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| سطر ۱: |
سطر ۱: |
| − | {{قرآن در قاب|وَإِنْ كَانَ أَصْحَابُ الْأَيْكَةِ لَظَالِمِينَ|سوره=15|آیه =78}} | + | {{قرآن در قاب|إِنَّ فِي ذَٰلِكَ لَآيَةً لِلْمُؤْمِنِينَ|سوره=15|آیه =77}} |
| | {{مشخصات آیه | | {{مشخصات آیه |
| − | |شماره آیه = 78 | + | |شماره آیه = 77 |
| − | |شماره بعدی = 79 | + | |شماره بعدی = 78 |
| − | |شماره قبلی = 77 | + | |شماره قبلی = 76 |
| | |سوره= حجر | | |سوره= حجر |
| | |شماره سوره= 15 | | |شماره سوره= 15 |
| سطر ۱۲: |
سطر ۱۲: |
| | <tabber> | | <tabber> |
| | الهی قمشهای= | | الهی قمشهای= |
| − | و اهل شهر ایکه (قوم شعیب) هم بسیار مردم ستمکاری بودند. | + | همانا در این عقوبت بدکاران عالم، اهل ایمان را آیت و عبرتی است. |
| | |-| | | |-| |
| | انصاریان= | | انصاریان= |
| − | و بی تردید اهل ایکه [قوم شعیب] ستمکار بودند.
| + | مسلماً در این [شهر ویران شده] برای مؤمنان نشانه ای [پندآموز] است. |
| | |-| | | |-| |
| | فولادوند= | | فولادوند= |
| − | و راستى اهل «ايكه» ستمگر بودند.
| + | بىگمان، در اين براى مؤمنان عبرتى است. |
| | |-| | | |-| |
| | آیتی= | | آیتی= |
| − | مردم ايكه نيز ستمكار بودند.
| + | و مؤمنان را در آن عبرتى است. |
| | |-| | | |-| |
| | مکارم شیرازی= | | مکارم شیرازی= |
| − | «اصحاب الأیکه» [= صاحبان سرزمینهای پردرخت = قوم شعیب] مسلماً قوم ستمگری بودند!
| + | در این، نشانهای است برای مؤمنان! |
| | </tabber> | | </tabber> |
| | ==ترجمه های انگلیسی(English translations)== | | ==ترجمه های انگلیسی(English translations)== |
| | <tabber> | | <tabber> |
| | Qarai= | | Qarai= |
| − | {{چپ به راست|Indeed the inhabitants of Aykah were [also] wrongdoers.}} | + | {{چپ به راست|and there is indeed a sign in that for the faithful.}} |
| | |-| | | |-| |
| | Shakir= | | Shakir= |
| − | {{چپ به راست|And the dwellers of the thicket also were most surely unjust.}} | + | {{چپ به راست|Most surely there is a sign in this for the believers.}} |
| | |-| | | |-| |
| | Pickthall= | | Pickthall= |
| − | {{چپ به راست|And the dwellers in the wood indeed were evil-doers.}} | + | {{چپ به راست|Lo! therein is indeed a portent for believers.}} |
| | |-| | | |-| |
| | yusufali= | | yusufali= |
| − | {{چپ به راست|And the Companions of the Wood were also wrong-doers;}} | + | {{چپ به راست|Behold! in this is a sign for those who believed.}} |
| | </tabber> | | </tabber> |
| | ==معانی کلمات آیه== | | ==معانی کلمات آیه== |
| − | الايكة: ايك: جنگل، بيشه، نى زار. اهل لغت آن را درختان بسيار و پيچيده معنى كرده اند .
| + | «فِی ذلِکَ»: در آنچه گذشت. |
| − | در قاموس آمده: «الشجر الملتف الكثير» اين با جنگل مى سازد. ايضا آن را غيضه گفته اند:
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| − | يعنى باتلاقى كه آبش خشكيده و در آن درخت روئيده است و اين با بيشه و نى زار مى سازد.
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| − | به هر حال مراد از أَصْحابُ الْأَيْكَةِ، قوم [[حضرت شعیب علیه السلام|حضرت شعيب]] است .
