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| سطر ۴۱: |
سطر ۴۱: |
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| | ==معانی کلمات آیه== | | ==معانی کلمات آیه== |
| − | تلقف: لقف: ربودن. راغب گويد: گرفتن شيء است به زيركى خواه با دست باشد يا با دهان. | + | تلقف: لقف: ربودن. [[راغب اصفهانی|راغب]] گويد: گرفتن شيء است به زيركى خواه با دست باشد يا با دهان. قاموس: ربودن و اخذ به سرعت گفته است، گرفتن با گوش (شنيدن) را نيز لقف گويند. |
| − | قاموس: ربودن و اخذ به سرعت گفته است، گرفتن با گوش (شنيدن) را نيز لقف گويند . | + | در [[نهج البلاغة (کتاب)|نهج البلاغه]] خطبه 208 فرموده: «... رآه و سمع منه و لقف عنه»: |
| − | در نهج البلاغه خطبه 208 فرموده:«... رآه و سمع منه و لقف عنه»: | + | يعنى: آن حضرت ديده و از او شنيده و اخذ كرده است.<ref>تفسیر احسن الحدیث، سید علی اکبر قرشی</ref> |
| − | يعنى: آن حضرت ديده و از او شنيده و اخذ كرده است..<ref>تفسیر احسن الحدیث، سید علی اکبر قرشی</ref> | |
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| | == تفسیر آیه == | | == تفسیر آیه == |
| − | <tabber> | + | <tafsir sura="20" ayeh="69" /> |
| − | تفسیر نور=
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| − | ===تفسیر نور (محسن قرائتی)=== | |
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| − | {{ نمایش فشرده تفسیر|
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| − | قُلْنا لا تَخَفْ إِنَّكَ أَنْتَ الْأَعْلى «68»
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| − | ما (به موسى) گفتيم: نترس! همانا تو خودت برترى.
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| − | وَ أَلْقِ ما فِي يَمِينِكَ تَلْقَفْ ما صَنَعُوا إِنَّما صَنَعُوا كَيْدُ ساحِرٍ وَ لا يُفْلِحُ السَّاحِرُ حَيْثُ أَتى «69»
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| − | و آنچه را در دست راستت دارى بيفكن تا هر چه را آنان ساختهاند در كام خود فرو برد (و ببلعد). همانا آنچه آنان ساختهاند (فقط) حيله ساحر است و ساحر هر جا رود (و هر چه كند پيروز) و رستگار نگردد.
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| − | فَأُلْقِيَ السَّحَرَةُ سُجَّداً قالُوا آمَنَّا بِرَبِّ هارُونَ وَ مُوسى «70»
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| − | پس (وقتى آنان معجزه موسى را ديدند كه چگونه اژدها همهى بافتههايشان را بلعيد، تمام) ساحران به سجده افتادند و گفتند: ما به پروردگار هارون و موسى ايمان آورديم.
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| − | ===نکته ها===
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| − | همين كه ساحران فهميدند كار موسى عليه السلام سحر و جادو نيست، بى اختيار به سجده
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| − | جلد 5 - صفحه 362
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| − | افتادند و در حالى كه صبح از كافران بشمار مىآمدند، غروب به جمع شهداء راه خدا پيوستند و با بيان «آمَنَّا بِرَبِّ هارُونَ وَ مُوسى» اظهار داشتند كه كار ما غلط بوده است، و چون فرعون خود را «رب» مردم مىدانست، آنها هم كلمه «بِرَبِّ هارُونَ وَ مُوسى» را بكار بردند، زيرا اگر آنها تنها مىگفتند: «رب موسى»، فرعون مىگفت: موسى را من تربيت كردهام، از اينروى ساحران، بعد از كلمه «رب» ابتدا نام هارون عليه السلام و سپس نام موسى عليه السلام را ذكر كردند. «1»
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| − | خداوند بدون شرط به پيامبرش وعده برترى مىدهد، «إِنَّكَ أَنْتَ الْأَعْلى» ولى به مؤمنين به شرط وفادارى به ايمان، وعده برترى مىدهد، «وَ أَنْتُمُ الْأَعْلَوْنَ إِنْ كُنْتُمْ مُؤْمِنِينَ» «2» زيرا انبيا وفادار هستند، ولى مؤمنين ممكن است دست از وفادارى بردارند، لذا خداوند مىفرمايد: آنان به شرط وفادارى برترند.
