لَنا وَ تَرحَمنا لَنَكُونَنَّ مِنَ الخاسِرِينَ «23»
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| − | گفتند آدم و حوي پروردگار ما ظلم كرديم ما بجان خود و اگر ما را نيامرزي و ترحم نفرمايي ما ميباشيم از زيانكاران.
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| − | قالا رَبَّنا ظَلَمنا أَنفُسَنا اشاره بچند آيه قبل است که فرمود لا تَقرَبا هذِهِ الشَّجَرَةَ فَتَكُونا مِنَ الظّالِمِينَ و مراد ظلم بنفس است که از فيوضات بهشت و نعم الهيه محروم شدند و مرتكب ترك اولي شدند و از مثل آدمي که مسجود و معلم ملائكه شد و عالم بعلم اسماء توقع نبود که بر خلاف صلاح سيّما در منظر ملائكه خود را كوچك كند لذا طلب مغفرت و رحمت كردند و گفتند وَ إِن لَم تَغفِر لَنا وَ تَرحَمنا لَنَكُونَنَّ مِنَ الخاسِرِينَ و جمله و ترحمنا عطف بتغفر لنا است مدخول لم است يعني و لم ترحمنا، و مراد از خسران همان ممنوع شدن از فيوضات و انحطاط رتبه در ارتكاب ترك اولي است، و مراد از غفران نه غفران از ذنب است
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| − | جلد 7 - صفحه 295
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| − | بلكه گذشت از اينکه خطاء است که محروم نشوند از بهشت و نعم آن و مراد از رحمت بهمان درجه باشند و تنزل نكنند.
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| − | ان قلت- خداوند که غفار الذنوب است حتي مشرك و كافر اگر توبه كرد پذيرفته ميشود چرا از آدم و حوي پذيرفته نشد.
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| − | قلت- خداوند قبول فرمود نه تنزل رتبه پيدا كرد و نه مورد مؤاخذه شد و سرّ خروج از بهشت همان بود که گفتيم که احتياج بمدفوع داشتند و مناسب با بهشت نبود و فرداي قيامت اينکه دو نفر را با مليونها از ذريه آنها از انبياء و اوصياء و اولياء و مقربان از صلحاء و اتقياء و ابرار و اخيار و مؤمنين حتي عصات از مؤمنين را خداوند داخل بهشت ميفرمايد که ابد الاباد متنعم باشند حتي از ملائكه بالاتر و مخلد در بهشت باشند از آنچه شيطان فريب داده که أَن تَكُونا مَلَكَينِ أَو تَكُونا مِنَ الخالِدِينَ بالاتر و بهتر باشد جعلنا اللّه معهم.
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| − | برگزیده تفسیر نمونه=
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| − | ===برگزیده تفسیر نمونه===
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| − | {{نمایش فشرده تفسیر|
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| − | (آیه 23)- بازگشت آدم به سوی خدا! سر انجام هنگامی که آدم و حوّا، به نقشه شیطانی ابلیس واقف شدند و نتیجه کار خلاف خود را دیدند به فکر جبران گذشته افتادند و نخستین گام را اعتراف به ظلم و ستم بر خویشتن، در پیشگاه خدا قرار دادند و «گفتند: پروردگار! ما بر خویشتن ستم کردیم» (قالا رَبَّنا ظَلَمْنا أَنْفُسَنا).
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| − | «و اگر ما را نیامرزی و رحمت خود را شامل حال ما نکنی، از زیانکاران خواهیم بود» (وَ إِنْ لَمْ تَغْفِرْ لَنا وَ تَرْحَمْنا لَنَکُونَنَّ مِنَ الْخاسِرِینَ).
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| − | سایر تفاسیر=
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| − | سایرتفاسیر این آیه را می توانید در سایت قرآن مشاهده کنید:
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| − | ==تفسیر های فارسی==
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| − | ==={{ترجمه تفسیر المیزان|سوره=7 |آیه=23}}===
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| − | ==={{تفسیر خسروی|سوره=7 |آیه=23}}===
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| − | ==={{تفسیر عاملی|سوره=7 |آیه=23}}===
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| − | ==={{تفسیر جامع|سوره=7 |آیه=23}}===
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| − | ==تفسیر های عربی==
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| − | ==={{تفسیر المیزان|سوره=7 |آیه=23}}===
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| − | ==={{تفسیر مجمع البیان|سوره=7 |آیه=23}}===
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| − | ==={{تفسیر نور الثقلین|سوره=7 |آیه=23}}===
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| − | ==={{تفسیر الصافی|سوره=7 |آیه=23}}===
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| − | ==={{تفسیر الکاشف|سوره=7 |آیه=23}}===
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| − | </tabber>
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| | ==پانویس== | | ==پانویس== |