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| سطر ۱: |
سطر ۱: |
| − | {{قرآن در قاب|وَقَضَيْنَا إِلَيْهِ ذَٰلِكَ الْأَمْرَ أَنَّ دَابِرَ هَٰؤُلَاءِ مَقْطُوعٌ مُصْبِحِينَ|سوره=15|آیه =66}} | + | {{قرآن در قاب|وَأَتَيْنَاكَ بِالْحَقِّ وَإِنَّا لَصَادِقُونَ|سوره=15|آیه =64}} |
| | {{مشخصات آیه | | {{مشخصات آیه |
| − | |شماره آیه = 66 | + | |شماره آیه = 64 |
| − | |شماره بعدی = 67 | + | |شماره بعدی = 65 |
| − | |شماره قبلی = 65 | + | |شماره قبلی = 63 |
| | |سوره= حجر | | |سوره= حجر |
| | |شماره سوره= 15 | | |شماره سوره= 15 |
| سطر ۱۲: |
سطر ۱۲: |
| | <tabber> | | <tabber> |
| | الهی قمشهای= | | الهی قمشهای= |
| − | و بر او این فرمان را وحی کردیم که قومت تا آخرین افراد، صبحگاه هلاک میشوند. | + | و به حق و راستی به سوی تو آمدهایم و آنچه گوییم صدق محض است. |
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| | انصاریان= | | انصاریان= |
| − | ما [کیفیت] این حادثه [بزرگ] را به او وحی کردیم که هنگامی که مجرمان وارد صبح شوند، بنیادشان برکنده خواهد شد. | + | و ما واقعیتی قطعی و مسلّم را [که همان عذاب الهی است، جهت نابودی مردم] برای تو آورده ایم و یقیناً راستگوییم. |
| | |-| | | |-| |
| | فولادوند= | | فولادوند= |
| − | و او را از اين امر آگاه كرديم كه ريشه آن گروه صبحگاهان بريده خواهد شد. | + | و حق را براى تو آوردهايم و قطعاً ما راستگويانيم، |
| | |-| | | |-| |
| | آیتی= | | آیتی= |
| − | و براى او حادثه را حكايت كرديم كه چون صبح فرارسد ريشه آنها بركنده شود. | + | ما تو را خبر راست آوردهايم و ما راستگويانيم. |
| | |-| | | |-| |
| | مکارم شیرازی= | | مکارم شیرازی= |
| − | و ما به لوط این موضوع را وحی فرستادیم که صبحگاهان، همه آنها ریشهکن خواهند شد.
| + | ما واقعیّت مسلّمی را برای تو آوردهایم؛ و راست میگوییم! |
| | </tabber> | | </tabber> |
| | ==ترجمه های انگلیسی(English translations)== | | ==ترجمه های انگلیسی(English translations)== |
| | <tabber> | | <tabber> |
| | Qarai= | | Qarai= |
| − | {{چپ به راست|We apprised him of the matter that these will be rooted out by dawn.}} | + | {{چپ به راست|We bring you the truth, and indeed, we speak truly.}} |
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| | Shakir= | | Shakir= |
| − | {{چپ به راست|And We revealed to him this decree, that the roots of these shall be cut off in the morning.}} | + | {{چپ به راست|And we have come to you with the truth, and we are most surely truthful.}} |
| | |-| | | |-| |
| | Pickthall= | | Pickthall= |
| − | {{چپ به راست|And We made plain the case to him, that the root of them (who did wrong) was to be cut at early morn.}} | + | {{چپ به راست|And bring thee the Truth, and lo! we are truth-tellers.}} |
| | |-| | | |-| |
| | yusufali= | | yusufali= |
| − | {{چپ به راست|And We made known this decree to him, that the last remnants of those (sinners) should be cut off by the morning.}} | + | {{چپ به راست|"We have brought to thee that which is inevitably due, and assuredly we tell the truth.}} |
| | </tabber> | | </tabber> |
| | ==معانی کلمات آیه== | | ==معانی کلمات آیه== |
| − | «دابر»: آخر و ريشه.
