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| سطر ۴۳: |
سطر ۴۳: |
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| | == تفسیر آیه == | | == تفسیر آیه == |
| − | <tabber> | + | <tafsir sura="18" ayeh="89" /> |
| − | تفسیر نور=
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| − | ===تفسیر نور (محسن قرائتی)===
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| − | {{ نمایش فشرده تفسیر|
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| − | ثُمَّ أَتْبَعَ سَبَباً «89»
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| − | سپس (ذوالقرنين براى سفر ديگر) سببِ (ديگرى) را پيگيرى كرد.
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| − | حَتَّى إِذا بَلَغَ مَطْلِعَ الشَّمْسِ وَجَدَها تَطْلُعُ عَلى قَوْمٍ لَمْ نَجْعَلْ لَهُمْ مِنْ دُونِها سِتْراً «90»
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| − | تا آنكه به محلّ طلوع خورشيد رسيد، آن را چنان يافت كه بر قومى طلوع مىكند كه جز خورشيد براى آنان پوشش وسايهبانى قرار نداده بوديم.
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| − | كَذلِكَ وَ قَدْ أَحَطْنا بِما لَدَيْهِ خُبْراً «91»
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| − | و ما اينگونه به آنچه از امكانات و برنامه نزد او (ذوالقرنين) بود، احاطه داشتيم (و كارهايش زير نظر ما بود).
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| − | ===نکته ها===
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| − | ذوالقرنين، پس از سفرى به سوى غرب واقامهى نظام عادلانه دينى در ميان ساحلنشينان، سفرى نيز به شرق كرد.
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| − | مراد از اينكه جز خورشيد، سايهبانى نداشتند، زندگى ابتدايى وبدون امكانات است.
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| − | جلد 5 - صفحه 222
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| − | به فرموده امام صادق عليه السلام: نه خانهسازى مىدانستند، نه خيّاطى. خورشيد، بىمانع بر آنان مىتابيد به گونهاى كه صورتهاى آنان سياه شده بود. «1»
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| − | ===پیام ها===
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| − | 1- افراد صالح و متعهّد، پيگيرى و پشتكار دارند. «ثُمَّ أَتْبَعَ سَبَباً»
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| − | 2- مردان خدا، با داشتن همه نوع امكانات رفاهى، براى نجات محرومان و گسترش عدالت حركت مىكنند. ثُمَّ أَتْبَعَ سَبَباً ...
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| − | 3- بازگو كردن سفرهاى مردان خدا و بركات مترتّب بر آن، ارزش و مايهى درس و عبرت است. أَتْبَعَ سَبَباً حَتَّى إِذا ...
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| − | 4- آنچه مهم است؛ هدايت و خدمت به مردم است، چه درشرق باشد چه در غرب. ثُمَّ أَتْبَعَ سَبَباً ...
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| − | 5- خداوند به افراد و نعمتهاى ويژهاى كه به آنان عطا فرموده، آگاهى كامل دارد. «أَحَطْنا بِما لَدَيْهِ خُبْراً» (بازگويى سفرهاى ذوالقرنين و حوادث و گفتگوهاى او با مردم، نمونهاى از احاطهى علمى خداوند است.)
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| − | «1». تفسير نورالثقلين.}}
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| − | اثنی عشری=
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| − | ===تفسیر اثنی عشری (حسینی شاه عبدالعظیمی)===
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| − | {{نمایش فشرده تفسیر|
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| − | ثُمَّ أَتْبَعَ سَبَباً (89)
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| − | حق تعالى سير او را به مشرق بيان فرمايد:
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| − | ثُمَّ أَتْبَعَ سَبَباً: پس پيروى نمود ذو القرنين راهى ديگر را كه طرف مشرق باشد.
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| − | روان جاوید=
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| − | ===تفسیر روان جاوید (ثقفى تهرانى)===
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| − | {{نمایش فشرده تفسیر|
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| − | ثُمَّ أَتْبَعَ سَبَباً (89) حَتَّى إِذا بَلَغَ مَطْلِعَ الشَّمْسِ وَجَدَها تَطْلُعُ عَلى قَوْمٍ لَمْ نَجْعَلْ لَهُمْ مِنْ دُونِها سِتْراً (90) كَذلِكَ وَ قَدْ أَحَطْنا بِما لَدَيْهِ خُبْراً (91)
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| − | ترجمه
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| − | پس توسل جست بوسيلهاى
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| − | تا وقتى كه رسيد بجاى بيرون آمدن آفتاب يافت آنرا كه ميتابيد بر گروهى كه قرار نداده بوديم براى آنها از زير آن پوششى
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| − | اينچنين بود و بتحقيق احاطه داشتيم بآنچه نزد او بود بآگاهى.
