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| سطر ۴۴: |
سطر ۴۴: |
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| | == تفسیر آیه == | | == تفسیر آیه == |
| − | <tabber> | + | <tafsir sura="3" ayeh="105" /> |
| − | تفسیر نور=
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| − | ===تفسیر نور (محسن قرائتی)===
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| − | {{ نمایش فشرده تفسیر|
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| − | «105» وَ لا تَكُونُوا كَالَّذِينَ تَفَرَّقُوا وَ اخْتَلَفُوا مِنْ بَعْدِ ما جاءَهُمُ الْبَيِّناتُ وَ أُولئِكَ لَهُمْ عَذابٌ عَظِيمٌ
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| − | و مانند كسانى نباشيد كه بعد از آنكه دلايل روشن برايشان آمد، باز هم اختلاف كرده و پراكنده شدند و براى آنان عذابى بزرگ است.
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| − | ===پیام ها===
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| − | 1- از تاريخِ تلخِ اختلافات پيشينيان، درس بگيريم. «وَ لا تَكُونُوا كَالَّذِينَ ...»
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| − | 2- هميشه ريشهى اختلافات جهل نيست، هوسها نيز اختلاف برانگيز است.
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| − | «وَ اخْتَلَفُوا مِنْ بَعْدِ ما جاءَهُمُ الْبَيِّناتُ»
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| − | 3- اختلاف و تفرقه، نه تنها قدرت شما را در دنيا مىشكند، بلكه در قيامت نيز گرفتار عذاب جهنّم مىسازد. «لَهُمْ عَذابٌ عَظِيمٌ»
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| − | اثنی عشری=
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| − | ===تفسیر اثنی عشری (حسینی شاه عبدالعظیمی)===
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| − | {{نمایش فشرده تفسیر|
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| − | وَ لا تَكُونُوا كَالَّذِينَ تَفَرَّقُوا وَ اخْتَلَفُوا مِنْ بَعْدِ ما جاءَهُمُ الْبَيِّناتُ وَ أُولئِكَ لَهُمْ عَذابٌ عَظِيمٌ (105)
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| − | بعد از آن تحذير از تفرقه و اختلاف كلمه مىفرمايد:
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| − | وَ لا تَكُونُوا كَالَّذِينَ: و مباشيد اى امت مانند كسانى كه، تَفَرَّقُوا وَ اخْتَلَفُوا: متفرق شدند مانند يهود و نصارى و اختلاف كردند در دين، مِنْ بَعْدِ ما جاءَهُمُ الْبَيِّناتُ: بعد از آنكه آمد ايشان را حجتهاى روشن در كتب آنان كه موجب اتحاد و اتفاق باشد بر توحيد و نبوت و تصديق احوال آخرت. يا مراد، مبتدعين اين امتند، وَ أُولئِكَ لَهُمْ عَذابٌ عَظِيمٌ: اين جماعت مختلفين در اصول دين، يا مبتدعين، براى ايشان است عذابى بزرگ كه به وصف در نيايد.
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| − | تنبيه: آيه شريفه تهديد عظيمى است نسبت به متفرقين و مخترعين و مبتدعين در دين، و اشاره است به تفرقه يهود و نصارى. «زاذان» روايت نموده:
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| − | روزى خدمت حضرت امير المؤمنين عليه السّلام در مسجد رفتم، ديدم رأس الجالوت حبر يهود و جاثليق راهب نصارى را به عنف آوردند. حضرت به رأس الجالوت فرمود: واى بر تو، مىدانى يهود بعد از حضرت موسى چند فرقه شدند؟
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| − | جواب داد در كتاب نظر كنم. حضرت فرمود: لعنت بر تو، چه نوع رياست مىكنى، هرگاه مسئله حلال و حرام از تو پرسند، گوئى در كتاب نظر كنم.