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| − | در [[جوامع الجامع]] فرموده: در حديث است كه شعيب بر اهل مدين و ايكه هر دو مبعوث شده بود.<ref>تفسیر احسن الحدیث، سید علی اکبر قرشی</ref>
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| | | | |
| − | ==تفسیر آیه== | + | == تفسیر آیه == |
| − | <tabber> | + | <tafsir sura="15" ayeh="77" /> |
| − | تفسیر نور=
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| − | | |
| − | ===تفسیر نور (محسن قرائتی)=== | |
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| − | {{ نمایش فشرده تفسیر|
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| − | وَ إِنْ كانَ أَصْحابُ الْأَيْكَةِ لَظالِمِينَ «78»
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| − | | |
| − | و به راستى اهالى سرزمين ايْكه (نيز) ستمگر بودند.
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| − | فَانْتَقَمْنا مِنْهُمْ وَ إِنَّهُما لَبِإِمامٍ مُبِينٍ «79»
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| − | | |
| − | پس از آنان انتقام گرفتيم و همانا (شهرهاى ويران شده) اين دو منطقه در برابر چشمان شما آشكار است.
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| − | | |
| − | ===نکته ها===
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| − | «ايكه» به معناى بيشه و درختان درهم پيچيده است و مراد از «اصحاب ايكه»، قوم حضرت شعيب مىباشند كه در منطقهى خوش آب و هوا و پردرختى ميان حجاز و شامزندگى مىكردند.
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| − | در روايتى از پيامبر اكرم صلى الله عليه و آله آمده كه اصحاب مدين و اصحاب الايكة دو امّت بودند كه
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| − | جلد 4 - صفحه 475
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| − | شعيب پيامبر هر دوى آنان بود و هر دو كفر ورزيدند، ولى به دو نوع عذاب گرفتار شدند؛ يكى به عذاب «يَوْمِ الظُّلَّةِ» و ديگرى به عذاب «صيحة». «1»
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| − | | |
| − | چون ما از خداوند طلبى نداريم، آنچه را دريافت مىكنيم، «انعام» خداوند است، امّا در كيفر الهى، چون قهر او به خاطر گناهان، عيبها واستحقاق خود ماست، كلمهى «انتقام» بكار مىرود.
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| − | | |
| − | ===پیام ها===
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| − | 1- ستمگران بدانند كه شرارت و ستم آنان در طول تاريخ، براى ديگران بازگو مىشود. «وَ إِنْ كانَ أَصْحابُ الْأَيْكَةِ لَظالِمِينَ»
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| − | | |
| − | 2- در طراحى جادهها، سعى كنيم محل حوادث تاريخى، در ديدگاه عابرين باشد. «لَبِإِمامٍ مُبِينٍ»
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| − | -------
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| − | «1». تفسير فرقان از درالمنثور، ج 4، ص 103.
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| − | }}
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| − | اثنی عشری=
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| − | ===تفسیر اثنی عشری (حسینی شاه عبدالعظیمی)===
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| − | {{نمایش فشرده تفسیر|
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| − | | |
| − | وَ إِنْ كانَ أَصْحابُ الْأَيْكَةِ لَظالِمِينَ (78)
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| − | وَ إِنْ كانَ أَصْحابُ الْأَيْكَةِ لَظالِمِينَ: و بدرستى كه شأن چنين است اصحاب بيشه درختان، هرآينه ظالم بودند به تكذيب پيغمبرشان. و مراد، قوم شعيب عليه السّلام كه در بيشهها و جنگلها زندگانى مىكردند. حق تعالى حضرت شعيب را به ايشان و اهل مدين مبعوث فرمود، و اهل مدين ايمان نياوردند و اهل «ايكه» تكذيب نمودند.