| + | «أَتَیْنَاکَ بِالْحَقِّ»: حقیقت را برای تو آوردهایم. به پیش تو به حق آمدهایم و دروغی در کار نیست. |
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| − | قضينا: قضاء فيصله دادن به امر، قولى باشد يا فعلى، از خدا باشد يا از بشر و نيز به معنى صنع، حتم و بيان آيد.
| + | == تفسیر آیه == |
| − | آن در آيه، به معنى اعلام و خبر دادن است. قَضَيْنا إِلَيْهِ: به او اعلام كردم و خبر داديم.<ref>تفسیر احسن الحدیث، سید علی اکبر قرشی</ref>
| + | <tafsir sura="15" ayeh="64" /> |
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| − | ==تفسیر آیه==
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| − | <tabber>
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| − | تفسیر نور=
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| − | ===تفسیر نور (محسن قرائتی)===
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| − | {{ نمایش فشرده تفسیر|
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| − | قالُوا بَلْ جِئْناكَ بِما كانُوا فِيهِ يَمْتَرُونَ «63»
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| − | (فرشتگان) گفتند: در واقع ما آنچه را (از نزول عذاب كه) دربارهاش ترديد داشتند، براى تو آوردهايم
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| − | وَ أَتَيْناكَ بِالْحَقِّ وَ إِنَّا لَصادِقُونَ «64»
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| − | و ما به حقّ نزد تو آمدهايم و قطعاً ما راستگويانيم.
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| − | فَأَسْرِ بِأَهْلِكَ بِقِطْعٍ مِنَ اللَّيْلِ وَ اتَّبِعْ أَدْبارَهُمْ وَ لا يَلْتَفِتْ مِنْكُمْ أَحَدٌ وَ امْضُوا حَيْثُ تُؤْمَرُونَ «65»
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| − | پس خاندانت را پاسى از شب (گذشته) حركت بده و خودت از پشت سرشان برو و هيچيك از شما (به پشت سرش) توجّه نكند به آنجا كه مأمور شدهايد برويد.
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| − | وَ قَضَيْنا إِلَيْهِ ذلِكَ الْأَمْرَ أَنَّ دابِرَ هؤُلاءِ مَقْطُوعٌ مُصْبِحِينَ «66»
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| − | وبه لوط اين امر حتمى را رسانديم كه ريشه و بن اين گروهِ (تبهكار)، صبحگاهان قطع شده است.
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| − | ===نکته ها===
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| − | قرآن بارها مطرح كرده كه كفّار، تعجيل قهر و عذاب الهى را از انبيا درخواست مىكردند و
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| − | جلد 4 - صفحه 470
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| − | مىگفتند: «فَأْتِنا بِما تَعِدُنا إِنْ كُنْتَ مِنَ الصَّادِقِينَ» «1» و تمام هشدارها را شوخى گرفته و در مورد قهر خداوند چه در دنيا و چه در آخرت ترديد داشتند، خداوند در اين آيات بيان مىكند كه قهر مورد ترديد كفّار قطعاً خواهد آمد.
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| − | «قطع» جمع «قطعه» به قسمت عمدهى شب كه گذشته باشد، گفته مىشود.
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| − | ===پیام ها===
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| − | 1- هشدارها وتهديدهاى الهى را شوخى نگيريد. «جِئْناكَ»
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| − | 2- كيفرهاى الهى بر اساس عدل و حقّ و استحقاق مجرمان است. «بِالْحَقِّ»
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| − |
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| − | 3- از غفلت كفّار براى نجات مؤمنان استفاده كنيد. «فَأَسْرِ بِأَهْلِكَ بِقِطْعٍ مِنَ اللَّيْلِ»
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| − | 4- حركت انبيا، زير نظر وفرمان خداوند است. «تُؤْمَرُونَ»
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| − |
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| − | 5- در حوادث مهم لطف خدا لحظه به لحظه امداد مىكند. (هجرت در چه زمانى: «بِقِطْعٍ مِنَ اللَّيْلِ» با چه افرادى: «بِأَهْلِكَ» با چه روشى: «لا يَلْتَفِتْ مِنْكُمْ أَحَدٌ» وبه چه مقصدى: «حَيْثُ تُؤْمَرُونَ»
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| − |
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| − | 6- خداوند انبيا را قبل از هلاكت كفّار آگاه مىكند. «وَ قَضَيْنا إِلَيْهِ»
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| − | 7- خداوند قادر است در لحظهاى نسل و گروهى را نابود سازد. «دابِرَ»
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| − | ------
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| − | «1». اعراف، 70.
