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| سطر ۴۴: |
سطر ۴۴: |
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| | == تفسیر آیه == | | == تفسیر آیه == |
| − | <tabber> | + | <tafsir sura="4" ayeh="143" /> |
| − | تفسیر نور=
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| − | ===تفسیر نور (محسن قرائتی)===
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| − | {{ نمایش فشرده تفسیر|
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| − | مُذَبْذَبِينَ بَيْنَ ذلِكَ لا إِلى هؤُلاءِ وَ لا إِلى هؤُلاءِ وَ مَنْ يُضْلِلِ اللَّهُ فَلَنْ تَجِدَ لَهُ سَبِيلًا «143»
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| − | (منافقان) بين كفر و ايمان سرگشتهاند، نه با اين گروهاند و نه با آن گروه و خداوند هر كه را گمراه كند، براى او راه نجاتى نخواهى يافت.
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| − | «1». تفسير نورالثقلين.
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| − | «2». درّالمنثور، ج 2، ص 237.
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| − | جلد 2 - صفحه 193
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| − | ===نکته ها===
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| − | «تَذَبذُب» حركت چيزى است كه در هوا آويخته باشد و هيچ جايگاه و پايگاه محكم و استوارى در روى زمين نداشته باشد.
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| − | ===پیام ها===
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| − | 1- منافقان، استقلال فكر و عقيده ندارند به هر حركتى مىچرخند، به ديگران وابسته و بىهدف سرگردانند. «مُذَبْذَبِينَ بَيْنَ ذلِكَ»
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| − | 2- منافق، آرامش ندارد. چون پيوسته بايد موضع جديد، تصميم فورى و عجولانه بگيرد. «مُذَبْذَبِينَ بَيْنَ ذلِكَ»
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| − | 3- در مواضع اعتقادى و بينش فكرى، قاطعيّت لازم است. «مُذَبْذَبِينَ بَيْنَ ذلِكَ»
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| − | 4- منافق، مورد قهر خداوند است. «مَنْ يُضْلِلِ اللَّهُ»
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| − | 5- نفاق، درد بى درمان است. «فَلَنْ تَجِدَ لَهُ سَبِيلًا»
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| − | اثنی عشری=
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| − | ===تفسیر اثنی عشری (حسینی شاه عبدالعظیمی)===
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| − | {{نمایش فشرده تفسیر|
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| − | مُذَبْذَبِينَ بَيْنَ ذلِكَ لا إِلى هؤُلاءِ وَ لا إِلى هؤُلاءِ وَ مَنْ يُضْلِلِ اللَّهُ فَلَنْ تَجِدَ لَهُ سَبِيلاً (143)
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| − | مُذَبْذَبِينَ بَيْنَ ذلِكَ: نماز مىگزارند منافقان در حالتى كه متردّد و متحيّرند ميان كفر و ايمان. يا ذكر خدا نمىكنند در حالتى كه متردّدند ميان كفر و ايمان، يا مذمت مىكنم تردد نمايندگان و شك كنندگان را، لا إِلى هؤُلاءِ: نه با گروه مؤمنانند به جهت كفر باطن، تا آنها را باشد هر چه ايشان را هست، وَ لا إِلى هؤُلاءِ: و نه با جماعت كافران، به جهت اظهار كلمه اسلام بر زبان. ملخص معنى آنكه: نه مؤمن مخلص باشند و نه كافر صريح، بلكه متردد. وَ مَنْ يُضْلِلِ اللَّهُ: و هر كه را خداوند فرو گذارد و خذلان نمايد و يا راه بهشت ننمايد، يعنى به جهت عناد و جحود و انكار او از قبول ايمان، به سوء اختيار خود با وجود علم او به حقيّت ملت اسلام، حق تعالى نظر توفيق و لطف از او باز دارد و او را در طريق انحراف و اضلال واگذارند. فَلَنْ تَجِدَ لَهُ سَبِيلًا:
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| − | «1» منهج الصادقين، جلد 3، صفحه 136.
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| − | تفسير اثنا عشرى، ج2، ص: 619
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| − | پس نيابى هرگز مر او را راهى به حق و صواب.
