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| سطر ۴۳: |
سطر ۴۳: |
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| | == تفسیر آیه == | | == تفسیر آیه == |
| − | <tabber> | + | <tafsir sura="10" ayeh="69" /> |
| − | تفسیر نور=
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| − | ===تفسیر نور (محسن قرائتی)===
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| − | {{ نمایش فشرده تفسیر|
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| − | قُلْ إِنَّ الَّذِينَ يَفْتَرُونَ عَلَى اللَّهِ الْكَذِبَ لا يُفْلِحُونَ «69»
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| − | بگو: همانا كسانى كه بر خداوند دروغ مىبندند، رستگار نمىشوند.
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| − | مَتاعٌ فِي الدُّنْيا ثُمَّ إِلَيْنا مَرْجِعُهُمْ ثُمَّ نُذِيقُهُمُ الْعَذابَ الشَّدِيدَ بِما كانُوا يَكْفُرُونَ «70»
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| − | بهرهاى اندك در دنيا دارند، سپس بازگشت آنان به سوى ماست، آنگاه به سزاى كفرشان، عذاب سخت به آنان مىچشانيم.
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| − | ===نکته ها===
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| − | «مَتاعٌ» و «متعه»، به بهرهگيرى كوتاه مدّت گفته مىشود. از آنجا كه بهرهورى انسان از دنيا و نعمتهاى آن كوتاه است، لذا قرآن در مورد امور دنيوى تعبير «متاع» را به كار برده است.
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| − | سؤال: اگر افترازنندگان رستگار نمىشوند، پس چرا در زندگى مادّى آنان را در رفاه بيشترى مىبينيم؟
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| − | پاسخ: اين رفاه و كاميابى موقّت است، «مَتاعٌ فِي الدُّنْيا» ولى كيفر اصلى آنان در آخرت و زمانى است كه به سوى او بازگردند.
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| − | ===پیام ها===
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| − | 1- آنان كه افرادى را به اميد شفاعت، فرزند خدا مىدانند، به هدفشان نمىرسند. قالُوا اتَّخَذَ اللَّهُ وَلَداً ... لا يُفْلِحُونَ
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| − | 2- كاميابى موقّت اگر عذاب دائمى در پى داشته باشد، بىارزش است. «مَتاعٌ فِي الدُّنْيا، نُذِيقُهُمُ الْعَذابَ الشَّدِيدَ»
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| − | 3- لذّتهاى دنيا زودگذر است. «مَتاعٌ فِي الدُّنْيا»
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| − | 4- ياد معاد، از عوامل بازدارنده از انحراف وگناه است. «إِلَيْنا مَرْجِعُهُمْ»
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| − | 5- دروغ بستن به خداوند با انواع بدعتها، تحريفها، تفسير به رأىها و فرزند قراردادن براى او، كفر است. «بِما كانُوا يَكْفُرُونَ»
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| − | تفسير نور(10جلدى)، ج3، ص: 600
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| − | اثنی عشری=
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| − | ===تفسیر اثنی عشری (حسینی شاه عبدالعظیمی)===
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| − | {{نمایش فشرده تفسیر|
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| − | قُلْ إِنَّ الَّذِينَ يَفْتَرُونَ عَلَى اللَّهِ الْكَذِبَ لا يُفْلِحُونَ (69)
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| − | بعد از آن وعيد و عقاب مفترين و رستگار نبودن آنان را اعلام فرمايد:
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| − | قُلْ إِنَّ الَّذِينَ يَفْتَرُونَ عَلَى اللَّهِ الْكَذِبَ: بگو اى پيغمبر و اعلان كن مفترين را كه بتحقيق آن كسانى كه افترا كنند و نسبت دهند بر خداى متعال دروغ را به اتخاذ ولد يا شريك و غير آن. لا يُفْلِحُونَ: فائز نشوند به چيزى از ثواب، يا رستگار نشوند در آخرت، يا ايمان نياورند و رستگارى نيابند، يا ظفر و بقا و فلاحى براى آنها نباشد؛ زيرا باطل را جولانى، و حق را سريانى است.
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| − | روان جاوید=
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| − | ===تفسیر روان جاوید (ثقفى تهرانى)===
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| − | {{نمایش فشرده تفسیر|
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| − | قالُوا اتَّخَذَ اللَّهُ وَلَداً سُبْحانَهُ هُوَ الْغَنِيُّ لَهُ ما فِي السَّماواتِ وَ ما فِي الْأَرْضِ إِنْ عِنْدَكُمْ مِنْ سُلْطانٍ بِهذا أَ تَقُولُونَ عَلَى اللَّهِ ما لا تَعْلَمُونَ (68) قُلْ إِنَّ الَّذِينَ يَفْتَرُونَ عَلَى اللَّهِ الْكَذِبَ لا يُفْلِحُونَ (69) مَتاعٌ فِي الدُّنْيا ثُمَّ إِلَيْنا مَرْجِعُهُمْ ثُمَّ نُذِيقُهُمُ الْعَذابَ الشَّدِيدَ بِما كانُوا يَكْفُرُونَ (70)
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| − | ترجمه
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| − | گفتند گرفت خدا فرزندى منزّه است او او است بىنياز مر او را است آنچه در آسمانها و آنچه در زمين است نيست نزد شما هيچ حجّتى بر اين آيا ميگوئيد نسبت بخدا آنچه را نميدانيد
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| − | بگو همانا آنانكه مىبندند بر خدا دروغ را رستگار نميشوند
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| − | بهرهاى است در دنيا پس بسوى ما است باز گشت ايشان پس ميچشانيم آنها را عذاب سخت براى آنكه بودند كه كافر ميشدند.
