|
|
| سطر ۴۳: |
سطر ۴۳: |
| | سخط: سخط: غضب شديد كه موجب عقوبت است.<ref>تفسیر احسن الحدیث، سید علی اکبر قرشی</ref> | | سخط: سخط: غضب شديد كه موجب عقوبت است.<ref>تفسیر احسن الحدیث، سید علی اکبر قرشی</ref> |
| | | | |
| − | ==تفسیر آیه== | + | == تفسیر آیه == |
| − | <tabber> | + | <tafsir sura="5" ayeh="80" /> |
| − | تفسیر نور=
| |
| | | | |
| − | ===تفسیر نور (محسن قرائتی)===
| |
| | | | |
| − | {{ نمایش فشرده تفسیر|
| |
| − | تَرى كَثِيراً مِنْهُمْ يَتَوَلَّوْنَ الَّذِينَ كَفَرُوا لَبِئْسَ ما قَدَّمَتْ لَهُمْ أَنْفُسُهُمْ أَنْ سَخِطَ اللَّهُ عَلَيْهِمْ وَ فِي الْعَذابِ هُمْ خالِدُونَ «80»
| |
| | | | |
| − | بسيارى از آنان (بنىاسرائيل) را مىبينى كه با كافران دوستى مىورزند، (و آنان را سرپرست خود مىگيرند.) چه اعمال بدى از پيش فرستادند (كه در نتيجه،) خداوند بر آنان خشم نموده و همانان پيوسته و هميشه در عذاب خواهند بود.
| |
| − |
| |
| − | ===نکته ها===
| |
| − |
| |
| − | در اين آيه، يكى ديگر از دلايل نفرين شدن بنىاسرائيل بيان شده است كه آنان با كافران،
| |
| − | ----
| |
| − | «1». تفسير نورالثقلين.
| |
| − |
| |
| − | «2». وسائل، ج 16، ص 130.
| |
| − |
| |
| − | جلد 2 - صفحه 353
| |
| − |
| |
| − | طرح دوستى دائمى و آشكارا داشتند. (كلمهى «تَرى» نشانگر آشكار بودن و كلمهى «يَتَوَلَّوْنَ» نشانگر دائمى بودن آن است)
| |
| − |
| |
| − | امام باقر عليه السلام در توضيح اين آيه فرمود: «اين دسته كسانى بودند كه: «يتولّون الملوك الجبّارين و يزيّنون لهم اهواءهم ليصيبوا من دنياهم» جبّاران را دوست داشتند و اعمال هوسآلود آنان را در نظرشان زيبا جلوه مىدادند تا از دنيايشان بهره گيرند». «1»
| |
| − |
| |
| − | ===پیام ها===
| |
| − |
| |
| − | 1- دوستى با كفّار، عامل خشم وغضب الهى است. يَتَوَلَّوْنَ الَّذِينَ كَفَرُوا ... سَخِطَ اللَّهُ عَلَيْهِمْ
| |
| − |
| |
| − | 2- اهل كتاب، سلطه ودوستى كافران را مىپذيرفتند؛ ولى با مسلمانان كنار نمىآمدند. «يَتَوَلَّوْنَ الَّذِينَ كَفَرُوا»
| |
| − |
| |
| − | 3- خداوند، حتّى براى اهل كتاب استقلال مىخواهد و وابستگى و ولايت پذيرى از مشركان را مورد مذمّت قرار مىدهد. «تَرى كَثِيراً مِنْهُمْ يَتَوَلَّوْنَ»
| |
| − |
| |
| − | 4- يكى از منكرات مهمّى كه در بنىاسرائيل از آن نهى نمىشد، رابطهى ولائى با كفّار (ومشركان مكّه) بود. لا يَتَناهَوْنَ عَنْ مُنكَرٍ فَعَلُوهُ ... تَرى
| |
| − |
| |
| − | 5- هر گناه، مقدّمهى انجام گناهان بزرگتر مىشود. (در آيات قبل سه گناه عَصَوْا ... يَعْتَدُونَ ... لا يَتَناهَوْنَ مطرح شد و اينها مقدّمهى قبول سلطهى كفّار مىشود. تَرى ... يَتَوَلَّوْنَ
| |
| − | ----
| |
| − | «1». تفسير نورالثقلين.