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| − | تنبيه: بدان كه معنى اصلى اضلال، هلاكت است. و چون به خداى تعالى نسبت داده شود، معنى هلاك و عذاب باشد، يعنى عذاب و عقاب فرمايد كافران و ظالمان را از آنجا كه كفار و ظالمان گمراهند. و اگر هر آينه خدا بندگان را گمراه گرداند و در آخرت ايشان را به سبب اضلال معذب سازد، نهايت ظلم، و ذات اقدس الهى از آن منزه و مبرى است. و ديگر آنكه اسناد به غير خود نمىدادى، چنانچه فرمايد: وَ لَقَدْ أَضَلَّ مِنْكُمْ جِبِلًّا كَثِيراً، يعنى: و هر آينه بتحقيق شيطان گمراه كند بسيارى از شما را. و به فرعون نيز اسناد داده كه:
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| − | وَ أَضَلَّ فِرْعَوْنُ قَوْمَهُ. پس مراد از اضلال حق تعالى، واگذاشتن بنده است به حال خود به سبب امتناع او از قبول حق و تأثير نشدن لطف در او و منهمك و منغمر شدن در معاصى و كفر خدا او را به همان حالت انغمار باقى گذارد تا هلاكت ابديه را دچار گردد؛ و بر ذات احديت نيست كه او را منع از ضلالت و كفر و معصيت نمايد، زيرا نقض غرض و با تكليف منافات دارد به جهت عدم اختيار، و منافقان به واسطه عدم ثبات در اسلام و موالات با كفار، خود را در وادى ضلالت انداختهاند.
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| − | از حضرت رسالت صلّى اللّه عليه و آله و سلّم منقول است كه مثل منافق مانند گوسفندى است كه در ميان دو گله گوسفند گذرد، متحير و سرگردان، و نظر به اين و آن كند و نداند كه تابع كدام شود و به كدام ملحق گردد. «1» امير المؤمنين عليه السّلام در نهج البلاغه مىفرمايد: اوصيكم عباد اللّه بتقوى اللّه و احذّركم اهل النّفاق فانّهم الضّالّون المضلّون و الزّالّون المزلّون يتلوّتون الوانا و يفتنون افتانا و يعمدونكم بكلّ عماد و يرصدونكم بكلّ مرصاد قلوبهم دويّة و صفاحهم نقيّة. يعنى: وصيت مىكنم شما را اى بندگان خدا به پرهيزكارى و ترس از خدا، و مىترسانم شما را به مردم منافق، پس بتحقيق كه ايشان گمراه و
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| − | «1» منهج الصادقين، جلد 3، صفحه 137.
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| − | تفسير اثنا عشرى، ج2، ص: 620
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| − | گمراه كننده و لغزنده و لغزانندهاند. رنگ به رنگ و حال به حال شوند به الوان و احوال مختلفه، و فتنه كنند به اقسام مختلفه، قصد نمايند شما را به هر تكيهگاهى، و انتظار شما كشند در هر گذرگاهى. قلوب آنها دردآلود، و صورتهاى ايشان پاكرو، تند مىروند در پنهانى، و كند شوند در آشكارا، توصيفشان دواء درد، و گفتارشان شفاء مرض، و افعالشان درد بىدرمان است.
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| − | روان جاوید=
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| − | ===تفسیر روان جاوید (ثقفى تهرانى)===
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| − | مُذَبْذَبِينَ بَيْنَ ذلِكَ لا إِلى هؤُلاءِ وَ لا إِلى هؤُلاءِ وَ مَنْ يُضْلِلِ اللَّهُ فَلَنْ تَجِدَ لَهُ سَبِيلاً (143)
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| − | ترجمه
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| − | مترددان ميان اين دو نه بسوى آنها و نه بسوى آنها و كسيرا كه گمراه كند خدا پس هرگز نيابى براى او راهى.
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| − | تفسير
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| − | اشخاص منافق دو دل و مردد و مضطرب زندگانى مىكنند و ذبذبه بمعنى اضطراب استعمال ميشود و اصل آن ذبّ بمعنى طرد است و اينها غالبا مطرود دو طرف واقع ميشوند با آنكه بخيال خودشان مىخواهند دل هر دو طرف را بدست بياورند ولى اين صفت عقلا و شرعا بسيار بد است انسان بايد در هر امر ثابت قدم و يكدل و يكرو و يك جهت و استوار باشد تا در انظار محترم و موقر و مورد اعتماد شود و نفاق با هر كس بد است خصوص با خدا كه عالم باسرار و خفايا است و ترديد در دين و اظهار اسلام و اخفاء كفر و موافقت با مسلمانان در ظاهر و مرافقت با كفار در باطن موجب ضلالت و گمراهى ابدى است و كسيكه خداوند او را هدايت ننمايد و بخود واگذارد براى عدم قابليت هرگز راه بحق پيدا نمىكند و ديندار نخواهد شد.
