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| سطر ۴۴: |
سطر ۴۴: |
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| | == تفسیر آیه == | | == تفسیر آیه == |
| − | <tabber> | + | <tafsir sura="9" ayeh="15" /> |
| − | تفسیر نور=
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| − | ===تفسیر نور (محسن قرائتی)===
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| − | {{ نمایش فشرده تفسیر|
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| − | وَ يُذْهِبْ غَيْظَ قُلُوبِهِمْ وَ يَتُوبُ اللَّهُ عَلى مَنْ يَشاءُ وَ اللَّهُ عَلِيمٌ حَكِيمٌ «15»
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| − | و خداوند (با پيروزى شما و خوارى دشمن،) غيظ و خشم دلهاى مؤمنان را از بين ببرد و خداوند لطف خود را بر هركس بخواهد بر مىگرداند (و راه توبه را به روى آنان مىگشايد.) و خداوند، دانا و حكيم است.
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| − | ===پیام ها===
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| − | 1- گرچه هدف از جنگ، رضاى خدا و دفاع و جلوگيرى از شرك و توطئه و پيمانشكنى است، ليكن تسكين دلها و آرام شدن روح نيز از آثار وضعى و ثانوى آن است. «1» «يُذْهِبْ غَيْظَ قُلُوبِهِمْ»
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| − | 2- پس از پيروزى، از آنان كه براى همبستگى و پيوند نزد شما مىآيند، استقبال كنيد و نگوييد: تا حالا كجا بوديد؟ «وَ يَتُوبُ اللَّهُ عَلى مَنْ يَشاءُ»
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| − | 3- مبادا از بيم خدعه، آنان را كه به سراغ شما مىآيند نپذيريد! خدا به توبهى واقعى يا رياكارانه آگاه است، ولى طبق حكمت الهى بايد هر كه اظهار اسلام مىكند- با حفظ اصول ايمنى- پذيرفت. «عَلِيمٌ حَكِيمٌ»
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| − | «1». در آياتى همچون «سَيَجْعَلُ اللَّهُ بَعْدَ عُسْرٍ يُسْراً» 9 (طلاق، 7)، «فَإِنَّ مَعَ الْعُسْرِ يُسْراً»، (انشراح، 6) به اين حقيقت اشاره شده كه:
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| − | بگذرد اين روزگار تلختر از زهر
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| − | بار دگر روزگار چون شكر آيد.
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| − | تفسير نور(10جلدى)، ج3، ص: 390
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| − | اثنی عشری=
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| − | ===تفسیر اثنی عشری (حسینی شاه عبدالعظیمی)===
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| − | وَ يُذْهِبْ غَيْظَ قُلُوبِهِمْ وَ يَتُوبُ اللَّهُ عَلى مَنْ يَشاءُ وَ اللَّهُ عَلِيمٌ حَكِيمٌ «15»
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| − | وَ يُذْهِبْ غَيْظَ قُلُوبِهِمْ: و تا ببرد خداى تعالى به نصرت شما بر كفار غضب و خشم قلوب آنان را كه به سبب آزار كفار به هيجان آمده و به سبب ناتوانى ملول و افسرده بودند.
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| − | تنبيه- آيه شريفه از معجزات حضرت رسالت صلّى اللّه عليه و آله و سلّم باشد، زيرا اخبار به غيب و مخبر بر وفق خبر واقع شد از قتل و اسيرى و خذلان كفار.
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| − | وَ يَتُوبُ اللَّهُ: (اين اخبار است به آنكه بعضى از كفره توبه نمايند، و واقع شد) يعنى و قبول فرمايد توبه را خداى تعالى و بازگردد به فضل خود از عقوبت به رحمت. عَلى مَنْ يَشاءُ: بر هر كه خواهد، مراد عكرمة بن ابى جهل و سهيل بن عمرو و امثال ايشان كه بالاخره ايمان آوردند. وَ اللَّهُ عَلِيمٌ حَكِيمٌ: و خداى تعالى داناست به ما كان و ما سيكون. حكيم است در امر نمودن شما به قتال، وقتى نقض عهد كنند قبل از توبه و رجوع، زيرا افعال سبحانى تمام صواب و حكمت است.
