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| سطر ۴۶: |
سطر ۴۶: |
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| | == تفسیر آیه == | | == تفسیر آیه == |
| − | <tabber> | + | <tafsir sura="7" ayeh="93" /> |
| − | تفسیر نور=
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| − | ===تفسیر نور (محسن قرائتی)===
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| − | {{ نمایش فشرده تفسیر|
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| − | فَتَوَلَّى عَنْهُمْ وَ قالَ يا قَوْمِ لَقَدْ أَبْلَغْتُكُمْ رِسالاتِ رَبِّي وَ نَصَحْتُ لَكُمْ فَكَيْفَ آسى عَلى قَوْمٍ كافِرِينَ «93»
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| − | پس شعيب از آنان روى گرداند و گفت: اى قوم من! پيامهاى پروردگارم را به شما رساندم و برايتان خيرخواهى كردم، پس چگونه بر (سرنوشت) قوم كافر تأسّف بخورم؟
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| − | جلد 3 - صفحه 120
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| − | ===پیام ها===
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| − | 1- قهر الهى، بعد از اتمام حجّت است. فَأَخَذَتْهُمُ الرَّجْفَةُ ... أَبْلَغْتُكُمْ رِسالاتِ رَبِّي
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| − | 2- موعظه، مدارا و توجّه به مردم حدّى دارد، گاهى هم بايد از آنان اعراض نمود.
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| − | «فَتَوَلَّى عَنْهُمْ»
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| − | 3- تبليغ، بايد همراه با مهربانى و سوز باشد. أَبْلَغْتُكُمْ ... نَصَحْتُ
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| − | 4- نصايح و خيرخواهى را با منافع شخصى آميخته نكنيم. «نَصَحْتُ لَكُمْ»
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| − | 5- وقتى به وظيفهى خود عمل كرديم، نگران نباشيم كه چه خواهد شد.
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| − | أَبْلَغْتُكُمْ ... فَكَيْفَ آسى
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| − | 6- تأسّف نابجا و عاطفهى بىمورد، ممنوع است. «فَكَيْفَ آسى»
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| − | (در موارد ديگرى هم به پيامبراكرم صلى الله عليه و آله خطاب شده كه «لا تَحْزَنْ عَلَيْهِمْ» «1»، غصّهى آنان را نخور.)
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| − | 7- آنجا كه روحيّهى كفر، لجاجت و عناد حاكم باشد، موعظهى پيامبران هم اثر نمىكند. «فَكَيْفَ آسى عَلى قَوْمٍ كافِرِينَ»
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| − | اثنی عشری=
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| − | ===تفسیر اثنی عشری (حسینی شاه عبدالعظیمی)===
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| − | {{نمایش فشرده تفسیر|
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| − | فَتَوَلَّى عَنْهُمْ وَ قالَ يا قَوْمِ لَقَدْ أَبْلَغْتُكُمْ رِسالاتِ رَبِّي وَ نَصَحْتُ لَكُمْ فَكَيْفَ آسى عَلى قَوْمٍ كافِرِينَ (93)
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| − | فَتَوَلَّى عَنْهُمْ: پس روى بگردانيد از ايشان و برگشت، وَ قالَ يا قَوْمِ: و فرمود اى قوم من، لَقَدْ أَبْلَغْتُكُمْ: هر آينه بتحقيق رسانيدم به شما، رِسالاتِ
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| − | جلد 4 صفحه 143
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| − | رَبِّي: پيغامهاى پروردگار خود را، وَ نَصَحْتُ لَكُمْ: و نصيحت نمودم شما را از روى شعف و مهربانى. بعد از آن تسليه خود داده، از تأسف و تحسر اعراض نمود و گفت: فَكَيْفَ آسى عَلى قَوْمٍ كافِرِينَ: پس چگونه غمناك شوم بر هلاك گروهى كه كافر بودند. و يا صدور اين قول بر وجه اعتذار بود از عدم شدت حزن بر ايشان.
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| − | در اكثر تفاسير مذكور است كه شعيب عليه السّلام مبادى عذاب را مشاهده كرد، اعراض، و از آن بلد عزم خروج نمود و در حين خروج با قوم فرمود: من مبالغه كردم در ابلاغ و انذار شما و بذل سعى و جهد نمودم در نصح و اشفاق شما، لكن تصديق نكرديد و بر كفر خود ثابت و راسخ شديد، لا جرم مستوجب اين عذاب شديد؛ پس چگونه من تأسف خورم بر هلاك شما، و حال آنكه از روى عناد تصديق مرا ننموديد و بر كفر باقى مانديد.
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| − | روان جاوید=
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| − | ===تفسیر روان جاوید (ثقفى تهرانى)===
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| − | {{نمایش فشرده تفسیر|
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| − | فَتَوَلَّى عَنْهُمْ وَ قالَ يا قَوْمِ لَقَدْ أَبْلَغْتُكُمْ رِسالاتِ رَبِّي وَ نَصَحْتُ لَكُمْ فَكَيْفَ آسى عَلى قَوْمٍ كافِرِينَ (93)
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| − | ترجمه
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| − | پس روى گردانيد از ايشان و گفت اى قوم من هر آينه بتحقيق ابلاغ نمودم بشما پيامهاى پروردگارم را و نصيحت كردم مر شما را پس چگونه غمناك شوم بر گروهى كافران.
