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| سطر ۴۳: |
سطر ۴۳: |
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| | == تفسیر آیه == | | == تفسیر آیه == |
| − | <tabber> | + | <tafsir sura="23" ayeh="73" /> |
| − | تفسیر نور=
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| − | ===تفسیر نور (محسن قرائتی)===
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| − | {{ نمایش فشرده تفسیر|
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| − | أَمْ تَسْأَلُهُمْ خَرْجاً فَخَراجُ رَبِّكَ خَيْرٌ وَ هُوَ خَيْرُ الرَّازِقِينَ «72»
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| − | آيا تو از آنها (در برابر دعوتت) مزدى خواستهاى؟ با اين كه پاداش دائمى پروردگارت بهتر، و او بهترين روزى دهندگان است.
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| − | وَ إِنَّكَ لَتَدْعُوهُمْ إِلى صِراطٍ مُسْتَقِيمٍ «73»
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| − | و قطعاً تو مردم را به راه راست دعوت مىكنى.
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| − | وَ إِنَّ الَّذِينَ لا يُؤْمِنُونَ بِالْآخِرَةِ عَنِ الصِّراطِ لَناكِبُونَ «74»
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| − | و همانا كسانى كه به آخرت ايمان نمىآورند، از راه راست منحرفند.
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| − | ===نکته ها===
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| − | «خرج» چيزى كه مصرف مىشود، ولى «خراج» بودجه مستمرى است كه تعيين مىشود.
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| − | «نكب» به معناى انحراف و «نكبت»، يعنى دنيا به او پشت كرده و بدبخت شده است. «1»
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| − | روزى الهى چون خير است، «فَخَراجُ رَبِّكَ خَيْرٌ» چند مزيّت دارد: بىمنّت، دائمى، زياد و
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| − | «1». التحقيق فىكلمات القرآن.
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| − | جلد 6 - صفحه 117
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| − | مبارك است.
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| − | در حديث مىخوانيم: كسانى كه به جاى اهل بيت پيامبر صلى الله عليه و آله سراغ ديگران بروند و رهبرى آنان را بپذيرند، از راه راست منحرفند. «1»
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| − | ===پیام ها===
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| − | 1- در تبليغ دين، نبايد از مردم پولى طلب كرد؛ اگر خود آنها دادند حساب جدايى دارد. «أَمْ تَسْأَلُهُمْ»
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| − | 2- مردم در برابر پول خواستن مبلّغ حسّاسيّت دارند. «أَمْ تَسْأَلُهُمْ خَرْجاً»
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| − | 3- مردم يك بار خرجى مىدهند، ولى خداوند هميشه روزى مىدهد. «خرج- خراج» (با توجّه به تفاوتى كه ميان «خرج» و «خراج» بيان شد)
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| − | 4- روزى دادن به صورت مستمر، از شئون پروردگار است. «فَخَراجُ رَبِّكَ»
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| − | 5- خداوند ضامن روزى مبلّغان دين است. «فَخَراجُ رَبِّكَ»
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| − | 6- واسطههاى رزق، شما را نفريبند. «وَ هُوَ خَيْرُ الرَّازِقِينَ»
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| − | 7- پيامبر، منادى راه درست است. «إِنَّكَ لَتَدْعُوهُمْ إِلى صِراطٍ مُسْتَقِيمٍ»
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| − | 8- ايمان به معاد، عامل پايدارى در راه راست و عدمايمان، عامل انحراف است. «لا يُؤْمِنُونَ- لَناكِبُونَ»
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| − | اثنی عشری=
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| − | ===تفسیر اثنی عشری (حسینی شاه عبدالعظیمی)===
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| − | {{نمایش فشرده تفسیر|
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| − | وَ إِنَّكَ لَتَدْعُوهُمْ إِلى صِراطٍ مُسْتَقِيمٍ (73)
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| − | جلد 9 - صفحه 160
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| − | وَ إِنَّكَ لَتَدْعُوهُمْ إِلى صِراطٍ مُسْتَقِيمٍ: و بدرستى كه تو اى پيغمبر مىخوانى ايشان را به راه راست از توحيد و اخلاص عبادت و عمل نمودن به احكام شريعت.
