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| سطر ۴۱: |
سطر ۴۱: |
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| | ==معانی کلمات آیه== | | ==معانی کلمات آیه== |
| − | «هَلْ یَنظُرُونَ ...»: مراد آیه، بیان حال واقعی کافران و مذمّت ایشان است. «السَّاعَةَ»: قیامت. «بَغْتَةً»: ناگهانی. (نگا: انعام / و ). | + | «هَلْ یَنظُرُونَ ...»: مراد آیه، بیان حال واقعی کافران و مذمّت ایشان است. «السَّاعَةَ»: قیامت. «بَغْتَةً»: ناگهانی. |
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| | == تفسیر آیه == | | == تفسیر آیه == |
| − | <tabber> | + | <tafsir sura="43" ayeh="66" /> |
| − | تفسیر نور=
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| − | ===تفسیر نور (محسن قرائتی)===
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| − | {{ نمایش فشرده تفسیر|
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| − | هَلْ يَنْظُرُونَ إِلَّا السَّاعَةَ أَنْ تَأْتِيَهُمْ بَغْتَةً وَ هُمْ لا يَشْعُرُونَ «66»
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| − | آيا جز قيامت را انتظار مىبرند كه ناگهان به سراغشان آيد در حالى كه بى خبرانند.
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| − | الْأَخِلَّاءُ يَوْمَئِذٍ بَعْضُهُمْ لِبَعْضٍ عَدُوٌّ إِلَّا الْمُتَّقِينَ «67»
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| − | دوستانِ (امروز)، در آن روز با يكديگر دشمناند، جز اهل تقوا.
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| − | ===نکته ها===
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| − | حال كسانىكه بر اساس غير تقوا، دوستانى انتخاب كردهاند، در قيامت چنين است:
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| − | - پشيمانى و حسرت كه چرا با او دوست شدم. «يا وَيْلَتى لَيْتَنِي لَمْ أَتَّخِذْ فُلاناً خَلِيلًا» «2» واى بر من! اى كاش فلانى را دوست خود بر نمىگزيدم.
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| − | - دوستان هيچ نقشى براى كمك به يكديگر ندارند. «وَ لا يَسْئَلُ حَمِيمٌ حَمِيماً» «3»
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| − | - دوستان، دشمن يكديگر مىشوند. «الْأَخِلَّاءُ يَوْمَئِذٍ بَعْضُهُمْ لِبَعْضٍ عَدُوٌّ» (آيه مورد بحث)
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| − | - به يكديگر لعنت خواهند كرد. «كُلَّما دَخَلَتْ أُمَّةٌ لَعَنَتْ أُخْتَها» «4»
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| − | - از يكديگر فرار مىكنند. «يَفِرُّ الْمَرْءُ مِنْ أَخِيهِ وَ أُمِّهِ وَ أَبِيهِ وَ صاحِبَتِهِ وَ بَنِيهِ» «5»
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| − | «1». زخرف، 61.
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| − | «2». فرقان، 28.
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| − | «3». معارج، 10.
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| − | «4». اعراف، 38.
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| − | «5». عبس، 34- 36.
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| − | جلد 8 - صفحه 472
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| − | - گناهان خود را به گردن يكديگر مىاندازند. «لَوْ لا أَنْتُمْ لَكُنَّا مُؤْمِنِينَ» «1»
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| − | - از يكديگر برائت دارند. «يا لَيْتَ بَيْنِي وَ بَيْنَكَ بُعْدَ الْمَشْرِقَيْنِ» «2»
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| − | ===پیام ها===
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| − | 1- وقوع قيامت ناگهانى است و زمان آن بر كسى معلوم نيست. «بَغْتَةً وَ هُمْ لا يَشْعُرُونَ»
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| − | 2- تمام دوستىهايى كه بر اساس تقوا نباشد، به دشمنى تبديل مىشود.
