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| سطر ۴۴: |
سطر ۴۴: |
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| | == تفسیر آیه == | | == تفسیر آیه == |
| − | <tabber> | + | <tafsir sura="37" ayeh="117" /> |
| − | تفسیر نور=
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| − | ===تفسیر نور (محسن قرائتی)===
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| − | {{ نمایش فشرده تفسیر|
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| − | وَ لَقَدْ مَنَنَّا عَلى مُوسى وَ هارُونَ «114» وَ نَجَّيْناهُما وَ قَوْمَهُما مِنَ الْكَرْبِ الْعَظِيمِ «115» وَ نَصَرْناهُمْ فَكانُوا هُمُ الْغالِبِينَ «116»
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| − | و به راستى ما بر موسى و هارون منّت نهاديم. و آن دو و قومشان را از اندوه بزرگ نجات داديم. و آنان را يارى كرديم، پس غالب آمدند (و پيروز شدند).
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| − | وَ آتَيْناهُمَا الْكِتابَ الْمُسْتَبِينَ «117» وَ هَدَيْناهُمَا الصِّراطَ الْمُسْتَقِيمَ «118» وَ تَرَكْنا عَلَيْهِما فِي الْآخِرِينَ «119»
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| − | و به آن دو كتاب روشنگر داديم. و آن دو را به راه راست هدايت كرديم.
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| − | و براى آن دو در ميان آيندگان (نام نيك) باقى گذاشتيم.
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| − | ===پیام ها===
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| − | 1- ياد الطاف الهى به پيامبران پيشين، سبب آرامش و دلگرمى و دلدارى پيامبر اسلام و مسلمانان در شرايط سخت مكّه است. «وَ لَقَدْ مَنَنَّا»
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| − | 2- برطرف شدن فشارهاى روحى از بزرگترين نعمتهاى الهى است. مَنَنَّا ...
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| − | نَجَّيْناهُما ... مِنَ الْكَرْبِ الْعَظِيمِ
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| − | 3- مردان خدا زمانى از نگرانى راحت مىشوند كه قومشان نيز راحت باشند. «وَ نَجَّيْناهُما وَ قَوْمَهُما مِنَ الْكَرْبِ الْعَظِيمِ»
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| − | 4- كسى كه مورد لطف و نصرت خداوند قرار گيرد، قطعاً پيروز خواهد شد.
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| − | «نَصَرْناهُمْ فَكانُوا هُمُ الْغالِبِينَ»
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| − | جلد 8 - صفحه 55
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| − | 5- اول نجات از طاغوت، سپس دعوت به كتاب و راه خدا. نَجَّيْناهُما ... آتَيْناهُمَا الْكِتابَ الْمُسْتَبِينَ وَ هَدَيْناهُمَا
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| − | 6- پيامها و مضامين تورات و ديگر كتب آسمانى، بسيار روشن و قابل فهم همگان است. «الْكِتابَ الْمُسْتَبِينَ»
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| − | 7- سخنان و نوشتههاى مربوط به تبليغ دين، بايد روشن و روشنگر باشد.
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| − | «الْكِتابَ الْمُسْتَبِينَ»
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| − | 8- حتّى انبيا به راهنمايى خداوند نيازمندند. «هَدَيْناهُمَا الصِّراطَ الْمُسْتَقِيمَ»
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| − | 9- نام نيك، يكى از پاداشهاى الهى در دنياست. «تَرَكْنا عَلَيْهِما فِي الْآخِرِينَ» در اين سوره از حضرت نوح در آيه 78 و از ابراهيم عليه السلام در آيه 107 و از موسى و هارون عليهما السلام در آيه 119 با بقاى نام نيك، تجليل شده است.
