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| سطر ۴۳: |
سطر ۴۳: |
| | بأس: شدت و سختى. در اينجا به معنى عذاب و كيفر است.<ref>تفسیر احسن الحدیث، سید علی اکبر قرشی</ref> | | بأس: شدت و سختى. در اينجا به معنى عذاب و كيفر است.<ref>تفسیر احسن الحدیث، سید علی اکبر قرشی</ref> |
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| − | ==تفسیر آیه== | + | == تفسیر آیه == |
| − | <tabber> | + | <tafsir sura="6" ayeh="147" /> |
| − | تفسیر نور=
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| − | ===تفسیر نور (محسن قرائتی)===
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| − | {{ نمایش فشرده تفسیر|
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| − | فَإِنْ كَذَّبُوكَ فَقُلْ رَبُّكُمْ ذُو رَحْمَةٍ واسِعَةٍ وَ لا يُرَدُّ بَأْسُهُ عَنِ الْقَوْمِ الْمُجْرِمِينَ «147»
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| − | (اى پيامبر!) اگر تو را تكذيب كردند پس بگو: پروردگارتان داراى رحمت گسترده است (امّا) عذاب او از قوم تبهكار، دفع نمىشود.
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| − | ===پیام ها===
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| − | 1- رهبر بايد آمادهى شنيدن تكذيب و تهمت از سوى برخى مردم باشد. فَإِنْ كَذَّبُوكَ فَقُلْ ...
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| − | 2- با تكذيب كنندگان، بايد برخوردى خيرخواهانه كرد و اگر تأثير نداشت، از تهديد استفاده شود. «ذُو رَحْمَةٍ- لا يُرَدُّ بَأْسُهُ»
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| − | 3- بيم و اميد، در كنار هم كارساز است. «ذُو رَحْمَةٍ، بَأْسُهُ»
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| − | 4- درهاى رحمت الهى حتّى به روى مخالفان هم بسته نيست. «فَإِنْ كَذَّبُوكَ فَقُلْ رَبُّكُمْ ذُو رَحْمَةٍ»
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| − | 5- رحمت خداوند، پيش از قهر اوست. ذُو رَحْمَةٍ ... بَأْسُهُ
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| − | 6- گستردگى رحمت الهى، مانع كيفر كردن او نيست. «رَبُّكُمْ ذُو رَحْمَةٍ ... وَ لا يُرَدُّ بَأْسُهُ» هرچند كيفر او نيز در مسير تربيت انسان و از رحمت و ربوبيّت او سرچشمه مىگيرد.
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| − | تفسير نور(10جلدى)، ج2، ص: 576
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| − | اثنی عشری=
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| − | ===تفسیر اثنی عشری (حسینی شاه عبدالعظیمی)===
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| − | {{نمایش فشرده تفسیر|
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| − | فَإِنْ كَذَّبُوكَ فَقُلْ رَبُّكُمْ ذُو رَحْمَةٍ واسِعَةٍ وَ لا يُرَدُّ بَأْسُهُ عَنِ الْقَوْمِ الْمُجْرِمِينَ (147)
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| − | بعد از آن خطاب بر رسول صلى اللّه عليه و آله فرمايد:
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| − | فَإِنْ كَذَّبُوكَ: پس اگر تكذيب تو كنند جحودان در آنچه وحى نمودهام به تو فَقُلْ رَبُّكُمْ ذُو رَحْمَةٍ واسِعَةٍ: پس بگو به ايشان آرى، پروردگار شما صاحب بخشايش بسيار است بر اهل طاعت. يا واسع الرحمة است به اينكه مهلت مىدهد شما را در تكذيب و تعجيل عذاب نفرمايد، تا شايد از كفر و تكذيب برگرديد، پس مغرور مشويد به امهال، زيرا امهال حق تعالى اهمال نيست وَ لا يُرَدُّ بَأْسُهُ عَنِ الْقَوْمِ الْمُجْرِمِينَ: و بازداشته نخواهد شد عذاب او در وقت معين و مقرر او قومى كه مكذبانند. چون چنين است، پس به رجاء رحمت او ايمن مشويد از نقمت او.
