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سطر ۴۱: |
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| | ==معانی کلمات آیه== | | ==معانی کلمات آیه== |
| − | «خَوْفاً وَ طَمَعاً»: در حال خوف و رجا. از ترس عقاب و امید به ثواب. هر دو واژه حال و به معنی: خَآئِفِینَ وَ طَامِعِین میباشند. «قَرِیبٌ»: مذکّر آمدنِ (قَریبٌ) به سبب کسب تذکیر مضاف یعنی (رَحْمَةَ) از مضافالیهیعنی (اللهِ) است. یا حمل فَعیل به معنی فاعِل بر فَعیل به معنی مَفْعُول است. (نگا: روحالمعانی، اعراف / ). | + | «خَوْفاً وَ طَمَعاً»: در حال خوف و رجا. از ترس عقاب و امید به ثواب. هر دو واژه حال و به معنی: خَآئِفِینَ وَ طَامِعِین میباشند. «قَرِیبٌ»: مذکّر آمدنِ (قَریبٌ) به سبب کسب تذکیر مضاف یعنی (رَحْمَةَ) از مضافالیهیعنی (اللهِ) است. یا حمل فَعیل به معنی فاعِل بر فَعیل به معنی مَفْعُول است. |
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| | == تفسیر آیه == | | == تفسیر آیه == |
| − | <tabber> | + | <tafsir sura="7" ayeh="56" /> |
| − | تفسیر نور=
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| − | ===تفسیر نور (محسن قرائتی)===
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| − | {{ نمایش فشرده تفسیر|
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| − | وَ لا تُفْسِدُوا فِي الْأَرْضِ بَعْدَ إِصْلاحِها وَ ادْعُوهُ خَوْفاً وَ طَمَعاً إِنَّ رَحْمَتَ اللَّهِ قَرِيبٌ مِنَ الْمُحْسِنِينَ «56»
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| − | پس از اصلاح زمين، در آن دست به فساد نزنيد و خداوند را با بيم و اميد بخوانيد، قطعاً رحمت خداوند به نيكوكاران نزديك است.
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| − | «1». كافى، ج 2، ص 481.
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| − | «2». تفسير قرطبى.
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| − | جلد 3 - صفحه 83
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| − | ===نکته ها===
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| − | آيهى قبل، رابطهى انسان با خدا را مطرح كرد، اين آيه رابطهى انسان با مردم را.
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| − | امام باقر عليه السلام فرمود: «خداوند به واسطهى پيامبر و قرآن، زمين را اصلاح كرد و فرمود: بعد از اصلاح فساد نكنيد». «1» آرى، آمدن هريك از انبيا، يك اصلاح بزرگ اجتماعى را بدنبال دارد و انحراف از آيين و دستورات آنان، عامل فساد و تباهى در جامعه است.
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| − | بين دو فرمان «ادْعُوا» در آيهى قبل و اين آيه، جملهى «لا تُفْسِدُوا فِي الْأَرْضِ» آمده تا اشاره كند كه دعاى زبانى بايد همراه با تلاش اصلاح طلبانهى اجتماعى باشد، نه با زبان دعا كردن و در عمل فساد نمودن.
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| − | اين آيه و آيهى قبل، شرايط كمال دعا و آداب آن و زمينههاى استجابت را مطرح كرده است، كه عبارتند از:
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| − | الف: دعا، همراه با تضرّع. «تَضَرُّعاً»
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| − | ب: دعا، پنهانى و دور از ريا. «تَضَرُّعاً وَ خُفْيَةً»
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| − | ج: دعا، بدون تجاوز از مرز حقّ. «إِنَّهُ لا يُحِبُّ الْمُعْتَدِينَ»
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| − | د: دعا، همراه بيم و اميد. «خَوْفاً وَ طَمَعاً»
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| − | ه: دعا، بدون تبهكارى. «لا تُفْسِدُوا»
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| − | و: دعا، همراه با نيكوكارى. «الْمُحْسِنِينَ»
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| − | لقمان حكيم به فرزندش فرمود: «فرزندم! اگر دل مؤمن را بشكافند در آن دو نور خواهند يافت؛ يكى نور ترس الهى و ديگرى نور اميد و رحمت كه هر دو با هم يكسانند». «2»
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| − | ===پیام ها===
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| − | 1- جامعهى اصلاح شده نيز در معرض خطر است. وَ لا تُفْسِدُوا ... بَعْدَ إِصْلاحِها
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| − | 2- انقلابيون اصلاحگر، بىنياز از دعا و مناجات نيستند. وَ ادْعُوهُ خَوْفاً ...