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| − | }}
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| − | روان جاوید=
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| − | ===تفسیر روان جاوید (ثقفى تهرانى)===
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| − | {{نمایش فشرده تفسیر|
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| − | فَأَخَذَتْهُمُ الصَّيْحَةُ مُشْرِقِينَ (73) فَجَعَلْنا عالِيَها سافِلَها وَ أَمْطَرْنا عَلَيْهِمْ حِجارَةً مِنْ سِجِّيلٍ (74) إِنَّ فِي ذلِكَ لَآياتٍ لِلْمُتَوَسِّمِينَ (75) وَ إِنَّها لَبِسَبِيلٍ مُقِيمٍ (76) إِنَّ فِي ذلِكَ لَآيَةً لِلْمُؤْمِنِينَ (77)
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| − | وَ إِنْ كانَ أَصْحابُ الْأَيْكَةِ لَظالِمِينَ (78) فَانْتَقَمْنا مِنْهُمْ وَ إِنَّهُما لَبِإِمامٍ مُبِينٍ (79) وَ لَقَدْ كَذَّبَ أَصْحابُ الْحِجْرِ الْمُرْسَلِينَ (80) وَ آتَيْناهُمْ آياتِنا فَكانُوا عَنْها مُعْرِضِينَ (81) وَ كانُوا يَنْحِتُونَ مِنَ الْجِبالِ بُيُوتاً آمِنِينَ (82)
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| − | فَأَخَذَتْهُمُ الصَّيْحَةُ مُصْبِحِينَ (83) فَما أَغْنى عَنْهُمْ ما كانُوا يَكْسِبُونَ (84)
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| − | ترجمه
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| − | پس گرفت آنها را صيحه آسمانى وارد در وقت طلوع آفتاب شدگان
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| − | پس گردانديم زبرش را زيرش و بارانديم بر آنها سنگهائى از گل سنگ شده
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| − | همانا در اين هر آينه نشانهها است براى اهل فراست
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| − | و همانا آنها هر آينه براهى است ثابت
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| − | بدرستيكه در اين نشانهاى است براى اهل ايمان
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| − | و همانا بودند اهل بلدأيكه هر آينه ستمكاران
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| − | پس انتقام كشيديم از آنها و بدرستيكه آن دو هر آينه در راهى روشنند
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| − |
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| − | و بتحقيق تكذيب كردند اهل وادى حجر پيغمبران را
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| − |
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| − | و داديم بآنها نشانههاى خودمان را پس بودند از آنها اعراض كنندگان
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| − | و بودند كه مىتراشيدند از كوهها خانهها را ايمنان
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| − | پس گرفت آنها را صيحه آسمانى بامداد كنندگان
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| − | پس بىنياز نكرد آنها را آنچه بودند كه كسب ميكردند.
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| − | .
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| − | جلد 3 صفحه 261
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| − | تفسير
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| − | بيان عاقبت كار قوم لوط است كه فرياد مهيب جبرئيل مقارن طلوع آفتاب بآنها رسيد و بال خود را در زير زمين بلد آنها فرو برد و از جا كند و بآسمان برد و وارونه نمود و بزمين زد و زير و زبر نمود و در اينحال بارانى از سجّيل كه معرّب سنگ گل است بر آنها باريدن گرفت كه ديّارى را از آنها باقى نگذارد حتى بكسانيكه در شهر نبودند و باطراف مسافرت نموده بودند هم اصابت كرد و هلاك نمود چنانچه در سوره هود گذشت و در اين هلاكت قوم لوط و زير و زبر شدن بلدشان آياتى است بر قدرت و عظمت معصيت خداوند براى اهل فراست و كسانيكه بنظر دقيق در حقايق اشياء مينگرند تا حقيقت هر چيز را بسمه و علامت