|
|
| سطر ۴۳: |
سطر ۴۳: |
| | يمترون: مراء و مماراة: مجادله و منازعه. امتراء: شك و ترديد. «يمترون»: شك مى كنند؛ گويى شك علّت مجادله است.<ref>تفسیر احسن الحدیث، سید علی اکبر قرشی</ref> | | يمترون: مراء و مماراة: مجادله و منازعه. امتراء: شك و ترديد. «يمترون»: شك مى كنند؛ گويى شك علّت مجادله است.<ref>تفسیر احسن الحدیث، سید علی اکبر قرشی</ref> |
| | | | |
| − | ==تفسیر آیه== | + | == تفسیر آیه == |
| − | <tabber> | + | <tafsir sura="15" ayeh="63" /> |
| − | تفسیر نور=
| |
| | | | |
| − | ===تفسیر نور (محسن قرائتی)===
| |
| | | | |
| − | {{ نمایش فشرده تفسیر|
| |
| − | قالُوا بَلْ جِئْناكَ بِما كانُوا فِيهِ يَمْتَرُونَ «63»
| |
| | | | |
| − | (فرشتگان) گفتند: در واقع ما آنچه را (از نزول عذاب كه) دربارهاش ترديد داشتند، براى تو آوردهايم
| |
| − |
| |
| − | وَ أَتَيْناكَ بِالْحَقِّ وَ إِنَّا لَصادِقُونَ «64»
| |
| − |
| |
| − | و ما به حقّ نزد تو آمدهايم و قطعاً ما راستگويانيم.
| |
| − |
| |
| − | فَأَسْرِ بِأَهْلِكَ بِقِطْعٍ مِنَ اللَّيْلِ وَ اتَّبِعْ أَدْبارَهُمْ وَ لا يَلْتَفِتْ مِنْكُمْ أَحَدٌ وَ امْضُوا حَيْثُ تُؤْمَرُونَ «65»
| |
| − |
| |
| − | پس خاندانت را پاسى از شب (گذشته) حركت بده و خودت از پشت سرشان برو و هيچيك از شما (به پشت سرش) توجّه نكند به آنجا كه مأمور شدهايد برويد.
| |
| − |
| |
| − | وَ قَضَيْنا إِلَيْهِ ذلِكَ الْأَمْرَ أَنَّ دابِرَ هؤُلاءِ مَقْطُوعٌ مُصْبِحِينَ «66»
| |
| − |
| |
| − | وبه لوط اين امر حتمى را رسانديم كه ريشه و بن اين گروهِ (تبهكار)، صبحگاهان قطع شده است.
| |
| − |
| |
| − | ===نکته ها===
| |
| − |
| |
| − | قرآن بارها مطرح كرده كه كفّار، تعجيل قهر و عذاب الهى را از انبيا درخواست مىكردند و
| |
| − |
| |
| − | جلد 4 - صفحه 470
| |
| − |
| |
| − | مىگفتند: «فَأْتِنا بِما تَعِدُنا إِنْ كُنْتَ مِنَ الصَّادِقِينَ» «1» و تمام هشدارها را شوخى گرفته و در مورد قهر خداوند چه در دنيا و چه در آخرت ترديد داشتند، خداوند در اين آيات بيان مىكند كه قهر مورد ترديد كفّار قطعاً خواهد آمد.
| |
| − |
| |
| − | «قطع» جمع «قطعه» به قسمت عمدهى شب كه گذشته باشد، گفته مىشود.
