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| سطر ۴۵: |
سطر ۴۵: |
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| | == تفسیر آیه == | | == تفسیر آیه == |
| − | <tabber> | + | <tafsir sura="19" ayeh="19" /> |
| − | تفسیر نور=
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| − | ===تفسیر نور (محسن قرائتی)===
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| − | {{ نمایش فشرده تفسیر|
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| − | قالَتْ إِنِّي أَعُوذُ بِالرَّحْمنِ مِنْكَ إِنْ كُنْتَ تَقِيًّا «18»
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| − | (مريم به آن فرشته) گفت: همانا من از تو به خداى رحمان پناه مىبرم، اگر پرهيزكارى (از من دور شو).
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| − | قالَ إِنَّما أَنَا رَسُولُ رَبِّكِ لِأَهَبَ لَكِ غُلاماً زَكِيًّا «19»
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| − | (فرشته) گفت: همانا من فرستادهى پروردگار توام (و آمدهام) تا پسرى پاكيزه به تو بخشم.
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| − | قالَتْ أَنَّى يَكُونُ لِي غُلامٌ وَ لَمْ يَمْسَسْنِي بَشَرٌ وَ لَمْ أَكُ بَغِيًّا «20»
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| − | (مريم) گفت: چگونه ممكن است براى من فرزندى باشد؟ در حالى كه نه بشرى با من تماس گرفته و نه من بدكاره بودهام.
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| − | جلد 5 - صفحه 255
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| − | ===نکته ها===
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| − | «زكىّ»، از ريشهى «زكوة» به معناى طهارت، نموّ و بركت است و «بَغِيًّا» در اينجا به معناى زناكار است.
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| − | در اين سوره، بارها به مسأله هبه كردن فرزند از طرف خداوند اشاره شده است: در آيهى 19، هبهى عيسى به مريم و در آيهى 49، هبهى اسحاق و يعقوب به ابراهيم و در آيهى 53، هبهى هارون به موسى و در آيهى 7، بشارت فرزند به زكريّا مطرح شده است.
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| − | ===پیام ها===
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| − | 1- افراد پاكدامن با احساس احتمال گناه به خود مىلرزند و به خدا پناه مىبرند. قالَتْ إِنِّي أَعُوذُ ...
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| − | 2- بهترين پناهگاه، رحمت الهى است. «أَعُوذُ بِالرَّحْمنِ»
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| − | 3- استعاذه و پناه بردن به خداى متعال، يكى از سفارشهاى خداوند به انبيا و سيرهى پيامبران و اولياى الهى است. «1» «أَعُوذُ بِالرَّحْمنِ»
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| − | 4- به حريم افراد، نبايد سرزده وارد شد. «أَعُوذُ بِالرَّحْمنِ مِنْكَ»
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| − | 5- خلوت كردن زن با مرد اجنبى خطرناك است. «إِنِّي أَعُوذُ بِالرَّحْمنِ مِنْكَ»
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| − | 6- در نهى از منكر، از غيرت دينى افراد استفاده كنيد. «إِنْ كُنْتَ تَقِيًّا»
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| − | 7- تقوا، راه پاكدامنى وعامل بازدارنده از گناه است. «إِنْ كُنْتَ تَقِيًّا»
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| − | 8- معرّفى خود براى رفع تهمت و نگرانى مردم، لازم است. «إِنَّما أَنَا رَسُولُ رَبِّكِ»
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| − | 9- فرشتگان تنها مأمور ابلاغ وحى الهى نيستند، بلكه واسطهى افعال او نيز هستند. «رَسُولُ رَبِّكِ لِأَهَبَ لَكِ غُلاماً»
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| − | 10- فرزند داشتن ارزش ولى بالاتر از آن پاكى فرزند است. «لِأَهَبَ لَكِ غُلاماً زَكِيًّا»
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| − | 11- زنا عملى منفور در تمام اديان آسمانى است. «وَ لَمْ أَكُ بَغِيًّا»
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| − | «1». واژههاى «اعوذ، فاستَعذ و عُذت» در قرآن بيانگر اين مطلب است.
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| − | تفسير نور(10جلدى)، ج5، ص: 256
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| − | اثنی عشری=
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| − | ===تفسیر اثنی عشری (حسینی شاه عبدالعظیمی)===
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| − | {{نمایش فشرده تفسیر|
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| − | قالَ إِنَّما أَنَا رَسُولُ رَبِّكِ لِأَهَبَ لَكِ غُلاماً زَكِيًّا «19»
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| − | جبرئيل چون اضطراب مريم را مشاهده نمود:
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| − | قالَ إِنَّما أَنَا رَسُولُ رَبِّكِ: گفت جز اين نيست كه من فرستاده پروردگار تو هستم، يعنى خدائى كه به ذات او پناه مىبرى مرا بسوى تو فرستاده. لِأَهَبَ لَكِ غُلاماً زَكِيًّا: تا ببخشم تو را، يعنى سبب و واسطه شوم در آنكه خداوند سبحان ببخشد به تو پسرى پاكيزه از ادناس شرك و معصيت و پرهيزكار و پارسا باشد. يا نمو و ترقى كننده در كارهاى شايسته پسنديده. ابن عباس گفته: مراد به زكى پيغمبر باشد، و بنابراين تسميه نبى به زكى از قبيل تسميه ملزوم است به اسم لازم.