آن ميشناسند چون متوسم ناظر و متأمّل در سمه و علامت شىء را گويند براى معرفت بحال آن و در مجمع از پيغمبر صلّى اللّه عليه و آله و سلّم روايت نموده بطريق صحيح كه فرمود بپرهيزيد از فراست مؤمن همانا او نظر ميكند بنور خدا و خداوند بندگانى دارد كه ميشناسند مردم را بتوسم و اين آيه را تلاوت فرمود و آن آيات و نشانههاى قدرت خداوند در راهى است كه ثابت و مستقر است و قافله قريش و غيرها كه از مكّه بشام حركت ميكنند از آنراه ميروند و آثار باقيه بلد سدوم را كه شهر قوم لوط بوده مشاهده مينمايند و بايد عبرت گيرند و با پيغمبر خدا مخالفت ننمايند در كافى از امام باقر عليه السّلام نقل نموده كه امير المؤمنين عليه السّلام فرمود در قول خداوند انّ فى ذالك لآيات للمتوسمين متوسم پيغمبر صلّى اللّه عليه و آله و سلّم بود و بعد از او منم و ائمه كه از ذريّه منند متوسمانند و در چند روايت ديگر باين معنى تصريح شده و در بعضى علاوه شده كه سبيل در ما مقيم است و خارج از ما نميشود هرگز و قمّى ره علاوه فرموده كه سبيل راه بهشت است و در بعضى روايات باين آيه تمسك شده است براى آنكه ائمه عليهم السلام تمام مردم را بنوشته ايمان و كفرشان كه در ميان دو چشمشان است ميشناسند كه مؤمنند يا كافر و اين نوشته از ساير مردم محجوب است و نسبت بامام زمان علاوه شده است كه در آن آيت است براى متوسمان و او آيت است براى متوسمان و او است سبيل مقيم و عيّاشى از امام صادق عليه السّلام نقل نموده كه در امام آيت است براى متوسمان و او است سبيل مقيم مىبيند بنور خدا و سخن ميگويد از جانب خدا و پوشيده نميماند بر او چيزى از چيزها كه خواسته باشد و بنابر آنچه ذكر شد مرجع ضمير
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| − |
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| − | جلد 3 صفحه 262
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| − | در و إنّها لبسبيل مقيم راجع است بآيات و مراد از انّ فى ذالك لآية للمؤمنين آنستكه در اين توسم و تفرّس و علامت شناسى و معرفت آيات خدا و ائمّه هدى و طرق الى اللّه آيت و علامتى است براى اهل ايمان يعنى اهل ايمان حقيقى باين امور شناخته ميشوند ولى مفسرين مرجع ضمير انّها را مدينه يا مدائن و آثار باقيه آنها قرار دادهاند و مشار اليه ذالك را در آيه بعد نيز همان دانستهاند و اختصاص باهل ايمانرا فرمودهاند براى آنستكه آنها منتفع ميشوند و بنظر حقير خلاف ظاهر آيه و روايات مفسره است و در هر دو معنى سهل انگارى شده است و كلمه ان در و إن كان اصحاب الأيكة ظاهرا مخفّفه از مثقّله است و أيكه درختان بسيار درهم رفته را گويند و نام بلدى است كه در جنگل واقع شده بود و حضرت شعيب علاوه بر اهل مدين بر آنها هم مبعوث شد و اطاعت ننمودند و ستم نمودند بخودشان و خلق و خداوند از آنها انتقام كشيد باين نحو كه هفت روز هوا بشدّت گرم شد و بعد ابرى ظاهر گشت آنها باميد فرج و تخفيف حرارت زير آن ابر جمع شدند ناگاه از آن صاعقهاى بآنها رسيد و تمامى سوختند و شهر سدوم و بلدأيكه در جلو راه مردم واضح و آشكار است و بنابراين مراد بامام مبين راه روشن است و بعضى گفتهاند مراد از امام مبين لوح محفوظ است كه وقايع آن دو بلد در آن نوشته است مانند و كل شىء احصيناه فى امام مبين و معناى اوّل اظهر است و اهل ديار حجر كه گفتهاند واديى است بين مدينه و شام هم مانند ساير كفار تكذيب نمودند پيغمبران خدا را كه حضرت صالح و رسولان او يا ساير انبياء باشد و اينها همان قوم ثمود بودند كه شرح احوال آنها در سوره اعراف گذشت و مراد از آيات ناقه و بچهاش و آب خوردن و شير دادن و ساير جهات اعجاز آنست كه مفصلا ذكر و كيفيّت اعراض آنها بيان گرديد و يكى از سفاهتهاى آنها اين بود كه خانههاشان را در كوهها از سنگ مىتراشيدند و باين ملاحظه ايمن بودند از وصول آفات ارضيّه و سماويّه بخودشان با آنكه باين امور نبايد دلگرم و از عذاب الهى ايمن بود پس تمامى در وقت صبح بصيحه آسمانى هلاك شدند و آن خانهها و اولاد و اموالشان كه كسب ميكردند براى آنها ابدا نتيجه و فائده و ثمرى نداشت و چيزى از احتياج آنها را رفع ننمود.