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| − | روان جاوید=
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| − | ===تفسیر روان جاوید (ثقفى تهرانى)===
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| − | {{نمایش فشرده تفسیر|
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| − | وَ لَوِ اتَّبَعَ الْحَقُّ أَهْواءَهُمْ لَفَسَدَتِ السَّماواتُ وَ الْأَرْضُ وَ مَنْ فِيهِنَّ بَلْ أَتَيْناهُمْ بِذِكْرِهِمْ فَهُمْ عَنْ ذِكْرِهِمْ مُعْرِضُونَ (71) أَمْ تَسْأَلُهُمْ خَرْجاً فَخَراجُ رَبِّكَ خَيْرٌ وَ هُوَ خَيْرُ الرَّازِقِينَ (72) وَ إِنَّكَ لَتَدْعُوهُمْ إِلى صِراطٍ مُسْتَقِيمٍ (73) وَ إِنَّ الَّذِينَ لا يُؤْمِنُونَ بِالْآخِرَةِ عَنِ الصِّراطِ لَناكِبُونَ (74) وَ لَوْ رَحِمْناهُمْ وَ كَشَفْنا ما بِهِمْ مِنْ ضُرٍّ لَلَجُّوا فِي طُغْيانِهِمْ يَعْمَهُونَ (75)
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| − | وَ لَقَدْ أَخَذْناهُمْ بِالْعَذابِ فَمَا اسْتَكانُوا لِرَبِّهِمْ وَ ما يَتَضَرَّعُونَ (76) حَتَّى إِذا فَتَحْنا عَلَيْهِمْ باباً ذا عَذابٍ شَدِيدٍ إِذا هُمْ فِيهِ مُبْلِسُونَ (77)
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| − | ترجمه
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| − | - و اگر پيروى ميكرد حق خواستههاى آنها را هر آينه تباه شده بود آسمانها و زمين و هر كه در آنها است بلكه داديم بآنها مايه ذكرشان را پس آنانند از ذكرشان روى گردانندگان
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| − | آيا درخواست ميكنى از آنها دستمزدى پس مزد پروردگار تو بهتر است و او است بهترين روزى دهندگان
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| − | و همانا تو هر آينه ميخوانى آنها را براه راست
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| − | و همانا آنانكه نميگروند بآخرت از راه هر آينه بيرون روندگانند
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| − | و اگر ترحّم كنيم بر آنها و رفع نمائيم آنچه را بآنها رسيده از سختى هر آينه لجاج كنند در زياده رويشان با آنكه حيران باشند
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| − | و بتحقيق گرفتيم آنها را بعذاب پس فروتنى ننمودند مر پروردگارشان را و زارى ننمودند
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| − | تا چون گشوديم بر آنها درى صاحب عذاب سخت آنگاه آنها در آن نااميدانند.
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| − | تفسير
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| − | - در آيه قبل اشاره شد بآنكه جهت اعراض كفار از پيغمبر و قرآن آنستكه دستورات الهى بر حق و طبق مصلحت تامّه عامّه است و آنها ميخواهند بهواى نفس خودشان عمل نمايند لذا قبول نميكنند و خداوند در اين آيه ميفرمايد كه اگر پيروى و متابعت كند حق كه خدا و پيغمبر صلّى اللّه عليه و آله و سلّم و اوصياء او عليهم السلامند
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| − | جلد 3 صفحه 648
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| − | از هواهاى نفسانى و خواستههاى شهوانى مردم فاسد و تباه شود دستگاه عالم از آسمانها و زمين و موجودات آنها زيرا كه آنها قائم بعدل و اراده حقّند نه قائم بخلق و اهويه آنها و قمّى ره نقل فرموده كه حق پيغمبر صلّى اللّه عليه و آله و سلّم و امير المؤمنين عليه السّلام است و فساد آسمانها وقتى است كه باران نيايد و فساد زمين وقتى است كه نرويد و فساد مردم در اين است بلى خداوند قرآن را براى آنها فرستاده كه موجب تذكّر و مايه تنبّه و بلندى نام آنها است و نيز مشتمل بر ذكر پيشينيانشان كه خودشان تقاضا نموده بودند ميباشد ولى آنها براى پيروى از هواى نفس از ذكر خودشان بهر سه معنى كه ذكر شد رو گردانند و بعزّت و شرف و نيك نامى خودشان لگد ميزنند اى پيغمبر آيا تو از آنها براى اداء رسالت دستمزدى تقاضا نمودى كه پرداخت آن موجب عدم ايمان آنها شده نه چنين است مزد الهى و رزق او در دنيا و آخرت بهتر است چون توسعه و دوام دارد و او بهترين روزى دهندگان است كه هر كس را بفراخور حال و بدون عوض و غرض روزى ميدهد و آن مزد او است و تو حاجت بمزد آنها ندارى و گفتهاند چون خراج غالبا در ماليات بر اراضى استعمال ميشود مشعر بتوسعه و دوام است لذا نسبت بخدا داده شده بخلاف خرج كه در مقابل دخل است و مبنى بر مضايقه و انقطاع ميباشد كه مناسب با عمل خلق است ولى بعضى در هر دو جا خرج و بعضى در هر دو خراج قرائت نمودهاند و تو آنها را براه راست و دين قويم اسلام دعوت مينمائى و قمّى ره نقل فرموده كه مراد دعوت بولايت امير المؤمنين عليه السّلام است ولى كسانى كه بآخرت ايمان نياوردهاند از راه راست و دين اسلام و ولايت امام عدول و تجاوز نمودهاند و بضلالت افتادهاند چون ترس از عذاب و شوق بثواب آخرت است كه موجب سلوك در طريق حق ميگردد و اگر ما آنها را مورد ترحّم قرار دهيم و كشف كربه و دفع ضرّ و سختى از آنها نمائيم و قحط و غلا را كه بآن مبتلا هستند رفع كنيم لجاجت ميكنند و امتداد ميدهند بطغيان و سركشى و زياده روى خودشان در انكار و استكبار و عداوت با پيغمبر و اولياء آنسرور و در آنحال باز سرگشته و حيران و متردّد و سرگردان باشند و براه هدايت و طريق سعادت واصل نگردند و ما قبلا آنها را معذب بعذاب گرسنگى و ترس و قتل نموديم چنانچه قمّى ره فرموده و آنها فروتنى و تذلّل و
