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| سطر ۴۴: |
سطر ۴۴: |
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| | == تفسیر آیه == | | == تفسیر آیه == |
| − | <tabber> | + | <tafsir sura="3" ayeh="148" /> |
| − | تفسیر نور=
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| − | ===تفسیر نور (محسن قرائتی)===
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| − | {{ نمایش فشرده تفسیر|
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| − | «148» فَآتاهُمُ اللَّهُ ثَوابَ الدُّنْيا وَ حُسْنَ ثَوابِ الْآخِرَةِ وَ اللَّهُ يُحِبُّ الْمُحْسِنِينَ
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| − | پس خداوند پاداش دنيا و پاداش نيك آخرت را به آنان عطا كرد و خداوند نيكوكاران را دوست مىدارد.
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| − | ===نکته ها===
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| − | ممكن است مراد از پاداش دنيوىِ رزمندگان، ثابت قدمى و پيروزى و مراد از ثواب آخروى آنان، مغفرتِ گناهان باشد.
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| − | ===پیام ها===
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| − | 1- ميان پاداشهاى دنيوى و اخروى تفاوت فراوان است. «وَ حُسْنَ ثَوابِ الْآخِرَةِ» در بهرههاى دنيوى، تلخىهايى نيز وجود دارد، ولى ثواب آخرت، به تمامى نيكى وخير است.
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| − | 2- دعا، جهاد، صبر، استغفار، ايمان و توكّل به خداوند كه در آيات قبل آمده بود، از عوامل محبوبيّت نزد خداوند است. «وَ اللَّهُ يُحِبُّ الْمُحْسِنِينَ»
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| − | تفسير نور(10جلدى)، ج1، ص: 624
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| − | اثنی عشری=
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| − | ===تفسیر اثنی عشری (حسینی شاه عبدالعظیمی)===
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| − | {{نمایش فشرده تفسیر|
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| − | فَآتاهُمُ اللَّهُ ثَوابَ الدُّنْيا وَ حُسْنَ ثَوابِ الْآخِرَةِ وَ اللَّهُ يُحِبُّ الْمُحْسِنِينَ (148)
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| − | تفسير اثنا عشرى، ج2، ص: 270
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| − | چون اين جماعت به اخلاص تمام دعا نمودند، اجابت دعاى آنها را فرمايد:
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| − | فَآتاهُمُ اللَّهُ ثَوابَ الدُّنْيا: پس عطا فرمود ايشان را خداوند به بركت دعا و استغفار و صبر بر ابتلائات، جزاى دنيا را، يعنى نصرت بر دشمنان و يافتن غنايم. وَ حُسْنَ ثَوابِ الْآخِرَةِ: و نيكوئى ثواب آخرت را، يعنى مغفرت و نعيم جنت و وصول به روضات رضوان و رضاى خالق منان.
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| − | نكته: تخصيص ثواب آخرت را به حسن، اشعار است به مزيد ثواب بر قدر استحقاق. و اشاره به آنكه نزد حق تعالى ثواب آخرتى منظور است نه پاداش دنيائى.
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| − | وَ اللَّهُ يُحِبُّ الْمُحْسِنِينَ: و خدا دوست مىدارد نيكوكاران را، يعنى صابران بر تكاليف شرعيه از نماز و روزه و حج و جهاد و امر به معروف و نهى از منكر، يعنى لازمه دوستى كه احسان و انعام خاصه است، در باره نيكوكاران منظور مىفرمايد.
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| − | بيان: محسنين سه قسم هستند:
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| − | 1- كسانى كه احسان به خود نمايند، يعنى بدن خود را از گروگان آتش جهنم بيرون آرند به توحيد و پرهيز از شرك و فسق و فجور و ارتكاب محرمات الهى.
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| − | 2- آنانكه سعى نمايند به ارشاد و هدايت بندگان خدا، و اين مرتبه عظمى، و از شعب منصب علياى نبوّت مىباشد؛ و لذا حضرت رسول اكرم صلّى اللّه عليه و آله و سلّم به حضرت امير المؤمنين عليه السّلام فرمايد: يا علىّ لئن يهتدى بك احد خير لك من الدّنيا و ما فيها «1». يعنى: يا على، اگر هر آينه هدايت شود به سبب تو يك فردى، بهتر است از دنيا و آنچه در آنست.