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| − | جلد 3 صفحه 263
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| − | }}
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| − | |-|
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| − | اطیب البیان=
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| − | ===اطیب البیان (سید عبدالحسین طیب)===
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| − | {{نمایش فشرده تفسیر|
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| − | وَ إِن كانَ أَصحابُ الأَيكَةِ لَظالِمِينَ (78)
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| − | أصحاب ايكه قوم شعيب هستند، چنانچه أصحاب مدين هم قوم شعيبند و ايكه اسم درخت است که بهم پيچيده و اينها با آنكه آن درخت را ميپرستيدند و يا آنكه شهر آنها را بنام آن درخت گذارده بودند و أصحاب ايكه بصاعقه هلاك شدند در يوم الظلّة، چنانچه در سوره شعراء آيه 176 الي 190 شرح آن را بيان فرموده من قوله تعالي:
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| − | كَذَّبَ أَصحابُ الأَيكَةِ المُرسَلِينَ.
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| − |
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| − | الي قوله تعالي فَأَخَذَهُم عَذابُ يَومِ الظُّلَّةِ إِنَّهُ كانَ عَذابَ يَومٍ عَظِيمٍ.
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| − |
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| − | و گفتند ابري آمد بالاي سر آنها تصور كردند که بروند زير سايه ابر استراحت كنند و از حرارت آفتاب نجات يابند.
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| − |
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| − | و چون تمام مجتمع شدند در زير سايه سحاب يك مرتبه صاعقه و آتش از سحاب خارج شد و تمام آنها را سوزانيد و تا هفت روز اينکه صاعقه ادامه داشت و ما در مجلد پنجم در سوره اعراف آيه 85 إشاره كرديم مراجعه كنيد صفحه 380 و أصحاب مدين که از فاميل خود شعيب بودند چون مدين نام جدّ شعيب بود و به رجفه هلاك شدند، چنانچه ميفرمايد: فَأَخَذَتهُمُ الرَّجفَةُ فَأَصبَحُوا فِي دارِهِم جاثِمِينَ اعراف آيه 78 و رجفه را بعضي گفتند زلزله بود بعضي گفتند صيحه بود بعضي گفتند صاعقه بود و جمع بين هر سه معني ممكن است صيحه صداي رعد بطوري که زمين را بلرزاند و زلزله واقع شود و برق جستن كند و بسوزاند که صاعقه باشد.
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| − |
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| − | جلد 12 - صفحه 64
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| − |
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| − | وَ إِن كانَ أَصحابُ الأَيكَةِ لَظالِمِينَ هم ظالم بنفس بودند که تكذيب شعيب كردند و هم ظالم بغير که بخس در مكيال و ميزان ميكردند و هم شرك آوردند که إِنَّ الشِّركَ لَظُلمٌ عَظِيمٌ لقمان آيه 12.
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| − | }}
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| − | برگزیده تفسیر نمونه=
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| − | ===برگزیده تفسیر نمونه===
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| − | {{نمایش فشرده تفسیر|
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| − | ]
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| − | (آیه 78)- پایان زندگی دو قوم ستمگر! در اینجا قرآن به دو بخش دیگر از
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| − | ج2، ص542
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| − | سرگذشت اقوام پیشین تحت عنوان «اصحاب الأیکه» و «اصحاب الحجر» اشاره میکند، و بحثهای عبرت انگیزی را که در آیات پیشین پیرامون قوم لوط بود تکمیل مینماید.
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| − | نخست میگوید: «و اصحاب الایکه مسلما مردمی ظالم و ستمگر بودند، (وَ إِنْ کانَ أَصْحابُ الْأَیْکَةِ لَظالِمِینَ).