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| − | تفسير
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| − | حضرت شعيب (ع) بعد از آنكه مقدمات عذاب الهى را مشاهده نمود از بلد خارج شد و در وقت خروج اين خطاب را بقوم خود فرمود يا مانند حضرت صالح بعد از نزول عذاب از شدت حزن و اندوه كه نمىتوانست آنها را بآن حال مشاهده نمايد از قوم خود روى گرداند و اين خطاب را بآنها فرمود تا كلمه لكم و بعد براى تسليت خاطر خود فرمود و چگونه ميتوان غمناك و محزون شد براى كسانيكه مخالفت با خدا نمودند و بپاداش خود رسيدند يعنى جاى تأسف و اندوه نيست.
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| − | اطیب البیان=
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| − | ===اطیب البیان (سید عبدالحسین طیب)===
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| − | {{نمایش فشرده تفسیر|
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| − | فَتَوَلّي عَنهُم وَ قالَ يا قَومِ لَقَد أَبلَغتُكُم رِسالاتِ رَبِّي وَ نَصَحتُ لَكُم فَكَيفَ آسي عَلي قَومٍ كافِرِينَ (93)
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| − | پس اعراض فرمود شعيب از كفار و مشركين و فرمود اي قوم من هرآينه بتحقيق من ابلاغ كردم بشما دستورات پروردگار خود را و نصيحت كردم شما را که بپذيريد فرمان الهي را و شما نپذيرفتيد پس براي چه و چگونه محزون باشم از نزول بلا بر قومي که كافر هستند.
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| − | فَتَوَلّي عَنهُم اينکه در موقعي بوده که خبر داده از نزول بلاء و چون بايد پيغمبر با مؤمنين از ميان قوم بيرون روند که از بلاء نجات يابند موقعي که حضرت شعيب خواست خارج شود و از قوم بيرون رود بآنها فرمود قالَ يا قَومِ خطاب بكفار قوم لَقَد أَبلَغتُكُم رِسالاتِ رَبِّي من بوسيله رسالتم عمل كردم و آنچه بايد و شايد بشما از دستورات الهي رساندم بعلاوه وَ نَصَحتُ لَكُم شما را هم پند و اندرز دادم و آنچه صلاح شما بود گفتم نپذيرفتيد ديگر براي چه و چگونه که مفاد فكيف است آسي متكلم وحده است محزون و غصهدار باشم که شما گرفتار بلاء و هلاكت شويد يعني نبايد كسي محزون باشد عَلي قَومٍ كافِرِينَ از اينکه جمله و آيات بسياري در قرآن استفاده ميشود که مؤمن نبايد براي كفار که گرفتار هر گونه عذابي در دنيا و آخرت شوند دلسوزي كند و محزون باشد بلكه مخالف و معاند و غير مؤمن هر که هست و هر چه هست بايد لعن كرد و از خداوند طلب كرد شدت عذاب آنها را و از آنها بيزاري جست چنانچه خطاب بپيغمبر اكرم صلّي اللّه عليه و آله و سلّم
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| − | جلد 7 - صفحه 394
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| − | ميفرمايد وَ لا تَحزَن عَلَيهِم حجر آيه 88- بني اسرائيل آيه 128- نمل آيه 72 و اخبار در مورد لعن و طرد اعداء دين بسيار است حتي گفتيم که لعن آنها بدو درجه ثوابش از صلوات بالاتر است زيرا محبت با اهل ايمان بالاخص انبياء و اوصياء ويژه محمّد و آل محمّد صلّي اللّه عليه و آله و سلّم سه درجه دارد: اول فقط آنها را دوست دارد که مفاد صلوات است، دوم دوستداران آنها را هم دوست دارد دوست دوست باشد، سوم دشمنان آنها را دشمن دارد که مفاد لعن و طرد باشد.
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| − | برگزیده تفسیر نمونه=
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| − | ===برگزیده تفسیر نمونه===
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| − | {{نمایش فشرده تفسیر|
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| − | (آیه 93)- در این آیه آخرین گفتار شعیب را میخوانیم که: «او از قوم گنهکار
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| − | ج2، ص71
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| − | روی برگردانید و گفت: من رسالات پروردگارم را ابلاغ کردم، و به مقدار کافی نصیحت نمودم و از هیچ گونه خیرخواهی فروگذار نکردم» (فَتَوَلَّی عَنْهُمْ وَ قالَ یا قَوْمِ لَقَدْ أَبْلَغْتُکُمْ رِسالاتِ رَبِّی وَ نَصَحْتُ لَکُمْ).
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| − | «با این حال چگونه به حال این جمعیت کافر تأسف بخورم» (فَکَیْفَ آسی عَلی قَوْمٍ کافِرِینَ).
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| − | زیرا آخرین تلاش و کوشش برای هدایت آنها به عمل آمد ولی در برابر حق سر تسلیم فرود نیاوردند، و میبایست چنین سرنوشت شومی را داشته باشند.
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| − | سایر تفاسیر=
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| − | سایرتفاسیر این آیه را می توانید در سایت قرآن مشاهده کنید:
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| − | ==تفسیر های فارسی==
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| − | ==={{ترجمه تفسیر المیزان|سوره=7 |آیه=93}}===
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| − | ==={{تفسیر خسروی|سوره=7 |آیه=93}}===
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| − | ==={{تفسیر عاملی|سوره=7 |آیه=93}}===
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| − | ==={{تفسیر جامع|سوره=7 |آیه=93}}===
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| − | ==تفسیر های عربی==
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| − | ==={{تفسیر المیزان|سوره=7 |آیه=93}}===
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| − | ==={{تفسیر مجمع البیان|سوره=7 |آیه=93}}===
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| − | ==={{تفسیر نور الثقلین|سوره=7 |آیه=93}}===
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| − | ==={{تفسیر الصافی|سوره=7 |آیه=93}}===
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| − | ==={{تفسیر الکاشف|سوره=7 |آیه=93}}===
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| − | </tabber>
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| | ==پانویس== | | ==پانویس== |