| |
| − |
| |
| − | ===پیام ها===
| |
| − |
| |
| − | 1- هشدارها وتهديدهاى الهى را شوخى نگيريد. «جِئْناكَ»
| |
| − |
| |
| − | 2- كيفرهاى الهى بر اساس عدل و حقّ و استحقاق مجرمان است. «بِالْحَقِّ»
| |
| − |
| |
| − | 3- از غفلت كفّار براى نجات مؤمنان استفاده كنيد. «فَأَسْرِ بِأَهْلِكَ بِقِطْعٍ مِنَ اللَّيْلِ»
| |
| − |
| |
| − | 4- حركت انبيا، زير نظر وفرمان خداوند است. «تُؤْمَرُونَ»
| |
| − |
| |
| − | 5- در حوادث مهم لطف خدا لحظه به لحظه امداد مىكند. (هجرت در چه زمانى: «بِقِطْعٍ مِنَ اللَّيْلِ» با چه افرادى: «بِأَهْلِكَ» با چه روشى: «لا يَلْتَفِتْ مِنْكُمْ أَحَدٌ» وبه چه مقصدى: «حَيْثُ تُؤْمَرُونَ»
| |
| − |
| |
| − | 6- خداوند انبيا را قبل از هلاكت كفّار آگاه مىكند. «وَ قَضَيْنا إِلَيْهِ»
| |
| − |
| |
| − | 7- خداوند قادر است در لحظهاى نسل و گروهى را نابود سازد. «دابِرَ»
| |
| − | ----
| |
| − | «1». اعراف، 70.
| |
| − | }}
| |
| − |
| |
| − |
| |
| − |
| |
| − | |-|
| |
| − | اثنی عشری=
| |
| − |
| |
| − | ===تفسیر اثنی عشری (حسینی شاه عبدالعظیمی)===
| |
| − |
| |
| − | {{نمایش فشرده تفسیر|
| |
| − |
| |
| − |
| |
| − | قالُوا بَلْ جِئْناكَ بِما كانُوا فِيهِ يَمْتَرُونَ (63)
| |
| − |
| |
| − | قالُوا بَلْ جِئْناكَ: گفتند ملائكه: نيامدهايم به آنچه تو به سبب آن خوفناكى، بلكه آمديم تو را، بِما كانُوا فِيهِ يَمْتَرُونَ: به عذابى كه تو ايعاد مىنمودى قوم را به نزول آن، و آنها در وقوع آن شك داشتند و تكذيب تو را كردند به عناد و لجاج، حال موعد سرور، و تشفّى خاطر تو باشد از دشمنان.
| |
| − |
| |
| − |
| |
| − | }}
| |
| − | |-|
| |
| − | روان جاوید=
| |
| − | ===تفسیر روان جاوید (ثقفى تهرانى)===
| |
| − | {{نمایش فشرده تفسیر|
| |
| − | فَلَمَّا جاءَ آلَ لُوطٍ الْمُرْسَلُونَ (61) قالَ إِنَّكُمْ قَوْمٌ مُنْكَرُونَ (62) قالُوا بَلْ جِئْناكَ بِما كانُوا فِيهِ يَمْتَرُونَ (63) وَ أَتَيْناكَ بِالْحَقِّ وَ إِنَّا لَصادِقُونَ (64) فَأَسْرِ بِأَهْلِكَ بِقِطْعٍ مِنَ اللَّيْلِ وَ اتَّبِعْ أَدْبارَهُمْ وَ لا يَلْتَفِتْ مِنْكُمْ أَحَدٌ وَ امْضُوا حَيْثُ تُؤْمَرُونَ (65)
| |
| − |
| |
| − | وَ قَضَيْنا إِلَيْهِ ذلِكَ الْأَمْرَ أَنَّ دابِرَ هؤُلاءِ مَقْطُوعٌ مُصْبِحِينَ (66) وَ جاءَ أَهْلُ الْمَدِينَةِ يَسْتَبْشِرُونَ (67) قالَ إِنَّ هؤُلاءِ ضَيْفِي فَلا تَفْضَحُونِ (68) وَ اتَّقُوا اللَّهَ وَ لا تُخْزُونِ (69) قالُوا أَ وَ لَمْ نَنْهَكَ عَنِ الْعالَمِينَ (70)
| |
| − |
| |
| − | قالَ هؤُلاءِ بَناتِي إِنْ كُنْتُمْ فاعِلِينَ (71) لَعَمْرُكَ إِنَّهُمْ لَفِي سَكْرَتِهِمْ يَعْمَهُونَ (72)
| |
| − |
| |
| − | ترجمه
| |
| − |
| |
| − | پس چون آمدند خانواده لوط را فرستادگان
| |
| − |
| |
| − | گفت همانا شمائيد گروهى ناشناخته شدگان
| |
| − |
| |
| − | گفتند بلكه آمديم تو را بآنچه بودند كه در آن شك ميكردند
| |
| − |
| |
| − | و آورديم تو را براستى و بدرستيكه ماهر آينه راستگويانيم
| |
| − |
| |
| − | پس بيرون
| |
| − |
| |
| − | جلد 3 صفحه 259
| |
| − |
| |
| − | بر خانواده خود را در پارهاى از شب و متابعت نما پشتهاشان را و نبايد روى بر گرداند از شما احدى و برويد بجائيكه مأمور ميشويد
| |
| − |
| |
