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| سطر ۴۴: |
سطر ۴۴: |
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| | == تفسیر آیه == | | == تفسیر آیه == |
| − | <tabber> | + | <tafsir sura="4" ayeh="39" /> |
| − | تفسیر نور=
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| − | ===تفسیر نور (محسن قرائتی)===
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| − | {{ نمایش فشرده تفسیر|
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| − | وَ ما ذا عَلَيْهِمْ لَوْ آمَنُوا بِاللَّهِ وَ الْيَوْمِ الْآخِرِ وَ أَنْفَقُوا مِمَّا رَزَقَهُمُ اللَّهُ وَ كانَ اللَّهُ بِهِمْ عَلِيماً «39»
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| − | و بر ايشان چه مىشد، اگر به خداوند و روز قيامت ايمان مىآوردند و از آنچه خداوند، روزى آنان كرده (از روى اخلاص، نه ريا) انفاق مىكردند؟
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| − | و خداوند به نيّت آنان داناست.
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| − | جلد 2 - صفحه 70
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| − | ===پیام ها===
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| − | 1- اظهار تأسف بر حال منحرفان، يكى از راههاى هشدار وتبليغ است. وَ ما ذا عَلَيْهِمْ ...
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| − | 2- لازمهى ايمان به خدا، انفاق به محرومان است. آمَنُوا ... أَنْفَقُوا
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| − | 3- انفاق فقط در اموال نيست، بلكه از هرچه كه خداوند داده، (علم، آبرو، مقام ...)
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| − | پسنديده است. «مِمَّا رَزَقَهُمُ اللَّهُ»
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| − | 4- اگر بدانيم كه نعمتها از خداوند است، روحيّهى انفاق در ما قوى مىشود.
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| − | «رَزَقَهُمُ اللَّهُ»
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| − | 5- افراد بخيل، يا رياكار بدانند كه زير نظر خداى آگاه قرار دارند. «كانَ اللَّهُ بِهِمْ عَلِيماً»
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| − | اثنی عشری=
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| − | ===تفسیر اثنی عشری (حسینی شاه عبدالعظیمی)===
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| − | وَ ما ذا عَلَيْهِمْ لَوْ آمَنُوا بِاللَّهِ وَ الْيَوْمِ الْآخِرِ وَ أَنْفَقُوا مِمَّا رَزَقَهُمُ اللَّهُ وَ كانَ اللَّهُ بِهِمْ عَلِيماً (39)
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| − | بعد از آن بر سبيل توبيخ و تجهيل ايشان فرمايد:
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| − | وَ ما ذا عَلَيْهِمْ لَوْ آمَنُوا بِاللَّهِ وَ الْيَوْمِ الْآخِرِ: و چه ضرر و عيب بودى بر ايشان اگر ايمان مىآوردند به وحدانيت الهى و تصديق مىكردند به روز آخرت و جزاى سبحانى يا چه شده است بر آنها كه بمبدء و معاد معتقد و مصدق گردند، وَ أَنْفَقُوا مِمَّا رَزَقَهُمُ اللَّهُ: و انفاق كردندى حقوق الهى را بدون غرض و ريا از آنچه روزى فرموده ايشان را خداى تعالى. پس بر سبيل تهديد و تخويف فرمايد: وَ كانَ اللَّهُ بِهِمْ عَلِيماً: و هست ذات ذو الجلال الهى به اقوال و افعال ايشان دانا، پس جزا فراخور اقوال و افعال آنها خواهد داد. غرض توبيخ است مر ايشان را بر جهل به منفعت و اعتقاد به چيزى كه ضرر آنها است. و ايضا تحريص بر فكر كردن جواب، كه شايد به تفكر عالم شوند به فوايد جليله و عوايد جميله، تا تحصيل آن نمايند. و ايضا تنبيه بر آنكه كسى كه او را دعوت به امرى كنند كه در آن ضررى نباشد، سزاوار باشد به اجابت؛ فكيف به دعوتى كه متضمن منافع باشد.
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| − | نكته: تقديم ايمان در اينجا و تأخير آن در آيه سابقه، به جهت آنكه مقصود در اينجا تخصيص، و در آنجا تعليل است.
