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| | ==معانی کلمات آیه== | | ==معانی کلمات آیه== |
| − | «بِهِ»: مرجع ضمیر (ه) حق در آیه است که مراد اسلام و قرآن است. «أَنّی»: چگونه؟ «التَّنَاوُشُ»: دسترسی پیدا کردن. فراچنگ آوردن. «مَکَانٍ بَعیدٍ»: مراد آخرت است که با جهان ما فاصله دوری دارد. یعنی بعد از خروج از دنیا، تازه کسی نمیتواند ایمانی به دست آورد که در پرتو آن رستگاری میسّر گردد (نگا: انعام / غافر / و ).
| + | *'''تناوش''': نوش و تناوش به معنى اخذ و گرفتن است. «ناش الشيء نوشا: تناوله» اين لفظ فقط يك بار در قرآن آمده است.<ref>تفسير احسن الحديث، سید علی اکبر قرشی ، ج8، ص: 451</ref> |
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| | == تفسیر آیه == | | == تفسیر آیه == |
| − | <tabber> | + | <tafsir sura="34" ayeh="52" /> |
| − | تفسیر نور=
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| − | ===تفسیر نور (محسن قرائتی)===
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| − | {{ نمایش فشرده تفسیر|
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| − | وَ قالُوا آمَنَّا بِهِ وَ أَنَّى لَهُمُ التَّناوُشُ مِنْ مَكانٍ بَعِيدٍ «52»
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| − | (و در آن حال) گويند: به او ايمان آورديم و كجا اين دستيابى به ايمان از راه دور (كه توان بر انجام عمل صالحى ندارند) به سودشان خواهد بود.
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| − | ===نکته ها===
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| − | در اين آيات تا آخر سوره، سيمايى از وضع دلخراش جان دادن مشركان ترسيم شده است.
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| − | كلمهى «تناوش» از «نوش» به معناى گرفتن چيزى به آسانى است.
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| − | در تفاسير شيعه و سنّى رواياتى آمده است كه رسول اكرم صلى الله عليه و آله اين آيات را به خروج سفيانى به هنگام قيام حضرت مهدى عليه السلام تفسير كردهاند كه خداوند از نزديكترين مكان، آنان را نابود مىكند.
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| − | مراد از «مَكانٍ قَرِيبٍ» دنيا و «مَكانٍ بَعِيدٍ» آخرت است.
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| − | جلد 7 - صفحه 465
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| − | ===پیام ها===
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| − | 1- جزع و فزع و استمداد مشركان، مشكلى از آنان حل نمىكند. «فَزِعُوا فَلا فَوْتَ» مشركان پناهگاهى ندارند.
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| − | 2- هر كافرى در لحظهى احساس خطر ايمان مىآورد ولى چه سود. (ايمان انتخابى ارزش دارد نه اضطرارى.) «أُخِذُوا مِنْ مَكانٍ قَرِيبٍ- قالُوا آمَنَّا»
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| − | 3- مرگ هر جا كه آمد فوراً انسان را مىگيرد. «مَكانٍ قَرِيبٍ»
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| − | 4- عقوبت مشركان از همين دنيا آغاز مىشود. «مَكانٍ قَرِيبٍ»
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| − | 5- برگشت به دنيا و جبران گذشتهها راهى دور و ناممكن است. «مَكانٍ بَعِيدٍ»
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| − | اثنی عشری=
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| − | ===تفسیر اثنی عشری (حسینی شاه عبدالعظیمی)===
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| − | {{نمایش فشرده تفسیر|
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| − | وَ قالُوا آمَنَّا بِهِ وَ أَنَّى لَهُمُ التَّناوُشُ مِنْ مَكانٍ بَعِيدٍ (52)
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| − | وَ قالُوا آمَنَّا بِهِ: و گويند مشركان مكه با لشگر سفيانى به وقت مرگ يا در قيامت يا در زمان خسف: ايمان آورديم به پيغمبر و آنچه به آن خبر داده، يا در آن وقت اعتراف به وحدانيت خدا نمايند، وَ أَنَّى لَهُمُ التَّناوُشُ: و از كجا باشد ايشان را فرا گرفتن ايمان به آسانى، مِنْ مَكانٍ بَعِيدٍ: از موضعى دور كه آخرت است، زيرا محل تكليف ايشان دنيا است، پس ايمان آن روز فايدهاى نخواهد داشت. يا بوقت مشاهده عذاب استيصال، چه در اين وقت ايمان آنها را قبول نكنند. اين به جهت مبالغه است، يعنى به هيچوجه از مكان دور تناول ايمان نتوانند كرد چه جاى مكان قريب. اين تمثيل حال كفار است از نائل شدن ايشان در وقت مشاهده عذاب و انتفاع ايشان به حال كسى كه خواهد به دست تناول كند چيزى را كه در غايت بلندى باشد، همچنين وقتى كه عذاب را معاينه ببينند محال است ايشان را رسيدن به ايمان، زيرا قبول نشود و فايده ندهد ايشان را. حاصل آنكه چگونه ايمان فايده دهد.
