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| سطر ۴۴: |
سطر ۴۴: |
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| | == تفسیر آیه == | | == تفسیر آیه == |
| − | <tabber> | + | <tafsir sura="7" ayeh="177" /> |
| − | تفسیر نور=
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| − | ===تفسیر نور (محسن قرائتی)===
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| − | {{ نمایش فشرده تفسیر|
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| − | ساءَ مَثَلًا الْقَوْمُ الَّذِينَ كَذَّبُوا بِآياتِنا وَ أَنْفُسَهُمْ كانُوا يَظْلِمُونَ «177»
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| − | چه بد مَثَلى دارند كسانى كه آيات ما را تكذيب كردند. و (لى) آنان تنها به خودشان ستم مىكردند.
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| − | مَنْ يَهْدِ اللَّهُ فَهُوَ الْمُهْتَدِي وَ مَنْ يُضْلِلْ فَأُولئِكَ هُمُ الْخاسِرُونَ «178»
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| − | هركه را خدا هدايت كند، تنها اوست هدايت يافته، و هر كه را گمراه كند، پس آنان همان زيانكارانند.
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| − | ===نکته ها===
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| − | شايد دليل اينكه در مورد هدايت يافتگان كلمهى مفرد «مهتد» و در مورد گمراهان به صورت جمع آمده «خاسرون»، آن باشد كه راه هدايت يافتگان يكى است و با هم متّحدند، امّا منحرفان، متفرّقند و راهشان متعدّد است.
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| − | جان گرگان و سگان هر يك جداست
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| − | متّحد جانهاى شيران خداست
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| − | گرچه هدايت و گمراهى به دست خداست، ولى جنبهى اجبار ندارد و بىدليل و بىحساب نيست. خداوند حكيم و رحيم است و تا انسان زمينه را به دست خويش فراهم نسازد، مشمول لطف يا قهر الهى نمىشود.
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| − | ===پیام ها===
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| − | 1- عاقبتِ زشتى در انتظار تكذيب كنندگان است. «ساءَ مَثَلًا»
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| − | 2- تكذيب آيات الهى، ظلم به خويش است، نه خداوند. «أَنْفُسَهُمْ كانُوا يَظْلِمُونَ» مقدّمداشتن «أَنْفُسَهُمْ» بر «يَظْلِمُونَ»، نشانهى انحصار است.
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| − | 3- هدايت به دست خداوند است و اگر لطف او نباشد، علم به تنهايى سبب نجات و هدايت نمىشود. «مَنْ يَهْدِ اللَّهُ»
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| − | 4- هدايتيافتگان از هر گونه زيان و خسران به دور هستند، زيرا ضلالت سرچشمهى خسارت است. «مَنْ يُضْلِلْ فَأُولئِكَ هُمُ الْخاسِرُونَ»
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| − | تفسير نور(10جلدى)، ج3، ص: 224
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| − | اثنی عشری=
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| − | ===تفسیر اثنی عشری (حسینی شاه عبدالعظیمی)===
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| − | {{نمایش فشرده تفسیر|
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| − | ساءَ مَثَلاً الْقَوْمُ الَّذِينَ كَذَّبُوا بِآياتِنا وَ أَنْفُسَهُمْ كانُوا يَظْلِمُونَ (177)
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| − | ساءَ مَثَلًا الْقَوْمُ الَّذِينَ كَذَّبُوا بِآياتِنا: بد است مثل كسانى كه تكذيب كردند آيات ما را بعد از علم آنها و حجت برايشان، وَ أَنْفُسَهُمْ كانُوا يَظْلِمُونَ:
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| − | و بر نفوس خود بودند كه ظلم مىكردند به تكذيب آيات، چه عقاب معاصى آنها عايد خودشان شد، و به ساحت جلال احديت، نقصانى وارد نيامد.
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| − | تبصره: مراد به قبح مثل قبح صفت آنها است، يعنى بد صفتى باشد ايشان را كه مضروب فيه مثل است، نه آنكه مراد اصل مثل باشد، چه آن محض حكمت و صواب مصلحت است كه مستلزم حسن باشد.
