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| سطر ۴۱: |
سطر ۴۱: |
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| | ==معانی کلمات آیه== | | ==معانی کلمات آیه== |
| − | «تَعَالَوْا»: بیائید. «صُدُوداً»: پشتکردن. بازداشتن.
| + | تعالوا: تعال: بيا. تعالوا: بيائيد. هر دو اسم فعل مى باشند. |
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| | + | يصدون: صد و صدود گاهى به معنى اعراض و گاهى به معنى برگرداندن است ، مراد در اين آيه معناى اول است.<ref>تفسیر احسن الحدیث، سید علی اکبر قرشی</ref> |
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| | == تفسیر آیه == | | == تفسیر آیه == |
| − | <tabber> | + | <tafsir sura="4" ayeh="61" /> |
| − | تفسیر نور=
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| − | ===تفسیر نور (محسن قرائتی)===
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| − | {{ نمایش فشرده تفسیر|
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| − | وَ إِذا قِيلَ لَهُمْ تَعالَوْا إِلى ما أَنْزَلَ اللَّهُ وَ إِلَى الرَّسُولِ رَأَيْتَ الْمُنافِقِينَ يَصُدُّونَ عَنْكَ صُدُوداً «61»
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| − | و چون به آنان گفته شود (كه براى داورى) به سوى آنچه خداوند نازل كرده و به سوى پيامبر بياييد، منافقان را مىبينى كه به شدّت از پذيرش دعوت تو روى مىگردانند.
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| − | جلد 2 - صفحه 95
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| − | ===پیام ها===
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| − | 1- گرچه منافقان، تسليم قانون خدا و فرمان پيامبر نيستند، ولى ما بايد آنان را دعوت كنيم. «قِيلَ لَهُمْ تَعالَوْا»
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| − | 2- در پذيرش دعوت انبيا، رشد وبرترى است. ( «تَعالَوْا» دعوت به بالاآمدن است)
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| − | 3- كتاب و سنّت هماهنگ هستند، وگرنه ارجاع مردم به دو چيز متضاد حكيمانه نيست. «إِلى ما أَنْزَلَ اللَّهُ وَ إِلَى الرَّسُولِ»
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| − | 4- مراجعه به طاغوت و قضاوت خواهى از بيگانگان، خصلت و روحيّهى منافقان است كه با رهبر آسمانى مخالفت و از راه حقّ اعراض كنند. (كلمه «يَصُدُّونَ» نشانهى خصلت و استمرار است) | |
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| − | 5- منافق، علاوه بر اعراض خود، مانع ديگران نيز مىشود. «يَصُدُّونَ»
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| − | 6- آنچه پرده از كفر منافقان برمىدارد، مخالفتشان با رهبرى الهى است. «عَنْكَ»
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| − | 7- منافقان، حساسيّتى نسبت به ايمان قلبى مردم به خداوند ندارند، ناراحتى عمدهى آنان اجتماع مردم برگرد رهبر آسمانى است. «يَصُدُّونَ عَنْكَ صُدُوداً»
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| − | اثنی عشری=
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| − | ===تفسیر اثنی عشری (حسینی شاه عبدالعظیمی)===
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| − | {{نمایش فشرده تفسیر|
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| − | وَ إِذا قِيلَ لَهُمْ تَعالَوْا إِلى ما أَنْزَلَ اللَّهُ وَ إِلَى الرَّسُولِ رَأَيْتَ الْمُنافِقِينَ يَصُدُّونَ عَنْكَ صُدُوداً (61)
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| − | وَ إِذا قِيلَ لَهُمْ تَعالَوْا إِلى ما أَنْزَلَ اللَّهُ: و زمانى كه گويند منافقان را در وقت تحاكم، بيائيد به حكمى كه خداوند نازل فرموده در كتاب خود، وَ إِلَى الرَّسُولِ: و به حكمى كه پيغمبر او مىنمايد، رَأَيْتَ الْمُنافِقِينَ يَصُدُّونَ عَنْكَ صُدُوداً: مىبينى منافقان را در حالتى كه اعراض مىكنند از تو، اعراض كردنى از روى فرط عناد و عداوت؛ زيرا مىخواستند به ميل آنها حكم كنى و توبه حق حكم نمودى، از اين جهت اعراض كردند.