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| − | اثنی عشری=
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| − | ===تفسیر اثنی عشری (حسینی شاه عبدالعظیمی)===
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| − | {{نمایش فشرده تفسیر|
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| − | وَ قَضَيْنا إِلَيْهِ ذلِكَ الْأَمْرَ أَنَّ دابِرَ هؤُلاءِ مَقْطُوعٌ مُصْبِحِينَ (66)
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| − | وَ قَضَيْنا إِلَيْهِ ذلِكَ الْأَمْرَ: و وحى نموديم به سوى لوط عليه السّلام و خبر داديم او را آنچه نازل مىشود به قوم از عذاب. أَنَّ دابِرَ هؤُلاءِ مَقْطُوعٌ:
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| − | بدرستى كه دنباله اين جماعت بريده شده و بركنده است، يعنى هلاك شوندهاند از آخرشان، تا آنكه باقى نماند هيچ كس از آنان. مُصْبِحِينَ: وقت داخل شدن ايشان در صبح، و اين وقت تعيين هلاكشان باشد چنانكه در آيه
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| − |
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| − | جلد 7 - صفحه 127
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| − | ديگر فرمود: (إِنَّ مَوْعِدَهُمُ الصُّبْحُ) «1». حاصل آنكه: وقت صباح، عذاب استيصال سبحانى نازل، و تمام ايشان را فرا گيرد، و عقب و اثر و نسلى از آنها باقى نگذارد، و بنيادشان را ريشهكن نمايد.
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| − | تنبيه: آيات شريفه را نيز دو اشارت است:
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| − | 1- قوله (وَ لا يَلْتَفِتْ مِنْكُمْ أَحَدٌ) اگرچه خطاب در مورد خاصى است، لكن چون الفاظ قرآنى، عبرت به عموم لفظ است نه خصوص سبب، پس بنابراين مىتوان گفت كه بنده بايد در انجام وظائف طاعت حق، به كار خود مشغول، و ابدا توجه و التفاتى به غير نداشته باشد، بلكه تمام نظرياتش رضاى مولاى حقيقى باشد.
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| − | 2- قوله (أَنَّ دابِرَ هؤُلاءِ مَقْطُوعٌ) آگاهى است مخالفان حق را كه انهماك و فرو رفتن در سركشى و نافرمانى اوامر الهى و انكار اخبار آسمانى تيشه به ريشه خود زدن، و اساس خاندان را از بيخ و بن بركندن است؛ با سطوت قهارى، كجا قدرت برابرى؟ و با غضب سبحانى، كه را ياراى توانائى؟
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| − | }}
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| − | روان جاوید=
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| − | ===تفسیر روان جاوید (ثقفى تهرانى)===
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| − | {{نمایش فشرده تفسیر|
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| − | فَلَمَّا جاءَ آلَ لُوطٍ الْمُرْسَلُونَ (61) قالَ إِنَّكُمْ قَوْمٌ مُنْكَرُونَ (62) قالُوا بَلْ جِئْناكَ بِما كانُوا فِيهِ يَمْتَرُونَ (63) وَ أَتَيْناكَ بِالْحَقِّ وَ إِنَّا لَصادِقُونَ (64) فَأَسْرِ بِأَهْلِكَ بِقِطْعٍ مِنَ اللَّيْلِ وَ اتَّبِعْ أَدْبارَهُمْ وَ لا يَلْتَفِتْ مِنْكُمْ أَحَدٌ وَ امْضُوا حَيْثُ تُؤْمَرُونَ (65)
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| − |
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| − | وَ قَضَيْنا إِلَيْهِ ذلِكَ الْأَمْرَ أَنَّ دابِرَ هؤُلاءِ مَقْطُوعٌ مُصْبِحِينَ (66) وَ جاءَ أَهْلُ الْمَدِينَةِ يَسْتَبْشِرُونَ (67) قالَ إِنَّ هؤُلاءِ ضَيْفِي فَلا تَفْضَحُونِ (68) وَ اتَّقُوا اللَّهَ وَ لا تُخْزُونِ (69) قالُوا أَ وَ لَمْ نَنْهَكَ عَنِ الْعالَمِينَ (70)