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| − | تفسير نور(10جلدى) ج3 83 ===پیام ها=== ..... ص : 83
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| − | آبادىهاى زمين را تخريب نكنيد. «وَ لا تُفْسِدُوا فِي الْأَرْضِ بَعْدَ إِصْلاحِها»
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| − | «1». كافى، ج 8، ص 58.
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| − | «2». تفسير اثنىعشرى.
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| − | جلد 3 - صفحه 84
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| − | 4- انسان بايد ميان خوف و رجا باشد. اين اعتدال را خداوند، «احسان» ناميده است. «قَرِيبٌ مِنَ الْمُحْسِنِينَ»
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| − | 5- سيره و روش نيكوكاران، دورى از فساد است. لا تُفْسِدُوا ... قَرِيبٌ مِنَ الْمُحْسِنِينَ
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| − | 6- احسان، زمينهساز دريافت رحمت الهى است و بدون آن، انتظار رحمت بىجاست. «قَرِيبٌ مِنَ الْمُحْسِنِينَ» آرى، دعاى مستجاب همراه بانيكوكارى است.
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| − | 7- دست نياز به جانب حقّ دراز كردن و دورى از فساد، احسان است. وَ لا تُفْسِدُوا ... وَ ادْعُوهُ ... قَرِيبٌ مِنَ الْمُحْسِنِينَ
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| − | اثنی عشری=
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| − | ===تفسیر اثنی عشری (حسینی شاه عبدالعظیمی)===
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| − | {{نمایش فشرده تفسیر|
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| − | وَ لا تُفْسِدُوا فِي الْأَرْضِ بَعْدَ إِصْلاحِها وَ ادْعُوهُ خَوْفاً وَ طَمَعاً إِنَّ رَحْمَتَ اللَّهِ قَرِيبٌ مِنَ الْمُحْسِنِينَ (56)
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| − | بعد از ترغيب به دعا، نهى فرمايد از فساد در زمين. وَ لا تُفْسِدُوا فِي الْأَرْضِ: و فساد و خرابى و تباهى مكنيد در زمين، بَعْدَ إِصْلاحِها: بعد از اصلاح و نيكى و آرامى اهل آن، چه افساد ضد اصلاح، و صلاح، حال نيك و پسنديده باشد.
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| − | تبصره: مفسرين را در اين آيه وجوهى است:
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| − | 1- عصيان و گناه مكنيد در زمين، زيرا به معاصى، فساد ارض شود به حبس باران و قحطى، و بعد آبادى و ارزانى و ويرانى و سختى حاصل آيد.
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| − | 2- بعد اسلام، اختراع بدعات و كفريات مكنيد، چه به احداث مذاهب مختلفه، اهل زمين كه اصلاحشان به دين اسلام و ايمان شده، مبدل به باطل و كفر مىگردانيد. و بدين معنى اشاره فرمود حضرت صادق عليه السّلام: انّ الارض كانت فاسدة فاصلحها اللّه بنبيّه. «1» در تفسير على بن ابراهيم قمى:
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| − | اصلاحها برسول اللّه و امير المؤمنين عليه السّلام فافسدوها حين تركوا امير المؤمنين عليه السّلام. «2»
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| − | «1» روضه كافى، صفحه 58، حديث 20 (روايت از امام باقر)
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| − | «2» تفسير نورالثقلين، جلد 2، صفحه 41، حديث 166- تفسير برهان، جلد 2، صفحه 23.