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| − | }}
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| − | سایر تفاسیر=
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| − | سایرتفاسیر این آیه را می توانید در سایت قرآن مشاهده کنید:
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| − | ==تفسیر های فارسی==
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| − | ==={{ترجمه تفسیر المیزان|سوره=15 |آیه=78}}===
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| − | ==={{تفسیر خسروی|سوره=15 |آیه=78}}===
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| − | ==={{تفسیر عاملی|سوره=15 |آیه=78}}===
| |
| − | ==={{تفسیر جامع|سوره=15 |آیه=78}}===
| |
| − |
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| − | ==تفسیر های عربی==
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| − | ==={{تفسیر المیزان|سوره=15 |آیه=78}}===
| |
| − | ==={{تفسیر مجمع البیان|سوره=15 |آیه=78}}===
| |
| − | ==={{تفسیر نور الثقلین|سوره=15 |آیه=78}}===
| |
| − | ==={{تفسیر الصافی|سوره=15 |آیه=78}}===
| |
| − | ==={{تفسیر الکاشف|سوره=15 |آیه=78}}===
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| − | </tabber>
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| | ==پانویس== | | ==پانویس== |
| − | <div style="font-size:smaller"><references /></div> | + | <div style="font-size:smaller"><references/></div> |
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| | ==منابع== | | ==منابع== |
| − | | + | * [[تفسیر نور]]، [[محسن قرائتی]]، [[تهران]]:مركز فرهنگى درسهايى از قرآن، 1383 ش، چاپ يازدهم |
| − | *[[تفسیر نور]]، [[محسن قرائتی]]، [[تهران]]:مركز فرهنگى درسهايى از قرآن، 1383 ش، چاپ يازدهم | + | * [[اطیب البیان فی تفسیر القرآن]]، [[سید عبدالحسین طیب]]، تهران:انتشارات اسلام، 1378 ش، چاپ دوم |
| − | *[[اطیب البیان فی تفسیر القرآن]]، [[سید عبدالحسین طیب]]، تهران:انتشارات اسلام، 1378 ش، چاپ دوم | + | * [[تفسیر اثنی عشری]]، [[حسین حسینی شاه عبدالعظیمی]]، تهران:انتشارات ميقات، 1363 ش، چاپ اول |
| − | *[[تفسیر اثنی عشری]]، [[حسین حسینی شاه عبدالعظیمی]]، تهران:انتشارات ميقات، 1363 ش، چاپ اول | + | * [[تفسیر روان جاوید]]، [[محمد ثقفی تهرانی]]، تهران:انتشارات برهان، 1398 ق، چاپ سوم |
| − | *[[تفسیر روان جاوید]]، [[محمد ثقفی تهرانی]]، تهران:انتشارات برهان، 1398 ق، چاپ سوم | + | * [[برگزیده تفسیر نمونه]]، [[ناصر مکارم شیرازی]] و جمعي از فضلا، تنظیم احمد علی بابایی، تهران: دارالکتب اسلامیه، ۱۳۸۶ش |
| − | *[[برگزیده تفسیر نمونه]]، [[ناصر مکارم شیرازی]] و جمعي از فضلا، تنظیم احمد علی بابایی، تهران: دارالکتب اسلامیه، ۱۳۸۶ش | + | * [[تفسیر راهنما]]، [[علی اکبر هاشمی رفسنجانی]]، [[قم]]:بوستان كتاب(انتشارات دفتر تبليغات اسلامي حوزه علميه قم)، 1386 ش، چاپ پنجم |
| − | *[[تفسیر راهنما]]، [[علی اکبر هاشمی رفسنجانی]]، [[قم]]:بوستان كتاب(انتشارات دفتر تبليغات اسلامي حوزه علميه قم)، 1386 ش، چاپ پنجم | |
| | | | |
| | [[رده:آیات سوره حجر]] | | [[رده:آیات سوره حجر]] |
| | [[رده:ترجمه و تفسیر آیات قرآن]] | | [[رده:ترجمه و تفسیر آیات قرآن]] |