| − | و فرمان فرستاديم بسوى او اين امر را كه دنباله اينها است بريده شده در حاليكه صبح كنندگانند
| |
| − |
| |
| − | و آمدند اهل شهر كه مژده ميدادند بيكديگر
| |
| − |
| |
| − | گفت همانا اينها مهمانان منند پس رسوا مكنيد مرا
| |
| − |
| |
| − | و بترسيد از خدا و خوار مسازيد مرا
| |
| − |
| |
| − | گفتند آيا منع نكرديم تو را از اهل عالم
| |
| − |
| |
| − | گفت اينها دختران منند اگر باشيد بجا آورندگان
| |
| − |
| |
| − | بجان تو كه آنها هر آينه در مستيشان حيران ميزيستند.
| |
| − |
| |
| − | تفسير
| |
| − |
| |
| − | شرح ورود ملائكه بعنوان مهمانى بر حضرت لوط و نشناختن او ايشانرا و بيم او از تعرّض قوم خود بايشان و اطلاع قوم و تعرض آنها و عجز آنحضرت از دفاع و كيفيت اضطرار و التماس او بآنها و اجابت ننمودن قوم و پس از اين وقايع شناختن حضرت ملائكه را و نزول عذاب در سوره هود گذشت و تكرار نميشود ولى اينجا شمّهاى از وقايع قبل از شناختن حضرت لوط ملائكه را بعدا ذكر شده و چون ذكر نشناختن حضرت ايشانرا در اوّل قصّه شده بود معرّفى ملائكه از خودشان و مأموريّتشان بملاحظه مطابقه جواب با سؤال قبلا ذكر شده است و قضاياى قبل، تعرّض اهل شهر بآنحضرت و مهمانها است كه از فرشتگان بودند و اجمال قصه بطوريكه حلّ مشكلات اين مقام شود آنستكه چون فرستادگان خدا كه ملائكه بودند بر لوط عليه السّلام و خانواده او وارد شدند حضرت لوط ايشانرا نشناخت و چون اطمينان كامل از قصد آنها نداشت كه خير است يا شرّ معرفى ايشان از خودشان و غرضشان از ورود بر خودش را خواستار گشت و آنها در جواب عرضه داشتند كه ما فرستادگان خداونديم و آمدهايم براى عذاب قومت كه شك داشتند در آن نزد تو بامر خدا كه بر حقّ و يقينى است و ما راستگويانيم پس خودت با اهل خانهات بعد از نصف شب حركت كن آنها جلو بروند و تو در دنبال باش كه متوجّه و نگهبان آنها باشى و كسى از شما متوجّه به پشت سر خود نشود تا متأثر شود از كيفيت عذاب قوم و بجانب مأموريّت خودتان سير كنيد تا بمكانيكه براى شما تعيين شده كه بعضى گفتهاند شام بوده برسيد و خداوند حكم فرمود و فرستاد بسوى حضرت لوط اين امر را و آن آنست كه نسل قوم او قطع شود و تا صبح يكنفر از آنها باقى نماند و چون خبر ورود مهمانهاى خوب صورت بر او بقوم رسيد كه اهل شهر سدوم بودند بيكديگر
| |
| − |
| |
| − | جلد 3 صفحه 260
| |
| − |
| |
| − | مژده دادند و براى فجور و عمل ناشايسته بخانه حضرت لوط روى نمودند و او بآنها فرمود اينها مهمانان منند مرا براى اين عمل ناشايسته با آنها رسوا و مفتضح نكنيد و از خدا بترسيد و مرا خوار و خجل ننمائيد و آنها جواب گفتند آيا ما تو را نهى ننموديم كه از كسى مهمانى نكنى و از ورود اهل عالم بر خود امتناع نمائى و او در جواب فرمود اين دختران شهر كه بمنزله دختران منند كه پدر روحانى آنها هستم چه عيب دارند كه شما بخيال پسران افتادهايد يا بچند نفر از رؤساء آنها كه قبلا خواستگارى از دختران آنحضرت كرده بودند و اجابت نفرموده بود فرمود كه اينها دختران منند حاضرم آنها را برسم زنيّت بشما بدهم اگر حاضريد بشرط آنكه دست از مهمانان من بكشيد و آنها قبول ننمودند لذا خداوند بجان پيغمبر خود قسم ياد فرموده كه آنها در مستى و غفلت و غوايت متحيّر و سرگردان بودند و اين مثبت فضيلتى براى حضرت ختمى مرتبت است بر ساير انبياء چون خداوند بعمر و جان هيچيك از انبياء قسم ياد نفرموده است ..