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| − | اثنی عشری=
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| − | ===تفسیر اثنی عشری (حسینی شاه عبدالعظیمی)===
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| − | {{نمایش فشرده تفسیر|
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| − | وَ آتَيْناهُمَا الْكِتابَ الْمُسْتَبِينَ (117)
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| − | وَ آتَيْناهُمَا: و عطا فرموديم حضرت موسى و هارون را، الْكِتابَ الْمُسْتَبِينَ:
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| − | كتابى را در غايت روشن و هويدا يعنى تورات كه مشتمل بود بر احكام بينه واضحه بيان اشياء مجهوله، و لذا مسمى به اين اسم شده، چه آن نزد بعضى لفظ عربى مشتق از (ورى الزند) يعنى آتش را از آتش زنه بيرون آوردن.
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| − | روان جاوید=
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| − | ===تفسیر روان جاوید (ثقفى تهرانى)===
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| − | {{نمایش فشرده تفسیر|
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| − | وَ لَقَدْ مَنَنَّا عَلى مُوسى وَ هارُونَ (114) وَ نَجَّيْناهُما وَ قَوْمَهُما مِنَ الْكَرْبِ الْعَظِيمِ (115) وَ نَصَرْناهُمْ فَكانُوا هُمُ الْغالِبِينَ (116) وَ آتَيْناهُمَا الْكِتابَ الْمُسْتَبِينَ (117) وَ هَدَيْناهُمَا الصِّراطَ الْمُسْتَقِيمَ (118)
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| − | وَ تَرَكْنا عَلَيْهِما فِي الْآخِرِينَ (119) سَلامٌ عَلى مُوسى وَ هارُونَ (120) إِنَّا كَذلِكَ نَجْزِي الْمُحْسِنِينَ (121) إِنَّهُما مِنْ عِبادِنَا الْمُؤْمِنِينَ (122)
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| − | ترجمه
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| − | و بتحقيق منّت نهاديم بر موسى و هارون
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| − | و نجات داديم آن دو و قومشانرا از اندوه بزرگ
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| − | و يارى كرديم آنانرا پس بودند ايشان غلبهكنندگان
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| − | و داديم بآن دو كتاب واضحى را
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| − | و هدايت نموديم آن دو را براه راست
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| − | و باقى گذارديم براى آندو در آيندگان
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| − | ذكر خير سلام بر موسى و هارون را
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| − | همانا ما اينچنين پاداش ميدهيم نيكوكارانرا
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| − | همانا آن دواند از بندگان ما كه گروندگانند.
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| − | تفسير
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| − | خداوند منّان منّت نهاد بر حضرت موسى و هارون از پيغمبران بنى اسرائيل بنبوّت و رسالت و معجزات بسيار و منافع دينى و دنيوى بيشمار و نجات داد آن دو و تمام آنطائفه را كه دوازده قبيله بودند معروف بأسباط از دوازده پسر حضرت يعقوب ارهمّ و غم و اندوه بزرگى كه داشتند از تسلّط قبطيان و فوعون و فرعونيان بر آنها كه بر صغير و كبيرشان رحم نمىنمودند و شرح حالشان مكرّر ذكر شده كه بچه اعمال شاقهاى وادارشان ميكردند و خداوند ببركت آن دو وجود محترم نصرت داد ايشان را بر دشمنانشان و بر آنها غلبه نمودند بطوريكه نا انقراض عالم ذكر آن در السنه و افواه باقى است و بالاتر از همه آنكه خداوند كتاب تورية را كه مشتمل بر احكام بليغه و نصائح و مواعظ شافيه وافيه كافيه براى اداره امور دنيوى و اخروى آنها در آن عصر تا زمان حضرت عيسى عليه السّلام بود بآن دو عنايت فرمود و بشارت داد در آن معجزه پيغمبر آخر الزّمان از نسل حضرت اسمعيل كه عموى آنها بود و اولاد او را برادران خودشان ميخواندند و آنكه دين او كامل كننده تمام اديان و تا روز قيامت باقى است و هدايت نمود آن دو را براه راست بهشت و ولايت امير المؤمنين و ائمه طاهرين عليهم السلام و بقيّه آيات در قصّه نوح عليه السّلام بيان شد.
