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| سطر ۴۴: |
سطر ۴۴: |
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| | == تفسیر آیه == | | == تفسیر آیه == |
| − | <tabber> | + | <tafsir sura="6" ayeh="36" /> |
| − | تفسیر نور=
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| − | ===تفسیر نور (محسن قرائتی)===
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| − | {{ نمایش فشرده تفسیر|
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| − | إِنَّما يَسْتَجِيبُ الَّذِينَ يَسْمَعُونَ وَ الْمَوْتى يَبْعَثُهُمُ اللَّهُ ثُمَّ إِلَيْهِ يُرْجَعُونَ «36»
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| − | تنها كسانى (دعوت تو را) مىپذيرند كه گوش شنوا دارند و (كافران كه نمىگروند،) مردگانى هستند كه روز قيامت خداوند آنان را برمىانگيزد و سپس همه به سوى او بازگردانده مىشوند.
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| − | ===نکته ها===
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| − | قرآن، بارها با تعبير مرده و كر، از ناباوران ياد كرده است. در آيهى 80 سورهى نمل و 52 سورهى روم مىخوانيم: «فَإِنَّكَ لا تُسْمِعُ الْمَوْتى وَ لا تُسْمِعُ الصُّمَّ الدُّعاءَ إِذا وَلَّوْا مُدْبِرِينَ»
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| − | ===پیام ها===
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| − | 1- انسان در انتخاب راه، آزاد است. إِنَّما يَسْتَجِيبُ ...
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| − | 2- شنيدن و پذيرفتن حقّ، نشانهى حيات معنوى و زنده دلى است.
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| − | (آرى؛ كسىكه حيات معنوى ندارد و حقّ پذير نيست، مرده است. چون حيات به معناى خوردن و خوابيدن حيوانات هم دارند.) وَ الْمَوْتى ...
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| − | جلد 2 - صفحه 448
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| − | 3- دلهاى حقجو به عهدهى تو و كفّار به عهدهى من تا پس از رستاخيز به حسابشان برسيم. «وَ الْمَوْتى يَبْعَثُهُمُ اللَّهُ»
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| − | اثنی عشری=
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| − | ===تفسیر اثنی عشری (حسینی شاه عبدالعظیمی)===
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| − | {{نمایش فشرده تفسیر|
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| − | إِنَّما يَسْتَجِيبُ الَّذِينَ يَسْمَعُونَ وَ الْمَوْتى يَبْعَثُهُمُ اللَّهُ ثُمَّ إِلَيْهِ يُرْجَعُونَ (36)
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| − | إِنَّما يَسْتَجِيبُ الَّذِينَ يَسْمَعُونَ: اينست و جز اين نيست اجابت مىكند دعوت تو را آنكه مىشنود به سمع قبول و بر وجه فهم و تأمل استماع كند، يعنى جواب دعوت را آنكس دهد كه خود را بر شنيدن آن دارد و نظر و تأمل نمايد و به وعظ و زجر آن منتفع شود، نه اين جماعت مشركان كه مانند مردگانند در عدم استماع و انتفاع و عدم اجابت دعوت و عدم تأمل و تفكر در آيات وَ الْمَوْتى يَبْعَثُهُمُ اللَّهُ: و مردگان را مبعوث فرمايد خداى تعالى از قبر آنگاه بدانند دين حق را و ايمان آرند، لكن آن دانستن و ايمان فايده و نتيجه نخواهد داشت ثُمَّ إِلَيْهِ يُرْجَعُونَ: پس به سوى جز او مكافات او بازگردانيده شوند. حاصل آيه آنكه اجابت دعوت تو نمىكند مگر مؤمنى كه سامع حق باشد و بر وجه تعمق و تفكر در آن نظر نمايد، اما كافر به منزله ميّت است و اجابت دعوت تو نمىكند تا آنكه حق تعالى او را در قيامت مبعوث سازد و بسبب مشاهده عذاب، ملجأ شود به ايمان.
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| − | تذكره- دائر مدار حيات و ترقيات انسانى، قلب آگاه و گوش شنوا
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| − | «1» تفسير عياشى، جلد اوّل، صفحه 10، حديث 4.
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| − | تفسير اثنا عشرى، ج3، ص: 260
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| − | مىباشد؛ زيرا اگر بسبب غبار معاصى، قلب محجوب، و سامعه حقيقى معيوب گردد، مانند ميّت، اثرى بر او مترتب نخواهد شد اگرچه تمام آيات و مواعظ سبحانى بر او بخوانى؛ لكن بعكس، اگر قلب صافى، و سامعه وافى شد، به كلام، شخصى متنبه شود؛ چنانچه مسلمه از بزرگان و صاحب ثروت بود.
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| − | گويد: رفتم نزد عمر عبد العزيز بعد از نماز صبح، وقت طلوع آفتاب، كنيزكى براى او به عنوان ناشتا خرمائى آورد. قبضهاى (سر انگشت) برداشت به من داد.
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| − | گفت: سير مىشوى؟ ساكت شدم، دو مرتبه قبضهاى (مشت) برداشت داد گفت: اين را تناول و آبى بياشامى، كفايت كند تو را؟ گفتم: بلى. گفت:
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| − | كسى كه يك قبضه خرما و شربت آبى او را كافى باشد، انصاف نيست بدن خود را به زحمت مال و منال دنيا گروگان آتش كند. اين كلام چنان مؤثر شد كه بكلى ترك عقار و ضياع نمودم و زاهد شدم. فتامل ايّها العاقل.