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| − | قالَ هؤُلاءِ بَناتِي إِنْ كُنْتُمْ فاعِلِينَ (71) لَعَمْرُكَ إِنَّهُمْ لَفِي سَكْرَتِهِمْ يَعْمَهُونَ (72)
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| − | ترجمه
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| − | پس چون آمدند خانواده لوط را فرستادگان
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| − | گفت همانا شمائيد گروهى ناشناخته شدگان
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| − | گفتند بلكه آمديم تو را بآنچه بودند كه در آن شك ميكردند
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| − | و آورديم تو را براستى و بدرستيكه ماهر آينه راستگويانيم
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| − | پس بيرون
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| − | جلد 3 صفحه 259
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| − | بر خانواده خود را در پارهاى از شب و متابعت نما پشتهاشان را و نبايد روى بر گرداند از شما احدى و برويد بجائيكه مأمور ميشويد
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| − | و فرمان فرستاديم بسوى او اين امر را كه دنباله اينها است بريده شده در حاليكه صبح كنندگانند
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| − | و آمدند اهل شهر كه مژده ميدادند بيكديگر
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| − | گفت همانا اينها مهمانان منند پس رسوا مكنيد مرا
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| − | و بترسيد از خدا و خوار مسازيد مرا
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| − | گفتند آيا منع نكرديم تو را از اهل عالم
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| − | گفت اينها دختران منند اگر باشيد بجا آورندگان
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| − | بجان تو كه آنها هر آينه در مستيشان حيران ميزيستند.
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| − | تفسير
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| − | شرح ورود ملائكه بعنوان مهمانى بر حضرت لوط و نشناختن او ايشانرا و بيم او از تعرّض قوم خود بايشان و اطلاع قوم و تعرض آنها و عجز آنحضرت از دفاع و كيفيت اضطرار و التماس او بآنها و اجابت ننمودن قوم و پس از اين وقايع شناختن حضرت ملائكه را و نزول عذاب در سوره هود گذشت و تكرار نميشود ولى اينجا شمّهاى از وقايع قبل از شناختن حضرت لوط ملائكه را بعدا ذكر شده و چون ذكر نشناختن حضرت ايشانرا در اوّل قصّه شده بود معرّفى ملائكه از خودشان و مأموريّتشان بملاحظه مطابقه جواب با سؤال قبلا ذكر شده است و قضاياى قبل، تعرّض اهل شهر بآنحضرت و مهمانها است كه از فرشتگان بودند و اجمال قصه بطوريكه حلّ مشكلات اين مقام شود آنستكه چون فرستادگان خدا كه ملائكه بودند بر لوط عليه السّلام و خانواده او وارد شدند حضرت لوط ايشانرا نشناخت و چون اطمينان كامل از قصد آنها نداشت كه خير است يا شرّ معرفى ايشان از خودشان و غرضشان از ورود بر خودش را خواستار گشت و آنها در جواب عرضه داشتند كه ما فرستادگان خداونديم و آمدهايم براى عذاب قومت كه شك داشتند در آن نزد تو بامر خدا كه بر حقّ و يقينى است و ما راستگويانيم پس خودت با اهل خانهات بعد از نصف شب حركت كن آنها جلو بروند و تو در دنبال باش كه متوجّه و نگهبان آنها باشى و كسى از شما متوجّه به پشت سر خود نشود تا متأثر شود از كيفيت عذاب قوم و بجانب مأموريّت خودتان سير كنيد تا بمكانيكه براى شما تعيين شده كه بعضى گفتهاند شام بوده برسيد و خداوند حكم فرمود و فرستاد بسوى حضرت لوط اين امر را و آن آنست كه نسل قوم او قطع شود و تا صبح يكنفر از آنها باقى نماند و چون خبر ورود مهمانهاى خوب صورت بر او بقوم رسيد كه اهل شهر سدوم بودند بيكديگر