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| − | ===پیام ها===
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| − | 1- هر كجا كه نگرانى زيادتر باشد، تأييد و تأكيد بيشترى را مىطلبد. «لا تَخَفْ إِنَّكَ أَنْتَ الْأَعْلى» «3»
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| − | 2- تلقين، عامل تقويت روحيه است. «إِنَّكَ أَنْتَ الْأَعْلى»
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| − | 3- جواب بايد متناسب با سخن مجادلهگر باشد وبا زبان خود او سخن بگوييم.
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| − | فرعون گفت: «قَدْ أَفْلَحَ الْيَوْمَ مَنِ اسْتَعْلى»، خداوند فرمود: «إِنَّكَ أَنْتَ الْأَعْلى»
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| − | 4- حقّ، باطل را نابود مىسازد. «تَلْقَفْ ما صَنَعُوا»، «إِنَّ الْباطِلَ كانَ زَهُوقاً» «4»
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| − | 5- نه تنها ساحران زمان حضرت موسى كه تمام ساحران تاريخ تيرهبخت هستند. «لا يُفْلِحُ السَّاحِرُ» «5» 6- براى افراد سالم و غير لجوج، روشن شدن حقّ همان وتسليم شدن همان.
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| − | «1». تفسير مراغى.
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| − | «2». آلعمران، 139.
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| − | «3». آوردن حرف تأكيد «انّ» و تكرار ضمير متصل و منفصل مخاطب «ك و انت» به همراه كلمه علّو آن هم در قالب «اعلى» و جمله اسميّه، همه تأييدى براى آن دلهرههاست.
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| − | «4». اسراء، 81.
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| − | «5». الف و لام در كلمه «الساحر» براى عموم است.
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| − | جلد 5 - صفحه 363
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| − | «فَأُلْقِيَ» (گويا در باطن مجبور به سجده شدند)
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| − | 7- انسان، موجودى است كه مىتواند در يك لحظه تصميم بگيرد و تغيير عقيده و ايدئولوژى دهد. «فَأُلْقِيَ السَّحَرَةُ»
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| − | 8- راه توبه براى همگان باز است، توبه از شرك، ايمان آوردن به خداست. «فَأُلْقِيَ السَّحَرَةُ» هر انسان منحرفى را بد ندانيم، شايد توبه كند.
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| − | 9- انسانها در انتخاب عقيده آزادند و مجبور محيط نيستند. «فَأُلْقِيَ السَّحَرَةُ»
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| − | 10- سجده، از آثار يقين است، ايمان بدون سجده نمىشود. «فَأُلْقِيَ السَّحَرَةُ سُجَّداً»
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| − | 11- ساحران، در يك جمله، ايمان خود را به توحيد و نبوّت اظهار داشتند. «آمَنَّا بِرَبِّ هارُونَ وَ مُوسى» (قدر زر زرگر شناسد، قدر گوهر گوهرى)
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| − | }}
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| − | اثنی عشری=
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| − | ===تفسیر اثنی عشری (حسینی شاه عبدالعظیمی)===
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| − | {{نمایش فشرده تفسیر|
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| − | وَ أَلْقِ ما فِي يَمِينِكَ تَلْقَفْ ما صَنَعُوا إِنَّما صَنَعُوا كَيْدُ ساحِرٍ وَ لا يُفْلِحُ السَّاحِرُ حَيْثُ أَتى (69)
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| − | وَ أَلْقِ ما فِي يَمِينِكَ: و بيانداز آنچه در دست راست تو باشد. تَلْقَفْ ما صَنَعُوا:
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| − | «1» تفسير برهان، ج 3، ص 39 بنقل از شيخ صدوق و نور الثقلين ج 3، ص 384 روايت 83 به نقل از احتجاج طبرسى.