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| − | 3- كسانى كه احسان به ديگران نمايند به عوارضات دنيا و اينهم گر چه
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| − | «1» المحجّة البيضاء جلد اوّل، صفحه 19 (بعضى از راويان، مخاطب رسول خدا صلّى اللّه عليه و آله را «معاذ» نقل كردهاند)
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| − | تفسير اثنا عشرى، ج2، ص: 271
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| − | مستوجب ثواب است، لكن بدان مرتبه نخواهد رسيد.
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| − | روان جاوید=
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| − | ===تفسیر روان جاوید (ثقفى تهرانى)===
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| − | {{نمایش فشرده تفسیر|
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| − | فَآتاهُمُ اللَّهُ ثَوابَ الدُّنْيا وَ حُسْنَ ثَوابِ الْآخِرَةِ وَ اللَّهُ يُحِبُّ الْمُحْسِنِينَ (148)
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| − | ترجمه
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| − | پس داد آنها را خدا جزاى دنيا و جزاى خوب آخرت و خدا دوست دارد نيكوكاران را..
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| − | تفسير
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| − | پس خداوند براى خضوع و استغفار و التجاء آنها بدرگاه ربوبيت بآنها در دنيا عطا فرمود عزت و غنيمت و نصرت و شهرت بخير را و در آخرت ايمنى از عذاب و فوز بنعيم ابدى و بهشت عدن را و اين جزا خوب است و اهميت دارد و جزاى دنيوى هر چه باشد در مقابل جزاى اخروى قدر و قيمتى ندارد چون ناقص و موقت
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| − | جلد 1 صفحه 511
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| − | است و خدا دوست دارد نيكوكارانرا در اقوال و افعالشان كه عزت اسلام و مسلمين را به ثبات قدم در جهاد حفظ كردند و بخود و برادران دينىشان نيكوئى نمودند.
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| − | اطیب البیان=
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| − | ===اطیب البیان (سید عبدالحسین طیب)===
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| − | {{نمایش فشرده تفسیر|
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| − | فَآتاهُمُ اللّهُ ثَوابَ الدُّنيا وَ حُسنَ ثَوابِ الآخِرَةِ وَ اللّهُ يُحِبُّ المُحسِنِينَ (148)
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| − | پس خداوند بآنها عنايت فرمود ثواب دنيا و نيكو ثواب در آخرت و خداوند دوست دارد احسان كنندهگان را.
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| − | جلد 4 - صفحه 385
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| − | در موضوع ثواب بسياري گفتند جزاي عمل خير است بنحو استحقاق و اينکه كلام صحيح نيست زيرا احدي حقي بر خداوند پيدا نميكند و لو تمام اعمال بشر بدرجه اعلا از او صادر شود از ايمان و اخلاق و عبادات زيرا تمام اينها بتوفيق حق است و خداوند منّت بر آنها گذارده که موفق شدند قُل لا تَمُنُّوا عَلَيَّ إِسلامَكُم بَلِ اللّهُ يَمُنُّ عَلَيكُم أَن هَداكُم لِلإِيمانِ إِن كُنتُم صادِقِينَ حجرات آيه 17.
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| − | بلي اعمال برّ قابليت ميآورد که تفضل الهي نسبت بآنها حسن پيدا كند و بيمورد نباشد و البته خداوند تفضل ميفرمايد و وعده، هم داده و تخلف نخواهد كرد چون خلف وعده قبيح است و از او سر نميزند.
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| − | و بعضي ديگر اضافه كردند قيد بنحو تعظيم و تجليل را و لذا منحصر دانستند بثواب آخرت و مثوبات دنيوي را گفتند اطلاق ثواب بر آنها مجاز و بعنايت است اينکه هم تمام نيست زيرا اصل استحقاق که ممنوع شد فرع و قيد آن بطريق اولي كلّ نعمك ابتداء.
