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| سطر ۴۳: |
سطر ۴۳: |
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| | == تفسیر آیه == | | == تفسیر آیه == |
| − | <tabber> | + | <tafsir sura="77" ayeh="47" /> |
| − | تفسیر نور=
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| − | ===تفسیر نور (محسن قرائتی)===
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| − | {{ نمایش فشرده تفسیر|
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| − | كُلُوا وَ تَمَتَّعُوا قَلِيلًا إِنَّكُمْ مُجْرِمُونَ «46» وَيْلٌ يَوْمَئِذٍ لِلْمُكَذِّبِينَ «47» وَ إِذا قِيلَ لَهُمُ ارْكَعُوا لا يَرْكَعُونَ «48» وَيْلٌ يَوْمَئِذٍ لِلْمُكَذِّبِينَ «49» فَبِأَيِّ حَدِيثٍ بَعْدَهُ يُؤْمِنُونَ «50»
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| − | بخوريد و بهره گيريد اندك كه همانا شما مجرميد. در آن روز واى بر تكذيب كنندگان. و هر گاه به آنان گفته شود ركوع كنيد، ركوع نمىكنند. در آن روز واى بر تكذيب كنندگان. پس بعد از اين (قرآن) به كدامين سخن ايمان مىآورند؟
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| − | جلد 10 - صفحه 355
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| − | ===نکته ها===
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| − | پزشك در دو حالت به بيمار اجازه مىدهد كه هر غذايى را بخورد: يكى آنجا كه بيمار درمان گشته و سالم است و ديگر آنجا كه بيمارى فرد لاعلاج و بدون درمان است و پزشك از بهبود او مأيوس شده است. در قرآن نيز فرمان «كُلُوا» گاهى نشانه اميد و سلامتى است و گاهى نشانه قهر الهى، چنانكه در آيات خداوند خطاب به مجرمان مىفرمايد: «كُلُوا وَ تَمَتَّعُوا قَلِيلًا إِنَّكُمْ مُجْرِمُونَ» و نظير آيه «اعْمَلُوا ما شِئْتُمْ» «1» هر كارى مىخواهيد، بكنيد.
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| − | پيامبر اكرم صلى الله عليه و آله به قبيله ثقيف دستور نماز داد، آنها گفتند: ما در برابر كسى خم و راست نمىشويم. حضرت فرمود: دينى كه ركوع و سجود در آن نباشد، خيرى نيست. «لا خير فى دين ليس فيه ركوع و لا سجود» «2»
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| − | بعد از فتح مكّه پيامبر اكرم صلى الله عليه و آله از همسر ابوسفيان (مادر معاويه) پرسيد: اسلام را چگونه مىبينى؟ گفت: اسلام خوب است مگر سه چيز آن: حجاب، اذان بلال، ركوع و سجود.
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| − | پيامبر در پاسخ فرمود: امّا حجاب بهترين پوشش است و نماز بدون ركوع و سجود نماز نيست و بلال نيز بهترين بنده است. «3»
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| − | «حَدِيثٍ» به معناى سخن جديد و تازه است كه از ديگران سابقه ندارد.
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| − | حضرت ابراهيم پس از تجديد بناى كعبه از خداوند خواست تا فقط به اهل ايمان روزى دهد. «وَ ارْزُقْ أَهْلَهُ مِنَ الثَّمَراتِ مَنْ آمَنَ مِنْهُمْ» امّا خداوند فرمود: من در دنيا به كفّار نيز روزى مىدهم و حساب قيامت از دنيا جداست. وَ مَنْ كَفَرَ فَأُمَتِّعُهُ ... «4»
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| − | ركوع از اركان نماز و مشخصه و نشانه ويژه نماز است، زيرا سجده به خودى خود و خارج از نماز نيز محقق مىشود، مانند سجده شكر. ولى ركوع جايگاهى جز نماز ندارد و لذا درباره نماز كلمه ركعت به كار مىرود. «إِذا قِيلَ لَهُمُ ارْكَعُوا لا يَرْكَعُونَ»
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| − | «1». فصلت، 40.
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| − | «2». بحار، ج 17، ص 52.
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| − | «3». تفسير الكاشف.
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| − | «4». بقره، 126.