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| − | جلد 8 - صفحه 294
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| − | تا فرو برد آنچه ساختهاند. إِنَّما صَنَعُوا كَيْدُ ساحِرٍ: جز اين نيست آنچه ساختهاند مكر و حيله جادوئى است. آيه شريفه اشاره است به آنكه اى موسى آنچه با تو است معجزه الهيه باشد، و آنچه با سحره است تمويهات و مكر باشد، پس چگونه تعارض نمايند. فخر رازى گويد: در «تلقف» دلالت است بر آنكه تمامى آنچه جادوگران از آلات و ادوات انداخته بودند، عصاى حضرت موسى همه را فرو برد، اين ممكن نيست مگر به صورت عظمت جسد و شدت قوّت آن «1».
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| − | وَ لا يُفْلِحُ السَّاحِرُ حَيْثُ أَتى: و رستگار نشود جادوگر هر جا آيد و به هر مكان برود و هر موضع كه باشد.
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| − | چون حضرت موسى به امر الهى عصا را بيانداخت، به قدرت كامله سبحانى اژدها گشت، دهان خود را گشوده روى به سحره و ادوات آنها آورد، در يك ساعت تمام آنها را كه چهارصد خروار چوب و طناب بود فرو برد و اثرى از آن پيدا نشد، و حجم آن عصا زياد نگشت. مردمان از ترس، روى به فرار نهادند، حضرت موسى بيامد آن را بگرفت، همان عصا شد. ساحران دانستند كه سحر نيست به چند وجه:
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| − | 1- به سبب ظهور حركت عصا بر وجهى كه به حيله، ظهور چنين حركت ممكن نيست.
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| − | 2- از حد زياد شدن مقدار و جسامت عصا كه بسحر مقدور نيست.
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| − | 3- در وقت انقلاب عصا به ثعبان فورا اعضاء مانند چشم و دهن و گوش و منخرين و غيره در آن ظاهر شد كه بجز خارق عادت و اعجاز ممكن نخواهد بود.
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| − | 4- فرو بردن عصائى تمام آنچه را كه چندين ميل فراهم كرده بود به طورى كه اثرى از آنها نماند.
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| − | 5- عود كردن آن ثعبان عظيم بعد از اين همه حالات عجيبه به حالت اصليه خود كه عصا، چوب خشك باشد.
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| − | «1» تفسير كبير فخر رازى، ج 6، ص 78.
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| − | جلد 8 - صفحه 295
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| − | روان جاوید=
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| − | ===تفسیر روان جاوید (ثقفى تهرانى)===
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| − | {{نمایش فشرده تفسیر|
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| − | فَأَوْجَسَ فِي نَفْسِهِ خِيفَةً مُوسى (67) قُلْنا لا تَخَفْ إِنَّكَ أَنْتَ الْأَعْلى (68) وَ أَلْقِ ما فِي يَمِينِكَ تَلْقَفْ ما صَنَعُوا إِنَّما صَنَعُوا كَيْدُ ساحِرٍ وَ لا يُفْلِحُ السَّاحِرُ حَيْثُ أَتى (69) فَأُلْقِيَ السَّحَرَةُ سُجَّداً قالُوا آمَنَّا بِرَبِّ هارُونَ وَ مُوسى (70) قالَ آمَنْتُمْ لَهُ قَبْلَ أَنْ آذَنَ لَكُمْ إِنَّهُ لَكَبِيرُكُمُ الَّذِي عَلَّمَكُمُ السِّحْرَ فَلَأُقَطِّعَنَّ أَيْدِيَكُمْ وَ أَرْجُلَكُمْ مِنْ خِلافٍ وَ لَأُصَلِّبَنَّكُمْ فِي جُذُوعِ النَّخْلِ وَ لَتَعْلَمُنَّ أَيُّنا أَشَدُّ عَذاباً وَ أَبْقى (71)