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| − | اطیب البیان=
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| − | ===اطیب البیان (سید عبدالحسین طیب)===
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| − | {{نمایش فشرده تفسیر|
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| − | مُذَبذَبِينَ بَينَ ذلِكَ لا إِلي هؤُلاءِ وَ لا إِلي هؤُلاءِ وَ مَن يُضلِلِ اللّهُ فَلَن تَجِدَ لَهُ سَبِيلاً (143)
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| − | منافقين مضطربين بين اينكه با مؤمنين باشند يا بطرف مشركين بروند و متحيرند که آيا پيشرفت با مؤمنين است تا با آنها پيوند كنند يا با مشركين است تا بآنها ملحق شوند نه جزو اينکه طرفند نه آن طرف و كسي را که خدا گمراه كند پس هرگز براي او راهي نمييابي.
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| − | در خبر از حضرت رسالت در مجمع دارد
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| − | (قال رسول اللّه صلّي اللّه عليه و آله و سلّم ان مثلهم مثل الشاة الغابرة بين الغنمين تتحير فتنظر الي هذه و الي هذه لا تدر ايهما تتبع).
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| − | جلد 6 - صفحه 248
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| − | مُذَبذَبِينَ بَينَ ذلِكَ بين اختيار ايمان يا شرك و كفر از كفر و شرك دور افتاده و از منافع آنها محروم شده و در ايمان هم داخل نشده و بمثوبات آنها نائل نشده لا إِلي هؤُلاءِ جزء مؤمنين نيستند اما باطنا چون معتقد بعقائد حقّه نيستند و اما ظاهرا بواسطه اينكه هر چه بخواهند خود داري كنند بتظاهر اسلامي بالاخره آثار نفاق آنها ظاهر خواهد شد مثل فرار از زحف و اعتذار از آمدن در جهاد و ارتباط با كفار و نحو اينها.
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| − | وَ لا إِلي هؤُلاءِ جزء كفار هم نيستند چون تظاهر بكفر نميتوانند كنند و علنا با كفار نميتوانند همراهي كنند.
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| − | وَ مَن يُضلِلِ اللّهُ سرگردان و متحير و مضطرب هستند نميدانند كارشان بكجا ميكشد، و نسبت اضلال بخدا بمعني اينست که آنها را بخودشان واگذار فرموده و عنايات خود را از آنها سلب نموده و توفيق از آنها گرفته شده و موانعي که بدست خود فراهم كرده سدّ راه هدايت و سعادت آنها شده.
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| − | فَلَن تَجِدَ لَهُ سَبِيلًا ديگر كسي قدرت ندارد آنها را راهنمايي كند خذلهم اللّه و لعنهم که هر ضرري که بمسلمين وارد شد و هر لطمه که باسلام زده شد از اينکه منافقين بوده و دردهاي داخلي بالاخص بعد از رحلت حضرت رسالت صلّي اللّه عليه و آله و سلّم که چه كردند و چه شد و بالاخره كفر و نفاق خود را ظاهر كردند و لطمات خود را وارد نمودند.
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| − | برگزیده تفسیر نمونه=
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| − | ===برگزیده تفسیر نمونه===
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| − | {{نمایش فشرده تفسیر|
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| − | (آیه 143)
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| − | پنجم: «آنها افراد سرگردان و بی هدف و فاقد برنامه و مسیر مشخصاند، نه جزء مؤمنانند و نه در صف کافران»؟ (مُذَبذَبِینَ بَینَ ذلِکَ لا إِلی هؤُلاءِ وَ لا إِلی هؤُلاءِ).
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| − | و در پایان آیه سرنوشت آنها را چنین بیان می کند آنها افرادی هستند که بر اثر اعمالشان خدا حمایتش را از آنان برداشته و در بیراهه ها گمراهشان ساخته «و هر کس را خدا گمراه کند هیچ گاه راه نجاتی برای آنان نخواهی یافت» (وَ مَن یضلِلِ اللّهُ فَلَن تَجِدَ لَهُ سَبِیلًا).
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| − | سایر تفاسیر=
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| − | سایرتفاسیر این آیه را می توانید در سایت قرآن مشاهده کنید:
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| − | ==تفسیر های فارسی==
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| − | ==={{ترجمه تفسیر المیزان|سوره=4 |آیه=143}}===
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| − | ==={{تفسیر خسروی|سوره=4 |آیه=143}}===
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| − | ==={{تفسیر عاملی|سوره=4 |آیه=143}}===
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| − | ==={{تفسیر جامع|سوره=4 |آیه=143}}===
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| − | ==تفسیر های عربی==
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| − | ==={{تفسیر المیزان|سوره=4 |آیه=143}}===
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| − | ==={{تفسیر مجمع البیان|سوره=4 |آیه=143}}===
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| − | ==={{تفسیر نور الثقلین|سوره=4 |آیه=143}}===
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| − | ==={{تفسیر الصافی|سوره=4 |آیه=143}}===
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| − | ==={{تفسیر الکاشف|سوره=4 |آیه=143}}===
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| − | </tabber>
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| | ==پانویس== | | ==پانویس== |