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| − | جلد 10 - صفحه 356
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| − | ===پیام ها===
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| − | 1- كاميابى دنيا نسبت به كاميابى آخرت، بسيار ناچيز است. «كُلُوا وَ تَمَتَّعُوا قَلِيلًا»
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| − | 2- كاميابى از نعمتهاى دنيا، نشانه محبوبيّت نزد خداوند نيست. (مجرمان نيز بهرهمند مىشوند.) «كُلُوا وَ تَمَتَّعُوا قَلِيلًا إِنَّكُمْ مُجْرِمُونَ»
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| − | 3- بهره مجرمان از نعمتهاى الهى، فقط بهره مادّى است. كُلُوا وَ تَمَتَّعُوا ... إِنَّكُمْ مُجْرِمُونَ
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| − | 4- زندگى دنيا هر قدر هم طولانى باشد، نسبت به آخرت ناچيز است. «تَمَتَّعُوا قَلِيلًا»
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| − | 5- از نشانههاى تكذيب عملى دين، ترك نماز است. (ترك نماز در ميان دو كلمه «مكذبين» قرار گرفته است.) «وَيْلٌ يَوْمَئِذٍ لِلْمُكَذِّبِينَ وَ إِذا قِيلَ لَهُمُ ارْكَعُوا لا يَرْكَعُونَ وَيْلٌ يَوْمَئِذٍ لِلْمُكَذِّبِينَ»
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| − | 6- انكار دين وارتكاب جرم، ملازم يكديگرند. «إِنَّكُمْ مُجْرِمُونَ وَيْلٌ يَوْمَئِذٍ لِلْمُكَذِّبِينَ»
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| − | 7- قرآن، شيواترين، تازهترين و شايستهترين پيام براى مردم است. «فَبِأَيِّ حَدِيثٍ»
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| − | 8- مطالب قرآن هرگز كهنه نمىشود و در هر زمان، نو و تازه است. «فَبِأَيِّ حَدِيثٍ بَعْدَهُ»
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| − | 9- اگر كسى به قرآن ايمان نياورد، به كدام سخن ايمان خواهد آورد. «فَبِأَيِّ حَدِيثٍ بَعْدَهُ يُؤْمِنُونَ»
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| − | «والحمد للّه ربّ العالمين»
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| − | جلد 10 - صفحه 358
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| − | اثنی عشری=
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| − | ===تفسیر اثنی عشری (حسینی شاه عبدالعظیمی)===
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| − | وَيْلٌ يَوْمَئِذٍ لِلْمُكَذِّبِينَ (47)
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| − | وَيْلٌ يَوْمَئِذٍ: واى و ويل در اين روز، لِلْمُكَذِّبِينَ: مر تكذيب كنندگان راست كه به دروغ پنداشتند عذاب اليم را. خطاب به مكذبان در دنياست، يعنى اى كسانى كه به زخارف دنيا مغرور و به جمع حطام دنيا مشغوليد و پشت به آخرت كردهايد، از دنيا برخوردار و بهرهور شويد زمانى اندك، كه شما كافريد و مال اندك و عمر كوتاه، زود به آخر رسد و به عذاب آخرت گرفتار گرديد.
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| − | روان جاوید=
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| − | ===تفسیر روان جاوید (ثقفى تهرانى)===
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| − | إِنَّ الْمُتَّقِينَ فِي ظِلالٍ وَ عُيُونٍ (41) وَ فَواكِهَ مِمَّا يَشْتَهُونَ (42) كُلُوا وَ اشْرَبُوا هَنِيئاً بِما كُنْتُمْ تَعْمَلُونَ (43) إِنَّا كَذلِكَ نَجْزِي الْمُحْسِنِينَ (44) وَيْلٌ يَوْمَئِذٍ لِلْمُكَذِّبِينَ (45)
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| − | كُلُوا وَ تَمَتَّعُوا قَلِيلاً إِنَّكُمْ مُجْرِمُونَ (46) وَيْلٌ يَوْمَئِذٍ لِلْمُكَذِّبِينَ (47) وَ إِذا قِيلَ لَهُمُ ارْكَعُوا لا يَرْكَعُونَ (48) وَيْلٌ يَوْمَئِذٍ لِلْمُكَذِّبِينَ (49) فَبِأَيِّ حَدِيثٍ بَعْدَهُ يُؤْمِنُونَ (50)
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| − | ترجمه
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| − | همانا پرهيزكاران در زير سايهها و كنار چشمههايند
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| − | و ميوههائى از آنچه مايل ميباشند
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| − | بخوريد و بياشاميد گوارا باد بپاداش آنچه ميكرديد
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| − | همانا
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| − | جلد 5 صفحه 329
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| − | ما اينچنين پاداش ميدهيم نيكوكاران را
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| − | واى در اين روز بر تكذيب كنندگان
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| − | بخوريد و برخوردار شويد اندكى همانا شما گناه كارانيد
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| − | واى در اين روز بر تكذيب كنندگان
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| − | و چون گفته شود بآنها ركوع كنيد ركوع نميكنند
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| − | واى در اين روز بر تكذيب كنندگان
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| − | پس بكدام سخن بعد از آن ايمان ميآورند.