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| − | پس معناي ثواب همان تفضلات و نعمي است که خداوند در دنيا و آخرت ببندگانش عنايت ميفرمايد، بلي در مفهوم ثواب اخذ شده که بازاء عمل خيري باشد لذا بفاء تفريع آورد و فرمود:
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| − | فَآتاهُمُ اللّهُ ثَوابَ الدُّنيا نعمتهاي الهي در دنيا بسيار است وَ إِن تَعُدُّوا نِعمَتَ اللّهِ لا تُحصُوها نحل آيه 18، و اكثر آنها در اثر اعمال صالحه است مثل طول عمر، سعه رزق، صحت بدن، توفيق هدايت و امثال اينها و دفع بليات و ساير نكبات و از جمله آنها عزّت و شرافت و عظمت و برتري كفار و معاندين است.
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| − | وَ حُسنَ ثَوابِ الآخِرَةِ مثوبات آخرت تماما حسن است و لكن ذي مراتب است، و مراد از حسن ثواب درجه اعلاي آنها است.
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| − | وَ اللّهُ يُحِبُّ المُحسِنِينَ احسان يا بنفس است که عبارت از ايمان و تكميل
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| − | جلد 4 - صفحه 386
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| − | اخلاق و اطاعت و بندهگي باتيان اعمال صالحه است، يا بغير است مثل دستگيري از فقراء و مستمندان و ايتام و ارامل و صله ارحام و ساير انفاقات مالي يا هدايت و ارشاد و قضاء حوائج مؤمنين بدست و زبان و قدم و امثال اينها يا ملاحظه احترامات و شئونات مؤمنين بالاخص علماء اعلام و غير اينها، يا خدمت بدين از اعلاي كلمه اسلام و ترويج شعائر مذهبي و تشييد اركان ديني که تمام اينها حسن است و فاعل آن محسن است و خداوند دوست ميدارد چنين بندهگاني را يعني معامله ميكند با آنها معامله دوست با دوست و الّا محبت و عداوت در خداوند راه ندارد زيرا محل حوادث نيست و تغيير از لوازم امكان است در ساحت واجب راه ندارد.
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| − | برگزیده تفسیر نمونه=
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| − | ===برگزیده تفسیر نمونه===
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| − | (آیه 148)- آنها با این طرز تفکر و عمل به زودی پاداش خود را از خدا میگرفتند «لذا خداوند هم پاداش این جهان که فتح و پیروزی بر دشمن بود و هم پاداش نیک آن جهان را به آنها داد» (فَآتاهُمُ اللَّهُ ثَوابَ الدُّنْیا وَ حُسْنَ ثَوابِ الْآخِرَةِ).
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| − | و در پایان آیه آنها را جزء نیکوکاران شمرده و میفرماید: «خدا نیکوکاران را دوست دارد» (وَ اللَّهُ یُحِبُّ الْمُحْسِنِینَ).
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| − | سایر تفاسیر=
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| − | سایرتفاسیر این آیه را می توانید در سایت قرآن مشاهده کنید:
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| − | ==تفسیر های فارسی==
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| − | ==={{ترجمه تفسیر المیزان|سوره=3 |آیه=148}}===
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| − | ==={{تفسیر خسروی|سوره=3 |آیه=148}}===
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| − | ==={{تفسیر عاملی|سوره=3 |آیه=148}}===
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| − | ==={{تفسیر جامع|سوره=3 |آیه=148}}===
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| − | ==تفسیر های عربی==
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| − | ==={{تفسیر المیزان|سوره=3 |آیه=148}}===
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| − | ==={{تفسیر مجمع البیان|سوره=3 |آیه=148}}===
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| − | ==={{تفسیر نور الثقلین|سوره=3 |آیه=148}}===
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| − | ==={{تفسیر الصافی|سوره=3 |آیه=148}}===
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| − | ==={{تفسیر الکاشف|سوره=3 |آیه=148}}===
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| − | </tabber>
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| | ==پانویس== | | ==پانویس== |