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| − | اگر آن كتاب سوخته يا دزديده شود، چه خواهى كرد؟ پس به جاثليق فرمود:
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| − | نصارى چند فرقه شدند؟ گفت چهل و پنج فرقه. فرمود: دروغ مىگوئى، به خدا من تورات و انجيل را بهتر از شما مىدانم. امت موسى هفتاد و يك فرقه شدند، هفتاد فرقه آنها هالك و يك فرقه ناجى است؛ و امت عيسى هفتاد و دو فرقه، تمام هالك و يك ناجى، و امت حضرت پيغمبر صلّى اللّه عليه و آله و سلّم هفتاد و سه فرقه، تمام آنها هالك الا يك فرقه، و ايشان شيعيان من هستند كه خداوند در شأن آنها
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| − | تفسير اثنا عشرى، ج2، ص: 203
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| − | فرموده: و ممّن خلقنا امّة يهدون بالحقّ و به يعدلون. «1»
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| − | روان جاوید=
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| − | ===تفسیر روان جاوید (ثقفى تهرانى)===
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| − | {{نمایش فشرده تفسیر|
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| − | وَ لا تَكُونُوا كَالَّذِينَ تَفَرَّقُوا وَ اخْتَلَفُوا مِنْ بَعْدِ ما جاءَهُمُ الْبَيِّناتُ وَ أُولئِكَ لَهُمْ عَذابٌ عَظِيمٌ (105)
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| − | ترجمه
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| − | و نبوده باشيد مانند آنانكه متفرق شدند و اختلاف كردند پس از آنكه آمد ايشان را حجتها و آنگروه هر آينه براى آنها است عذابى بزرگ.
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| − | تفسير
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| − | و نبوده باشيد مانند يهود و نصارى كه اختلاف نمودند در توحيد و تنزيه ذات احديت از صفات خلق و در احوال آخرت بعد از آنكه رسيد بشما آيات بينات و ادله واضحه كاشفه از حق كه موجب اتفاق و مزيل اختلاف است اين آيه هم بنظر حقير تأييد تحقيق سابق را مينمايد كه ميخواهد بفرمايد دعوت باسلام با تفرق انجام نميشود بايد متفق شويد و از هواى نفس صرف نظر كنيد و از تعصب و عناد دست بكشيد و بكلمه جامعه متابعت امام عادل و مبلغ و داعى حقيقى اسلام را نمائيد كه يد اللّه مع الجماعة تا باين توفيق موفق و باين مقصود نائل شويد و در صورتى كه متفرق شويد و از اماميكه منصوب از طرف خداوند است اعراض نمائيد بعذاب عظيم گرفتار خواهيد شد.
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| − | اطیب البیان=
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| − | ===اطیب البیان (سید عبدالحسین طیب)===
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| − | {{نمایش فشرده تفسیر|
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| − | وَ لا تَكُونُوا كَالَّذِينَ تَفَرَّقُوا وَ اختَلَفُوا مِن بَعدِ ما جاءَهُمُ البَيِّناتُ وَ أُولئِكَ لَهُم عَذابٌ عَظِيمٌ (105)
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| − | و نباشيد مثل كساني که متفرق شدند و اختلاف (مخالفت يك ديگر) نمودند تا اينكه آمد آنها را ادلّه واضحه و آيات بيّنه و اينها كساني هستند که اختصاص داده شدند بعذاب عظيمي.
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| − | بعض مفسرين گفتند تفرقه و اختلاف بيك معني است و تكرارش تأكيد است و بعضي گفتند تفرقه در عداوت است و اختلاف در دين است.
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| − | و تحقيق كلام اينست که تفرقه بمعني جدايي است مقابل وصل که اتصال بيك ديگر است و اجتماع با هم که بشر بالذات احتياج بيكديگر دارند چه در امور دنيوي و نظام عالم و لذا گفتند (الانسان مدني بالطبع) بخلاف حيوانات که زندگي آنها انفراديست فقط در جماع و حفظ بچهها يك احتياج موقت محدودي دارند.
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| − | و چه در امور دين و مسلك که احتياج بتعليم و تعلّم و تربيت و ارشاد و هدايت دارند و بامر بمعروف و نهي از منكر چون شهوت و غضب و حبّ مال و منال در كمون بسياري رسوخ دارد و اگر خود سر باشند و بجان يكديگر بيفتند نظام دنيا و دين برهم ميخورد و فساد سر تا سر دنيا را پر ميكند.