| |
| − | }}
| |
| − | |-|
| |
| − | اطیب البیان=
| |
| − | ===اطیب البیان (سید عبدالحسین طیب)===
| |
| − | {{نمایش فشرده تفسیر|
| |
| − | قالُوا بَل جِئناكَ بِما كانُوا فِيهِ يَمتَرُونَ (63)
| |
| − |
| |
| − | گفتند ملائكه بلكه ما آمدهايم بآن عذابهايي که بآنها وعده ميدادي و آنها باور نميكردند و قبول نداشتند که معناي (بِما كانُوا فِيهِ يَمتَرُونَ) است و چون اينکه ملائكه بصورة جوانهاي خوش صورت و زيبا و خوش لباس بودند حضرت لوط وحشت كرد که قوم نسبت بآنها بياحترامي كنند و خوش نداشت که آنها را ضيافت كند آنها گفتند ما ملائكه هستيم.
| |
| − | }}
| |
| − | |-|
| |
| − | برگزیده تفسیر نمونه=
| |
| − |
| |
| − | ===برگزیده تفسیر نمونه===
| |
| − | {{نمایش فشرده تفسیر|
| |
| − | ]
| |
| − |
| |
| − | (آیه 63)- ولی فرشتگان، زیاد او را در انتظار نگذاردند، با صراحت «گفتند:
| |
| − |
| |
| − | ما چیزی را برای تو آوردهایم که آنها در آن تردید داشتند» (قالُوا بَلْ جِئْناکَ بِما کانُوا فِیهِ یَمْتَرُونَ). یعنی مأمور مجازات دردناکی هستیم که تو کرارا به آنها گوشزد کردهای ولی هرگز آن را جدی تلقی نکردند؟
| |
| − | }}
| |
| − | |-|
| |
| − |
| |
| − | سایر تفاسیر=
| |
| − | سایرتفاسیر این آیه را می توانید در سایت قرآن مشاهده کنید:
| |
| − |
| |
| − | ==تفسیر های فارسی==
| |
| − | ==={{ترجمه تفسیر المیزان|سوره=15 |آیه=63}}===
| |
| − | ==={{تفسیر خسروی|سوره=15 |آیه=63}}===
| |
| − | ==={{تفسیر عاملی|سوره=15 |آیه=63}}===
| |
| − | ==={{تفسیر جامع|سوره=15 |آیه=63}}===
| |
| − |
| |
| − | ==تفسیر های عربی==
| |
| − | ==={{تفسیر المیزان|سوره=15 |آیه=63}}===
| |
| − | ==={{تفسیر مجمع البیان|سوره=15 |آیه=63}}===
| |
| − | ==={{تفسیر نور الثقلین|سوره=15 |آیه=63}}===
| |
| − | ==={{تفسیر الصافی|سوره=15 |آیه=63}}===
| |
| − | ==={{تفسیر الکاشف|سوره=15 |آیه=63}}===
| |
| − | </tabber>
| |
| | | | |
| | ==پانویس== | | ==پانویس== |