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| − | وجه تنظيم- قوله «وَ يَتُوبُ اللَّهُ ...» وجه اتصالش بما قبل دو چيز است: يكى بشارت به اينكه در ايشان كسانى هستند كه توبه نمايند از كفر به ايمان. و ديگر بيان اينكه در قتال آنها اقتطاعى نيست براى احدى از ايشان از توبه.
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| − | ج5، ص 33
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| − | روان جاوید=
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| − | ===تفسیر روان جاوید (ثقفى تهرانى)===
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| − | قاتِلُوهُمْ يُعَذِّبْهُمُ اللَّهُ بِأَيْدِيكُمْ وَ يُخْزِهِمْ وَ يَنْصُرْكُمْ عَلَيْهِمْ وَ يَشْفِ صُدُورَ قَوْمٍ مُؤْمِنِينَ «14» وَ يُذْهِبْ غَيْظَ قُلُوبِهِمْ وَ يَتُوبُ اللَّهُ عَلى مَنْ يَشاءُ وَ اللَّهُ عَلِيمٌ حَكِيمٌ «15»
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| − | ترجمه
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| − | جنگ كنيد با آنها عذاب ميكند ايشانرا خدا بدستهاى شما و رسوا ميكند آنها را و نصرت ميدهد شما را بر آنها و شفا ميدهد سينههاى گروهى را كه اهل ايمانند
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| − | و
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| − | جلد 2 صفحه 562
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| − | ميبرد خشم دلهاى ايشانرا و مىپذيرد توبه كسيرا كه بخواهد و خدا داناى درست كار است.
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| − | تفسير
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| − | وعده است از خداوند به مسلمانان كه در صورت جنگ نمودن ايشان با كفار معهوده در آيه سابقه عذاب كند خدا آنها را بدستهاى مسلمانان يعنى قتل و اسر و ذلّت و خفّت آنها بحق و بجا واقع شود بدست ايشان و آنها مفتضح و رسوا شوند و مسلمانان منصور و مظفر گردند بكمك غيبى و نصرت الهى و شفاء بدهد خداوند سينههاى گروهى از اهل ايمان حقيقى را كه مجروح شده بود از آزار و اذيت آنها نسبت بخودشان و پيغمبر اكرم نه اهل ايمان ظاهرى كه باطنا با آنها همعقيده بودند و ظاهرا ادّعاء اسلام مينمودند و نيز پاك كند دلهاى ايشانرا كه پر شده بود از خشم و غضب بر كفار براى آن آزارهاى سابقه و موّفق بتوبه و قبول اسلام فرمايد از آنها كسيرا كه اراده فرموده است خدا اسلام و قبول توبه او را مانند عكرمة بن ابى جهل و سهيل بن عمرو و امثال ايشان كه قبول اسلام نمودند و تمام اين مواعيد الهيه بعد از جنگ انجاز شد و انجام يافت و اين يكى از معجزات قرآن است و خداوند عالم بما كان و ما يكون است امر بجهاد نمىفرمايد مگر بر طبق حكمت ..
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| − | اطیب البیان=
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| − | ===اطیب البیان (سید عبدالحسین طیب)===
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| − | {{نمایش فشرده تفسیر|
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| − | وَ يُذهِب غَيظَ قُلُوبِهِم وَ يَتُوبُ اللّهُ عَلي مَن يَشاءُ وَ اللّهُ عَلِيمٌ حَكِيمٌ «15»
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| − | و خداوند برطرف ميكند و از بين ميبرد غيظ و غضبي که از كفار در قلوب مؤمنين بود و مع ذلک اگر موفق بتوبه شدند خداوند قبول ميفرمايد از آنهايي که مشيّت خود تعلق گرفته و خداوند عالم و حكيم است به اينكه كي قابليت دارد و مصلحت در قبولي توبه او هست و كي لياقت ندارد.