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| − | قالُوا لَنْ نُؤْثِرَكَ عَلى ما جاءَنا مِنَ الْبَيِّناتِ وَ الَّذِي فَطَرَنا فَاقْضِ ما أَنْتَ قاضٍ إِنَّما تَقْضِي هذِهِ الْحَياةَ الدُّنْيا (72) إِنَّا آمَنَّا بِرَبِّنا لِيَغْفِرَ لَنا خَطايانا وَ ما أَكْرَهْتَنا عَلَيْهِ مِنَ السِّحْرِ وَ اللَّهُ خَيْرٌ وَ أَبْقى (73) إِنَّهُ مَنْ يَأْتِ رَبَّهُ مُجْرِماً فَإِنَّ لَهُ جَهَنَّمَ لا يَمُوتُ فِيها وَ لا يَحْيى (74) وَ مَنْ يَأْتِهِ مُؤْمِناً قَدْ عَمِلَ الصَّالِحاتِ فَأُولئِكَ لَهُمُ الدَّرَجاتُ الْعُلى (75) جَنَّاتُ عَدْنٍ تَجْرِي مِنْ تَحْتِهَا الْأَنْهارُ خالِدِينَ فِيها وَ ذلِكَ جَزاءُ مَنْ تَزَكَّى (76)
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| − | ترجمه
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| − | پس احساس نمود در ضمير خود بيمى موسى
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| − | گفتيم مترس همانا توئى برتر
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| − | و بينداز آنچه در دست راست تو است فرو ميبرد آنچه را ساختهاند همانا آنچه را ساختهاند مكر ساحر است و رستگار نميشود ساحر هر جا كه آيد
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| − | پس بر وى افكنده شدند ساحران سجده كنندگان گفتند ايمان آورديم بپروردگار هارون و موسى
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| − | گفت آيا ايمان آورديد مر او را پيش از آنكه اذن دهم شما را همانا او هر آينه بزرگ شما است كه آموخت بشما سحر را پس هر آينه خواهم بريد البتّه دستهاى شما و پايهاى شما را بر خلاف يكديگر و هر آينه بردار كشم البتّه شما را بر تنه درخت خرما و هر آينه خواهيد دانست كه كدام يك از ما سختتر است از جهت عذاب و پايندهتر
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| − | گفتند هرگز اختيار نخواهيم نمود تو را بر آنچه آمد ما را از معجزات آشكار و آنكس كه آفريد ما را پس حكم كن آنچه را تو حكم كنندهئى جز اين نيست كه حكم ميكنى در اين زندگانى دنيا
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| − | همانا ما ايمان آورديم بپروردگارمان تا بيامرزد براى ما گناهانمان را و آنچه را اكراه نمودى تو ما را بر آن از سحر و خدا بهتر است و پايندهتر
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| − | محقّق است كه كسيكه بيايد نزد پروردگارش با آنكه باشد گناهكار پس همانا مر او را است جهنّم كه نه ميميرد در آن و نه زندگانى ميكند
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| − | و كسيكه بيايد نزد او با آنكه مؤمن باشد كه بتحقيق بجا آورده باشد كارهاى شايسته را پس آنگروه براى ايشان است مقامات عاليه،
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| − | بهشتهاى اقامت دائمى كه ميرود از زير آنها نهرها كه جاودانيانند در آن و آن پاداش كسى است كه پاك باشد..