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| − | روان جاوید=
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| − | ===تفسیر روان جاوید (ثقفى تهرانى)===
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| − | {{نمایش فشرده تفسیر|
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| − | وَ لَوْ تَرى إِذْ فَزِعُوا فَلا فَوْتَ وَ أُخِذُوا مِنْ مَكانٍ قَرِيبٍ (51) وَ قالُوا آمَنَّا بِهِ وَ أَنَّى لَهُمُ التَّناوُشُ مِنْ مَكانٍ بَعِيدٍ (52) وَ قَدْ كَفَرُوا بِهِ مِنْ قَبْلُ وَ يَقْذِفُونَ بِالْغَيْبِ مِنْ مَكانٍ بَعِيدٍ (53) وَ حِيلَ بَيْنَهُمْ وَ بَيْنَ ما يَشْتَهُونَ كَما فُعِلَ بِأَشْياعِهِمْ مِنْ قَبْلُ إِنَّهُمْ كانُوا فِي شَكٍّ مُرِيبٍ (54)
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| − | ترجمه
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| − | و اگر به بينى هنگاميكه ترسان شوند پس از دست نروند و گرفته شوند از مكانى نزديك
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| − | و گويند ايمان آورديم بآن و از كجا باشد برايشان نائل
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| − | جلد 4 صفحه 372
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| − | شدن از جاى دور
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| − | و بتحقيق كافر شدند بآن از پيش و مىافكنند بجاى پنهان از جاى دور
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| − | و جدائى افكنده شود ميانشان و ميان آنچه ميخواستند چنان كه بجا آورده شد بهمكارانشان پيش از اين همانا آنها بودند در شكى متزلزل كننده.
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| − | تفسير
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| − | خداوند متعال باز بنغمه ديگرى از كفّار تهديد فرموده كه خطاب بپيغمبر خود فرموده ميفرمايد و اگر به بينى تو وقتى را كه بفزع در آيند و هراسان شوند در وقت مرگ يا بعث براى حشر يا در جنگ بدر بر حسب اختلاف اقوال مفسّرين هر آينه ديدهئى امر عجيبى را پس هيچ يك از دست عزرائيل يا صور احضار اسرافيل يا شمشير اهل ايمان و امير ايشان نميتوانند فرار كنند و گرفته ميشوند از جاى نزديك كه بستر و بالين يا قبر و قالب مثال يا ميدان جنگ باشد يا بدست خدا كه بهمه بر هر تقدير نزديك است و در آنوقت گويند ايمان آورديم ما به پيغمبر يا قرآن و كجا و چگونه ممكن باشد تناول و وصول بنفع ايمان براى آنها از جاى دور كه عالم آخرت يا برزخ يا مشاهده عذاب باشد كه بيرون است از زمان تكليف و از انظار اهل اين عالم با آنكه قبلا كافر شدند بحق با مشاهده آيات آن و هر نسبت ناروائى را كه دلشان خواست از سحر و شعر و جنون و كذب و غيرها به پيغمبر و قرآن دادند با آنكه از باطن امر خبردار نبودند مانند كسيكه سنگى بنقطه ناپديدى از جاى دورى بيندازد كه البتّه بهدف نخواهد رسيد و در آنروز و آنهنگام حائل شود عذاب بين آنها و تمام مشتهيات و آمال و آرزوهاشان كه نه بدنيا برميگردند و نه ايمان آنها پذيرفته ميشود و نه از جهنّم نجات پيدا ميكنند و نه به بهشت ميروند چنانچه با اقوام سابقه كه انبياء را تكذيب نمودند همين معامله شد و بعذاب الهى گرفتار شدند چون آنها هم مانند اينها شكّاك و بد گمان به انبياء و اولياء بودند و در مسلك و مرام با هم شركت داشتند و باين مناسبت اطلاق اشياع بر آنها شده و توصيف شك بمريب ظاهرا براى تأكيد است مانند عجب عجيب و شعر شاعر و ظلّ ظليل و امثال اينها و محتمل است براى تقييد شك بموجب تزلزل و اتّهام و تشويش خاطر باشد در هر حال آنچه تاكنون ذكر شد بمقتضاى ظاهر آيات شريفه و اقوال مفسّرين بود ولى بمقتضاى روايات از
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| − | جلد 4 صفحه 373
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| − | صيحه آسمانى است و اخذ كفار از مكان قريب بدون فوت احدى خسف است كه از زير قدمهاى عساكر سفيانى در زمين بيداء كه بين مدينه و مكه است در وقت ظهور امام زمان واقع ميشود و ايمانشان بآنحضرت بعد از نزول امر قبول نميشود در ثواب الاعمال و مجمع از امام صادق عليه السّلام نقل نموده كه كسيكه دو سوره حمد يعنى سوره سبا و فاطر را در يك شب بخواند خداوند او را حفظ و نگهدارى فرمايد و اگر در روز آنشب هم بخواند هيچ مكروهى در آنروز باو نرسد و خداوند از خير دنيا و آخرت بقدرى باو عطا ميفرمايد كه بر قلبش خطور نكرده و آرزويش را ننموده باشد و الحمد للّه رب العالمين و صلّى اللّه على محمد و آله الطاهرين.