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| − | جلد 3 صفحه 260
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| − | مژده دادند و براى فجور و عمل ناشايسته بخانه حضرت لوط روى نمودند و او بآنها فرمود اينها مهمانان منند مرا براى اين عمل ناشايسته با آنها رسوا و مفتضح نكنيد و از خدا بترسيد و مرا خوار و خجل ننمائيد و آنها جواب گفتند آيا ما تو را نهى ننموديم كه از كسى مهمانى نكنى و از ورود اهل عالم بر خود امتناع نمائى و او در جواب فرمود اين دختران شهر كه بمنزله دختران منند كه پدر روحانى آنها هستم چه عيب دارند كه شما بخيال پسران افتادهايد يا بچند نفر از رؤساء آنها كه قبلا خواستگارى از دختران آنحضرت كرده بودند و اجابت نفرموده بود فرمود كه اينها دختران منند حاضرم آنها را برسم زنيّت بشما بدهم اگر حاضريد بشرط آنكه دست از مهمانان من بكشيد و آنها قبول ننمودند لذا خداوند بجان پيغمبر خود قسم ياد فرموده كه آنها در مستى و غفلت و غوايت متحيّر و سرگردان بودند و اين مثبت فضيلتى براى حضرت ختمى مرتبت است بر ساير انبياء چون خداوند بعمر و جان هيچيك از انبياء قسم ياد نفرموده است ..
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| − | }}
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| − | اطیب البیان=
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| − | ===اطیب البیان (سید عبدالحسین طیب)===
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| − | {{نمایش فشرده تفسیر|
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| − | وَ قَضَينا إِلَيهِ ذلِكَ الأَمرَ أَنَّ دابِرَ هؤُلاءِ مَقطُوعٌ مُصبِحِينَ (66)
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| − | و گذارش داديم بحضرت لوط اينکه هلاكت قوم را که ريشه آنها كنده ميشود صبحگاه که صبح ميكنند گويا حضرت لوط پس از آنكه معلوم شد که اينها براي هلاكت قوم آمدند تقاضا كرد که تعجيل كنند در اهلاك قوم بخلاف ابراهيم که تقاضاي عفو نمود که ميفرمايد:
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| − | يُجادِلُنا فِي قَومِ لُوطٍ هود آيه 77.
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| − | وَ قَضَينا إِلَيهِ يعني گفتند که همين اول صبح عملي ميشود خيالت راحت باشد، چنانچه در سوره هود آيه 83 ميفرمايد: إِنَّ مَوعِدَهُمُ الصُّبحُ أَ لَيسَ الصُّبحُ بِقَرِيبٍ.
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| − |
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| − | (ذلِكَ الأَمرَ) هلاكت قوم را (أَنَّ دابِرَ هؤُلاءِ) هفت شهر لوط رجالا و نساء با جميع اموال و زخارف و حيوانات آنها (مَقطُوعٌ مُصبِحِينَ) قطع دابر بكلي از بين رفتنست و ريشه كن شدن.
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| − | }}
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| − | برگزیده تفسیر نمونه=
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| − | ===برگزیده تفسیر نمونه===
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| − | {{نمایش فشرده تفسیر|
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| − | ]
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| − | (آیه 66)- سپس لحن کلام تغییر مییابد و خداوند میفرماید: «ما به لوط چگونگی این امر را وحی فرستادیم که به هنگام طلوع صبح همگی ریشه کن خواهند شد، به گونهای که حتی یک نفر از آنها باقی نماند» (وَ قَضَیْنا إِلَیْهِ ذلِکَ الْأَمْرَ أَنَّ دابِرَ هؤُلاءِ مَقْطُوعٌ مُصْبِحِینَ).