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| − | جلد 3 صفحه 515
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| − | تفسير
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| − | پس از آنكه ساحران عصاها و ريسمانهاى خودشان را انداختند و در نظر حضرت موسى براى سحرى كه كرده بودند نمودار شد كه آنها راه ميروند مختصر ترسى در دل آنحضرت جاى گير شد براى آنكه مبادا آنها غالب شوند و دين حقّ ثابت نشود و مردم در ضلالت و گمراهى بمانند چنانچه در نهج البلاغه باين معنى اشاره شده است لذا خداوند صريحا او را نهى فرمود از آنكه بترسد و خطاب را بضمير انت تكرار فرمود براى تأكيد با آنكه كلام بحرف تأكيد مؤكّد بود و تصريح بغلبه او فرمود و در احتجاج از امام صادق عليه السّلام نقل نموده كه پيغمبر صلّى اللّه عليه و آله و سلّم فرمود كه وقتى موسى ترسيد متوسل بمحمد و آل محمد عليهم السلام شد و امان طلبيد پس از آن خطاب رسيد نترس همانا البتّه تو غالبى و بينداز عصاى خود را مىبلعد بقدرت خدا آنچه را كه ساخته و پرداخته نمودند و تلقّف برفع و تشديد نيز قرائت شده است و فرمود همانا آنچه ساخته و پرداخته نمودهاند بكيد و مكر و حيله ساحر درست شده و ساحر هر جا باشد و هر كار كند خير نمىبيند و بمراد نميرسد و عاقبت رسوا خواهد شد و موسى عليه السّلام اطاعت نمود و انداخت و بلعيد تمام مصنوعات آنها را و ساحرها يقين كردند كه كار آنحضرت سحر نيست و معجزه الهيه است لذا همگى برو بزمين افتادند و براى عظمت اين امر در نظرشان و قبول توبه از اعمالشان سجده كردند براى خضوع در پيشگاه الهى و گفتند ايمان آورديم ما بپروردگار هارون و موسى عليه السّلام و اعراض نموديم از فرعون و فرعونيان و فرعون آنها را معاتب قرار داد و گفت ايمان آورديد و متابعت نموديد موسى را پيش از آنكه من بشما اجازه دهم كه ايمان بياوريد همانا او هر آينه بزرگ و اعلم و استاد شما است كه بشما سحر آموخته و با يكديگر قبلا مواضعه و سازش كرده بوديد در اين امر كه او غالب و شما مغلوب شويد و فورا ايمان بياوريد اكنون من شما را مجازات ميكنم باين كيفيّت كه دست راست و پاى چپ شما را مىبرم و شما را مىآويزم بر تنه درخت خرما كه در مرئى و منظر مردم جان دهيد و موجب عبرت خلق شويد و بدانيد كه كدام يك از من و موسى يا خداى او عذابش شديدتر و با دوامتر است گفتهاند از فرط غرور و جهل تصوّر ميكرد كسى بدون اجازه او نبايد دينى را اختيار نمايد و آنها در جواب گفتند هرگز اختيار نمىكنيم رضاى
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| − | جلد 3 صفحه 516
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| − | تو را بر دين حقّ كه ثابت شد از براى ما بمعجزات باهرات و بر آن خداوندى كه خلق فرمود ما را يا قسم بآنخداوندى كه آفريد ما را پس حكم كن آنچه دلت ميخواهد هر حكمى بكنى در اين دنيا ميكنى كه ميگذرد و آخرت باقى براى ما بهتر است ما ايمان بخدا آورديم تا از گناهانمان بگذرد و ما را بر سحرى كه در مقام معارضه با حضرت موسى كرديم باصرار تو مؤاخذه ننمايد و پاداش الهى بهتر و عذابش باقىتر است در جوامع روايت نموده كه سحره بفرعون گفتند موسى را وقتى در خواب است بما نشان بده پس يافتند او را در خواب با آنكه عصا حراست او را مينمود و گفتند اين ساحر نيست چون ساحر وقتى بخوابد سحرش باطل ميشود ولى فرعون بخرجش نرفت و آنها را وادار بمعارضه نمود و كسيكه بحال كفر و عصيان بميرد جهنّم از آن او است كه نه ميميرد در آن تا راحت شود و نه زندگانى راحتى ميكند كه بهتر از مردن باشد و بنظر حقير محتمل است مراد آن باشد كه نه ميميرد و نه زنده ميباشد يعنى هميشه مشغول جان كندن است و كسانيكه در پيشگاه الهى حاضر شوند با آنكه اهل ايمان و اعمال صالحه باشند داراى منازل رفيعهاى خواهند بود كه آنها بهشتهاى دائمى داراى نهرهاى جارى است كه هميشه در آنها خواهند بود و آن پاداش كسانى است كه پاك شدند از چرك كفر و عصيان بتوبه و سه آيه اخيره محتمل است جزء كلام سحره باشد كه خداوند نقل فرموده و محتمل است ابتداء كلام الهى باشد و كلمه على جمع عليا است كه آن مؤنّث اعلى ميباشد ..