| |
| − |
| |
| − | تفسير نور(10جلدى)، ج2، ص: 354
| |
| − | }}
| |
| − |
| |
| − | |-|
| |
| − | اثنی عشری=
| |
| − |
| |
| − | ===تفسیر اثنی عشری (حسینی شاه عبدالعظیمی)===
| |
| − |
| |
| − | {{نمایش فشرده تفسیر|
| |
| − |
| |
| − |
| |
| − | تَرى كَثِيراً مِنْهُمْ يَتَوَلَّوْنَ الَّذِينَ كَفَرُوا لَبِئْسَ ما قَدَّمَتْ لَهُمْ أَنْفُسُهُمْ أَنْ سَخِطَ اللَّهُ عَلَيْهِمْ وَ فِي الْعَذابِ هُمْ خالِدُونَ (80)
| |
| − |
| |
| − | و نيز از احوال اهل كتاب خبر مىدهد:
| |
| − |
| |
| − | تَرى كَثِيراً مِنْهُمْ: و مىبينى اى پيغمبر، بسيارى از اهل كتاب را كه از غايت حقد و حسد و بغض با تو؛ و مسلمانان يَتَوَلَّوْنَ الَّذِينَ كَفَرُوا: دوستى مىكنند با كافران، مانند كعب بن اشرف كه بعد از غزوه بدر كبرى به مكه رفت و مشركان را بر حرب مسلمانان تحريص و ترغيب كرد. لَبِئْسَ ما قَدَّمَتْ لَهُمْ أَنْفُسُهُمْ: هر آينه بد چيزى است كه مقدم داشته براى آنها نفسهاى ايشان، تا روز قيامت بآن رد كرده شوند، و آن اينست أَنْ سَخِطَ اللَّهُ عَلَيْهِمْ: كه خشم فرمود خدا بر ايشان يعنى موجب آن شد كه حق تعالى بر ايشان غضب نمود و
| |
| − |
| |
| − | «1» مجمع البيان ج 2 ص 231.
| |
| − |
| |
| − | تفسير اثنا عشرى، ج3، ص: 158
| |
| − |
| |
| − | فِي الْعَذابِ هُمْ خالِدُونَ: و در عذاب جهنم ايشان مخلد باشند. از ابى جعفر عليه السّلام مروى است «1» كه مراد از «يَتَوَلَّوْنَ الَّذِينَ كَفَرُوا» آنست كه دوست مىكنند با ملوك جبابره، و اهواء باطله ايشان را تصديق مىنمايند تا برسند به بعضى از دنياى آنها و از حطام دنيوى محظوظ شوند. در اين، توبيخ است ابناى روزگار را و تنبيه بر بدى افعال و خبث اعمال ايشان. عقاب الاعمال «2»- ابن بابويه رحمه اللّه به حذف اسانيد روايت نموده: «ايّاكم و ابواب السّلطان و حواشيها فانّ اقربكم من السّلطان و حواشيها ابعدكم من اللّه تعالى و من اثر السّلطان على اللّه اذهب اللّه عنه الورع و جعله حيرانا. فرمود رسول اكرم صلى اللّه عليه و آله: بپرهيزيد ابواب سلطان و حواشى آن را، پس بدرستى كه نزديكترين شما به سلطان و حواشى او، دورترين شماست از خدا و هر كه اختيار كند و برگزيند امر سلطان را بر امر الهى، ببرد خدا از او ورع را، و بگرداند او را حيران.