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| − | جلد 4 صفحه 93
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| − | 3- زمين را فاسد مسازيد به ظلم و ستم و تعدى، چه به عدل و انصاف اصلاح يافته است.
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| − | 4- قتل مؤمن، و اخذ مال مسلم به ناحق و تدليس و حيل مكنيد.
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| − | 5- اصلاح اهل زمين مبدل به افساد مكنيد به شرك و كفر و نفاق و فسق و دعوت به باطل، بعد از بعث رسل و انزال كتب و اتيان شرايع و احكام.
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| − | 6- مصالح دين و دنيا منحصر است بر پنج چيز: نفوس، و عقول، و اموال، و انساب، و اديان؛ و بيك كلمه جامعه لا تفسدوا نهى از افساد همه اينها فرموده، به افساد در نفوس به قتل و قطع اعضاء، و افساد اموال به غصب و سرقت و تدليس و خدعه، و افساد اديان به القاء شكوك به كفر و بدعت، و افساد انساب به خلط انساب به زنا و لواطه و قذف محصنين و محضات. و افساد عقول به شرب مسكرات مثل خمر و بنگ و چرس. خلاصه، ادخال ماهيات مفسدات در ماهيات صالحات و طاعات و عبادات و معاملات دينى و دنيائى مسازيد و عالم و آدم و اهل زمين را خراب مكنيد.
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| − | وَ ادْعُوهُ خَوْفاً وَ طَمَعاً: و بخوانيد خدا را به حالى كه ترسان و اميدوار باشيد.
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| − | مفسرين را در آيه وجوهى است: 1- بخوانيد حق تعالى را ترسناك از عدل او و اميدوار به فضل او. 2- ترسناك از نيران و اميدوار به جنان. 3- ترسناك از رد و اميدوار به اجابت. 4- ترسناك از عقاب و اميدوار به ثواب. 5- ترسناك از ريا و سمعه و اميدوار به قبول. و اولى حمل بر عموم است.
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| − | إِنَّ رَحْمَتَ اللَّهِ قَرِيبٌ مِنَ الْمُحْسِنِينَ: بتحقيق انعام و احسان الهى نزديك است به نيكوكاران در دنيا به اجابت دعوات مخلصه ايشان، و در عقبى به وصول ثواب آن، يا ثواب الهى نزديك است به فرمان برداران، مراد به مطيعين است.
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| − | تنبيه: آيه شريفه دال است بر اينكه بنده بايد در طاعت و عبادت بين خوف و رجا باشد. لقمان حكيم در وصاياى فرزند خود فرمايد: اى فرزند گرامى، از خدا بترس ترسيدنى كه اگر با نيكى جن و انس به قيامت بيائى، ترسى تو را عذاب نمايد. و اميدوار باش به خداوند اميدى كه اگر به محشر آئى به گناه جن و انس، اميد دارى تو را بيامرزد. پسر گفت: اى پدر، چگونه طاقت اين توانم كه خوف و
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| − | جلد 4 صفحه 94
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| − | رجا را با يكديگر جمع كنم، من بيش از يك دل ندارم. لقمان فرمود: اى فرزند، اگر دل مؤمن را بيرون آورند و بشكافند، هر آينه در آن دو نور خواهند يافت:
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| − | نورى از ترس الهى، و نورى به اميد رحمت سبحانى، كه اگر هر دو را مقايسه كنند بقدر ذرهاى زيادتى نكند.
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| − | روان جاوید=
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| − | ===تفسیر روان جاوید (ثقفى تهرانى)===
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| − | {{نمایش فشرده تفسیر|
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| − | وَ لا تُفْسِدُوا فِي الْأَرْضِ بَعْدَ إِصْلاحِها وَ ادْعُوهُ خَوْفاً وَ طَمَعاً إِنَّ رَحْمَتَ اللَّهِ قَرِيبٌ مِنَ الْمُحْسِنِينَ (56)
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| − | ترجمه
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| − | و فساد منمائيد در زمين بعد از اصلاح آن و بخوانيد او را با ترس و اميد همانا رحمت خدا نزديك است به نيكوكاران.