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| − | وَ يُذهِب غَيظَ قُلُوبِهِم نظر باذيتها و اهانتها و آزارها که مشركين در مكه
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| − | جلد 8 - صفحه 190
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| − | نسبت بمؤمنين روا داشتند قلوب مؤمنين مملوّ از غيظ شده بود و انتظار داشتند که تلافي كنند خداوند ميفرمايد با آنها مقاتله كنيد بر آنها مسلط خواهيد شد و دلهاي خود را خالي كنيد از آن غيظ و غضب که از آنها در دل داريد.
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| − | وَ يَتُوبُ اللّهُ عَلي مَن يَشاءُ كساني را که مورد توفيق الهي شوند و توبه كنند و بشرف اسلام مشرف شوند خداوند ميپذيرد و لو هر قدر اذيت بپيغمبر اكرم صلّي اللّه عليه و آله و سلّم و بشما مؤمنين كرده باشند شما ديگر كينه آنها را در دل نگيريد.
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| − | (الاسلام يجبّ ما قبله).
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| − | وَ اللّهُ عَلِيمٌ ميداند كيست که موفق بتوبه ميشود و لياقت مغفرت دارد و كيست که قساوت قلب او بدرجهاي رسيده که موفق نميشود و لياقت ندارد حكيم مصالح و مفاسد را كلية و حكم و صلاح و فساد هر كس را ميداند.
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| − | برگزیده تفسیر نمونه=
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| − | ===برگزیده تفسیر نمونه===
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| − | {{نمایش فشرده تفسیر|
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| − | (آیه 15)- در این آیه اضافه میکند که: خداوند در پرتو پیروزی شما و شکست آنها «خشم دلهای مؤمنان را فرو مینشاند» (وَ یُذْهِبْ غَیْظَ قُلُوبِهِمْ).
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| − | و در پایان آیه میفرماید: «خداوند توبه هر کسی را که بخواهد (و مصلحت بداند) میپذیرد» (وَ یَتُوبُ اللَّهُ عَلی مَنْ یَشاءُ).
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| − | «و خداوند دانا و حکیم است» (وَ اللَّهُ عَلِیمٌ حَکِیمٌ).
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| − | از نیات توبه کنندگان آگاه و دستورهایی را که در باره آنها و همچنین پیمان شکنان داده است حکیمانه میباشد.
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| − | جملههای اخیر بشارتی است به این که چنین افرادی در آینده به سوی مسلمانها خواهند آمد و توفیق الهی به خاطر آمادگی روحیشان شامل حال آنها خواهد بود.
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| − | سایر تفاسیر=
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| − | سایرتفاسیر این آیه را می توانید در سایت قرآن مشاهده کنید:
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| − | ==تفسیر های فارسی==
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| − | ==={{ترجمه تفسیر المیزان|سوره=9 |آیه=15}}===
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| − | ==={{تفسیر خسروی|سوره=9 |آیه=15}}===
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| − | ==={{تفسیر عاملی|سوره=9 |آیه=15}}===
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| − | ==={{تفسیر جامع|سوره=9 |آیه=15}}===
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| − | ==تفسیر های عربی==
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| − | ==={{تفسیر المیزان|سوره=9 |آیه=15}}===
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| − | ==={{تفسیر مجمع البیان|سوره=9 |آیه=15}}===
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| − | ==={{تفسیر نور الثقلین|سوره=9 |آیه=15}}===
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| − | ==={{تفسیر الصافی|سوره=9 |آیه=15}}===
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| − | ==={{تفسیر الکاشف|سوره=9 |آیه=15}}===
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| − | </tabber>
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| | ==پانویس== | | ==پانویس== |