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| − | الْأَخِلَّاءُ ... عَدُوٌّ إِلَّا الْمُتَّقِينَ
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| − | }}
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| − | اثنی عشری=
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| − | ===تفسیر اثنی عشری (حسینی شاه عبدالعظیمی)===
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| − | {{نمایش فشرده تفسیر|
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| − | هَلْ يَنْظُرُونَ إِلاَّ السَّاعَةَ أَنْ تَأْتِيَهُمْ بَغْتَةً وَ هُمْ لا يَشْعُرُونَ (66)
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| − | بعد از آن در وعيد احزاب به جهت زيادتى تهديد فرمايد:
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| − | هَلْ يَنْظُرُونَ إِلَّا السَّاعَةَ: (استفهام انكارى) انتظار نمىكشند احزاب بعد ورود رسل و قرآن مگر قيامت را، أَنْ تَأْتِيَهُمْ بَغْتَةً: آنكه بيايد ايشان را ناگهانى، وَ هُمْ لا يَشْعُرُونَ: و ايشان ندانند آمدن آن را به سبب غفلت و مشغولى آنها به امور دنيا و انكار قيامت و بغتتا واقع شود.
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| − | روان جاوید=
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| − | ===تفسیر روان جاوید (ثقفى تهرانى)===
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| − | {{نمایش فشرده تفسیر|
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| − | هَلْ يَنْظُرُونَ إِلاَّ السَّاعَةَ أَنْ تَأْتِيَهُمْ بَغْتَةً وَ هُمْ لا يَشْعُرُونَ (66) الْأَخِلاَّءُ يَوْمَئِذٍ بَعْضُهُمْ لِبَعْضٍ عَدُوٌّ إِلاَّ الْمُتَّقِينَ (67) يا عِبادِ لا خَوْفٌ عَلَيْكُمُ الْيَوْمَ وَ لا أَنْتُمْ تَحْزَنُونَ (68) الَّذِينَ آمَنُوا بِآياتِنا وَ كانُوا مُسْلِمِينَ (69) ادْخُلُوا الْجَنَّةَ أَنْتُمْ وَ أَزْواجُكُمْ تُحْبَرُونَ (70)
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| − | يُطافُ عَلَيْهِمْ بِصِحافٍ مِنْ ذَهَبٍ وَ أَكْوابٍ وَ فِيها ما تَشْتَهِيهِ الْأَنْفُسُ وَ تَلَذُّ الْأَعْيُنُ وَ أَنْتُمْ فِيها خالِدُونَ (71) وَ تِلْكَ الْجَنَّةُ الَّتِي أُورِثْتُمُوها بِما كُنْتُمْ تَعْمَلُونَ (72) لَكُمْ فِيها فاكِهَةٌ كَثِيرَةٌ مِنْها تَأْكُلُونَ (73) إِنَّ الْمُجْرِمِينَ فِي عَذابِ جَهَنَّمَ خالِدُونَ (74) لا يُفَتَّرُ عَنْهُمْ وَ هُمْ فِيهِ مُبْلِسُونَ (75)
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| − | ترجمه
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| − | آيا انتظار ميكشند مگر قيامت را كه بيايد آنانرا ناگهان با آنكه آنها ندانند
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| − | دوستان در چنين روز بعضيشان براى بعضى دشمنند مگر پرهيزكاران
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| − | اى بندگان من نيست ترسى بر شما امروز و نه شما اندوهگين ميشويد
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| − | آنانكه گرويدند بآيتهاى ما و بودند منقادان اوامر ما
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| − | وارد شويد ببهشت شما و همسرانتان آنجا اكرام و مسرور خواهيد شد
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| − | بگردش درآورده شود بر آنان قدحها و تنگهائى از طلا و در آنست آنچه ميخواهد آنرا نفسها و لذّت ميبرد چشمها و شما در آن جاودانيانيد
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| − | و اين آن بهشتى است كه بارث داده شديد آنرا بسبب آنچه بوديد
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| − | جلد 4 صفحه 614
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| − | كه ميكرديد
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| − | براى شما در آن ميوه بسيار است كه از آنها ميخوريد
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| − | همانا گناهكاران در عذاب دوزخ جاودانيانند
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| − | تخفيف داده نشود بر آنها و آنان در آن نوميدانند.