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| − | در كتاب كافى- ابى اسامه از حضرت صادق عليه السّلام يقول: تعوّذوا باللّه من سطوات اللّه باللّيل و النّهار. قال قلت: و ما سطوات اللّه؟ قال الاخذ على المعاصى. فرمود پناه ببريد به خدا از سطوات قهارى در شب و روز. عرض كردم سطوات الهى چيست؟ فرمود: گرفتن به عقوبت معاصى.
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| − | روان جاوید=
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| − | ===تفسیر روان جاوید (ثقفى تهرانى)===
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| − | {{نمایش فشرده تفسیر|
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| − | فَإِنْ كَذَّبُوكَ فَقُلْ رَبُّكُمْ ذُو رَحْمَةٍ واسِعَةٍ وَ لا يُرَدُّ بَأْسُهُ عَنِ الْقَوْمِ الْمُجْرِمِينَ (147)
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| − | ترجمه
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| − | پس اگر تكذيب كنند تو را پس بگو پروردگار شما صاحب رحمت واسعه است و بازداشته نميشود عذابش از گروه گناهكاران.
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| − | تفسير
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| − | خداوند پس از بيان يك سلسله از حقايق پيغمبر خود را مأمور بابلاغ فرمود و آنكه در صورت تكذيب بگويد خدا داراى رحمت واسعه رحيميّه است پرده ناموس بندگان را بخطاء فاحش ندرد و روزى روزى خواران را بگناه ظاهر نبرد تا مغرور نشوند بعدم نزول عذاب فورى بر آنها و نيز گوشزد فرمايد كه مقتضاى حكمت و عدالت الهى آنستكه دست ردّ بر سينه احدى از اهل جرم و عصيان نگذارد و هر كس را بمجازات عملش در وقت مقرر برساند تا از عاقبت امر خويش بينديشند و پيرامون معاصى نگردند ..
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| − | اطیب البیان=
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| − | ===اطیب البیان (سید عبدالحسین طیب)===
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| − | {{نمایش فشرده تفسیر|
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| − | فَإِن كَذَّبُوكَ فَقُل رَبُّكُم ذُو رَحمَةٍ واسِعَةٍ وَ لا يُرَدُّ بَأسُهُ عَنِ القَومِ المُجرِمِينَ (147)
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| − | پس اگر تكذيب ميكنند پس بآنها بگو که پروردگار شما صاحب رحمت واسعه است و كسي نميتواند بأس او را از قوم گنهكارها رد كند.
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| − | فَإِن كَذَّبُوكَ مراد يهود است که تكذيب پيغمبر اكرم صلّي اللّه عليه و آله و سلّم نمودند هم در اينکه حكم تحريم بلكه جميع احكام بلكه تكذيب رسالت نمودند فقل در جواب تكذيب آنها ربّكم پروردگار شما که شما را از كتم عدم بوجود آورد و بحدّ كمال عقل رسانيد و انبياء بسياري براي شما فرستاد و احكامي جعل فرمود براي هدايت شما تماما از روي رحمت و لطف و عنايت بوده براي تربيت شما.
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| − | ذُو رَحمَةٍ واسِعَةٍ که وَسِعَت كُلَّ شَيءٍ و لكن شما يهود با انبياء چه كرديد بعضي را كشتيد و بعضي را تكذيب نموديد و با احكام الهيه چه كرديد همه را زير پا گذارديد و تغيير داديد و با كتابهاي الهي چه كرديد همه را تحريف نموديد و از مواضع خود انتقال داديد بلكه توحيد را منكر شديد و در شرك بسر برديد و گمان كرديد که خدا شما را عذاب نميكند و خدا را بغضب آورديد بدانيد که وَ لا يُرَدُّ بَأسُهُ عَنِ القَومِ المُجرِمِينَ احدي بفرياد شما نميرسد و كسي جلوگيري از عذاب او نميكند هر قومي که نافرماني او كردند.