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| − | و اختلاف اختلاف در رأي و سليقه و دين و مسلك که باعث عداوت و قتل و غارت و بالاخره منجر باضمحلال و فناء ميشود و همين تفرقه و اختلاف منشأ ضعف كفار شد در صدر اسلام چنانچه ميفرمايد تَحسَبُهُم جَمِيعاً وَ قُلُوبُهُم شَتّي حشر آيه 14، و نيز ميفرمايد فَأَغرَينا بَينَهُمُ العَداوَةَ وَ البَغضاءَ إِلي يَومِ القِيامَةِ مائده آيه 14، و همين منشأ ضعف مسلمين شد از اختلاف بين مسلمين در امر خلافت و منجرّ باختلاف بني اميّه و بني عباس و رفته رفته بين شيعه و سني و تفرقه بين ممالك
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| − | جلد 4 - صفحه 309
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| − | اسلامي الي زماننا هذا و لذا ميفرمايد:
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| − | وَ لا تَكُونُوا اي جماعت مسلمين كَالَّذِينَ تَفَرَّقُوا از مشركين و يهود و نصاري و اختلفوا در امر پيغمبر اسلام صلّي اللّه عليه و آله و سلّم و دين حقه اسلامي.
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| − | مِن بَعدِ ما جاءَهُمُ البَيِّناتُ از ادله روشن اسلام و معجزات باهرات و جامعيت صفات انبياء در وجود مبارك محمّد صلّي اللّه عليه و آله و سلّم از روي عناد و عصبيت و هوي و هوس و حبّ جاه و مال.
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| − | وَ أُولئِكَ لَهُم عَذابٌ عَظِيمٌ تهديد مسلمين است که اگر شما هم تفرقه و اختلاف در ميانتان حكم فرما شد همان عذاب عظيم در دنيا و آخرت بشما متوجه خواهد شد.
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| − | برگزیده تفسیر نمونه=
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| − | ===برگزیده تفسیر نمونه===
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| − | {{نمایش فشرده تفسیر|
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| − | (آیه 105)- در این آیه مجددا پیرامون مسأله اتحاد و پرهیز از تفرقه و نفاق بحث میکند، میفرماید: «و مانند کسانی نباشید که پراکنده شدند و اختلاف کردند» (وَ لا تَکُونُوا کَالَّذِینَ تَفَرَّقُوا وَ اخْتَلَفُوا).
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| − | اصرار قرآن در این آیات در باره اجتناب از تفرقه و نفاق، اشاره به این است که این حادثه در آینده در اجتماع آنها وقوع خواهد یافت زیرا هر کجا قرآن در ترساندن از چیزی زیاد اصرار نموده اشاره به وقوع و پیدایش آن میباشد.
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| − | لذا در پایان آیه میفرماید: «کسانی که با بودن ادله روشن در دین چنان اختلاف کنند به عذاب عظیم و دردناکی گرفتار میگردند» (مِنْ بَعْدِ ما جاءَهُمُ الْبَیِّناتُ وَ أُولئِکَ لَهُمْ عَذابٌ عَظِیمٌ).
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| − | جامعهای که اساس قدرت و ارکان همبستگیهای آنان با تیشههای تفرقه در هم کوبیده شود، سرزمین آنان برای همیشه جولانگاه بیگانگان و قلمرو حکومت استعمارگران خواهد بود، راستی چه عذاب بزرگی است!
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| − | سایر تفاسیر=
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| − | سایرتفاسیر این آیه را می توانید در سایت قرآن مشاهده کنید:
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| − | ==تفسیر های فارسی==
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| − | ==={{ترجمه تفسیر المیزان|سوره=3 |آیه=105}}===
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| − | ==={{تفسیر خسروی|سوره=3 |آیه=105}}===
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| − | ==={{تفسیر عاملی|سوره=3 |آیه=105}}===
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| − | ==={{تفسیر جامع|سوره=3 |آیه=105}}===
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| − | ==تفسیر های عربی==
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| − | ==={{تفسیر المیزان|سوره=3 |آیه=105}}===
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| − | ==={{تفسیر مجمع البیان|سوره=3 |آیه=105}}===
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| − | ==={{تفسیر نور الثقلین|سوره=3 |آیه=105}}===
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| − | ==={{تفسیر الصافی|سوره=3 |آیه=105}}===
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| − | ==={{تفسیر الکاشف|سوره=3 |آیه=105}}===
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| − | </tabber>
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| | ==پانویس== | | ==پانویس== |