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| − | تفسير
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| − | خداوند مملكت خود را بوجود انبيا و اوليا و كتب سماويّه اصلاح فرموده و نبايد فاسد نمود آنرا و يكى از آداب دعا آنستكه شخص در آن موقع خائف باشد از ردّ براى قصور اعمال و عدم استحقاق خود و اميدوار باشد باجابت براى فضل و رحمت و احسان خداوند و ترجيح دهد جانب اميد و طمع را چون رحمت خداوند نزديك است بكسانيكه نيكو نمودند عمل خود را و دعا خصوص با خوف و رجاء يكى از بهترين اعمال صالحه است و باين جهت وعده اجابت فرموده نهايت آنكه اگر اعمال فاسده نداشته باشند نزديكتر باجابت است
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| − | جلد 2 صفحه 436
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| − | اطیب البیان=
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| − | ===اطیب البیان (سید عبدالحسین طیب)===
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| − | {{نمایش فشرده تفسیر|
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| − | وَ لا تُفسِدُوا فِي الأَرضِ بَعدَ إِصلاحِها وَ ادعُوهُ خَوفاً وَ طَمَعاً إِنَّ رَحمَتَ اللّهِ قَرِيبٌ مِنَ المُحسِنِينَ (56)
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| − | و افساد نكنيد در روي زمين بعد از آني که اصلاح شده است و خدا را بخوانيد در حالي که هم خوف داشته باشيد هم طمع محققا رحمت خداوند نزديك از احسان كنندگان است.
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| − | جلد 7 - صفحه 343
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| − | لا تُفسِدُوا فِي الأَرضِ افساد در زمين اقسام بسياري دارد: قسم اول- افساد در دين است تبليغات سوء که مسلمين را از جاده دين منحرف كنند و كفار را مانع شوند از ايمان آوردن و القاء شبهه در قلوب بندگان.
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| − | قسم دوم- جلوگيري از اطاعت و عبادت و اتيان بوظائف ديني و سوق بمعاصي و اشاعه فحشاء و القاء جلباب حياء قسم سوم- ظلم و ايذاء و قتل و غارت و ذهاب مال و عرض بندگان و نفوس آنها قسم چهارم- القاء نفاق و دوئيت و تفرقه و عداوت و بغضاء بين مؤمنين الي غير ذلک که تمام اينها فساد في الارض است.
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| − | بَعدَ إِصلاحِها که خداوند تبارك و تعالي ارسال رسل مخصوصا وجود مقدس نبيّ خاتم صلّي اللّه عليه و آله و سلّم فرمود و آنچه باعث سعادت دنيا و آخرت بشر بود بيان فرمود از عقائد حقّه و اخلاق حميده و اعمال صالحه و دوري از عقائد باطله و اخلاق رذيله و اعمال سيّئه و نيز القاء محبت، مودت، اخوت، الفت بين النّاس و جعل حقوق هر يك و جلوگيري از تعدي و تجاوز و ظلم و ايذاء که إِنَّ هذَا القُرآنَ يَهدِي لِلَّتِي هِيَ أَقوَمُ اسري آيه 9 وَ أَلَّفَ بَينَ قُلُوبِهِم لَو أَنفَقتَ ما فِي الأَرضِ جَمِيعاً ما أَلَّفتَ بَينَ قُلُوبِهِم وَ لكِنَّ اللّهَ أَلَّفَ بَينَهُم انفال آيه 65، خلاصه بعد از اينکه همه زحمات که پيغمبر و ائمه و علماء و مؤمنين و مجاهدين تحمل كردند که بساط صلح را در روي زمين بيندازند شما برنچينيد و زحمت آنها را از بين نبريد.
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| − | وَ ادعُوهُ خَوفاً وَ طَمَعاً بين خوف و رجاء باشيد هم بترسيد از نزول عذاب در دنيا و گرفتار جهنم در عقبي بواسطه كثرت معاصي و طغيان و هم اميدوار باشيد برحمت و مغفرت و خدا را بخوانيد بين خوف و رجاء که خداوند مغفرتش و عفوش شامل حال شما شود و اعمال زشت شما را از بين ببرد و رحمت و لطفش شما را سعادتمند نمايد.