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| − | تفسير
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| − | چنانچه معمول در كلام الهى است بعد از بيان حال كفّار و فجّار خداوند شمّهئى از احوال اهل ايمان و تقوى را در روز قيامت بيان فرموده كه در سايههاى درختان بهشت و كنار چشمههاى جارى آن و ميوههاى گوناگون از هر نوع كه مايل باشند بسر ميبرند و بايشان گفته ميشود بخوريد و بياشاميد گواراى وجود شما در مقابل اعمال صالحه خودتان در دنيا اينچنين جزا و پاداش ميدهيم ما باهل تقوى و نيكوكاران واى در روز قيامت بحال كسانيكه منكر شدند در دنيا پاداش خدا را باهل تقوى در آخرت بايد بآنها گفت بخوريد و بهرهمند شويد در مدّت قليلى كه در دنيا هستيد بالاخره چون شما مجرم و گناه كاريد بمجازات اعمالتان خواهيد رسيد واى بحال كسانيكه منكر كمى و قلّت متاع دنيا نسبت بأمتعه كثيره آخرت شدند و اين را بجاى آن اختيار نمودند و چون در دنيا بآنها گفته شود نماز بخوانيد نميخوانند و از تعظيم در برابر خداوند عظيم تكبّر ميورزند و قمّى ره نقل نموده كه وقتى مأمور بتولّاى امام شوند قبول نمينمايند واى بحال منكرين نماز و ولايت در روز قيامت آيا بعد از قرآن معجز بيان پس بچه سخن و كدام خبر اين بىاعتقادان اعتقاد پيدا ميكنند در ثواب الاعمال و مجمع از امام صادق عليه السّلام نقل نموده كه هر كس سوره و المرسلات عرفا را بخواند خداوند ميان او و پيغمبر صلّى اللّه عليه و آله و سلّم آشنائى مىاندازد و الحمد للّه ربّ العالمين
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| − | جلد 5 صفحه 330
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| − | اطیب البیان=
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| − | ===اطیب البیان (سید عبدالحسین طیب)===
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| − | {{نمایش فشرده تفسیر|
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| − | وَيلٌ يَومَئِذٍ لِلمُكَذِّبِينَ (47) وَ إِذا قِيلَ لَهُمُ اركَعُوا لا يَركَعُونَ (48) وَيلٌ يَومَئِذٍ لِلمُكَذِّبِينَ (49) فَبِأَيِّ حَدِيثٍ بَعدَهُ يُؤمِنُونَ (50)
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| − | جلد 17 - صفحه 347
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| − | و زماني که گفته شد بآنها که ركوع كنيد ركوع نميكنند ويل در آن روز براي تكذيب كنندگان است پس بچه حديثي بعد از او ايمان ميآورند.
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| − | وَ إِذا قِيلَ لَهُمُ اركَعُوا لا يَركَعُونَ بعضي گفتند: مراد نماز است که امر بصلاة آمد و اطاعت نكردند، و بعضي گفتند: مراد روز قيامت است که قدرت بر خم شدن ندارند چنانچه ميفرمايد: يَومَ يُكشَفُ عَن ساقٍ وَ يُدعَونَ إِلَي السُّجُودِ فَلا يَستَطِيعُونَ قلم آيه 42.
