|
|
| سطر ۴۳: |
سطر ۴۳: |
| | جحيم: آتش بزرگ، «الجحيم: كل نار عظيم فى مهواة».<ref>تفسیر احسن الحدیث، سید علی اکبر قرشی</ref> | | جحيم: آتش بزرگ، «الجحيم: كل نار عظيم فى مهواة».<ref>تفسیر احسن الحدیث، سید علی اکبر قرشی</ref> |
| | | | |
| − | ==تفسیر آیه== | + | == تفسیر آیه == |
| − | <tabber> | + | <tafsir sura="5" ayeh="10" /> |
| − | تفسیر نور=
| |
| | | | |
| − | ===تفسیر نور (محسن قرائتی)===
| |
| | | | |
| − | {{ نمایش فشرده تفسیر|
| |
| − | وَ الَّذِينَ كَفَرُوا وَ كَذَّبُوا بِآياتِنا أُولئِكَ أَصْحابُ الْجَحِيمِ «10»
| |
| | | | |
| − | و آنان كه كفر ورزيده و آيات ما را تكذيب نمودند، همانان اهل دوزخند.
| |
| − |
| |
| − | ===نکته ها===
| |
| − |
| |
| − | در قرآن چند نوع أجر به كار رفته است: «أَجْرٌ عَظِيمٌ»، «أَجْرٌ كَبِيرٌ» «1»، «أَجْرٍ كَرِيمٍ» «2»، «أَجْرٌ غَيْرُ مَمْنُونٍ» «3». بنابراين، پاداشهاى الهى داراى درجاتى است.
| |
| − |
| |
| − | وعدههاى خداوند، وَعَدَ اللَّهُ ... تخلّف ناپذير است: «إِنَّ اللَّهَ لا يُخْلِفُ الْمِيعادَ» «4»
| |
| − |
| |
| − | «1». هود، 11.
| |
| − |
| |
| − | «2». يس، 11.
| |
| − |
| |
| − | «3». فصّلت، 8.
| |
| − |
| |
| − | «4». آلعمران، 9.
| |
| − |
| |
| − | جلد 2 - صفحه 252
| |
| − |
| |
| − | «جحيم» به معناى شدّت برافروختگى آتش است. در داستان ابراهيم عليه السلام آمده كه او را در جحيم (آتش شعلهور) افكندند. «أَصْحابُ الْجَحِيمِ» يعنى اهل آتش و آنان كه پيوسته در آتش دوزخ هستند.
| |
| − |
| |
| − | ===پیام ها===
| |
| − |
| |
| − | 1- ايمان و عمل ملازم هم هستند. «آمَنُوا وَ عَمِلُوا الصَّالِحاتِ»
| |
| − |
| |
| − | 2- ايمان و عمل شايسته، هم جبران كنندهى گناهان است «لَهُمْ مَغْفِرَةٌ» و هم تأمين كنندهى پاداش. «أَجْرٌ عَظِيمٌ»
| |
| − |
| |
| − | 3- توجّه به عاقبت كارها، در تصميمهاى انسان نقش مهمى دارد. أَجْرٌ عَظِيمٌ ... أَصْحابُ الْجَحِيمِ
| |
| − |
| |
| − | 4- كيفر كافران و تكذيب كنندگان، دوزخ ابدى است. وَ الَّذِينَ كَفَرُوا ... أَصْحابُ الْجَحِيمِ
| |
| − |
| |
| − | 5- تشويق، انگيزهى عمل است. «لَهُمْ مَغْفِرَةٌ وَ أَجْرٌ عَظِيمٌ» همان گونه كه تهديد، از روشهاى تربيتى قرآن است. «أَصْحابُ الْجَحِيمِ»
| |
| − | }}
| |
| − |
| |
| − | |-|
| |
| − | اثنی عشری=
| |
| − |
| |
| − | ===تفسیر اثنی عشری (حسینی شاه عبدالعظیمی)===
| |
| − |
| |
| − | {{نمایش فشرده تفسیر|
| |
| − |
| |
| − |
| |
| − | وَ الَّذِينَ كَفَرُوا وَ كَذَّبُوا بِآياتِنا أُولئِكَ أَصْحابُ الْجَحِيمِ «10»
| |
| − |
| |
| − | و بنابر عادت جاريه الهى بعد از ذكر وعد بيان وعيد فرمايد:
| |
| − |
| |
| − | وَ الَّذِينَ كَفَرُوا: آنان كه كافر شدند وَ كَذَّبُوا بِآياتِنا: و تكذيب كردند آيتهاى ما را كه قرآن يا ساير معجزات داله بر صدق نبوت پيغمبر صلى اللّه عليه و آله أُولئِكَ أَصْحابُ الْجَحِيمِ: آن گروه كافران و جاحدان، مصاحبان و
| |
| − |
| |
| − | «1» معالم الزّلفى، محدّث بحرانى، فصل پنجم، باب 29 (صفحه 277)
| |
| − |
| |
| − | تفسير اثنا عشرى، ج3، ص: 36
| |
| − |
| |
| − | مجاوران آتشاند.