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| − | روان جاوید=
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| − | ===تفسیر روان جاوید (ثقفى تهرانى)===
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| − | {{نمایش فشرده تفسیر|
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| − | وَ اذْكُرْ فِي الْكِتابِ مَرْيَمَ إِذِ انْتَبَذَتْ مِنْ أَهْلِها مَكاناً شَرْقِيًّا «16» فَاتَّخَذَتْ مِنْ دُونِهِمْ حِجاباً فَأَرْسَلْنا إِلَيْها رُوحَنا فَتَمَثَّلَ لَها بَشَراً سَوِيًّا «17» قالَتْ إِنِّي أَعُوذُ بِالرَّحْمنِ مِنْكَ إِنْ كُنْتَ تَقِيًّا «18» قالَ إِنَّما أَنَا رَسُولُ رَبِّكِ لِأَهَبَ لَكِ غُلاماً زَكِيًّا «19» قالَتْ أَنَّى يَكُونُ لِي غُلامٌ وَ لَمْ يَمْسَسْنِي بَشَرٌ وَ لَمْ أَكُ بَغِيًّا «20»
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| − | قالَ كَذلِكِ قالَ رَبُّكِ هُوَ عَلَيَّ هَيِّنٌ وَ لِنَجْعَلَهُ آيَةً لِلنَّاسِ وَ رَحْمَةً مِنَّا وَ كانَ أَمْراً مَقْضِيًّا «21»
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| − | ترجمه
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| − | و ياد كن در كتاب مريم را هنگاميكه كنارهگيرى كرد از كسانش در جائى از جانب مشرق
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| − | پس گرفت از برابر ايشان پردهاى پس فرستاديم بسوى او روح خودمان را پس متمثّل شد براى او بصورت انسانى درست اندام
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| − | گفت همانا من پناه ميبرم بخداى بخشنده از تو اگر هستى پرهيزكار
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| − | گفت نيستم من مگر فرستاده پروردگارت تا ببخشم بتو پسر پاكيزهاى
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| − | گفت از كجا ميباشد مرا پسرى با آنكه دست نرسانده بمن انسانى و نبودم زناكار
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| − | گفت اينچنين گفت پروردگار تو كه آن بر من آسان است و تا بگردانم آنرا علامتى براى مردم و رحمتى از ما و بوده است امرى مقرّر شده.
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| − | تفسير
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| − | خداوند تعالى بعد از قصّه حضرت زكريّا و يحيى شروع بذكر قصّه مريم و عيسى عليه السّلام نمود براى نسبت ايشان با يكديگر و شباهت احوالشان و اينكه قدرت خداوند در ولادت عيسى عليه السّلام بىپدر بيشتر ظاهر شد از ولادت يحيى از پدر پير و مادر نازا باين تقريب كه فرمود اى پيغمبر صلّى اللّه عليه و آله و سلّم ياد كن در قرآن از قصّه مريم بنت عمران وقتى كه اعتزال و كنارهگيرى نمود از اقوام و عشاير خود براى عبادت در مكانيكه از اماكن شرقى بود براى آنكه آفتاب رو باشد و بعضى گفتهاند ميخواست غسل كند و سرش را شانه نمايد و پردهاى آويخت براى آنكه از كسانش مستور باشد و از اينجا معلوم ميشود كه حجاب در شرايع سابقه هم ثابت بوده و اختصاص بدين مقدّس اسلام ندارد چون اگر نبود حضرت مريم عليها السلام از كسان خود اتّخاذ حجاب نميفرمود ناگاه جبرئيل كه ملقّب بروح الامين
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| − | جلد 3 صفحه 467
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| − | است از جانب خداوند نزد او آمد بصورت جوانى زيبا و خوش اندام مريم از نهايت عفّت بوحشت افتاد و گفت من پناه ميبرم بخداوند رحمن از تو اگر با تقوى و پرهيزكارى چون شخص خدا ترس اگر اتفاقا قصد سوئى به كسى داشته باشد اگر طرف از شرّ او پناه بخدا ببرد از آنقصد بر ميگردد و اگر متوجّه نباشد كه آن عمل سوء منافى با تقوى است متوجّه ميشود مانند آنكه بگويند اگر مسلمانى مردم آزارى مكن جبرئيل گفت آسوده خاطر باش كه من از طرف همان خداى رحمن كه پناه باو بردى آمدم تا ببخشم بتو از جانب او و بعضى بجاى لأهب ليهب قرائت نمودهاند يعنى تا ببخشد او بتو پسرى كه پاك و پاكيزه باشد از گناه و اخلاق رذيله بتوسط دميدن من در پيراهن تو روح او را مريم گفت از كجا باشد براى من چنين پسرى با آنكه دست بشرى بمن نرسيده از راه حلال و هيچگاه العياذ باللّه زناكار نبودم جبرئيل گفت اينچنين گفت پروردگار تو كه آن براى من آسان است و اين كار را ميكنم براى آنكه وجود آن پسر را از مثل تو زن پاك دامنى بدون پدر علامت و دليل قدرت خود قرار دهم براى خلق و تا رحمتى باشد از من بر بندگان كه هدايت و ارشاد شوند بتوسط او براه راست و دين حقّ و اين كار از قضاى حتم و حكم قطعى الهى بود كه در علم ازلى گذشته بود واقع شود و شد ..