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| − | تبصره: آيه شريفه دلالت دارد بر بطلان قول جبريه، چه اگر خداى تعالى كفر را در كافر جعل كند و بفرمايد: ماذا عليهم لو امنوا، و ايضا معصيت را در عاصى جعل نمايد و بفرمايد: ماذا عليهم لو اطاعوا؛ هر آينه عبث و قبيح، و صدور آن از حكيم على الاطلاق محال خواهد بود؛ زيرا مثل آنست كه شخصى
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| − | تفسير اثنا عشرى، ج2، ص: 440
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| − | را دست و پا بسته به دريا اندازند و گويند: «ماذا عليه ان لا يبتل بالماء». و معذبين نار را گويند: «ماذا عليهم لو خرجوا و صاروا الى الجنه». و مريض را گويند: «ماذا عليه لو كان صحيحا». و موكل و كيل در متاع را محبوس كند و گويد: «ماذا عليه لو تصرف فى الضيعه». و مسلم است صدور اين كلمات از عاقل، نسبت به اشخاص مذكور قبيح باشد. و چون قبيح از ذات احديت محال است، صدور فعلى كه مسبب قبح باشد، البته محال و ممتنع خواهد بود. پس كفر در كافر، و معصيت در عاصى را حق تعالى جعل نفرموده، بلكه خود، به سوء اختيار كفر را بر ايمان و عصيان را بر طاعت ترجيح دادند. و اين قاعده از مسلميات عقليه است كه: الامتناع بالاختيار لا ينافى الاختيار، يعنى بازداشتن و منع كردن شيئى را از خود به اختيار، منافى با اختيار در فعل و ترك نيست. و آيه شريفه بعد مؤيد مطلب حقه است.
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| − | روان جاوید=
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| − | ===تفسیر روان جاوید (ثقفى تهرانى)===
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| − | وَ ما ذا عَلَيْهِمْ لَوْ آمَنُوا بِاللَّهِ وَ الْيَوْمِ الْآخِرِ وَ أَنْفَقُوا مِمَّا رَزَقَهُمُ اللَّهُ وَ كانَ اللَّهُ بِهِمْ عَلِيماً (39)
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| − | ترجمه
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| − | و چه باكى بود برايشان اگر ايمان ميآوردند بخدا و روز بازپسين و انفاق مينمودند از آنچه روزى دادشان خدا و باشد خداوند بايشان دانا.
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| − | تفسير
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| − | خداوند ملامت فرموده است به اين بيان بر جهل كه ناشى از بىفكرى است در امور مهمّه و اجابت دعوات حقه كه راه ضرر آن موهوم و رجاء نفع آن معلوم است و وجه تقديم ايمان بر انفاق در اين آيه و تاخير آن در آيه سابقه بنظر فيض ره آنستكه مقصود در اينجا تخصيص و در آنجا تعليل است و بنظر حقير اشاره بتلازم اين دو عنوان است كه اگر مرائى شد مؤمن نيست و اگر مؤمن شد مرائى نيست و بهر چه هست خدا عالم است.
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| − | اطیب البیان=
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| − | ===اطیب البیان (سید عبدالحسین طیب)===
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| − | وَ ما ذا عَلَيهِم لَو آمَنُوا بِاللّهِ وَ اليَومِ الآخِرِ وَ أَنفَقُوا مِمّا رَزَقَهُمُ اللّهُ وَ كانَ اللّهُ بِهِم عَلِيماً (39)
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| − | چه ضرر داشت بر اينها اگر ايمان بخدا و روز قيامت ميآوردند و از آنچه خداوند بآنها روزي كرده انفاق ميكردند و خداوند بآنها عالم است.
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| − | ما ذا عَلَيهِم كفار و مشركين توهم ضرر كرده که اگر ايمان بياوريم جلوگير ميشويم از بسيار منافع دنيوي از مكاسب محرمه و ما را بعبادت و تحصيل علم دين وادار ميكند و از صنايع و ترقيات باز ميدارد چنانچه بسيار از ابناء زمان ما اينکه توهم را كردهاند و اينکه توهم فاسد است اولا اسلام و دين مانع از ترقيات نيست بلكه تشويقات در دين براي كسب و تجارت و صنعت بسيار است حتي
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| − | (الكاسب حبيب اللّه)
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| − | فرموده و نه عشر عبادت را كسب حلال دانسته و جلوگيري از دزدي و تقلب و بيعاري و کل برناس كرده و اينکه عقب افتادن شما در اثر ساز و آواز و رقص و راديو و سينما و شرب خمر و قمار و زنا و آرايش و تفريح و تفرج و مجالس لهو و لعب و تقلب و غش در معامله و دزدي و ظلم و اذيت و هزارها مفاسد ديگر است و ثانيا ايمان و تقوي و انفاق في سبيل اللّه شما را عزت و ثروت و تعالي و ترقي و عظمت و سيادت و اتفاق و يگانگي و اتحاد و وفور نعمت و سعادت دنيا و آخرت ميبخشد قضيه بعكس است وَ لَو أَنَّ أَهلَ القُري آمَنُوا وَ اتَّقَوا لَفَتَحنا عَلَيهِم بَرَكاتٍ مِنَ السَّماءِ وَ الأَرضِ الاية اعراف آيه 96، و بسياري از آيات ديگر و در اينکه باب اخبار الي ما شاء اللّه است.