| |
| − |
| |
| − | على بن ابراهيم- از ابو بصير روايت نموده به حضرت صادق عليه السّلام عرض كردم: يابن رسول اللّه عليه السّلام مرا بترسان كه دلم سنگين شده.
| |
| − |
| |
| − | حضرت فرمود: مهيا شو براى زندگى دراز بدرستى كه جبرئيل آمد به نزد رسول خدا با روى ترش، پيشتر كه مىآيد متبسم بود. حضرت از سبب آن سؤال.
| |
| − |
| |
| − | جبرئيل گفت: امروز دمهائى كه بر آتش مىدميدند از دست گذاشتند. پيغمبر صلى اللّه عليه و آله فرمود دمهاى جهنم چيست؟ جبرئيل گفت: حق تعالى امر فرمود هزار سال بر آتش جهنم دميدند تا سفيد شد، پس هزار سال ديگر دميدند تا سرخ شد، و هزار سال ديگر دميدند تا سياه شد، و اكنون سياه است و تاريك، و اگر قطرهاى از ضريع كه عرق اهل جهنم و چرك و ريم فرجهاى زناكاران است كه در ديگهاى جهنم جوشيده و به عوض آب به اهل جهنم مىخورانند در آبهاى اهل دنيا بريزند، هر آينه جميع اهل دنيا از گندش بميرند، و اگر يك حلقه از زنجيرى كه هفتاد ذرع است و بر گردن اهل جهنم مىگذارند بر دنيا بگذارند، از حرارت آن تمام دنيا بگدازد. و اگر پيراهنى از پيراهنهاى اهل آتش را در ميان آسمان و زمين بياويزند، اهل دنيا از بوى بد آن هلاك شوند. چون جبرئيل اينها را گفت پيغمبر و جبرئيل هر دو به گريه آمدند، پس حق تعالى ملكى را فرستاد كه پروردگار شما سلام مىرساند و مىفرمايد: شما را ايمن مىگردانم. بعد از آن هر وقت جبرئيل خدمت حضرت نازل مىشد متبسم بود.
| |
| − |
| |
| − | پس حضرت صادق عليه السّلام فرمود: در آن روز اهل آتش عظمت جهنم و عذاب الهى را مىدانند، و اهل بهشت عظمت بهشت و نعيم آن را مىدانند «1».
| |
| − |
| |
| − |
| |
| − | }}
| |
| − | |-|
| |
| − | روان جاوید=
| |
| − | ===تفسیر روان جاوید (ثقفى تهرانى)===
| |
| − | {{نمایش فشرده تفسیر|
| |
| − | وَ الَّذِينَ كَفَرُوا وَ كَذَّبُوا بِآياتِنا أُولئِكَ أَصْحابُ الْجَحِيمِ «10»
| |
| − |
| |
| − | ترجمه
| |
| − |
| |
| − | و آنانكه كافر شدند و تكذيب نمودند آيتهاى ما را آنگروه اصحاب دوزخند.
| |
| − |
| |
| − | تفسير
| |
| − |
| |
| − | نتيجه كفر كه مستوريت حقايق و چشمپوشى از آنست تكذيب دلائل واضحه اسلام و آيات بيّنات قرآن است و حق دعوت آنستكه مركب از وعد وعيد باشد و باين طريقه كلام الهى مستقر شده است ..
