آیه 163 سوره انعام: تفاوت بین نسخهها
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محتویات
ترجمه های فارسی
که او را شریک نیست و به همین (اخلاص کامل) مرا فرمان دادهاند و من اول کسی هستم که تسلیم امر خدایم.
او را شریکی نیست، و به این [یگانه پرستی] مأمورم، و نخستین کسی هستم که [در این آیین] تسلیم [فرمان ها و احکام] اویم.
[كه] او را شريكى نيست، و بر اين [كار] دستور يافتهام، و من نخستين مسلمانم.
او را شريكى نيست. به من چنين امر شده است، و من از نخستين مسلمانانم.
همتایی برای او نیست؛ و به همین مأمور شدهام؛ و من نخستین مسلمانم!»
ترجمه های انگلیسی(English translations)
معانی کلمات آیه
«أوَّلُ الْمُسْلِمِینَ»: مراد نخستین مسلمان در میان امّت محمّدی، یا مخلصترین و مطیعترین کس در میان تمام اهل جهان از آغاز تا پایان آن است.
تفسیر آیه
تفسیر نور (محسن قرائتی)
قُلْ إِنَّ صَلاتِي وَ نُسُكِي وَ مَحْيايَ وَ مَماتِي لِلَّهِ رَبِّ الْعالَمِينَ «162»
بگو: همانا نماز من و عبادات من و زندگى من و مرگ من براى خداوند، پروردگار جهانيان است.
لا شَرِيكَ لَهُ وَ بِذلِكَ أُمِرْتُ وَ أَنَا أَوَّلُ الْمُسْلِمِينَ «163»
شريكى براى او نيست و به آن (روح تسليم و خلوص و عبوديّت) مأمور شدهام و من نخستين مسلمان و تسليم پرودرگارم.
نکته ها
روايت شده كه رسول اكرم صلى الله عليه و آله در آستانهى نماز اين آيات را مىخواند. «1»
مرگ، بر حيات احاطه دارد و حيات بر نُسُك، و نُسُك بر نماز. بنابراين، نماز، هستهى مركزى در درون عبادات است.
اسلام، به معناى تسليم بودن در برابر امر خداوند است و به همهى انبيا نسبت داده شده است. حضرت نوح عليه السلام خود را مسلمان دانسته است، «أُمِرْتُ أَنْ أَكُونَ مِنَ الْمُسْلِمِينَ» «2» حضرت ابراهيم عليه السلام از خداوند مىخواهد كه او و ذريّهاش را تسليم او قرار دهد. «وَ اجْعَلْنا مُسْلِمَيْنِ لَكَ وَ مِنْ ذُرِّيَّتِنا أُمَّةً مُسْلِمَةً لَكَ» «3»، حضرت يوسف عليه السلام نيز از خداوند مسلمان مردن را درخواست مىكند: «تَوَفَّنِي مُسْلِماً» «4» و پيامبر اسلام صلى الله عليه و آله نيز اوّلين مسلمان است،
«1». تفسير قرطبى.
«2». يونس، 72.
«3». بقره، 128.
«4». يوسف، 101.
جلد 2 - صفحه 596
«وَ أَنَا أَوَّلُ الْمُسْلِمِينَ» به اين معنا كه يا در زمان خودش، يا در رتبه و مقام تسليم، مقدّم بر همه است.
پیام ها
1- راه و روش و هدف خود را در برابر راههاى انحرافى، با صراحت و افتخار اعلام كنيم. «قُلْ»
2- با آنكه نماز، جزو عبادات است، ولى، جدا ذكر شده تا اهميّت آن را نشان دهد. «صَلاتِي وَ نُسُكِي»
3- انسانهاى مخلص، مسير تكوينى (مرگ و حيات) و مسير تشريعى خود (نماز و نُسُك) را فقط براى خداوند عالميان مىدانند. «إِنَّ صَلاتِي وَ نُسُكِي وَ مَحْيايَ وَ مَماتِي لِلَّهِ»
4- آنگونه كه در نماز قصد قربت مىكنيم، در هر نفس كشيدن و زنده بودن و مردن هم مىتوان قصد قربت كرد. مَحْيايَ وَ مَماتِي لِلَّهِ ...
5- مرگ و حيات مهم نيست، مهم آن است كه آنها براى خدا و در راه خدا باشد. «مَحْيايَ وَ مَماتِي لِلَّهِ»
6- آنچه براى خدا باشد، رشد مىكند. «لِلَّهِ رَبِّ الْعالَمِينَ»
7- مرگ و زندگى دست ما نيست، ولى جهت دادن به آن دست ماست. «لِلَّهِ»
8- اخلاص در كارها، فرمان الهى است. «بِذلِكَ أُمِرْتُ»
9- پيشواى جامعه، بايد در پيمودن راه و پياده كردن فرمان الهى، پيشگام باشد. «أَوَّلُ الْمُسْلِمِينَ»
تفسير نور(10جلدى)، ج2، ص: 597
پانویس
منابع
- تفسیر نور، محسن قرائتی، تهران:مركز فرهنگى درسهايى از قرآن، 1383 ش، چاپ يازدهم
- اطیب البیان فی تفسیر القرآن، سید عبدالحسین طیب، تهران:انتشارات اسلام، 1378 ش، چاپ دوم
- تفسیر اثنی عشری، حسین حسینی شاه عبدالعظیمی، تهران:انتشارات ميقات، 1363 ش، چاپ اول
- تفسیر روان جاوید، محمد ثقفی تهرانی، تهران:انتشارات برهان، 1398 ق، چاپ سوم
- برگزیده تفسیر نمونه، ناصر مکارم شیرازی و جمعي از فضلا، تنظیم احمد علی بابایی، تهران: دارالکتب اسلامیه، ۱۳۸۶ش
- تفسیر راهنما، علی اکبر هاشمی رفسنجانی، قم:بوستان كتاب(انتشارات دفتر تبليغات اسلامي حوزه علميه قم)، 1386 ش، چاپ پنجم