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| − | جلد 5 - صفحه 82
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| − | لَو آمَنُوا بِاللّهِ وَ اليَومِ الآخِرِ دو چيز انسان را باوج كمال و سعادت نشئتين و نجات از كليه مهالك دارين ميرساند: ايمان بمبدء و معاد، اگر مردم ايمان بخدا داشتند و خدا را حاضر و ناظر و خبير و بصير و محيط ميدانستند و اگر ايمان بروز جزا و پاداش اعمال و بهشت و جهنم و حساب و ميزان و نامه عمل داشتند و اينكه هر كس بجزاي عمل خود ميرسد اينکه اندازه فسق و فجور و فحشاء و منكرات در ميانه آنها شايع نبود.
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| − | وَ أَنفَقُوا مِمّا رَزَقَهُمُ اللّهُ و انفاق بفقراء و ذوي الحاجات و ارحام و همسايهگان و ساير انفاقات واجبه و مستحبه ميكردند از مال حلال مشروع که خداوند بآنها روزي فرموده، آنچه مستفاد ميشود از مضامين بعض آيات و اخبار اينكه خداوند رزق هر كس را قبل از خلقتش معين فرموده وَ فِي السَّماءِ رِزقُكُم وَ ما تُوعَدُونَ الذاريات آيه 52، و البته خداوند رزق هر که را از ممر حلال مقرر فرموده و اما اگر بنده تعجيل نمود و از ممر حرام دست آورد مطابقش از حلال كسر ميگذراند و انفاق هم بايد از حلال باشد، انفاق از مال حرام دو عقوبت دارد يكي چرا باهلش رد نكرده، يكي بمصرف غير مرضي صاحبانش صرف كرده.
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| − | وَ كانَ اللّهُ بِهِم عَلِيماً علم الهي احاطه دارد بجميع مخلوقات از سري تا ثريا و بجميع افعال و صفات و حالات و نيات و ساير خصوصيات آنها و با اعتقاد باين جمله چگونه انسان ميتواند مخالفت بكند و سركشي نمايد.
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| − | برگزیده تفسیر نمونه=
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| − | ===برگزیده تفسیر نمونه===
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| − | {{نمایش فشرده تفسیر|
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| − | (آیه 39)
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| − | در این آیه به عنوان اظهار تأسف به حال این عده میفرماید: «چه میشد اگر آنها (از این بیراههها باز میگشتند و) ایمان به خدا و روز رستاخیز میآوردند و از مواهبی که خداوند در اختیار آنها گذاشته با اخلاص نیت و فکر پاک به بندگان خدا میدادند» و از این راه برای خود کسب سعادت و خوشبختی دنیا و آخرت میکردند (وَ ما ذا عَلَیهِم لَو آمَنُوا بِاللّهِ وَ الیومِ الآخِرِ وَ أَنفَقُوا مِمّا رَزَقَهُمُ اللّهُ).
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| − | «و در هر حال خداوند از نیات و اعمال آنها باخبر است» و بر طبق آن به آنها جزا و کیفر میدهد» (وَ کانَ اللّهُ بِهِم عَلِیماً).
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| − | سایر تفاسیر=
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| − | سایرتفاسیر این آیه را می توانید در سایت قرآن مشاهده کنید:
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| − | ==تفسیر های فارسی==
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| − | ==={{ترجمه تفسیر المیزان|سوره=4 |آیه=39}}===
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| − | ==={{تفسیر خسروی|سوره=4 |آیه=39}}===
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| − | ==={{تفسیر عاملی|سوره=4 |آیه=39}}===
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| − | ==={{تفسیر جامع|سوره=4 |آیه=39}}===
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| − | ==تفسیر های عربی==
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| − | ==={{تفسیر المیزان|سوره=4 |آیه=39}}===
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| − | ==={{تفسیر مجمع البیان|سوره=4 |آیه=39}}===
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| − | ==={{تفسیر نور الثقلین|سوره=4 |آیه=39}}===
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| − | ==={{تفسیر الصافی|سوره=4 |آیه=39}}===
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| − | ==={{تفسیر الکاشف|سوره=4 |آیه=39}}===
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| − | </tabber>
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| | ==پانویس== | | ==پانویس== |