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| − | تفسير
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| − | خداوند متعال براى توبيخ و ملامت كفّار و فجّار ميفرمايد كه آيا بعد از آمدن قرآن و كشف حقائق براى فرق مختلفه آنان باز منتظر چيزى هستند جز روز قيامت كه ناگهان بر آنها وارد و آنان بكلّى غافل و بىخبر از آن باشند چون ايمان بآن ندارند و بايد دانست كه دوستانى كه براى امور دنيوى با يكديگر مرافقت مينمايند بدون غرض الهى در آخرت با هم دشمن ميشوند چنانچه از امام صادق عليه السّلام نقل شده چون آنجا معلوم ميشود كه هر يك موجب بعد ديگرى از مقام ربوبى شدهاند و بيكديگر ضرر اخروى وارد نمودهاند ولى دوستى و معاشرت و مرافقتى كه براى خدا باشد مانند دوستى اهل تقوى با يكديگر در دنيا هميشه باقى و برقرار خواهد بود و در آنروز خداوند بآنها ميفرمايد اى بندگان من خوف و ترس و حزن و اندوه شما تمام شد امروز روز آسايش و راحتى شما است تا خدا خدائى ميكند و مخاطب كسانى هستند كه ايمان آوردند بائمه اطهار و مطيع و منقاد ايشان بودند چون اطاعت و انقياد از ايشان اطاعت و انقياد از خدا و پيغمبر است چنانچه مراد از متّقين هم بروايت كافى از امام صادق عليه السّلام شيعيان ايشانند و امر ميشود بآنها كه داخل بهشت شويد بازنهاتان در دنيا كه شيعه بودند اكرام و پذيرائى ميشود از شما كه مسرور شويد بطوريكه آثار سرور از چهره شما نمايان باشد و آنها داخل ميشوند و گردش ميكنند در اطراف ايشان حوران و غلمان بهشتى با قدحهائى مملوّ از طعام و تنگهائى پر از شراب طهور بهشتى كه تمام آنها از طلاى خالص است و در بهشت است آنچه نفس و دل مؤمن بخواهد از طعام و شراب و لباس و تعيّن و تجمّل و تغنّى و خلوت و جلوت و صحبت و عشرت و انواع لذائذ روحى و جسمى كه بچشم ديده شود مانند گل و سبزه و درخت و آب جارى و قصر عالى كه لذّت نظرى دارد و غير اينها كه قبلا ذكر شد و همه در آن هميشه سالم و غانم و باقى و برقرار خواهند بود و بالاتر از همه آنكه اهل تقوى اين بهشت و نعمتهاى آنرا باستحقاق در مقابل اعمالشان در دنيا مالك ميشوند و از كفّار و فجّار ارث ميبرند
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| − | جلد 4 صفحه 615
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| − | بتقريبى كه در اوّل سوره المؤمنون نقل شد و اوصاف ميوههاى گوناگون زياد بهشتى مكرّر ذكر شده و اجمالش آنستكه تمام محسّنات ميوههاى دنيا را دارد و از تمام عيوب آنها مبرّى است و هر چه از آنها خورده شود كم نميشود و آنجا در هر خوراكى بقدريكه شخص در دنيا خورده ميخورد و كفّار و مشركين (و قمّى ره فرموده دشمنان آل محمد صلّى اللّه عليه و اله و سلّم) در عذاب جهنّم مخلّدند و تخفيف عذابى براى آنها نيست و مأيوس از هر خيرى ميباشند و تشتهى الأنفس بدون ضمير مفعول نيز قرائت شده و گفتهاند آن بهتر است براى آنكه كلمه طولانى نشود.
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| − | اطیب البیان=
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| − | ===اطیب البیان (سید عبدالحسین طیب)===
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| − | {{نمایش فشرده تفسیر|
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| − | هَل يَنظُرُونَ إِلاَّ السّاعَةَ أَن تَأتِيَهُم بَغتَةً وَ هُم لا يَشعُرُونَ (66)
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| − | آيا انتظاري ميكشند اينکه كفار مگر روز قيامت را اينکه که بيايد آنها را بغتة و آنها نميدانند.