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| − | جلد 7 - صفحه 344
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| − | إِنَّ رَحمَتَ اللّهِ قَرِيبٌ مِنَ المُحسِنِينَ هر عمل خيري چه عبادات واجبه يا مستحبه باشد احسان بنفس است يا احسان ببندگان خدا است و موجب قرب رحمت است چنانچه هر عمل زشتي ظلم بنفس يا ظلم ببندگان خدا است و موجب بعد از رحمت است لذا قصد قربت در عبادت لازم است.
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| − | برگزیده تفسیر نمونه=
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| − | ===برگزیده تفسیر نمونه===
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| − | {{نمایش فشرده تفسیر|
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| − | (آیه 56)- در این آیه اشاره به حکمی شده است که در واقع یکی از شرایط تأثیر دعا است، میفرماید: «در روی زمین فساد مکنید بعد از آن که اصلاح شده است» (وَ لا تُفْسِدُوا فِی الْأَرْضِ بَعْدَ إِصْلاحِها). بنابراین هیچ گاه دعای افراد مفسد و تبهکار به جایی نخواهد رسید.
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| − | در روایتی از امام باقر علیه السّلام میخوانیم: «زمین فاسد بود و خداوند به وسیله پیامبر اسلام آن را اصلاح کرد».
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| − | باز دیگر به مسأله دعا میپردازد و یکی دیگر از شرایط آن را بازگو میکند، میگوید: «و خدا را با ترس و امید بخوانید» (وَ ادْعُوهُ خَوْفاً وَ طَمَعاً).
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| − | ج2، ص56
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| − | نه آن چنان از اعمال خود راضی باشید که گمان کنید هیچ نقطه تاریکی در زندگی شما نیست که این خود عامل عقبگرد و سقوط است، و نه آن چنان مأیوس باشید که خود را شایسته عفو خدا و اجابت دعا ندانید، بلکه با دو بال «بیم» و «امید» به سوی او پرواز کنید، امید به رحمتش و بیم از مسؤولیتها و لغزشهای خود.
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| − | و در پایان آیه برای تأکید بیشتر روی اسباب امیدواری به رحمت خدا، میگوید: «رحمت خدا به نیکوکاران نزدیک است» (إِنَّ رَحْمَتَ اللَّهِ قَرِیبٌ مِنَ الْمُحْسِنِینَ).
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| − | در این دو آیه اشاره به پنج قسمت از شرایط قبولی دعا شده است: نخست این که از روی تضرع و در پنهانی باشد، دیگر این که از حدّ اعتدال تجاوز نکند، سوم این که با تولید فساد و تبهکاری همراه نگردد، چهارم این که توأم با بیم و امید متوازن باشد، پنجم این که با نیکوکاری توأم گردد.
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| − | سایر تفاسیر=
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| − | سایرتفاسیر این آیه را می توانید در سایت قرآن مشاهده کنید:
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| − | ==تفسیر های فارسی==
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| − | ==={{ترجمه تفسیر المیزان|سوره=7 |آیه=56}}===
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| − | ==={{تفسیر خسروی|سوره=7 |آیه=56}}===
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| − | ==={{تفسیر عاملی|سوره=7 |آیه=56}}===
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| − | ==={{تفسیر جامع|سوره=7 |آیه=56}}===
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| − |
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| − | ==تفسیر های عربی==
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| − | ==={{تفسیر المیزان|سوره=7 |آیه=56}}===
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| − | ==={{تفسیر مجمع البیان|سوره=7 |آیه=56}}===
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| − | ==={{تفسیر نور الثقلین|سوره=7 |آیه=56}}===
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| − | ==={{تفسیر الصافی|سوره=7 |آیه=56}}===
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| − | ==={{تفسیر الکاشف|سوره=7 |آیه=56}}===
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| − | </tabber>
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| | ==پانویس== | | ==پانویس== |