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| − | تفسير
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| − | جمعى از كفّار قريش ميگفتند ملائكه دختران خدايند و يهود معتقد بودند عزير پسر خدا است و نصارى مسيح را پسر خدا ميدانستند و چون بآنها اعتراض ميشد كه توالد و تناسل ملازم با ازدواج و جسميّت است ميگفتند خدا آنانرا برسم اولادى قبول كرده و ولد گرفته لذا خداوند آنها را اولا به تنزيه ذات احديّت از هر نقص ردّ فرموده كه مفاد كلمه سبحانه است و مفيد تعجّب است از مقاله فاسده آنها و ثانيا بيان فرموده كه اتّخاذ ولد بواسطه ضعف و فقر و احتياج است و خداوند بىنياز از ماسوى است و تمام مخلوق آسمانها و زمين مملوك و مقهور اراده اويند پس چه احتياج به اتّخاذ ولد دارد و ثالثا نفى حجّت از دعاوى آنها فرموده براى اشاره بآنكه ادّعاء بدون دليل پذيرفته نيست و در خاتمه توبيخ و ملامت شدهاند بر جهالت و نادانى و نسبت دادن آنها بخداوند امرى را كه مبرّى از آنست و آنها هم علم بآن ندارند چون از اقامه برهان بر آن عاجز شدند و قول بدون دليل جهل است و در دو آيه اخيره تصريح
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| − | جلد 3 صفحه 34
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| − | شده است كه اين قبيل افتراء بستن بخدا موجب كفر و خلود در آتش و نديدن روى فلاح و رستگارى است چند روزى در اين دنياى دنى بايد باين موهومات سر گرم باشند تا اجل آنها برسد و در پيشگاه الهى با روى سياه حاضر شوند و بجزاى عقائد باطله و اعمال فاسده خودشان برسند.
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| − | اطیب البیان=
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| − | ===اطیب البیان (سید عبدالحسین طیب)===
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| − | قُل إِنَّ الَّذِينَ يَفتَرُونَ عَلَي اللّهِ الكَذِبَ لا يُفلِحُونَ (69)
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| − | بگو اي رسول محترم محققا كساني که بر خداوند افتراء ميزنند و از روي دروغ نسبت ميدهند اينها رستگار نميشوند.
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| − | قُل إِنَّ الَّذِينَ يَفتَرُونَ عَلَي اللّهِ الكَذِبَ گذشت در چند آيه قبل معناي افتراء و فرق بين او و كذب بعموم و خصوص مطلق احتياج بتكرار نيست فقط در كلمه لا يُفلِحُونَ چند كلمه صحبت ميداريم:
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| − | اولا هر چيزي که داراي اجزاء و شرائطي باشد بفقدان يكي از اجزاء و شرائط آن فاقد ميشود، در مركبات ارتباطيه مثل نماز و امثال آن فلاح و رستگاري منوط و مربوط باموري است از ايمان بجميع عقائد حقّه و ثبات آن تا زمان فوت و موانعي هم ايجاد نشود از انكار ضروري يا بدعت در دين يا اهانت بمقدسات ديني که موجب زوال ايمان ميشود و مقرون شدن باعمال صالحه و تقواي از معاصي كبار چنانچه در بسياري از آيات شريفه تصريح شده که بفقدان هر يك فلاح فاقد ميشود مگر آنكه تدارك كند برجوع و توبه و شفاعت آنهم خاص باهل ايمان است و البته افتراء بخدا و كذب بر خدا هم ايمان را از بين ميبرد و هم گناه بسيار بزرگي است و با اينکه وصف هرگز روي فلاح و رستگاري را نخواهد ديد سيّما خداوند خبر داده که اينها رستگار نميشوند وَ مَن أَصدَقُ مِنَ اللّهِ قِيلًا نساء آيه 121 وَ مَن أَصدَقُ مِنَ اللّهِ حَدِيثاً نساء آيه
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| − | جلد 10 - صفحه 89
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| − | 426
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| − | برگزیده تفسیر نمونه=
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| − | ===برگزیده تفسیر نمونه===
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| − | {{نمایش فشرده تفسیر|
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| − | (آیه 69)- در این آیه سر انجام شوم افترا و تهمت بر خدا را بازگو میکند روی سخن را متوجه پیامبرش کرده و میگوید: «به آنها بگو: کسانی که بر خدا افترا میبندند و دروغ میگویند هرگز روی رستگاری را نخواهند دید» (قُلْ إِنَّ الَّذِینَ یَفْتَرُونَ عَلَی اللَّهِ الْکَذِبَ لا یُفْلِحُونَ).
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| − | سایر تفاسیر=
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| − | سایرتفاسیر این آیه را می توانید در سایت قرآن مشاهده کنید:
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| − | ==تفسیر های فارسی==
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| − | ==={{ترجمه تفسیر المیزان|سوره=10 |آیه=69}}===
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| − | ==={{تفسیر خسروی|سوره=10 |آیه=69}}===
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| − | ==={{تفسیر عاملی|سوره=10 |آیه=69}}===
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| − | ==={{تفسیر جامع|سوره=10 |آیه=69}}===
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| − | ==تفسیر های عربی==
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| − | ==={{تفسیر المیزان|سوره=10 |آیه=69}}===
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| − | ==={{تفسیر مجمع البیان|سوره=10 |آیه=69}}===
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| − | ==={{تفسیر نور الثقلین|سوره=10 |آیه=69}}===
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| − | ==={{تفسیر الصافی|سوره=10 |آیه=69}}===
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| − | ==={{تفسیر الکاشف|سوره=10 |آیه=69}}===
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| − | </tabber>
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| | ==پانویس== | | ==پانویس== |