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| − | تبصره: چون آيات قرآنى عبرت به عموم لفظ است نه خصوص سبب، پس آيه شريفه عموميت دارد نسبت به كسانى كه حاليه وقتى به آنها گفته شود:
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| − | بيائيد به حكم خدا و رسول رفتار كنيد، اعراض نموده و گويند: اقتضاى زمان چنين است كه ما به قانون مجعوله رفتار كنيم. يا للعجب از اين قوم كه خود را مسلمان دانند، مگر نعوذ باللّه، خدا و پيغمبر مخبر نبودند كه قرون اخيره چه احكامى محتاج اليه است، تا وضع آن نموده مردم را بلا تكليف نگذارند. البته قرآن حكمش باقى و عموم مكلفين مأمورند به عمل به آن تا روز قيامت، پس بنا بر اين است. حسانات عقليه و آراء جديده غير مشروعه هر دورهاى از زمان، چه محلى از اعراب دارد.
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| − | در كافى شيخ كلينى و اكمال الدين صدوق رحمه اللّه در ذيل خبرى،
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| − | تفسير اثنا عشرى، ج2، ص: 487
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| − | حضرت رضا عليه السّلام به عبد العزيز فرمايد: اى عبد العزيز بن مسلم! جهالت كردند مردم و خدعه و حيله نمودند در آراء خود. بدرستى كه خداى عز و جل قبض روح پيغمبر خود ننمود تا كامل كرد دين او را و نازل فرمود به او قرآن را كه در آنست تفصيل هر چيزى؛ بيان فرموده در آن حلال و حرام و حدود احكام را و جميع آنچه را كه محتاجند مردم به آن كاملا. پس فرمود خداى عز و جل:
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| − | «فرو گذار نكرديم در قرآن چيزى را». «1» و نازل فرمود در حجة الوداع كه آخر عمر پيغمبر صلّى اللّه عليه و آله و سلّم بود، اين آيه را كه: الْيَوْمَ أَكْمَلْتُ لَكُمْ دِينَكُمْ.
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| − | يعنى: امروز دين شما را براى شما كامل كردم و نعمتم را بر شما تمام ساختم و راضى شدم كه اسلام دين شما باشد. «2» و امر امامت از تماميت دين است، و رحلت ننمود پيغمبر صلّى اللّه عليه و آله و سلّم تا اينكه بيان فرمود براى امتش، معالم دينشان را و واضح ساخت براى آنها راهشان را و واگذاشت ايشان را بر طريق حق، و اقامه نمود بر آنها على عليه السّلام را علم و امام، و ترك نكرد بيان چيزى را كه امت محتاجند. پس هر كه گمان كند كه خداى تعالى كامل نفرموده دينش را، به تحقيق رد كرده كتاب اللّه را، و هر كه رد كند كتاب الهى را، كافر است. «3»
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| − | روان جاوید=
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| − | ===تفسیر روان جاوید (ثقفى تهرانى)===
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| − | {{نمایش فشرده تفسیر|
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| − | وَ إِذا قِيلَ لَهُمْ تَعالَوْا إِلى ما أَنْزَلَ اللَّهُ وَ إِلَى الرَّسُولِ رَأَيْتَ الْمُنافِقِينَ يَصُدُّونَ عَنْكَ صُدُوداً (61)
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| − | ترجمه
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| − | و چون گفته شود مر ايشانرا بيائيد بسوى آنچه فرستاده است خدا و بسوى پيغمبر ميبينى منافقانرا كه باز ميدارند آنرا از تو بازداشتنى..
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| − | تفسير
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| − | قمى ره فرموده اين آيه در شأن اعداء آل محمد (ص) نازل شده است و صدّ بمعنى منع يا اعراض است كه منافقين از مراجعه مردم به پيغمبر (ص) و آل او مينمودند باتمام قواء و ميكوشيدند در محو آثار آنها.
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| − | اطیب البیان=
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| − | ===اطیب البیان (سید عبدالحسین طیب)===
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| − | {{نمایش فشرده تفسیر|
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| − | وَ إِذا قِيلَ لَهُم تَعالَوا إِلي ما أَنزَلَ اللّهُ وَ إِلَي الرَّسُولِ رَأَيتَ المُنافِقِينَ يَصُدُّونَ عَنكَ صُدُوداً (61)
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| − | و زماني که بآنها گفته شود که برويد و بشتابيد بآنچه خدا نازل فرموده در قرآن مجيد و بسوي رسول مبين قرآن ميبيني که منافقين اعراض ميكنند از تو و ديگران را منع ميكنند منع شديدي.
