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| سطر ۴۸: |
سطر ۴۸: |
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| | == تفسیر آیه == | | == تفسیر آیه == |
| − | <tabber> | + | <tafsir sura="2" ayeh="225" /> |
| − | تفسیر نور=
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| − | ===تفسیر نور (محسن قرائتی)===
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| − | {{ نمایش فشرده تفسیر|
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| − | «225» لا يُؤاخِذُكُمُ اللَّهُ بِاللَّغْوِ فِي أَيْمانِكُمْ وَ لكِنْ يُؤاخِذُكُمْ بِما كَسَبَتْ قُلُوبُكُمْ وَ اللَّهُ غَفُورٌ حَلِيمٌ
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| − | خداوند، شما را به خاطر سوگندهاى لغو (كه بدون قصد ياد كردهايد،) مؤاخذه نمىكند، امّا به آنچه دلهاى شما (از روى اراده و آگاهى واختيار) كسب كرده، مؤاخذه مىكند وخداوند آمرزنده وحليم (بردبار) است.
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| − | ===نکته ها===
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| − | سوگندهايى كه از روى بى توجّهى و يا در حال عصبانيّت و بدون فكر و اراده و يا پر حرفى وعجله و سبقلسان از انسان سرمىزند، ارزش حقوقى ندارد. مسئوليّت، تنها در برابر سوگندهايى است كه با توجّه و در حال عادّى، به نام مقدّس خداوند براى انجام كار مفيد ياد شود. اين قبيل سوگندها شرعاً واجبالاجرا مىباشد و شكستن آن حرام مىباشد و كفّاره آن عبارت است از: اطعام ده فقير، يا اعطاى لباس به آنها، و يا آزاد كردن يك برده و در صورت عدم امكان هيچ يك از اينها، سه روز روزه گرفتن. «1»
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| − | ===پیام ها===
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| − | 1- مسئوليّت انسان، وابسته به اراده و انتخاب اوست. خداوند لغزشهايى را كه در شرائط غير عادّى از انسان صادر شود، مىبخشد. «لا يُؤاخِذُكُمُ اللَّهُ بِاللَّغْوِ»
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| − | 2- انگيزه و نيّت، ملاك ثواب وعقاب است. «كَسَبَتْ قُلُوبُكُمْ»
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| − | 3- يكى از جلوههاى حِلم ومغفرت الهى، گذشت از خطاهاى غير عمدى انسان است. «لا يُؤاخِذُكُمُ اللَّهُ ... غَفُورٌ حَلِيمٌ»
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| − | اثنی عشری=
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| − | ===تفسیر اثنی عشری (حسینی شاه عبدالعظیمی)===
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| − | {{نمایش فشرده تفسیر|
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| − | لا يُؤاخِذُكُمُ اللَّهُ بِاللَّغْوِ فِي أَيْمانِكُمْ وَ لكِنْ يُؤاخِذُكُمْ بِما كَسَبَتْ قُلُوبُكُمْ وَ اللَّهُ غَفُورٌ حَلِيمٌ (225)
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| − | «1» فروع كافى، كتاب الايمان، جلد 7، صفحه 434، حديث اوّل.
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| − | «2» مدرك پيشين، حديث سوّم (با اختلاف در عبارات)
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| − | تفسير اثنا عشرى، ج1، ص: 403
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| − | بعد از آن بيان اقسام سوگند را مىفرمايد:
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| − | لا يُؤاخِذُكُمُ اللَّهُ: مؤاخذه نفرمايد شما را خدا، بِاللَّغْوِ فِي أَيْمانِكُمْ:
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| − | در سوگندهاى لغو و بىفايده شما. بنا بقول اماميه رضوان اللّه عليهم مراد آنچه زبان عادت دارد كه بدون قصد گويد به خدا قسم، يا نه به خدا قسم، چنانچه در كتاب كافى- از حضرت صادق عليه السّلام در آيه شريفه فرمايد: لغو، مراد قول شخص است: لا و اللّه و بلى و اللّه كه منعقد نشود. «1» مراد به عدم مؤاخذه نداشتن عقاب و كفاره است.
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| − | صاحب كنز العرفان گفته كه: ممكن است اين آيه جواب سؤال مقدر باشد و تقدير سؤال اينكه هرگاه بندگان نهى شده باشند كه نام الهى را عرضه سوگند خود گردانند، پس لازم آيد همه به جهت كثرت سوگند به خداى تعالى به هلاكت و عقوبت گرفتار شوند، حق تعالى جواب فرمايد در سوگندهاى لغو مؤاخذه نيست.
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| − | وَ لكِنْ يُؤاخِذُكُمْ: و لكن مؤاخذه فرمايد شما را، بِما كَسَبَتْ قُلُوبُكُمْ: به آنچه كسب نمايد قلوب شما و از روى عمد و قصد سوگند نمائيد كه در اين صورت به مخالفت آن، مستحق عقوبت و كفاره قسم بر شما لازم آيد.