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| − | اطیب البیان=
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| − | ===اطیب البیان (سید عبدالحسین طیب)===
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| − | {{نمایش فشرده تفسیر|
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| − | قالَ إِنَّما أَنَا رَسُولُ رَبِّكِ لِأَهَبَ لَكِ غُلاماً زَكِيًّا «19»
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| − | گفت روح الامين جز اينکه نيست و مقصد ديگري در نظر ندارم من فرستاده پروردگار تو هستم که ببخشم از براي تو غلامي که پاك و پاكيزه باشد قالَ إِنَّما كلمه حصر است يعني غرض سويي ندارم فقط أَنَا رَسُولُ رَبِّكِ رسالت حق دو نحوه است يكي رسالت بر بندگان بايد بشر باشد از جنس آنها تا بتواند با آنها تماس بگيرد و اگر هم ملك باشد بايد بصورت بشر باشد چنانچه ساره زوجه ابراهيم مشاهده آنها را كرد و دارد در اخبار که بر صدّيقه طاهره پس از رحلت پيغمبر نازل ميشدند و خدمت ميكردند و او را تسليت ميدادند بلكه در زمان حضرت رسول چنانچه سلمان ميگويد وارد شدم ديدم گهواره حسين عليه السّلام در حركت است و يكي ذكر خواب ميگويد.
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| − | جلد 12 - صفحه 429
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| − | ان في الجنة نهرا من لبن لعلي و حسين و حسن کل من کان محبا لهم يدخل الجنة من غير حزن
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| − | و آسياب ميگردد و يكي مشغول خدمات است و صديقه طاهره بخواب رفته خدمت پيغمبر صلّي اللّه عليه و اله رسيدم فرمود ملائكه براي خدمت فاطمه نازل ميشوند جبرئيل ذكر خواب ميگفت ميكائيل آسياب ميگردانيد اسرافيل ذكر ميگفت و تسبيح در دست فاطمه گردش ميكرد لذا بر مريم هم بصورة بشري نازل شد و گفت لِأَهَبَ لَكِ غُلاماً زَكِيًّا حضرت مريم دانست ملك است و فرستاده پروردگار است و براي اينکه بشارت آمده لكن تعجب كرد که چگونه ميشود او اولاد پيدا كند با اينكه شوهر ندارد لذا.
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| − | برگزیده تفسیر نمونه=
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| − | ===برگزیده تفسیر نمونه===
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| − | (آیه 19)- مریم با گفتن این سخن در انتظار عکس العمل آن مرد ناشناس
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| − | ج3، ص84
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| − | بود، انتظاری آمیخته با وحشت و نگرانی بسیار، اما این حالت دیری نپایید، ناشناس زبان به سخن گشود و مأموریت و رسالت عظیم خویش را چنین بیان کرد و «گفت:
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| − | من فرستاده پروردگار توام»! (قالَ إِنَّما أَنَا رَسُولُ رَبِّکِ)
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| − | .این جمله همچون آبی که بر آتش بریزد، به قلب پاک مریم آرامش بخشید.
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| − | ولی این آرامش نیز چندان طولانی نشد، چرا که بلا فاصله افزود: من آمدهام «تا پسر پاکیزهای (از نظر خلق و خوی و جسم و جان) به تو ببخشم»! (لِأَهَبَ لَکِ غُلاماً زَکِیًّا)
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| − | سایر تفاسیر=
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| − | سایرتفاسیر این آیه را می توانید در سایت قرآن مشاهده کنید:
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| − | ==تفسیر های فارسی==
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| − | ==={{ترجمه تفسیر المیزان|سوره=19 |آیه=19}}===
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| − | ==={{تفسیر خسروی|سوره=19 |آیه=19}}===
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| − | ==={{تفسیر عاملی|سوره=19 |آیه=19}}===
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| − | ==={{تفسیر جامع|سوره=19 |آیه=19}}===
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| − | ==تفسیر های عربی==
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| − | ==={{تفسیر المیزان|سوره=19 |آیه=19}}===
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| − | ==={{تفسیر مجمع البیان|سوره=19 |آیه=19}}===
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| − | ==={{تفسیر نور الثقلین|سوره=19 |آیه=19}}===
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| − | ==={{تفسیر الصافی|سوره=19 |آیه=19}}===
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| − | ==={{تفسیر الکاشف|سوره=19 |آیه=19}}===
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| − | </tabber>
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| | ==پانویس== | | ==پانویس== |