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| سطر ۴۴: |
سطر ۴۴: |
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| | == تفسیر آیه == | | == تفسیر آیه == |
| − | <tabber> | + | <tafsir sura="3" ayeh="80" /> |
| − | تفسیر نور=
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| − | ===تفسیر نور (محسن قرائتی)===
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| − | {{ نمایش فشرده تفسیر|
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| − | «80» وَ لا يَأْمُرَكُمْ أَنْ تَتَّخِذُوا الْمَلائِكَةَ وَ النَّبِيِّينَ أَرْباباً أَ يَأْمُرُكُمْ بِالْكُفْرِ بَعْدَ إِذْ أَنْتُمْ مُسْلِمُونَ
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| − | و (خداوند) به شما فرمان نمىدهد كه فرشتگان وانبيا را ارباب خود قرار دهيد، آيا ممكن است، پس از آنكه تسليم خدا شديد، او شما را به كفر فرمان دهد؟
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| − | ===پیام ها===
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| − | 1- هرگونه دعوت به شرك از سوى هر كس كه باشد، ممنوع است. «وَ لا يَأْمُرَكُمْ أَنْ تَتَّخِذُوا ...»
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| − | 2- كفر، تنها انكار خدا نيست؛ بلكه پذيرش هرگونه ربّ و مستقل دانستن هر مخلوقى، كفر است. «تَتَّخِذُوا الْمَلائِكَةَ وَ النَّبِيِّينَ أَرْباباً أَ يَأْمُرُكُمْ بِالْكُفْرِ»
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| − | «1». تفسير فىظلالالقرآن.
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| − | «2». تفسير صافى.
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| − | تفسير نور(10جلدى)، ج1، ص: 550
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| − | اثنی عشری=
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| − | ===تفسیر اثنی عشری (حسینی شاه عبدالعظیمی)===
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| − | {{نمایش فشرده تفسیر|
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| − | وَ لا يَأْمُرَكُمْ أَنْ تَتَّخِذُوا الْمَلائِكَةَ وَ النَّبِيِّينَ أَرْباباً أَ يَأْمُرُكُمْ بِالْكُفْرِ بَعْدَ إِذْ أَنْتُمْ مُسْلِمُونَ (80)
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| − | «1» مجمع البيان، جلد اوّل، صفحه 466- نهاية، ابن اثير، ذيل لغت «ربب»
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| − | «2» مجمع البيان، جلد اوّل، صفحه 466
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| − | «3» اصول كافى، جلد اوّل، كتاب فضل العلم، صفحه 39، حديث 3
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| − | تفسير اثنا عشرى، ج2، ص: 158
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| − | وَ لا يَأْمُرَكُمْ: (عطف بر: ثُمَّ يَقُولَ لِلنَّاسِ) يعنى سزاوار نباشد احدى از انبياء را كه مقام نبوت و كتاب آسمانى حق تعالى به ايشان عطا فرموده، كه مردمان را امر به عبادت خود نمايد و امر نمايد شما را، أَنْ تَتَّخِذُوا الْمَلائِكَةَ وَ النَّبِيِّينَ:
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| − | اينكه فرا بگيريد ملائكه و پيغمبران را، أَرْباباً: خدايان و پروردگاران.
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| − | تخصيص ذكر ملائكه و انبياء به جهت آنست كه بعضى مشركان ملائكه را مىپرستيدند، و يهود و نصارى حضرت عزير و عيسى را معبود قرار دادند؛ حق تعالى رد قول ايشان نمود بر طريق انكار مىفرمايد: أَ يَأْمُرُكُمْ بِالْكُفْرِ: آيا آن پيغمبر امر نمايد شما را به كفر و شرك، بَعْدَ إِذْ أَنْتُمْ مُسْلِمُونَ: بعد از آنكه شما مسلمان شويد و تسليم كنيد امر اسلام را، يعنى هرگز امر ننمايد پيغمبر مبعوث از جانب حق تعالى، بندگان را به كفر و ارتداد. يا در زمان انبياء ايمان آورديد به گفته ايشان، آيا نبى بعد از تكليف شما به ايمان، امر به كفر مىكند و حال آنكه شما مؤمن و مقر بوديد به توحيد حق تعالى و نبوت انبياء؟
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| − | تنبيه: دو مطلب در تحت آيه شريفه عنوان شود:
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| − | مطلب اول: مقام عبادت و پرستش، خاصه ذات يگانه الهى است، چنانچه احدى را شخص شريك قرار دهد حتى انبياء و اولياء و ملائكه را، هر آينه مشرك و كافر خواهد بود و احاديث بسيار در اين قسمت وارد شده:
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| − | 1- در عيون اخبار الرضا عليه السّلام و برغانى در ذيل حديثى فرمايد: فمن ادّعا للانبياء ربوبيّة او ادّعى للائمّة ربوبيّة او نبوّة او لغير الائمّة الامامة، فنحن منه براء فى الدّنيا و الاخرة. «1» از حضرت رضا عليه السّلام مروى است: هر كه ادعا نمايد براى پيغمبران ربوبيت را، يا ادعا نمايد براى ائمه ربوبيت يا نبوت را، يا براى غير ائمه امامت را، پس ما از او بيزار هستيم در دنيا و آخرت.