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| − | روان جاوید=
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| − | ===تفسیر روان جاوید (ثقفى تهرانى)===
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| − | {{نمایش فشرده تفسیر|
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| − | إِنَّما يَسْتَجِيبُ الَّذِينَ يَسْمَعُونَ وَ الْمَوْتى يَبْعَثُهُمُ اللَّهُ ثُمَّ إِلَيْهِ يُرْجَعُونَ (36)
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| − | ترجمه
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| − | اجابت نمىكنند مگر آنانكه ميشنوند و مردگان برانگيزدشان خدا پس بسوى او بازگشت داده ميشوند.
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| − | تفسير
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| − | كسى نداى الهى را لبيك ميگويد و دعوت پيغمبر را اجابت مىكند كه گوش شنوا و قلب بينا داشته باشد و زنده باشد بروح علم و معرفت و آراسته باشد بكمال فكر و فهم و فراست ولى مردگان در اين ميدان كه فاقد اين اوصاف كمالند در دنيا دعوت الهى را اجابت نمىكنند و باختيار رو بحق نميروند تا وقتى كه باجبار آنها را در صفحه محشر حاضر نمايند و بمجازات كردارشان برسانند ولى افسوس كه در آنوقت ايمان فائده ندارد ..
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| − | اطیب البیان=
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| − | ===اطیب البیان (سید عبدالحسین طیب)===
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| − | {{نمایش فشرده تفسیر|
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| − | إِنَّما يَستَجِيبُ الَّذِينَ يَسمَعُونَ وَ المَوتي يَبعَثُهُمُ اللّهُ ثُمَّ إِلَيهِ يُرجَعُونَ (36)
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| − | منحصرا كساني اجابت ميكنند دعوت تو را که ميشنوند فرمايشات تو را (يعني بقلب آنها اثر ميكند) و مردهها را خداوند مبعوث ميفرمايد پس از بعثت بسوي خدا رجوع ميكنند.
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| − | اينکه آيه شريفه مشتمل بر سه جمله است: جمله اولي إِنَّما يَستَجِيبُ الَّذِينَ يَسمَعُونَ مكرر گفتهايم که سميع دو معني دارد يكي مقابل صمم که كري باشد و ديگر بمعني ترتيب اثر ميگويي فلاني حرفشنو است که در نماز ميگويي (سمع اللّه لمن حمده) يا در صفات الهي سميع الدعاء است و اينجا باين معني است که كساني که اجابت دعوت تو را ميكنند و ايمان ميآورند كساني هستند که معجزات را درك ميكنند و آيات شريفه قرآن در قلب آنها اثر ميگذارد مقابل كفار و مشركين که اعراض ميكنند و اينکه جمله براي تسليت خاطر رسول اكرم صلّي اللّه عليه و آله و سلّم است که محزون نباشد مؤمنين اجابت دعوت تو را ميكنند و همين اندازه براي تو كافيست چنانچه در جاي ديگر ميفرمايد يا أَيُّهَا النَّبِيُّ حَسبُكَ اللّهُ وَ مَنِ اتَّبَعَكَ مِنَ المُؤمِنِينَ انفال آيه 66، و اينکه جمله مربوط بآيه قبل است.
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| − | جمله دوم وَ المَوتي يَبعَثُهُمُ اللّهُ مفسرين توهم كردند که اينکه جمله هم مربوط بما سبق است و گفتند مراد از موتي كفار هستند که اعراض كردند در حكم موتي هستند و اينکه تفسير مناسب با كلمه يبعثهم اللّه نيست بلكه مناسب با اينکه معني بود
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| − | جلد 7 - صفحه 58
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| − | که بفرمايد و الموتي لا يسمعون و لا يستجيبون بلكه راجع بامر بعثت است و مراد از موتي جميع اموات است از مؤمن و كافر که فرداي قيامت مبعوث خواهند شد جمله سوم ثُمَّ إِلَيهِ يُرجَعُونَ که پس از بعثت در محكمه عدل الهي وارد ميشوند و هر که جزاي خود را ميبيند از ثواب و عقاب، بهشت و جهنم، خير و شرّ و اينکه هم يك نوع تسليت قلب مبارك رسالت است و خلاصه كلام اينكه خداوند اولا براي تسليت قلب رسول ميفرمايد اينها قابل هدايت نيستند و ثانيا خداوند تو را ياري ميكند و بر آنها چيره و غالب خواهي شد و آنها بكيفر خود ميرسند.
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| − | و ثالثا تو را كفايت ميكند كساني که ايمان آوردند و بايمان كفار نيازمند نيستي و رابعا بر فرض که در دنيا گرفتار نشدند و مردند مبعوث خواهند شد و در شكنجه و عذاب الهي دچار خواهند شد.
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| − | برگزیده تفسیر نمونه=
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| − | ===برگزیده تفسیر نمونه===
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| − | {{نمایش فشرده تفسیر|
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| − | }}
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| − | سایر تفاسیر=
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| − | سایرتفاسیر این آیه را می توانید در سایت قرآن مشاهده کنید:
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| − | ==تفسیر های فارسی==
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| − | ==={{ترجمه تفسیر المیزان|سوره=6 |آیه=36}}===
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| − | ==={{تفسیر خسروی|سوره=6 |آیه=36}}===
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| − | ==={{تفسیر عاملی|سوره=6 |آیه=36}}===
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| − | ==={{تفسیر جامع|سوره=6 |آیه=36}}===
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| − | ==تفسیر های عربی==
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| − | ==={{تفسیر المیزان|سوره=6 |آیه=36}}===
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| − | ==={{تفسیر مجمع البیان|سوره=6 |آیه=36}}===
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| − | ==={{تفسیر نور الثقلین|سوره=6 |آیه=36}}===
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| − | ==={{تفسیر الصافی|سوره=6 |آیه=36}}===
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| − | ==={{تفسیر الکاشف|سوره=6 |آیه=36}}===
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| − | </tabber>
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| | ==پانویس== | | ==پانویس== |