| |
| − | }}
| |
| − | |-|
| |
| − | اطیب البیان=
| |
| − | ===اطیب البیان (سید عبدالحسین طیب)===
| |
| − | {{نمایش فشرده تفسیر|
| |
| − | وَ الَّذِينَ كَفَرُوا وَ كَذَّبُوا بِآياتِنا أُولئِكَ أَصحابُ الجَحِيمِ «10»
| |
| − |
| |
| − | و كساني که كافر شدند و تكذيب آيات ما را نمودند اينها اصحاب جهنم هستند وَ الَّذِينَ كَفَرُوا شامل جميع طبقات كفار ميشود از طبيعي و مشرك، مجوس يهود، نصاري، غلات، اهل بدعت و منكر ضروري.
| |
| − |
| |
| − | وَ كَذَّبُوا بِآياتِنا آيات الهي انبياء، اوصياء انبياء و دلائل بر وجود الهي و صفات ربوبي و افعال خداوند و آيات قرآني و دستورات و احكام پروردگار هستند که تكذيب هر يك از آنها موجب خروج از ايمان ميشود و لو اطلاق كفر بر آنها نشود أُولئِكَ أَصحابُ الجَحِيمِ اصحاب از مصاحبت است و بدلالت التزامي دليل بر خلود است که دائما مصاحب جهنم است و جحيم يكي از اسماء جهنم است و در بعض اخبار يكي از طبقات جهنم است.
| |
| − | }}
| |
| − | |-|
| |
| − | برگزیده تفسیر نمونه=
| |
| − |
| |
| − | ===برگزیده تفسیر نمونه===
| |
| − | {{نمایش فشرده تفسیر|
| |
| − | (آیه 10)
| |
| − |
| |
| − | - و در مقابل: «کسانی که خدا را انکار کنند و آیات او را تکذیب نمایند از اصحاب دوزخند» (وَ الَّذِینَ کفَرُوا وَ کذَّبُوا بِآیاتِنا أُولئِکَ أَصحابُ الجَحِیمِ).
| |
| − |
| |
| − | قابل توجه این که آمرزش و اجر عظیم به عنوان یک وعده الهی در آیه ذکر شده و فرموده: وعد اللّه ... ولی کیفر دوزخ به صورت نتیجه عمل بیان شده و می فرماید: «کسانی که دارای چنین اعمالی باشند، چنان سرنوشتی خواهند داشت» و این در حقیقت اشاره به مسأله فضل و رحمت خدا در مورد پاداشهای سرای دیگر است، که به هیچ وجه برابری با اعمال ناچیز انسان ندارد، همانطور که مجازاتهای آن جهان جنبه انتقامی نداشته بلکه نتیجه اعمال خود آدمی است.
| |
| − |
| |
| − | }}
| |
| − | |-|
| |
| − |
| |
| − | سایر تفاسیر=
| |
| − | سایرتفاسیر این آیه را می توانید در سایت قرآن مشاهده کنید:
| |
| − |
| |
| − | ==تفسیر های فارسی==
| |
| − | ==={{ترجمه تفسیر المیزان|سوره=5 |آیه=10}}===
| |
| − | ==={{تفسیر خسروی|سوره=5 |آیه=10}}===
| |
| − | ==={{تفسیر عاملی|سوره=5 |آیه=10}}===
| |
| − | ==={{تفسیر جامع|سوره=5 |آیه=10}}===
| |
| − |
| |
| − | ==تفسیر های عربی==
| |
| − | ==={{تفسیر المیزان|سوره=5 |آیه=10}}===
| |
| − | ==={{تفسیر مجمع البیان|سوره=5 |آیه=10}}===
| |
| − | ==={{تفسیر نور الثقلین|سوره=5 |آیه=10}}===
| |
| − | ==={{تفسیر الصافی|سوره=5 |آیه=10}}===
| |
| − | ==={{تفسیر الکاشف|سوره=5 |آیه=10}}===
| |
| − | </tabber>
| |
| | | | |
| | ==پانویس== | | ==پانویس== |