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| − | ما جامعه شيعه ميگوييم باين عامه عمياء بيائيد در حقانيت علي عليه السّلام و ابا بكر رجوع كنيم بقرآن مجيد و باخبار متواتره صادره از پيغمبر اكرم صلّي اللّه عليه و آله و سلّم بكلي اعراض ميكنند و عوام خود را هم منع شديد ميكنند مگر آيه ركوع و آيه مباهله و دو آيه يوم الغدير و بسياري از آيات ديگر و همچنين حديث منزلة و حديث ثقلين و حديث سفينة و حديث طير مشوي و حديث من كنت مولاه و احاديث ديگر
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| − | جلد 5 - صفحه 120
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| − | همه دلالت بر حقانيت علي عليه السّلام بلكه صراحت ندارد چرا رجوع نميكنيد و نميگذاريد عوام رجوع كنند نعوذ باللّه من النفاق و الضلالة و الكفر، چنانچه در تفسير علي إبن ابراهيم است فرمود
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| − | هم اعداء آل محمّد كلهم جرت فيهم هذه
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| − | الاية.
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| − | وَ إِذا قِيلَ لَهُم قائل خدا است چنانچه در آيه قبل فرمود فَإِن تَنازَعتُم فِي شَيءٍ فَرُدُّوهُ إِلَي اللّهِ وَ الرَّسُولِ و مرجع ضمير لهم منافقين هستند بقرينه جمله بعد (تعالوا) از كلمه علو بمعني بالا رفتن است ميگويي تعالي و ترقي و معلوم است هيچ مرتبهاي بالاتر از إِلي ما أَنزَلَ اللّهُ وَ إِلَي الرَّسُولِ نيست، اما قرآن بواسطه إِنَّ هذَا القُرآنَ يَهدِي لِلَّتِي هِيَ أَقوَمُ بني اسرائيل آيه 9، و اما الرسول فلقوله صلّي اللّه عليه و آله و سلّم
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| − | ما من شيئي يقربكم الي الجنة و يبعدكم عن النار الا و قد امرتكم به و ما من شيئي يبعدكم عن الجنة و يقربكم الي النار الا و قد نهيتكم عنه.
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| − | رَأَيتَ المُنافِقِينَ چون دزد داخلي هستند دائما كار شكني ميكنند.
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| − | يَصُدُّونَ عَنكَ صُدُوداً هم خود آنها از فيوضات ممنوع ميشوند و هم مانع از ايمان كفار ميشوند و هم مؤمنين را ميخواهند از دور پيغمبر صلّي اللّه عليه و آله و سلّم متفرق كنند چنانچه خدا از آنها خبر ميدهد هُمُ الَّذِينَ يَقُولُونَ لا تُنفِقُوا عَلي مَن عِندَ رَسُولِ اللّهِ صلي اللّه عليه و آله و سلّم حَتّي يَنفَضُّوا منافقين آيه 8.
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| − | برگزیده تفسیر نمونه=
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| − | ===برگزیده تفسیر نمونه===
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| − | {{نمایش فشرده تفسیر|
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| − | }}
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| − | سایر تفاسیر=
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| − | سایرتفاسیر این آیه را می توانید در سایت قرآن مشاهده کنید:
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| − | ==تفسیر های فارسی==
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| − | ==={{ترجمه تفسیر المیزان|سوره=4 |آیه=61}}===
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| − | ==={{تفسیر خسروی|سوره=4 |آیه=61}}===
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| − | ==={{تفسیر عاملی|سوره=4 |آیه=61}}===
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| − | ==={{تفسیر جامع|سوره=4 |آیه=61}}===
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| − | ==تفسیر های عربی==
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| − | ==={{تفسیر المیزان|سوره=4 |آیه=61}}===
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| − | ==={{تفسیر مجمع البیان|سوره=4 |آیه=61}}===
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| − | ==={{تفسیر نور الثقلین|سوره=4 |آیه=61}}===
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| − | ==={{تفسیر الصافی|سوره=4 |آیه=61}}===
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| − | ==={{تفسیر الکاشف|سوره=4 |آیه=61}}===
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| − | </tabber>
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| | ==پانویس== | | ==پانویس== |