| |
| − |
| |
| − |
| |
| − | }}
| |
| − | |-|
| |
| − | روان جاوید=
| |
| − | ===تفسیر روان جاوید (ثقفى تهرانى)===
| |
| − | {{نمایش فشرده تفسیر|
| |
| − | تَرى كَثِيراً مِنْهُمْ يَتَوَلَّوْنَ الَّذِينَ كَفَرُوا لَبِئْسَ ما قَدَّمَتْ لَهُمْ أَنْفُسُهُمْ أَنْ سَخِطَ اللَّهُ عَلَيْهِمْ وَ فِي الْعَذابِ هُمْ خالِدُونَ (80)
| |
| − |
| |
| − | ترجمه
| |
| − |
| |
| − | مىبينى بسيارى از ايشان را كه دوست مىگيرند آنان را كه كافر شدند هر آينه بد است آنچه پيش فرستاده است براى آنها نفسهاشان كه خشم كرد خدا بر ايشان و در عذاب ايشانند جاويدان.
| |
| − |
| |
| − | تفسير
| |
| − |
| |
| − | گفتهاند بعضى از يهود مانند كعب بن اشرف كه بمكه رفت بعد از جنگ بدر و كفار قريش را تحريص بجنگ با مسلمانان نمود با مشركان دوستى و رفاقت مىنمودند براى هم دست شدن با آنها بر خلاف اسلام و اينها توشه آخرت خوبى براى خودشان تهيه مينمودند و آن غضب الهى و خلود در آتش جهنم بود و در مجمع از حضرت باقر (ع) روايت نموده كه دوستى ميكنند با پادشاهان ستم كار و جلوه ميدهند در نظر آنان دلخواه آنها را تا بهرهمند شوند از دنياى ايشان ..
| |
| − | }}
| |
| − | |-|
| |
| − | اطیب البیان=
| |
| − | ===اطیب البیان (سید عبدالحسین طیب)===
| |
| − | {{نمایش فشرده تفسیر|
| |
| − | تَري كَثِيراً مِنهُم يَتَوَلَّونَ الَّذِينَ كَفَرُوا لَبِئسَ ما قَدَّمَت لَهُم أَنفُسُهُم أَن سَخِطَ اللّهُ عَلَيهِم وَ فِي العَذابِ هُم خالِدُونَ (80)
| |
| − |
| |
| − | ميبيني بسياري از آنها را که دوستي ميكنند با كساني که كافر شدند هر آينه بسيار بد است آنچه را که براي خود پيش ميفرستند اينكه خداوند بر آنها سخط و غضب ميكند و در عذابي که براي كفار است آنها هم مخلد ميشوند.
| |
| − |
| |
| − | ظاهر اينکه آيات بني اسرائيل را سه قسمت فرموده: قسمت اول همان كفار که مخالفت و تعدي نمودند که اصحاب سبت باشند و گرفتار لعن شدند و بعذاب مسخ بقرده معذب گشتند. قسمت دوم مؤمنين از آنها که اينها را نهي ميكردند و اينها منتهي نميشدند. قسمت سوم كساني که از مؤمنين که نهي نميكردند و خود هم مخالفت و تعدي نمينمودند و لكن با آنها مراوده و محبت و وداد داشتند اينها هم در عذاب با همان اهل معصيت داخل و شريك هستند چنانچه در قوم شعيب خبر داريم که صد هزار بودند شصت هزار آنها ايمان آوردند و چهل هزار كافر بودند عذاب که نازل شد تمام صد هزار هلاك شدند، حضرت شعيب عليه السلام عرض كرد ( يا رب هذا للاشرار فما بال الاخيار) خطاب رسيد براي مداهنه و موالات با اشرار و ترك امر بمعروف و نهي از منكر بود يا أَيُّهَا الَّذِينَ آمَنُوا لا تَتَّخِذُوا اليَهُودَ وَ النَّصاري أَولِياءَ بَعضُهُم أَولِياءُ بَعضٍ وَ مَن يَتَوَلَّهُم مِنكُم فَإِنَّهُ مِنهُم الايه مائده آيه 51، و غير اينکه از آيات بسياري در اينکه باب.