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| − | در موضوع يوم القيمة و وقت آن لا يَعلَمُها إِلّا هُوَ چنانچه ميفرمايد إِنَّ اللّهَ عِندَهُ عِلمُ السّاعَةِ- الاية- لقمان آيه 34- و بسياري از روي انكار يا جهات ديگري سؤال ميكنند يَسئَلُونَكَ عَنِ السّاعَةِ أَيّانَ مُرساها قُل إِنَّما عِلمُها عِندَ رَبِّي لا يُجَلِّيها لِوَقتِها إِلّا هُوَ- اعراف آيه 186- يَسئَلُونَ أَيّانَ يَومُ الدِّينِ- ذاريات آيه 12- يَسئَلُونَكَ عَنِ السّاعَةِ أَيّانَ مُرساها- الي قوله تعالي- كَأَنَّهُم يَومَ يَرَونَها لَم يَلبَثُوا إِلّا عَشِيَّةً أَو ضُحاها- نازعات آيه 42 الي 46- لذا ميفرمايد:
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| − | هَل يَنظُرُونَ يعني موقعي که قيامت برپا ميشود.
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| − | إِلَّا السّاعَةَ أَن تَأتِيَهُم بَغتَةً بلكه يك چشم بهم زدن بلكه كمتر که ميفرمايد وَ ما أَمرُ السّاعَةِ إِلّا كَلَمحِ البَصَرِ أَو هُوَ أَقرَبُ نحل آيه 79.
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| − | وَ هُم لا يَشعُرُونَ ولي اينکه كفار درك نميكنند و باور نميكنند.
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| − | برگزیده تفسیر نمونه=
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| − | ===برگزیده تفسیر نمونه===
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| − | {{نمایش فشرده تفسیر|
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| − | (آیه 66)- در انتظار چه هستید جز عذاب آخرت؟ در آیات پیشین سخن از بت پرستان لجوج، و همچنین منحرفان و مشرکان امّت عیسی بود، و در اینجا پایان کار آنها را مجسم کرده، میفرماید: «اینها چه چیزی را انتظار میکشند، جز
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| − | ج4، ص381
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| − | این که ناگهان قیامت به سراغ آنها آید در حالی که متوجه نیستند»؟! (هَلْ یَنْظُرُونَ إِلَّا السَّاعَةَ أَنْ تَأْتِیَهُمْ بَغْتَةً وَ هُمْ لا یَشْعُرُونَ).
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| − | این سؤال در حقیقت بیان حال واقعی این گونه افراد است، مثل این که در مقام مذمت فردی که گوش به نصیحت هیچ ناصح مشفقی فرا نمیدهد و عوامل نابودی خود را به دست خویش فراهم میسازد میگوییم: او تنها در انتظار مرگ خویش است!
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| − | سایر تفاسیر=
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| − | سایرتفاسیر این آیه را می توانید در سایت قرآن مشاهده کنید:
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| − | ==تفسیر های فارسی==
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| − | ==={{ترجمه تفسیر المیزان|سوره=43 |آیه=66}}===
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| − | ==={{تفسیر خسروی|سوره=43 |آیه=66}}===
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| − | ==={{تفسیر عاملی|سوره=43 |آیه=66}}===
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| − | ==={{تفسیر جامع|سوره=43 |آیه=66}}===
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| − | ==تفسیر های عربی==
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| − | ==={{تفسیر المیزان|سوره=43 |آیه=66}}===
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| − | ==={{تفسیر مجمع البیان|سوره=43 |آیه=66}}===
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| − | ==={{تفسیر نور الثقلین|سوره=43 |آیه=66}}===
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| − | ==={{تفسیر الصافی|سوره=43 |آیه=66}}===
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| − | ==={{تفسیر الکاشف|سوره=43 |آیه=66}}===
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| − | </tabber>
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| | ==پانویس== | | ==پانویس== |