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| − | 2- رجال كشى و تفسير برغانى- از حضرت صادق عليه السّلام مروى
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| − | «1» بحار الانوار، جلد 25، باب- 10، صفحه 272، ذيل حديث 18 (به نقل از عيون الاخبار)
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| − | تفسير اثنا عشرى، ج2، ص: 159
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| − | است كه به ابو بصير فرمايد: يا ابا محمّد ابرء ممّن زعم انّا ارباب قلت برء اللّه منه.
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| − | قال ابرء ممّن زعم انّا انبياء قلت برء اللّه منه. «1» اى ابا محمد، من برى هستم از كسى كه گمان نمايد ما ائمه را ارباب. گفتم: خدا از او بيزار است. پس حضرت فرمود: من برى هستم از كسى كه ما را انبياء بداند. من عرض كردم:
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| − | خدا از او برى است.
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| − | 3- احتجاج طبرسى و تفسير برغانى- از حضرت رضا عليه السّلام مروى است كه: قال امير المؤمنين عليه السّلام لا تتجاوزوا بنا العبوديّة، ثمّ قولوا فينا ما شئتم و لن تبلغوا، و ايّاكم و الغلوّ كغلوّ النّصارى فانّى برىء من الغالين. «2» فرمود حضرت امير المومنين عليه السّلام: تجاوز نكنيد نسبت به ما از عبوديت، پس گوئيد در حق ما هر چه خواهيد و هرگز به كنه معرفت ما نرسيد، و مبالغه نكنيد تا به حد غلو رسيد، و بپرهيزيد از غلو مانند غلو نصارى، پس بدرستى كه من بيزار هستم از غلو كنندگان.
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| − | و مقام انبياء و برگزيدگان الهى، منزه است از آنكه امت را دعوت بپرستش خود نمايند.
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| − | مطلب دوم: حفظ احترامات مقدسين و مقربين درگاه رب العالمين به تعظيم و تكريم و زيارت قبور آنان، عبادت نخواهد بود تا شرك لازم آيد، زيرا:
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| − | اولا: اين قسمت اطاعت است نه عبادت، زيرا شيعيان به جهت امتثال امر الهى آن را بجا آورند، نه به رأى خود چنانكه كيش بت پرستان است.
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| − | ثانيا: استعانت بر دو وجه باشد: يكى به وسائلى كه خداى تعالى مقرر فرموده براى رسيدن به مقصود، مانند استشفاع به سوى خدا در دعا و توسل به انبياء و اولياى معصومين در حوائج و مطالب، چنانچه فرمايد: يا أَيُّهَا الَّذِينَ آمَنُوا اتَّقُوا اللَّهَ وَ ابْتَغُوا إِلَيْهِ الْوَسِيلَةَ. «3» و در اين قسمت منعى وارد نيست، بلكه «امرهم»
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| − | «1» مدرك پيشين، صفحه 297، حديث 60 (به نقل از رجال كشّى)
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| − | «2» احتجاج طبرسى، جزء دوّم، كلام الامام الرضا عليه السّلام فى ذمّ الغلاة، صفحه 233
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| − | «3» سوره مائده، آيه 35
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| − | تفسير اثنا عشرى، ج2، ص: 160
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| − | مىباشد، زيرا آيه شريفه نيز دلالت دارد بر آن. وجه دوم- استعانت به ذات الهى جلّ جلاله به الهيّت و قدرت ذاتيه مطلقه سبحانى، و اين خاصه و منحصر است بر خداى تعالى، زيرا استعانت بدين طريق، اگر به غير ذات سبحانى باشد، هر آينه شرك لازم آيد. بنابراين توسّل به آستان قدس آل عصمت و زيارت قبور ايشان، از قسم اول باشد نه دوم، و البته ممدوح و مستحسن است.
