آیه 1 سوره جمعه: تفاوت بین نسخهها
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* [[برگزیده تفسیر نمونه]]، [[ناصر مکارم شیرازی]] و جمعي از فضلا، تنظیم احمد علی بابایی، تهران: دارالکتب اسلامیه، ۱۳۸۶ش | * [[برگزیده تفسیر نمونه]]، [[ناصر مکارم شیرازی]] و جمعي از فضلا، تنظیم احمد علی بابایی، تهران: دارالکتب اسلامیه، ۱۳۸۶ش | ||
* [[تفسیر راهنما]]، [[علی اکبر هاشمی رفسنجانی]]، [[قم]]:بوستان كتاب(انتشارات دفتر تبليغات اسلامي حوزه علميه قم)، 1386 ش، چاپ پنجم | * [[تفسیر راهنما]]، [[علی اکبر هاشمی رفسنجانی]]، [[قم]]:بوستان كتاب(انتشارات دفتر تبليغات اسلامي حوزه علميه قم)، 1386 ش، چاپ پنجم | ||
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محتویات
ترجمه های فارسی
هر چه در آسمانها و زمین است همه به تسبیح و ستایش خدا که پادشاهی منزّه و پاک و مقتدر و حکیم است مشغولند.
آنچه در آسمان ها و آنچه در زمین است، خدا را [به پاک بودن از هر عیب و نقصی] می ستایند، خدایی که فرمانروای هستی و بی نهایت پاکیزه و توانای شکست ناپذیر و حکیم است.
آنچه در آسمانها و آنچه در زمين است، خدايى را كه پادشاه پاك ارجمند فرزانه است، تسبيح مىگويند.
خدا را تسبيح مىگويند هر چه در آسمانها و هر چه در زمين است، آن فرمانرواى پاك از عيب را، آن پيروزمند حكيم را.
آنچه در آسمانها و آنچه در زمین است همواره تسبیح خدا میگویند، خداوندی که مالک و حاکم است و از هر عیب و نقصی مبرا، و عزیز و حکیم است!
ترجمه های انگلیسی(English translations)
معانی کلمات آیه
تفسیر آیه
تفسیر نور (محسن قرائتی)
سيماى سوره جمعه
سوره جمعه يازده آيه دارد و در مدينه نازل شده است.
يكى از اهداف اساسى اين سوره، ترغيب و تشويق و تحريص مسلمانان به حضور يكپارچه در اجتماع هفتگى نمازجمعه است. اين سوره با تسبيح خداوند و بيان بعثت پيامبر اسلام آغاز گشته و در ادامه از مسلمانان مى خواهد كه همچون يهود نباشند كه تورات به آنان داده شد اما آنان تحمل نكرده و به آن عمل نكردند و از مسلمانان مى خواهد هرگاه نداى نمازجمعه برخاست، دست از هر كارى بكشند و به سوى ذكر خدا بشتابند و در غير اين صورت سزاوار توبيخ و سرزنش اند. قرائت سوره جمعه، در شب جمعه و ركعت اول نمازجمعه سفارش شده است.
بِسْمِ اللَّهِ الرَّحْمنِ الرَّحِيمِ
به نام خداوند بخشنده مهربان.
يُسَبِّحُ لِلَّهِ ما فِي السَّماواتِ وَ ما فِي الْأَرْضِ الْمَلِكِ الْقُدُّوسِ الْعَزِيزِ الْحَكِيمِ «1»
آنچه در آسمانها و آنچه در زمين است، براى خداوند تسبيح گويند، فرمانرواىِ با قداستِ عزيز حكيم.
جلد 10 - صفحه 21
نکته ها
سوره قبل با «سَبَّحَ» و اين سوره با «يُسَبِّحُ» آغاز شد، شايد نشان آن باشد كه تسبيح براى خداوند، بوده و هست و خواهد بود.
شايد چهار صفتِ «الْمَلِكِ، الْقُدُّوسِ، الْعَزِيزِ، الْحَكِيمِ» در اين آيه، مقدمه آيه بعد باشد كه مىفرمايد: هُوَ الَّذِي بَعَثَ فِي الْأُمِّيِّينَ ... اگر خداوند براى شما پيامبرى مىفرستد، به خاطر نياز خداوند به پرستش نيست، بلكه او حاكمى منزّه و مقتدر است و بعثت انبيا بر اساس حكمت اوست كه انسان را از طريق تزكيه و خودسازى و تعليم و آموزش دين و حكمت، از ظلمات به نور برساند.