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| − | }}
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| − | سایر تفاسیر=
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| − | سایرتفاسیر این آیه را می توانید در سایت قرآن مشاهده کنید:
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| − | ==تفسیر های فارسی==
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| − | ==={{ترجمه تفسیر المیزان|سوره=15 |آیه=66}}===
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| − | ==={{تفسیر خسروی|سوره=15 |آیه=66}}===
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| − | ==={{تفسیر عاملی|سوره=15 |آیه=66}}===
| |
| − | ==={{تفسیر جامع|سوره=15 |آیه=66}}===
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| − |
| |
| − | ==تفسیر های عربی==
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| − | ==={{تفسیر المیزان|سوره=15 |آیه=66}}===
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| − | ==={{تفسیر مجمع البیان|سوره=15 |آیه=66}}===
| |
| − | ==={{تفسیر نور الثقلین|سوره=15 |آیه=66}}===
| |
| − | ==={{تفسیر الصافی|سوره=15 |آیه=66}}===
| |
| − | ==={{تفسیر الکاشف|سوره=15 |آیه=66}}===
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| − | </tabber>
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| | ==پانویس== | | ==پانویس== |
| − | <div style="font-size:smaller"><references /></div> | + | <div style="font-size:smaller"><references/></div> |
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| | ==منابع== | | ==منابع== |
| − | | + | * [[تفسیر نور]]، [[محسن قرائتی]]، [[تهران]]:مركز فرهنگى درسهايى از قرآن، 1383 ش، چاپ يازدهم |
| − | *[[تفسیر نور]]، [[محسن قرائتی]]، [[تهران]]:مركز فرهنگى درسهايى از قرآن، 1383 ش، چاپ يازدهم | + | * [[اطیب البیان فی تفسیر القرآن]]، [[سید عبدالحسین طیب]]، تهران:انتشارات اسلام، 1378 ش، چاپ دوم |
| − | *[[اطیب البیان فی تفسیر القرآن]]، [[سید عبدالحسین طیب]]، تهران:انتشارات اسلام، 1378 ش، چاپ دوم | + | * [[تفسیر اثنی عشری]]، [[حسین حسینی شاه عبدالعظیمی]]، تهران:انتشارات ميقات، 1363 ش، چاپ اول |
| − | *[[تفسیر اثنی عشری]]، [[حسین حسینی شاه عبدالعظیمی]]، تهران:انتشارات ميقات، 1363 ش، چاپ اول | + | * [[تفسیر روان جاوید]]، [[محمد ثقفی تهرانی]]، تهران:انتشارات برهان، 1398 ق، چاپ سوم |
| − | *[[تفسیر روان جاوید]]، [[محمد ثقفی تهرانی]]، تهران:انتشارات برهان، 1398 ق، چاپ سوم | + | * [[برگزیده تفسیر نمونه]]، [[ناصر مکارم شیرازی]] و جمعي از فضلا، تنظیم احمد علی بابایی، تهران: دارالکتب اسلامیه، ۱۳۸۶ش |
| − | *[[برگزیده تفسیر نمونه]]، [[ناصر مکارم شیرازی]] و جمعي از فضلا، تنظیم احمد علی بابایی، تهران: دارالکتب اسلامیه، ۱۳۸۶ش | + | * [[تفسیر راهنما]]، [[علی اکبر هاشمی رفسنجانی]]، [[قم]]:بوستان كتاب(انتشارات دفتر تبليغات اسلامي حوزه علميه قم)، 1386 ش، چاپ پنجم |
| − | *[[تفسیر راهنما]]، [[علی اکبر هاشمی رفسنجانی]]، [[قم]]:بوستان كتاب(انتشارات دفتر تبليغات اسلامي حوزه علميه قم)، 1386 ش، چاپ پنجم | |
| | | | |
| | [[رده:آیات سوره حجر]] | | [[رده:آیات سوره حجر]] |
| | [[رده:ترجمه و تفسیر آیات قرآن]] | | [[رده:ترجمه و تفسیر آیات قرآن]] |