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| − | اطیب البیان=
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| − | ===اطیب البیان (سید عبدالحسین طیب)===
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| − | {{نمایش فشرده تفسیر|
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| − | وَ أَلقِ ما فِي يَمِينِكَ تَلقَف ما صَنَعُوا إِنَّما صَنَعُوا كَيدُ ساحِرٍ وَ لا يُفلِحُ السّاحِرُ حَيثُ أَتي (69)
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| − | و بينداز آنچه که در دست تو است ميخورد بلع ميكند آنچه را که سحره بجا آورده بودند زيرا جز اينکه نيست که كار سحره كيد ساحر است و رستگار نميشود و توفيق و استعلا پيدا نميكند ساحر هر چه که كيد كند و بيايد.
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| − | (وَ أَلقِ ما فِي يَمِينِكَ) جمله در تقدير است که (فلمّا القي موسي).
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| − | (تَلقَف ما صَنَعُوا) لقف اكل بسرعت است يعني بلعيد عصي آنچه را که سحره صنعت كرده بودند.
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| − | (إِنَّما صَنَعُوا) زيرا صنعت آنها از روي مكيده بود كيد مكر و حيله و تزوير و تقلّب است.
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| − | (كَيدُ ساحِرٍ) چون سحر همان خدعه است و خدعه يك صورت ظاهري در وقت قليلي بيش نيست فوري منقلب ميشود و طرفدار رسوا ميكند.
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| − | (وَ لا يُفلِحُ السّاحِرُ حَيثُ أَتي) رسوايي و خفّت و بدبختي ميآورد از اينکه جهت پس از اينكه مشاهده اينکه آيه كبري و اينکه معجزه عظمي را مشاهده كردند تمام سربزير و رسوا و پشيمان شدند.
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| − | 60
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| − | برگزیده تفسیر نمونه=
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| − | ===برگزیده تفسیر نمونه===
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| − | {{نمایش فشرده تفسیر|
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| − | (آیه 69)- مجددا به او خطاب شد که: «و آنچه را در دست راست داری بیفکن که تمام آنچه را که آنها ساختهاند میبلعد»! (وَ أَلْقِ ما فِی یَمِینِکَ تَلْقَفْ ما صَنَعُوا).
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| − | «چرا که کار آنها تنها مکر ساحر است» (إِنَّما صَنَعُوا کَیْدُ ساحِرٍ).
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| − | «و ساحر هر کجا برود پیروز نخواهد شد» (وَ لا یُفْلِحُ السَّاحِرُ حَیْثُ أَتی).
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| − | چرا که کار ساحر متکی به نیروی محدود انسانی است، و معجزه از قدرت بیپایان و لا یزال الهی سر چشمه میگیرد، لذا ساحر تنها کارهایی را میتواند انجام دهد که قبلا روی آن تمرین داشته است.
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| − | جالب این که: نمیگوید: «عصایت را بیفکن» بلکه میگوید: «آنچه در دست راست داری بیفکن» این تعبیر شاید به عنوان بیاعتنایی به عصا باشد و اشاره به این که عصا مسأله مهمی نیست آنچه مهم است اراده و فرمان خداست که اگر اراده او باشد عصا که سهل است کمتر و کوچکتر از آن هم میتواند چنین قدرت نمایی کند!