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| − | جلد 4 صفحه 374
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| − | اطیب البیان=
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| − | ===اطیب البیان (سید عبدالحسین طیب)===
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| − | {{نمایش فشرده تفسیر|
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| − | وَ قالُوا آمَنّا بِهِ وَ أَنّي لَهُمُ التَّناوُشُ مِن مَكانٍ بَعِيدٍ (52)
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| − | و گفتند ايمان آورديم به
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| − | جلد 14 - صفحه 582
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| − | خداوند و پيغمبر و دين اسلام و از كجا ميتوانند و دسترسي و طلب كنند از مكان بعيد يعني هيهات که بدست بياورند و بسيار دور است اينکه آمال و آرزو.
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| − | وَ قالُوا آمَنّا بِهِ ايماني که از روي الجاء و اضطراب باشد، نتيجه ندارد چنانچه ميفرمايد: وَ لَيسَتِ التَّوبَةُ لِلَّذِينَ يَعمَلُونَ السَّيِّئاتِ حَتّي إِذا حَضَرَ أَحَدَهُمُ المَوتُ قالَ إِنِّي تُبتُ الآنَ وَ لَا الَّذِينَ يَمُوتُونَ وَ هُم كُفّارٌ (نساء آيه 18) و هر چه بگويند رَبِّ ارجِعُونِ لَعَلِّي أَعمَلُ صالِحاً فِيما تَرَكتُ كَلّا إِنَّها كَلِمَةٌ هُوَ قائِلُها (مؤمنون آيه 99).
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| − | وَ أَنّي لَهُمُ التَّناوُشُ تناوش جديت در تحصيل مطلوب است كجا ميتوانند تحصيل كنند هيهات هيهات.
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| − | مِن مَكانٍ بَعِيدٍ يعني اينکه آرزو و اينکه تمنا بسيار بعيد است ديگر برگشتن ندارند و در توبه بسته شده.
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| − | برگزیده تفسیر نمونه=
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| − | ===برگزیده تفسیر نمونه===
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| − | {{نمایش فشرده تفسیر|
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| − | }}
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| − | سایر تفاسیر=
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| − | سایرتفاسیر این آیه را می توانید در سایت قرآن مشاهده کنید:
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| − | ==تفسیر های فارسی==
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| − | ==={{ترجمه تفسیر المیزان|سوره=34 |آیه=52}}===
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| − | ==={{تفسیر خسروی|سوره=34 |آیه=52}}===
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| − | ==={{تفسیر عاملی|سوره=34 |آیه=52}}===
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| − | ==={{تفسیر جامع|سوره=34 |آیه=52}}===
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| − | ==تفسیر های عربی==
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| − | ==={{تفسیر المیزان|سوره=34 |آیه=52}}===
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| − | ==={{تفسیر مجمع البیان|سوره=34 |آیه=52}}===
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| − | ==={{تفسیر نور الثقلین|سوره=34 |آیه=52}}===
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| − | ==={{تفسیر الصافی|سوره=34 |آیه=52}}===
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| − | ==={{تفسیر الکاشف|سوره=34 |آیه=52}}===
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| − | </tabber>
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| | ==پانویس== | | ==پانویس== |