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| − | اطیب البیان=
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| − | ===اطیب البیان (سید عبدالحسین طیب)===
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| − | وَ آتَيناهُمَا الكِتابَ المُستَبِينَ (117)
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| − | و داديم موسي و هارون را كتابي که حقايق را بيان ميفرمايد.
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| − | اول كتابي که از آسمان نازل شد تورية بود پس از آن زبور سپس انجيل بعدا قرآن و بر انبياء قبل از موسي صحف نازل ميشد صحف آدم شيث نوح ابراهيم و تورية را ميفرمايد إِنّا أَنزَلنَا التَّوراةَ فِيها هُديً وَ نُورٌ يَحكُمُ بِهَا- النَّبِيُّونَ- الي قوله تعالي- وَ مَن لَم يَحكُم بِما أَنزَلَ اللّهُ فَأُولئِكَ هُمُ الكافِرُونَ مائده آيه 48.
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| − | وَ آتَيناهُمَا الكِتابَ و شرح نزول توريه را ميفرمايد وَ كَتَبنا لَهُ فِي الأَلواحِ مِن كُلِّ شَيءٍ مَوعِظَةً وَ تَفصِيلًا لِكُلِّ شَيءٍ فَخُذها بِقُوَّةٍ وَ أمُر قَومَكَ يَأخُذُوا بِأَحسَنِها اعراف آيه 142 که حضرت موسي بر حسب وعده الهي رفت چهل شب در ميقات تا الواح توريه بر او نازل شد.
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| − | وَ آتَيناهُمَا الكِتابَ المُستَبِينَ سؤال تورية بر موسي نازل شد چرا مي- فرمايد و آتيناهما جواب هارون شركت داشت با موسي در دعوت و در تمام امور چنانچه حضرت موسي درخواست كرد از پروردگار وَ اجعَل لِي وَزِيراً مِن أَهلِي هارُونَ أَخِي اشدُد بِهِ أَزرِي وَ أَشرِكهُ فِي أَمرِي طه آيه 30 الي 33 غاية الامر
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| − | جلد 15 - صفحه 185
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| − | از جانب حق بر موسي و بتوسط موسي بر هارون.
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| − | برگزیده تفسیر نمونه=
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| − | ===برگزیده تفسیر نمونه===
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| − | {{نمایش فشرده تفسیر|
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| − | (آیه 117)- در سومین مرحله به مواهب معنوی که خدا به این قوم از بند رسته عنایت فرمود اشاره کرده، میگوید: «ما به آن دو کتاب روشنگر دادیم» (وَ آتَیْناهُمَا الْکِتابَ الْمُسْتَبِینَ).
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| − | آری «تورات» کتاب مستبین یعنی کتاب روشنگر بود، و به تمام نیازمندیهای دین و دنیای بنی اسرائیل در آن روز پاسخ میگفت، همان گونه که در آیه 44 سوره مائده نیز میخوانیم: «ما تورات را نازل کردیم که هم در آن هدایت بود و هم نور و روشنائی».
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| − | ج4، ص157
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| − | سایر تفاسیر=
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| − | سایرتفاسیر این آیه را می توانید در سایت قرآن مشاهده کنید:
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| − | ==تفسیر های فارسی==
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| − | ==={{ترجمه تفسیر المیزان|سوره=37 |آیه=117}}===
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| − | ==={{تفسیر خسروی|سوره=37 |آیه=117}}===
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| − | ==={{تفسیر عاملی|سوره=37 |آیه=117}}===
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| − | ==={{تفسیر جامع|سوره=37 |آیه=117}}===
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| − | ==تفسیر های عربی==
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| − | ==={{تفسیر المیزان|سوره=37 |آیه=117}}===
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| − | ==={{تفسیر مجمع البیان|سوره=37 |آیه=117}}===
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| − | ==={{تفسیر نور الثقلین|سوره=37 |آیه=117}}===
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| − | ==={{تفسیر الصافی|سوره=37 |آیه=117}}===
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| − | ==={{تفسیر الکاشف|سوره=37 |آیه=117}}===
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| − | </tabber>
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| | ==پانویس== | | ==پانویس== |