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| − | تنبيه: فرق ميان كسب به لسان و كسب قلب، آنست كه قلب مخالف نفس مكلف نيست به خلاف لسان كه گاه هست مخالف نفس مىباشد و صادر شود از او آنچه مأذون نفس نيست؛ پس سزاوار حضرت حكيم جل شأنه نباشد كه مواخذه نمايد به آنچه نفس اذن نداده در فعل آن. و در اين اشاره است به آنكه در قسم شرط مىباشد قصد و نيت، پس سوگند غضبان واقع نشود وقتى قصد نباشد، و همچنين غافل و ساهى.
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| − | وَ اللَّهُ غَفُورٌ حَلِيمٌ: و خداى تعالى بسيار آمرزنده است بنده را به سوگند
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| − | «1» مدرك پيشين، صفحه 443.
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| − | تفسير اثنا عشرى، ج1، ص: 404
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| − | لغو، و او را مؤاخذه نفرمايد، حليم است و در سوگند عمد نيز به عقوبت تعجيل نفرمايد به جهت ترتب توبه.
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| − | روان جاوید=
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| − | ===تفسیر روان جاوید (ثقفى تهرانى)===
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| − | لا يُؤاخِذُكُمُ اللَّهُ بِاللَّغْوِ فِي أَيْمانِكُمْ وَ لكِنْ يُؤاخِذُكُمْ بِما كَسَبَتْ قُلُوبُكُمْ وَ اللَّهُ غَفُورٌ حَلِيمٌ (225)
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| − | ترجمه
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| − | مؤاخذه نميكند شما را خدا بر بيهوده در سوگندهاتان ولى مؤاخذه ميكند شما را بآنچه كسب كند دلهاتان و خداوند آمرزنده بردبار است..
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| − | تفسير
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| − | قسم بيهوده و لغو آنست كه بمجرد عادت زبان باشد نه از روى جد و قصد و عقد قلب چنانچه معمولا براى تأكيد ياد مينمايند و ميگويند نه بخدا بلى بخدا و اينمعنى از صادقين عليهما السلام نقل شده است و چون مجرد از قصد است مؤاخذه ندارد و كفاره هم گفتهاند ندارد ولى بهتر آنست كه انسان مواظب خود باشد و اينعادت را از خود دور نمايد و نام خدا را محترم بدارد چنانچه در آيه سابقه اشاره بآن شد ولى مؤاخذه مينمايد خداوند بر آن سوگندى كه مطابق با قلب و از روى قصد و جد باشد چون آن سوگند عمل قلب و كسب آنست كه مؤمن بايد از راست و دروغ آن اجتناب نمايد مگر در موقع ضرورت و خداوند غفور است مؤاخذه بسوگند خالى از قصد نميكند و حليم است تعجيل در عقوبت براى قسم جدى نميفرمايد و اگر متعقب بتوبه شد عفو ميفرمايد و بدادن كفاره تدارك شر او را مينمايد.
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| − | اطیب البیان=
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| − | ===اطیب البیان (سید عبدالحسین طیب)===
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| − | {{نمایش فشرده تفسیر|
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| − | لا يُؤاخِذُكُمُ اللّهُ بِاللَّغوِ فِي أَيمانِكُم وَ لكِن يُؤاخِذُكُم بِما كَسَبَت قُلُوبُكُم وَ اللّهُ غَفُورٌ حَلِيمٌ (225)
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| − | (خداوند شما را بواسطه سوگندهاي لغو و بدون قصد مؤاخذه نميكند ولي به قسمهايي که از روي قصد و توجه قلب ياد ميكنيد مؤاخذه مينمايد و خداوند آمرزنده و بردبار است).
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| − | 1- صدوق از حضرت رضا (ع)
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| − | [.....]
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| − | 2- نهج البلاغه جلد سوم خطبه 47
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| − | 3- جامع السعادات ص 343
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| − | 4- سوره مائده آيه 91
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| − | جلد 2 - صفحه 451
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| − | لا يُؤاخِذُكُمُ اللّهُ بِاللَّغوِ فِي أَيمانِكُم قسم يا در مقام اخبار است باين معني که از امري خبر ميدهد و اينکه خبر را بواسطه قسم مؤكد مينمايد مانند:
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| − | فَوَ رَبِّ السَّماءِ وَ الأَرضِ إِنَّهُ لَحَقٌّ«1» و چنين قسمي اگر مطابق با واقع باشد آن را صادق و راست نامند، و اگر بر خلاف واقع باشد آن را غموس و قسم دروغ گويند و قسم دروغ يكي از گناهان كبيره است و آن را غموس گفتند براي اينكه صاحب آن در معصيت و پس از آن در آتش دوزخ فرو ميرود زيرا غمس بمعني فرو رفتن است و يا در مقام انشأ است باين معني که امري را بواسطه قسم بر خود واجب ميكند مثل اينكه بگويد و اللّه فردا را روزه ميگيرم و اينکه نوع از قسم است که متعلقش واجب ميشود و بر خلف آن كفارة تعلق ميگيرد.