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| − | روان جاوید=
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| − | ===تفسیر روان جاوید (ثقفى تهرانى)===
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| − | {{نمایش فشرده تفسیر|
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| − | وَ لا يَأْمُرَكُمْ أَنْ تَتَّخِذُوا الْمَلائِكَةَ وَ النَّبِيِّينَ أَرْباباً أَ يَأْمُرُكُمْ بِالْكُفْرِ بَعْدَ إِذْ أَنْتُمْ مُسْلِمُونَ (80)
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| − | ترجمه
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| − | و نه آنكه امر كند شما را كه بگيريد ملائكه و پيغمبران را خدايان آيا امر ميكند شما را بكفر بعد از آنكه شما مسلمانانيد.
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| − | تفسير
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| − | قمى فرموده بعضى عبادت ملائكه را مىنمودند و دسته از نصارى گمان مىكردند عيسى خدا است و يهود گفتند عزير پسر خدا است لذا اين آيه نازل شد و يأمركم برفع نيز قرائت شده است و بنابر اين آيه مستانف است و بنابر قرائت نصب عطف است بر آيه سابقه يعنى و نبوده است از براى بشرى آنكه امر كند باتخاذ ملائكه و پيغمبران را خدايان و بنابر اين ضمير مستتر در يأمر راجع به پيغمبر است و بقرائت رفع محتمل است راجع بخدا باشد و محتمل است راجع به پيغمبر و اللّه اعلم.
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| − | اطیب البیان=
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| − | ===اطیب البیان (سید عبدالحسین طیب)===
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| − | {{نمایش فشرده تفسیر|
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| − | وَ لا يَأمُرَكُم أَن تَتَّخِذُوا المَلائِكَةَ وَ النَّبِيِّينَ أَرباباً أَ يَأمُرُكُم بِالكُفرِ بَعدَ إِذ أَنتُم مُسلِمُونَ (80)
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| − | و امر نميكند شما را که ملائكه و انبياء را پروردگار خود بگيريد آيا امر ميكند شما را بكفر بعد از آني که شما مسلمان بوديد.
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| − | اينکه آيه شريفه كمال دلالت و ظهور دارد بر اينكه آيه سابقه تعريض بر نصاري است که روح القدس و عيسي را بربوبيت گرفتند و قائل باقانيم ثلاثه شدند.
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| − | وَ لا يَأمُرَكُم الايه فرق بين مفاد اينکه آيه شريفه با آيه سابقه اينست که آيه سابقه در مقام شرك عبادتيست که انبياء دعوت بشرك در عبادت نميكنند بلكه اولين كلمه
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| − | جلد 4 - صفحه 265
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| − | انبياء دعوت بتوحيد در عبادت است که مفاد كلمه طيبه لا اله الّا اللّه است بدلالت مطابقي و در قرآن مجيد نقل از انبياء در اولين كلمه آنها اينست که لا تعبدوا الا اللّه در مورد نوح، هود، صالح، ابراهيم، شعيب، موسي و غير اينها، و منقول از نبيّ اكرم صلّي اللّه عليه و آله و سلّم است که ميفرمود
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| − | قولوا لا اله الا اللّه تفلحوا.
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| − | و مفاد اينکه آيه شرك افعاليست که خالق و رازق، محيي و مميت، معزّ و مذلّ، معطي و منعم، مغني و مفقر و غير اينها از افعال الهيه فاعل ذات اقدس حقّ است و بس که مفاد كلمه ربّ است و او است ربّ العالمين، ردّ بر حكماء که گفتند فقط خدا يك فعل از او بيشتر صادر نشده خلقت عقل اول بدليل (الواحد لا يصدر منه الّا الواحد و لا يصدر الواحد الّا من الواحد).