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| − | سایر تفاسیر=
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| − | سایرتفاسیر این آیه را می توانید در سایت قرآن مشاهده کنید:
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| − | ==تفسیر های فارسی==
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| − | ==={{ترجمه تفسیر المیزان|سوره=20 |آیه=69}}===
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| − | ==={{تفسیر خسروی|سوره=20 |آیه=69}}===
| |
| − | ==={{تفسیر عاملی|سوره=20 |آیه=69}}===
| |
| − | ==={{تفسیر جامع|سوره=20 |آیه=69}}===
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| − |
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| − | ==تفسیر های عربی==
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| − | ==={{تفسیر المیزان|سوره=20 |آیه=69}}===
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| − | ==={{تفسیر مجمع البیان|سوره=20 |آیه=69}}===
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| − | ==={{تفسیر نور الثقلین|سوره=20 |آیه=69}}===
| |
| − | ==={{تفسیر الصافی|سوره=20 |آیه=69}}===
| |
| − | ==={{تفسیر الکاشف|سوره=20 |آیه=69}}===
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| − | </tabber>
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| | ==پانویس== | | ==پانویس== |
| − | <div style="font-size:smaller"><references/></div> | + | <div style="font-size:smaller"><references /></div> |
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| | ==منابع== | | ==منابع== |
| − | * [[تفسیر نور]]، [[محسن قرائتی]]، [[تهران]]:مركز فرهنگى درسهايى از قرآن، 1383 ش، چاپ يازدهم | + | |
| − | * [[اطیب البیان فی تفسیر القرآن]]، [[سید عبدالحسین طیب]]، تهران:انتشارات اسلام، 1378 ش، چاپ دوم | + | *[[تفسیر نور]]، [[محسن قرائتی]]، [[تهران]]:مركز فرهنگى درسهايى از قرآن، 1383 ش، چاپ يازدهم |
| − | * [[تفسیر اثنی عشری]]، [[حسین حسینی شاه عبدالعظیمی]]، تهران:انتشارات ميقات، 1363 ش، چاپ اول | + | *[[اطیب البیان فی تفسیر القرآن]]، [[سید عبدالحسین طیب]]، تهران:انتشارات اسلام، 1378 ش، چاپ دوم |
| − | * [[تفسیر روان جاوید]]، [[محمد ثقفی تهرانی]]، تهران:انتشارات برهان، 1398 ق، چاپ سوم | + | *[[تفسیر اثنی عشری]]، [[حسین حسینی شاه عبدالعظیمی]]، تهران:انتشارات ميقات، 1363 ش، چاپ اول |
| − | * [[برگزیده تفسیر نمونه]]، [[ناصر مکارم شیرازی]] و جمعي از فضلا، تنظیم احمد علی بابایی، تهران: دارالکتب اسلامیه، ۱۳۸۶ش | + | *[[تفسیر روان جاوید]]، [[محمد ثقفی تهرانی]]، تهران:انتشارات برهان، 1398 ق، چاپ سوم |
| − | * [[تفسیر راهنما]]، [[علی اکبر هاشمی رفسنجانی]]، [[قم]]:بوستان كتاب(انتشارات دفتر تبليغات اسلامي حوزه علميه قم)، 1386 ش، چاپ پنجم | + | *[[برگزیده تفسیر نمونه]]، [[ناصر مکارم شیرازی]] و جمعي از فضلا، تنظیم احمد علی بابایی، تهران: دارالکتب اسلامیه، ۱۳۸۶ش |
| | + | *[[تفسیر راهنما]]، [[علی اکبر هاشمی رفسنجانی]]، [[قم]]:بوستان كتاب(انتشارات دفتر تبليغات اسلامي حوزه علميه قم)، 1386 ش، چاپ پنجم |
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