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| − | تفسير
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| − | جناب ذو القرنين پس از فراغت از امر بلاد مغرب اراده مسافرت بمشرق نمود پس پيروى و متابعت و اتّخاذ نمود براى نيل بمقصود سبب و وسيلهاى را از ميان آن وسائل و اسباب كه بخواست خدا براى او آماده شده بود تا رسيد بمنتهاى آبادى مشرق و يافت آفتابرا كه از بدو طلوع تا غروب ميتابد بر گروهى كه حاجب و ساترى ميان آنها و آفتاب خداوند قرار نداده نه كوهى است نه درهاى نه درختى است نه بنائى در مجمع و عيّاشى ره از امام باقر عليه السّلام نقل نموده كه آنها نياموخته بودند صنعت بنّائى را و قمّى ره نقل نموده كه فرمود نياموخته بودند صنعت لباس را و عياشى ره از امير المؤمنين عليه السّلام نقل نموده كه ذو القرنين وارد شد بر قوميكه سوزانده بود آنها را آفتاب و تغيير داده بود اجساد و الوان آنها را تا حدّيكه شده بودند مانند شب تار چنين بود حكايت ذو القرنين و كيفيت احاطه او بمغرب و مشرق كه بيان شد يا سلوك او با اهل مشرق مانند سلوك او با اهل مغرب بود و خداوند احاطه داشت بر او و لشكر و حشم و خدم و مهمّات جنگى و اسباب و
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| − | جلد 3 صفحه 451
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| − | آلات و ادوات و وسايل حركت و سكون و پيشرفت او بعلم و اراده و تدبير و تقدير بطوريكه هيچ يك از آنها در هيچ آنى بيرون از علم و بصر و خارج از اطلاع و خبر خداوند نبود و بنابر آنچه تاكنون بتبع آقايان مفسّرين ذكر شد كلمه كذالك در كلام خداوند متمّم آيه سابقه، و جمله و قد احطنا ابتداء كلام است ولى بنظر حقير محتمل است كذالك ابتداء كلام لا حق باشد باين تقريب كه خدا ميفرمايد اين چنين با عظمت و مفصّل بود دستگاه و وسائل و اسباب پيشرفت كار او در مغرب و مشرق با اينحال از محيط علم و اطلاع ما خارج نبود و ما از تمام جزئيات آن دستگاه باخبر بوديم ..
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| − | اطیب البیان=
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| − | ===اطیب البیان (سید عبدالحسین طیب)===
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| − | {{نمایش فشرده تفسیر|
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| − | وَ أَمّا مَن آمَنَ وَ عَمِلَ صالِحاً فَلَهُ جَزاءً الحُسني وَ سَنَقُولُ لَهُ مِن أَمرِنا يُسراً (88) ثُمَّ أَتبَعَ سَبَباً (89)
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| − | و اما كسي که ايمان آورد و عمل صالح بجا بياورد پس از براي او است جزاي نيكي و زود باشد که بگوئيم از براي او از كار خود كار سهل و آساني وَ أَمّا مَن آمَنَ ايمان بجميع امور ديني مطابق مذهب حقه شيعه اثني عشري و در ايمان چهار چيز معتبر است يقين اعتقاد اقرار! تسليم وَ عَمِلَ صالِحاً عمل صالح اتيان باو- امر الهي از واجبات و مستحبات طبق دستور شرع از مراعات اجزاء و شرايط و رفع منافيات و موانع و مراعات حالات از علم و شك و سهو و ظن طبق دستور و از همه بالاتر شرايط قبول که درجاتش بالاتر ميشود.
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| − | فَلَهُ جَزاءً الحُسني جزاء حسني در دنيا افاضه نعم و رفع و دفع بليّات و اجابت دعوات و غفران ذنوب و رفع هموم و امثال اينها و در آخرت نيل بمثوبات و نجات از عقوبات وَ سَنَقُولُ لَهُ مِن أَمرِنا يُسراً خداوند متعال براي بندگان صالح خود امري را مشكل نميكند.
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| − | يُرِيدُ اللّهُ بِكُمُ اليُسرَ وَ لا يُرِيدُ بِكُمُ العُسرَ بقره آيه 181 و مخصوصا دين مقدس اسلام که دين سمحه سهله است بعلاوه در امور دنيوي هم اسباب سهولت براي او فراهم ميفرمايد و موانع را برطرف مينمايد و چون ذي القرنين از جانب خداوند مأموريت داشته که با اهل ايمان محبّت و عنايت داشته باشد و از كفار انتقام
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| − | جلد 12 - صفحه 397
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| − | كشد لذا اينکه كلام را فرمود ثُمَّ أَتبَعَ سَبَباً پس از آنكه از مغرب زمين سير كرد تا رسيد بطرف مشرق زمين که خورشيد طلوع ميكرد و از اينکه جمله ثُمَّ أَتبَعَ سَبَباً استفاده ميشود که تمام ربع مسكون در تحت تصرف و سيطره ذي القرنين درآمد از مغرب تا مشرق جنوب شمال.
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| − | برگزیده تفسیر نمونه=
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| − | ===برگزیده تفسیر نمونه===
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| − | {{نمایش فشرده تفسیر|
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| − | (آیه 89)- «ذو القرنین» سفر خود را به غرب پایان داد سپس عزم شرق کرد آن گونه که قرآن میگوید: «سپس از اسباب و وسائلی که در اختیار داشت مجددا بهره گرفت» (ثُمَّ أَتْبَعَ سَبَباً).
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| − | سایر تفاسیر=
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| − | سایرتفاسیر این آیه را می توانید در سایت قرآن مشاهده کنید:
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| − | ==تفسیر های فارسی==
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| − | ==={{ترجمه تفسیر المیزان|سوره=18 |آیه=89}}===
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| − | ==={{تفسیر خسروی|سوره=18 |آیه=89}}===
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| − | ==={{تفسیر عاملی|سوره=18 |آیه=89}}===
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| − | ==={{تفسیر جامع|سوره=18 |آیه=89}}===
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| − | ==تفسیر های عربی==
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| − | ==={{تفسیر المیزان|سوره=18 |آیه=89}}===
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| − | ==={{تفسیر مجمع البیان|سوره=18 |آیه=89}}===
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| − | ==={{تفسیر نور الثقلین|سوره=18 |آیه=89}}===
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| − | ==={{تفسیر الصافی|سوره=18 |آیه=89}}===
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| − | ==={{تفسیر الکاشف|سوره=18 |آیه=89}}===
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| − | </tabber>
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| | ==پانویس== | | ==پانویس== |