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| − | اقول: ركوع تعظيم است چنانچه در مقابل سلاطين خم ميشوند و از همين جا است که ذكر ركوع سبحان ربي العظيم و بحمده شده، و سجود كوچكي و تسليم و خضوع و خشوع است و لذا شيطان زير بار سجده آدم نرفت و نسبت باو كوچكي نكرد و ذكر سجده سبحان ربي الاعلي و بحمده شده. بعلاوه اينکه خطاب به مكذبين است که اصلا ايمان نياوردهاند مناسبت ندارد که بآنها امر بصلاة كنند بايد امر بايمان كنند و تصديق رسالت حضرت را بكنند و همچنين مناسبت با قيامت ندارد زيرا تنظير بآيه يدعون الي السجود بي مناسبت است زيرا يدعون الي السجود را ميفرمايد فلا يستطيعون نميتوانند و در اينجا ميفرمايد: لا يَركَعُونَ که مذمت ميكند آنها را و عصيان ميكنند. پس معني آنچه بنظر نزديك ميآيد اينكه تسليم شويد و اطاعت كنيد و در پيشگاه عظمت پروردگار منقاد شويد تكبر ميكنند و سر فرود نميآورند.
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| − | وَيلٌ يَومَئِذٍ لِلمُكَذِّبِينَ تفسيرش گذشت.
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| − | فَبِأَيِّ حَدِيثٍ بَعدَهُ يُؤمِنُونَ جايي که مثل قرآن و معجزات صادره از پيغمبر اكرم و احكام متقنه اسلام را قبول نكنند ديگر به چه چيز ايمان ميآورند بالاتر از اينکه چيست. هذا آخر ما اردنا في تفسير هذه السورة بحمد اللّه و توفيقه، و يتلوه ان شاء اللّه تعالي سورة النبأ و بقية السور من الجزء الاخير من القرآن و الحمد للّه و الصلاة و السلام علي رسولا اللّه و آله آل اللّه و ساير رسل اللّه و اللعن الدائم علي اعدائهم اعداء اللّه الي يوم لقاء اللّه، و انا السيد عبد الحسين المدعو بالطيب.
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| − | جلد 17 - صفحه 348
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| − | سورة النبإ
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| − | مفسرين گفتند: مكي است لكن از اخبار بسيار از ائمه اطهار استفاده ميشود که مدني است چنانچه اشاره ميشود.
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| − | اما فضلها از إبن بابويه مسندا از حضرت صادق (ع):
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| − | (من قرأ عم يتساءلون لم تخرج سنة اذا کان يد منها في کل يوم حتي يزور بيت اللّه الحرام ان شاء اللّه تعالي).
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| − | و از آن حضرت مرسلا روايت شده که مسافر اگر در شب قرائت كند از دزد محفوظ ميماند و از حضرت رسول روايت شده که فرمود:
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| − | (من قرأها و حفظها لم يكن حسابه يوم القيامة الا كمقدار سورة مكتوبة حتي يدخل الجنة)
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| − | و در حديث ديگر:
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| − | (بمقدار صلوة واحدة)
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| − | و غير اينها.
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| − | برگزیده تفسیر نمونه=
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| − | ===برگزیده تفسیر نمونه===
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| − | {{نمایش فشرده تفسیر|
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| − | (آیه 47)- سپس این تهدید را بار دیگر با جمله: «وای در آن روز بر تکذیب کنندگان» تکمیل میکند (ویل یومئذ للمکذبین).
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| − | همانها که به زرق و برق دنیا و لذات و شهوات آن مغرور و فریفته شدند، و عذاب الهی را برای خود خریدند.
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| − | سایر تفاسیر=
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| − | سایرتفاسیر این آیه را می توانید در سایت قرآن مشاهده کنید:
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| − | ==تفسیر های فارسی==
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| − | ==={{ترجمه تفسیر المیزان|سوره=77 |آیه=47}}===
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| − | ==={{تفسیر خسروی|سوره=77 |آیه=47}}===
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| − | ==={{تفسیر عاملی|سوره=77 |آیه=47}}===
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| − | ==={{تفسیر جامع|سوره=77 |آیه=47}}===
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| − |
| |
| − | ==تفسیر های عربی==
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| − | ==={{تفسیر المیزان|سوره=77 |آیه=47}}===
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| − | ==={{تفسیر مجمع البیان|سوره=77 |آیه=47}}===
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| − | ==={{تفسیر نور الثقلین|سوره=77 |آیه=47}}===
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| − | ==={{تفسیر الصافی|سوره=77 |آیه=47}}===
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| − | ==={{تفسیر الکاشف|سوره=77 |آیه=47}}===
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| − | </tabber>
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| | ==پانویس== | | ==پانویس== |