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| − | و سابقا جواب آنها را گفتيم که اينکه دو قاعده در باب علة نامه موجبه تمام است نه در فاعل مختار و قادر متعال و حكيم علي الاطلاق که تمام افعالش از روي حكمت و مصلحت است و بتعدد حكم و مصالح افعال متعدد ميشود و بمحل قابل افاضه ميشود. و همچنين ردّ كساني که مؤثر در عالم وجود را شمس و قمر و كواكب و كرات جوّيه ميدانند يا ملائكه و انبياء و اولياء را مرّ بي عالم ميپندارند چنانچه مفاد أَن تَتَّخِذُوا المَلائِكَةَ وَ النَّبِيِّينَ أَرباباً است و اينکه كفر و شرك افعاليست چنانچه مفاد أَ يَأمُرُكُم بِالكُفرِ است.
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| − | بَعدَ إِذ أَنتُم مُسلِمُونَ بعد از آني که اسلام آورديد به وحدانيت حق در عبادت و رسالة انبياء كافر نشويد بشرك افعالي.
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| − | 266
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| − | برگزیده تفسیر نمونه=
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| − | ===برگزیده تفسیر نمونه===
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| − | {{نمایش فشرده تفسیر|
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| − | (آیه 80)- این آیه تکمیلی است نسبت به آنچه در آیه قبل آمد میگوید:
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| − | همانطور که پیامبران مردم را به پرستش خویش دعوت نمیکردند، به پرستش فرشتگان و سایر پیامبران هم دعوت نمینمودند میفرماید: «و سزاوار نیست این که به شما دستور دهد فرشتگان و پیامبران را پروردگار خود انتخاب کنید» (وَ لا یَأْمُرَکُمْ أَنْ تَتَّخِذُوا الْمَلائِکَةَ وَ النَّبِیِّینَ أَرْباباً).
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| − | این جمله از یکسو پاسخی است به مشرکان عرب که فرشتگان را دختران خدا میپنداشتند و نوعی ربوبیت برای آنها قائل بودند و با این حال خود را پیرو آیین ابراهیم معرفی میکردند.
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| − | ج1، ص302
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| − | و از سوی دیگر پاسخی است به صابئان که خود را پیرو یحیی (ع) میدانستند ولی مقام فرشتگان را تا سر حد پرستش بالا میبردند.
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| − | و نیز پاسخی است به یهود و نصارا که عزیز یا مسیح (ع) را فرزند خدا معرفی میکردند.
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| − | و در پایان آیه برای تأکید بیشتر میافزاید: «آیا شما را به کفر دعوت میکند پس از آن که (تسلیم فرمان حق گشته و) مسلمان شدید» (أَ یَأْمُرُکُمْ بِالْکُفْرِ بَعْدَ إِذْ أَنْتُمْ مُسْلِمُونَ).
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| − | یعنی، چگونه ممکن است پیامبری پیدا شود و نخست مردم را به ایمان و توحید دعوت کند سپس راه شرک را به آنها نشان دهد! آیه ضمنا اشاره سر بستهای به معصوم بودن پیامبران و عدم انحراف آنها از مسیر فرمان خدا میکند.
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| − | سایر تفاسیر=
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| − | سایرتفاسیر این آیه را می توانید در سایت قرآن مشاهده کنید:
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| − | ==تفسیر های فارسی==
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| − | ==={{ترجمه تفسیر المیزان|سوره=3 |آیه=80}}===
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| − | ==={{تفسیر خسروی|سوره=3 |آیه=80}}===
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| − | ==={{تفسیر عاملی|سوره=3 |آیه=80}}===
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| − | ==={{تفسیر جامع|سوره=3 |آیه=80}}===
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| − | ==تفسیر های عربی==
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| − | ==={{تفسیر المیزان|سوره=3 |آیه=80}}===
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| − | ==={{تفسیر مجمع البیان|سوره=3 |آیه=80}}===
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| − | ==={{تفسیر نور الثقلین|سوره=3 |آیه=80}}===
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| − | ==={{تفسیر الصافی|سوره=3 |آیه=80}}===
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| − | ==={{تفسیر الکاشف|سوره=3 |آیه=80}}===
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| − | </tabber>
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| | ==پانویس== | | ==پانویس== |