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| − | جلد 3 صفحه 649
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| − | خضوع ننمودند در برابر خداوندشان و تضرّع و زارى و دعا نكردند تا وقتى در ديگرى از عذاب بر وى آنها گشوديم كه اشدّ از سابق بود و آن عذاب قحطى شديد طاقت فرسائى بود كه بنفرين پيغمبر صلّى اللّه عليه و آله و سلّم مبتلا بآن شدند و كثافات و نجاسات و اطفال خود را خوردند تا آنكه ابو سفيان در مدينه خدمت آنحضرت رسيد و عرضه داشت تو را بخدا و رحميّتى كه ميان ما و شما است قسم ميدهم مگر نگفتى من براى رحمت بر جهانيان مبعوث شدم پدرها را بشمشير كشتى پسرها را بگرسنگى از خدا بخواه كه اين بلا را از ما رفع كند و اين آيات نازل شد چنانچه در جوامع و غيره نقل شده آنگاه آنها در حال عذاب متحيّر و سرگردان و مأيوس از هر خير خواهند بود تا آنكه ثروتمندترين خودشان را بفرستند و خواهش عفو نمايند و بنابراين ضرّ و هر دو عذاب در دنيا بوده و بعضى آنها را اخروى دانستهاند و خلاف ظاهر است و از امام باقر عليه السّلام در مجمع نقل شده كه عذاب شديد اخير در رجعت است و معلوم است كه از لوازم استكانت و تضرّع خضوع و دعا و بلند نمودن دست است لذا در روايات استكانت بخضوع و دعا و تضرّع ببلند نمودن دست در آنحال و در نماز تفسير شده ..
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| − | اطیب البیان=
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| − | ===اطیب البیان (سید عبدالحسین طیب)===
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| − | {{نمایش فشرده تفسیر|
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| − | وَ إِنَّكَ لَتَدعُوهُم إِلي صِراطٍ مُستَقِيمٍ (73)
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| − | و محققا تو آنها را دعوت ميفرمايي براه راست. صراط مستقيم دين حق است که ميفرمايد:
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| − | (وَ أَنَّ هذا صِراطِي مُستَقِيماً فَاتَّبِعُوهُ وَ لا تَتَّبِعُوا السُّبُلَ فَتَفَرَّقَ بِكُم عَن سَبِيلِهِ) انعام آيه 154 سبل شيطاني که انسان را از سبيل الهي دور ميكند و به پرتگاه عظيمي مياندازد که نجات ندارد.
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| − | برگزیده تفسیر نمونه=
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| − | ===برگزیده تفسیر نمونه===
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| − | (آیه 73)- در این آیه به عنوان یک نتیجه گیری کلی از آنچه گذشت چنین میگوید: «بطور قطع و یقین تو آنها را به صراط مستقیم دعوت میکنی» (وَ إِنَّکَ لَتَدْعُوهُمْ إِلی صِراطٍ مُسْتَقِیمٍ).
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| − | گر چه در بعضی از روایات اسلامی «صراط مستقیم» به ولایت علی علیه السّلام
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| − | ج3، ص261
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| − | تفسیر شده ولی این گونه روایات بیان بعضی از مصداقهای روشن است، و هیچ منافات با وجود مصادیق دیگر مانند قرآن و ایمان به مبدء و معاد و تقوی و جهاد ندارد.
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| − | سایر تفاسیر=
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| − | سایرتفاسیر این آیه را می توانید در سایت قرآن مشاهده کنید:
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| − | ==تفسیر های فارسی==
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| − | ==={{ترجمه تفسیر المیزان|سوره=23 |آیه=73}}===
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| − | ==={{تفسیر خسروی|سوره=23 |آیه=73}}===
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| − | ==={{تفسیر عاملی|سوره=23 |آیه=73}}===
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| − | ==={{تفسیر جامع|سوره=23 |آیه=73}}===
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| − | ==تفسیر های عربی==
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| − | ==={{تفسیر المیزان|سوره=23 |آیه=73}}===
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| − | ==={{تفسیر مجمع البیان|سوره=23 |آیه=73}}===
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| − | ==={{تفسیر نور الثقلین|سوره=23 |آیه=73}}===
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| − | ==={{تفسیر الصافی|سوره=23 |آیه=73}}===
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| − | ==={{تفسیر الکاشف|سوره=23 |آیه=73}}===
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| − | </tabber>
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| | ==پانویس== | | ==پانویس== |