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| − | سؤال- اينکه آيه دليل بر انكار شفاعت است با اينكه از ضروريات مذهب است جواب- شفاعت خاص باهل ايمان است غير مؤمن بالاخص يهود عنود لياقت شفاعت ندارند و احدي از براي آنها شفاعت نميكند بلكه انبياء و اولياء حتي حضرت موسي عليه السّلام از اينها بيزار است و خصم آنها است چنانچه پيغمبر اسلام با اينكه شفاعت كبري بدست او است خصم اينکه مذاهب باطله است که در اسلام احداث شده است (ويل لمن شفعائه خصمائه).
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| − | برگزیده تفسیر نمونه=
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| − | ===برگزیده تفسیر نمونه===
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| − | {{نمایش فشرده تفسیر|
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| − | (آیه 147)
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| − | از آنجا که لجاجت یهود و مشرکان روشن بوده و امکان داشته پافشاری کنند و پیامبر صلّی اللّه علیه و آله را تکذیب نمایند، در این آیه خداوند به پیامبرش دستور می دهد که «اگر تو را تکذیب کنند به آنها بگو: پروردگارتان رحمت وسیع و پهناوری دارد» (فَإِن کذَّبُوکَ فَقُل رَبُّکم ذُو رَحمَةٍ واسِعَةٍ).
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| − | و شما را زود مجازات نمی کند بلکه مهلت می دهد، شاید از اشتباهات خود برگردید و از کرده خود پشیمان شوید و به سوی خدا باز آیید.
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| − | ولی اگر از مهلت الهی باز هم سوء استفاده کنید، و به تهمتهای ناروای خود ادامه دهید، بدانید کیفر خداوند قطعی است، و سر انجام دامان شما را خواهد گرفت، زیرا «مجازات او از جمعیت مجرمان دفع شدنی نیست» (وَ لا یرَدُّ بَأسُهُ عَنِ القَومِ المُجرِمِینَ).
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| − | این آیه به خوبی عظمت تعلیمات قرآن را روشن می سازد که بعد از شرح این همه خلافکاریهای یهود و مشرکان، باز آنها را فورا تهدید به عذاب نمی کند بلکه نخست با تعبیرهای آکنده از محبت راه بازگشت را به سوی آنها گشوده، تا تشویق شوند و به سوی حق بازگردند، اما برای این که رحمت پهناور الهی باعث جرأت و جسارت و طغیان آنان نگردد، و دست از لجاجت بردارند در آخرین جمله آنها را تهدید به مجازات قطعی خدا می کند.
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| − | سایر تفاسیر=
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| − | سایرتفاسیر این آیه را می توانید در سایت قرآن مشاهده کنید:
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| − | ==تفسیر های فارسی==
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| − | ==={{ترجمه تفسیر المیزان|سوره=6 |آیه=147}}===
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| − | ==={{تفسیر خسروی|سوره=6 |آیه=147}}===
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| − | ==={{تفسیر عاملی|سوره=6 |آیه=147}}===
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| − | ==={{تفسیر جامع|سوره=6 |آیه=147}}===
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| − | ==تفسیر های عربی==
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| − | ==={{تفسیر المیزان|سوره=6 |آیه=147}}===
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| − | ==={{تفسیر مجمع البیان|سوره=6 |آیه=147}}===
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| − | ==={{تفسیر نور الثقلین|سوره=6 |آیه=147}}===
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| − | ==={{تفسیر الصافی|سوره=6 |آیه=147}}===
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| − | ==={{تفسیر الکاشف|سوره=6 |آیه=147}}===
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| − | </tabber>
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| | ==پانویس== | | ==پانویس== |