| |
| − |
| |
| − | تَري كَثِيراً مِنهُم مورد تعجب است که ميبيني بسيار از اهل كتاب که ايمان دارند و اهل معصيت هم نيستند مع ذلک يَتَوَلَّونَ الَّذِينَ كَفَرُوا که با كفار مجالست و معاشرت و مراوده و مودت و رفاقت ميكنند و آنها را از اينکه كردار زشت جلوگيري نميكنند.
| |
| − |
| |
| − | لَبِئسَ ما قَدَّمَت لَهُم أَنفُسُهُم هر آينه بسيار زشت و قبيح و بد عملي است
| |
| − |
| |
| − | جلد 6 - صفحه 444
| |
| − |
| |
| − | اينکه دوستي و معاشرت با آنها.
| |
| − |
| |
| − | أَن سَخِطَ اللّهُ عَلَيهِم خدا را بغضب ميآورند زيرا تولي و تبري دور كن اعظم ايمان است حتي در خبر دارد که از حضرت صادق عليه السلام سؤال كردند که (هل الحب و البغض من الايمان) حضرت فرمود
| |
| − |
| |
| − | (هل الايمان الا الحب و البغض)
| |
| − |
| |
| − | و در اخبار دارد
| |
| − |
| |
| − | (المرء مع من احب)
| |
| − |
| |
| − | و
| |
| − |
| |
| − | (من احب حجرا حشره اللّه معه)
| |
| − |
| |
| − | (حشر محبان علي با علي حشر محبان عمر با عمر) لذا ميفرمايد وَ فِي العَذابِ هُم خالِدُونَ و خلود در عذاب ملازم با كفر است.
| |
| − | }}
| |
| − | |-|
| |
| − | برگزیده تفسیر نمونه=
| |
| − |
| |
| − | ===برگزیده تفسیر نمونه===
| |
| − | {{نمایش فشرده تفسیر|
| |
| − | (آیه 80)
| |
| − |
| |
| − | در این آیه به یکی دیگر از اعمال خلاف آنها اشاره کرده، می گوید: «بسیاری از آنان را می بینی که طرح دوستی و محبت با کافران می ریزند» (تَری کثِیراً مِنهُم یتَوَلَّونَ الَّذِینَ کفَرُوا).
| |
| − |
| |
| − | بدیهی است که دوستی آنها ساده نبود، بلکه دوستی آمیخته با انواع گناه و تشویق آنان به اعمال و افکار غلط بود، و لذا در آخر آیه می فرماید: «چه بد اعمالی از پیش برای معاد خود فرستادند، اعمالی که نتیجه آن، خشم و غضب الهی بود و در عذاب الهی جاودانه خواهند ماند» (لَبِئسَ ما قَدَّمَت لَهُم أَنفُسُهُم أَن سَخِطَ اللّهُ عَلَیهِم وَ فِی العَذابِ هُم خالِدُونَ).
| |
| − |
| |
| − | }}
| |
| − | |-|
| |
| − |
| |
| − | سایر تفاسیر=
| |
| − | سایرتفاسیر این آیه را می توانید در سایت قرآن مشاهده کنید:
| |
| − |
| |
| − | ==تفسیر های فارسی==
| |
| − | ==={{ترجمه تفسیر المیزان|سوره=5 |آیه=80}}===
| |
| − | ==={{تفسیر خسروی|سوره=5 |آیه=80}}===
| |
| − | ==={{تفسیر عاملی|سوره=5 |آیه=80}}===
| |
| − | ==={{تفسیر جامع|سوره=5 |آیه=80}}===
| |
| − |
| |
| − | ==تفسیر های عربی==
| |
| − | ==={{تفسیر المیزان|سوره=5 |آیه=80}}===
| |
| − | ==={{تفسیر مجمع البیان|سوره=5 |آیه=80}}===
| |
| − | ==={{تفسیر نور الثقلین|سوره=5 |آیه=80}}===
| |
| − | ==={{تفسیر الصافی|سوره=5 |آیه=80}}===
| |
| − | ==={{تفسیر الکاشف|سوره=5 |آیه=80}}===
| |
| − | </tabber>
| |
| | | | |
| | ==پانویس== | | ==پانویس== |