تسبيح خداوند، ريشه و اساس تمام عقايد و تفكرات صحيح اسلامى است:
توحيد، بر اساس تسبيح و منزّه دانستن خداوند از شرك است. «سُبْحانَ اللَّهِ عَمَّا يُشْرِكُونَ» «1»
عدل، بر اساس منزّه دانستن خداوند از ظلم است. «سُبْحانَ رَبِّنا إِنَّا كُنَّا ظالِمِينَ» «2»
نبوّت و امامت، بر اساس تسبيح خداوند است، يعنى خداوند منزّه است از اين كه بشر را بدون راهنما و به حال خود واگذارد، بنابراين كسانىكه مىگويند: خداوند وحى و راهنمايى نفرستاده است، در حقيقت او را به درستى نشناختهاند. «وَ ما قَدَرُوا اللَّهَ حَقَّ قَدْرِهِ إِذْ قالُوا ما أَنْزَلَ اللَّهُ» «3»
معاد، بر اساس تسبيح خداوند و منزّه دانستن او از كار عبث و بيهوده و باطل است. «رَبَّنا ما خَلَقْتَ هذا باطِلًا سُبْحانَكَ» «4»، «أَ فَحَسِبْتُمْ أَنَّما خَلَقْناكُمْ عَبَثاً وَ أَنَّكُمْ إِلَيْنا لا تُرْجَعُونَ» «5»
آرى، اگر انسان خداوند را از هر عيب و نقص مبرّا دانست، عاشق و بندهى او مىشود، از او پروا كرده و بر او توكل مىكند و روابط اجتماعى و حركات و افعال خود را مطابق رضاى او تنظيم مىكند.
«1». طور، 43.
«2». قلم، 29.
«3». انعام، 91.
«4». آل عمران، 191.
«5». مؤمنون، 115.
جلد 10 - صفحه 22
اهميت و جايگاه تسبيح
در قرآن، هشت بار فرمان توكل، هشت بار فرمان استغفار، پنج بار فرمان عبادت، پنج بار فرمان ذكر و ياد خدا، دو بار فرمان تكبير و چند بار فرمان سجده آمده است، ولى فرمان تسبيح، شانزده مرتبه آمده است.
امام صادق عليه السلام از رسول گرامى اسلام صلى الله عليه و آله روايت مىكند كه آن حضرت فرمود: هرگاه بندهاى «سبحان الله» بگويد، هر آنچه در زير عرش قرار دارد همراه با او تسبيح گويند و به گويندهى اين سخن، ده برابر پاداش داده مىشود و هرگاه «الحمد لله» بگويد، خداوند نعمتهاى دنيا را بر او ارزانى دارد تا زمانى كه با خداوند ملاقات كند و آنگاه نعمتهاى آخرت بر او ارزانى شود. «1»
تسبيح خداوند، نوعى تشكر از اوست. قرآن مىفرمايد: هرگاه فتح و پيروزى به سراغ شما آمد خدا را تسبيح گوييد. إِذا جاءَ نَصْرُ اللَّهِ وَ الْفَتْحُ ... فَسَبِّحْ بِحَمْدِ رَبِّكَ «2»
تسبيح خداوند، كفّاره كلماتى است كه در مجالس گفته يا شنيده مىشود. در حديث مىخوانيم: رسول خدا صلى الله عليه و آله هنگامى كه از مجالس برمىخاستند، ذكر «سبحانك اللهم و بحمدك» را گفته و مىفرمودند: اين كلمه، كفّاره مجلس است. «انه كفارة المجلس»
تسبيح، وسيله نجات است. قرآن درباره حضرت يونس عليه السلام مىفرمايد: «فَلَوْ لا أَنَّهُ كانَ مِنَ الْمُسَبِّحِينَ لَلَبِثَ فِي بَطْنِهِ إِلى يَوْمِ يُبْعَثُونَ» «3» اگر او تسبيحگو نبود، براى هميشه در شكم ماهى ماندگار بود.
در حديث ديگرى مىخوانيم: هنگامى كه انسان «سبحان الله» مىگويد، تمام فرشتگان بر او درود مىفرستند. «صلى عليه كل ملك» «4»
در سحرهاى ماه مبارك رمضان، سفارش به قرائت دعايى شده است كه تمام جملات آن با «سبحان الله» آغاز مىشود: سبحان من يعلم جوارح القلوب ...، سبحان رب الودود ...
در حديث مىخوانيم: شخصى وارد خانه امام صادق عليه السلام شد و حضرت را در حال نماز ديد
«1». تفسيرالميزان، ج 10، ص 30.
«2». فتح، 1- 3.
«3». صافّات، 143.
«4». بحار، ج 93، ص 177.
جلد 10 - صفحه 23
كه شصت مرتبه ذكر «سبحان الله» را تكرار فرمود يا مىخوانيم: امام صادق عليه السلام در حال سجده پانصد مرتبه ذكر «سبحان الله» را تكرار فرمودند. «1»
تسبيح موجودات
در جهان بينى الهى، پرستش و عبادت خداوند مخصوص انسان نيست، بلكه همه موجودات در حال پرستشاند.