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| − | و قسم گاهي از روي قصد و اراده و اختيار و توجه بآنست و گاهي از روي عدم قصد و بي توجهي بآن يا از روي اكراه يا بواسطه هيجان غضب و نحو آن اينکه قسم اخير را لغو در ايمان گويند زيرا لغو بمعني كلامي است که داراي معني نباشد يا متكلم بقصد معني بآن تكلم نكند، و اينکه قسم از يمين مورد مؤاخذه نيست و خلف آن كفاره ندارد و آيه شريفه ناظر باين قسم است و اخبار نيز بر طبق اينکه معني وارد شده چنانچه از كافي از حضرت صادق عليه السّلام روايت شده که فرمود «
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| − | اللغو قول الرجل لا و اللّه و بلي و اللّه و لا يعقد علي شيئي
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| − | » و در مجمع از حضرت باقر و حضرت صادق (ع) همين معني را نقل ميكند ولي در آخر آن «من غير عقد» ذكر شده.
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| − | وَ لكِن يُؤاخِذُكُم بِما كَسَبَت قُلُوبُكُم يعني خدا شما را بآنچه نفس شما كسب ميكند مؤاخذه مينمايد و به قسمهايي که از روي قصد و اراده ياد نمائيد عقوبت مينمايد و قسمي که مورد مؤاخذه و عقوبت است قسم دروغ و قسمي است که بر
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| − | 1- سورة الذاريات آيه 23
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| − | جلد 2 - صفحه 452
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| − | ترك امر واجب و يا فعل حرام ياد كند و يا قسمي که در مقام انشاء باشد و متعلقش واجب شود و آن را ترك نمايد و مراد از قلب همان نفس انساني و روح ملكوتي است که در اوائل سوره در صفات منافقين بيان شد.
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| − | وَ اللّهُ غَفُورٌ حَلِيمٌ خداوند آمرزنده است و بر لغو از ايمان مؤاخذه نميكند و بردبار است و در عقوبت تعجيل نمينمايد.
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| − | برگزیده تفسیر نمونه=
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| − | ===برگزیده تفسیر نمونه===
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| − | {{نمایش فشرده تفسیر|
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| − | (آیه 225)- در این آیه برای تکمیل این مطلب مهم که قسم نباید مانع کارهای خیر شود، میفرماید: «خداوند شما را بخاطر سوگندهایی که بدون توجه
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| − | ج1، ص204
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| − | یاد میکنید مؤاخذه نخواهد کرد» (لا یُؤاخِذُکُمُ اللَّهُ بِاللَّغْوِ فِی أَیْمانِکُمْ).
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| − | اما به آنچه دلهای شما کسب کرده (و سوگندهایی که از روی اراده و اختیار یاد میکنید) مؤاخذه میکند و خداوند آمرزنده و دارای حلم است» (وَ لکِنْ یُؤاخِذُکُمْ بِما کَسَبَتْ قُلُوبُکُمْ وَ اللَّهُ غَفُورٌ حَلِیمٌ).
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| − | در این آیه خداوند به دو نوع سوگند اشاره کرده، نوع اول قسمهای لغو است که هیچ گونه اثری ندارد و نباید به آن اعتنا کرد و مخالفت آن کفاره ندارد زیرا از روی اراده و تصمیم نیست. نوع دوم سوگندهایی است که از روی اراده و تصمیم انجام میگیرد و به تعبیر قرآن قلب انسان آن را کسب میکند، این گونه قسم معتبر است و باید به آن پایبند بود، و مخالفت با آن، هم گناه دارد، و هم موجب کفاره میشود.
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| − | سایر تفاسیر=
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| − | سایرتفاسیر این آیه را می توانید در سایت قرآن مشاهده کنید:
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| − | ==تفسیر های فارسی==
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| − | ==={{ترجمه تفسیر المیزان|سوره=2 |آیه=225}}===
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| − | ==={{تفسیر خسروی|سوره=2 |آیه=225}}===
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| − | ==={{تفسیر عاملی|سوره=2 |آیه=225}}===
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| − | ==={{تفسیر جامع|سوره=2 |آیه=225}}===
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| − | ==تفسیر های عربی==
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| − | ==={{تفسیر المیزان|سوره=2 |آیه=225}}===
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| − | ==={{تفسیر مجمع البیان|سوره=2 |آیه=225}}===
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| − | ==={{تفسیر نور الثقلین|سوره=2 |آیه=225}}===
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| − | ==={{تفسیر الصافی|سوره=2 |آیه=225}}===
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| − | ==={{تفسیر الکاشف|سوره=2 |آیه=225}}===
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| − | </tabber>
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| | ==پانویس== | | ==پانویس== |