شخصى از پيامبر صلى الله عليه و آله معجزهاى درخواست كرد. حضرت مقدارى ريگ از زمين برداشت و در دست گرفت و به درخواست پيامبر و اذن الهى، صداى تسبيح سنگريزهها را شنيدند. «2»
رسول اكرم صلى الله عليه و آله فرمودند: چه بسيار مركبها كه از راكب خود بهترند، زيرا بيشتر ذكر خدا مىگويند. «3»
درباره تسبيح موجودات هستى، به چند نكته بايستى توجه شود:
الف) قرآن، تسبيح موجودات را آگاهانه و از روى علم و شعور مىداند: «كُلٌّ قَدْ عَلِمَ صَلاتَهُ وَ تَسْبِيحَهُ» «4»
ب) هركسى نمىتواند تسبيح ساير موجودات را درك كند: «وَ لكِنْ لا تَفْقَهُونَ تَسْبِيحَهُمْ» «5»
ج) تسبيح موجودات، گوناگون است. امام سجاد عليه السلام از اميرالمؤمنين عليه السلام نقل فرمود كه: مرغان در هر صبحگاه خداوند را تسبيح نموده و قوت روز خود را مسئلت مىنمايند. «6»
نظامى، در اين زمينه چنين سروده است:
خبر دارى كه سياحان افلاك
چرا گردند گِرد مركز خاك
چه مىخواهند، از اين منزل بريدن
كه مىجويند، از اين محمل كشيدن
در اين محراب، معبودشان كيست
از اين آمد شدن، مقصودشان چيست
همه هستند سرگردان چو پرگار
پديد آينده خود را طلبكار
«1». وافى، ج 2، ص 157.
«2». تفسير الميزان، ج 13، ص 96.
«3». تفسير الميزان.
«4». نور، 41.
«5». اسراء، 44.
«6». تفسير الميزان.
جلد 10 - صفحه 24
حافظ شيرازى نيز مىفرمايد:
روشن از پرتو رويت، نظرى نيست كه نيست
منّت خاك درت، بر بشرى نيست كه نيست
ناظر روى تو صاحب نظرانند آرى
سرّ گيسوى تو در هيچ سرى نيست كه نيست
حاجى سبزوارى صاحب كتاب منظومه، نيز مىگويد:
موسيى نيست كه دعوى «انا الحق» شنود
ور نه اين زمزمه اندر شجرى نيست كه نيست
مولوى نيز مىگويد:
جمله ذرّات عالم در نهان
با تو مىگويند روزان و شبان
ما سميعيم و بصير و باهشيم
با شما نامحرمان ما خامشيم
پیام ها
1- در جهان بينى الهى، هستى در حال تسبيح خداست. «يُسَبِّحُ لِلَّهِ ما فِي السَّماواتِ وَ ما فِي الْأَرْضِ»
2- در تسبيح تكوينى، تفاوتى ميان موجودات آسمان و زمين، ميان جمادات و نباتات و حيوانات و انسان نيست. «يُسَبِّحُ لِلَّهِ ما فِي السَّماواتِ وَ ما فِي الْأَرْضِ»
3- ستايش، بايد ملاك و ميزان و دليل داشته باشد. تسبيح، تنها سزاوار كسى است كه حكومت و قداست و عزّت و حكمت را با هم داراست. يُسَبِّحُ لِلَّهِ ... الْمَلِكِ الْقُدُّوسِ الْعَزِيزِ الْحَكِيمِ
4- پادشاهى و فرمانروايى خداوند، همراه با قداست و قدرت و حكمت است. «الْمَلِكِ الْقُدُّوسِ»
5- حكومت خداوند، همراه با حكمت است. الْمَلِكِ ... الْحَكِيمِ
6- خداوند، عزيز است. «الْعَزِيزِ الْحَكِيمِ» (همان گونه كه پيامبرش، ايمان آوردندگان به پيامبرش و قرآنش عزيز هستند. «وَ لِلَّهِ الْعِزَّةُ وَ لِرَسُولِهِ وَ
جلد 10 - صفحه 25
لِلْمُؤْمِنِينَ» «1»، «وَ إِنَّهُ لَكِتابٌ عَزِيزٌ» «2»)
7- قدرتى ارزش دارد كه همراه با حكمت باشد، «الْعَزِيزِ الْحَكِيمِ» خداوند هم قدرتمند است و هم حكيم، امّا قدرتمندى ديگران معمولًا با روحيه استكبار و استعمار همراه است.
پانویس
منابع
- تفسیر نور، محسن قرائتی، تهران:مركز فرهنگى درسهايى از قرآن، 1383 ش، چاپ يازدهم
- اطیب البیان فی تفسیر القرآن، سید عبدالحسین طیب، تهران:انتشارات اسلام، 1378 ش، چاپ دوم
- تفسیر اثنی عشری، حسین حسینی شاه عبدالعظیمی، تهران:انتشارات ميقات، 1363 ش، چاپ اول
- تفسیر روان جاوید، محمد ثقفی تهرانی، تهران:انتشارات برهان، 1398 ق، چاپ سوم
- برگزیده تفسیر نمونه، ناصر مکارم شیرازی و جمعي از فضلا، تنظیم احمد علی بابایی، تهران: دارالکتب اسلامیه، ۱۳۸۶ش
- تفسیر راهنما، علی اکبر هاشمی رفسنجانی، قم:بوستان كتاب(انتشارات دفتر تبليغات اسلامي حوزه علميه قم)، 1386 ش، چاپ پنجم