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| − | روان جاوید=
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| − | ===تفسیر روان جاوید (ثقفى تهرانى)===
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| − | {{نمایش فشرده تفسیر|
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| − | سوره الأعراف «7»: آيات 175 تا 178
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| − | وَ اتْلُ عَلَيْهِمْ نَبَأَ الَّذِي آتَيْناهُ آياتِنا فَانْسَلَخَ مِنْها فَأَتْبَعَهُ الشَّيْطانُ فَكانَ مِنَ الْغاوِينَ (175) وَ لَوْ شِئْنا لَرَفَعْناهُ بِها وَ لكِنَّهُ أَخْلَدَ إِلَى الْأَرْضِ وَ اتَّبَعَ هَواهُ فَمَثَلُهُ كَمَثَلِ الْكَلْبِ إِنْ تَحْمِلْ عَلَيْهِ يَلْهَثْ أَوْ تَتْرُكْهُ يَلْهَثْ ذلِكَ مَثَلُ الْقَوْمِ الَّذِينَ كَذَّبُوا بِآياتِنا فَاقْصُصِ الْقَصَصَ لَعَلَّهُمْ يَتَفَكَّرُونَ (176) ساءَ مَثَلاً الْقَوْمُ الَّذِينَ كَذَّبُوا بِآياتِنا وَ أَنْفُسَهُمْ كانُوا يَظْلِمُونَ (177) مَنْ يَهْدِ اللَّهُ فَهُوَ الْمُهْتَدِي وَ مَنْ يُضْلِلْ فَأُولئِكَ هُمُ الْخاسِرُونَ (178)
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| − | ترجمه
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| − | و بخوان بر آنها خبر آنكه داديم باو آيتهاى خودمان را پس بيرون رفت از آنها و پيروى كرد او را شيطان پس بود از گمراهان
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| − | و اگر ميخواستيم هر آينه برترى ميداديم او را بآنها ولى او ميل كرد بسوى زمين و پيروى كرد دلخواه خود را پس مثل او مانند مثل سگ است كه اگر حمله كنى بر او زبان از دهان در آورد و اگر واگذاريش زبان از دهان در آورد اين مثل گروهى است كه تكذيب نمودند آيتهاى ما را پس نقل كن حكايت را باشد كه آنها تفكّر نمايند
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| − | بدند در مثل گروهى كه تكذيب نمودند آيتهاى ما را و بر خودهاشان بودند كه ستم ميكردند
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| − | كسيرا كه هدايت كند خدا او هدايت شده است و كسانيرا كه گمراه كند پس آنگروه ايشانند زيانكاران.
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| − | تفسير
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| − | قمى ره فرموده نازل شده است در باره بلعم بن باعورا كه از بنى اسرائيل بود
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| − | جلد 2 صفحه 494
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| − | و باو عطا شده بود علم بعضى از كتب سماوى و در مجمع از امام باقر (ع) نقل نموده كه اصل در آن بلعم است ولى خداوند مثل زده است بآن براى هر كس كه هواى نفس او را از راه هدايت باز دارد از اهل قبله و عيّاشى از آنحضرت نقل نموده كه مثل مغيرة بن شعبه مثل بلعم است كه باو تعليم شده بود اسم اعظم و در اين آيه از او خبر داده شده و قمى ره از حضرت رضا (ع) نقل نموده كه عطا شده بود به بلعم بن باعورا اسم اعظم و بآن اسم دعا ميكرد و اجابت ميشد پس مايل شد بفرعون و چون او بطلب حضرت موسى بيرون آمد از بلعم خواهش نمود كه دعا كند خدا آنحضرت را بحبس فرعون در آورد پس بلعم سوار الاغش شد كه بطلب حضرت موسى بيرون رود آنحيوان از حركت باز ماند و هر چه زد حركت نكرد تا بامر خداوند بزبان آمد و گفت چرا مرا ميزنى ميخواهى من با تو بيايم تا نفرين كنى در باره پيغمبر خدا و پيروانش ولى او بقدرى آنحيوانرا زد كه كشت و اسم اعظم از زبانش منسلخ شد و اين است مراد از فانسلخ منها در اين آيه و اينكه فرموده شيطان پيروى از او نمود و نفرموده او پيروى از شيطان كرد براى اين نكته است كه او در بدو امر از علما و عبّاد بود شيطان مدتها تعقيب از او نمود تا او را بدام آورد ولى از اوّل نام او در دفتر الهى جزء گمراهان ثبت بود و اگر مشيّت الهى تعلّق گرفته بود برفعت مقام او ميرساند او را ببركت آن آيات كتاب كه ميدانست يا اسم اعظم بمقامات علماء ابرار ولى او ميل نمود بخلود در دنياى دنىّ و فراموش كرد دار باقى را و متابعت نمود از هواى نفس خود و امر فرعون و رضاى او را بر رضاى خداوند ترجيح داد پس مثل او و امثال او مثل سگ است كه اگر متعرض او شوى و حمله كنى براى طرد و زجرش زبان خود را از دهن بيرون ميآورد و بشدّت نفس ميكشد و بانك ميكند و اگر آنرا بحال خود واگذارى باز اين كار را دارد اين قبيل اشخاص هم اگر بآنها علم و دانش عطا شود يا بموعظه و نصيحت از اعمال قبيحه منع و زجر شوند با آنكه بحال جهل باقى باشند و كسى متعرض آنها نشود بحالشان يكسان است خبث طينت و دنائت طبع و قصور همّت آنها نميگذارد در هيچ حال بسعادت و كرامت و اصل شوند و ضرر اعمالشان بخودشان عائد ميشود و معنى اضلال خداوند مكرر بيان شده است و قصص بفتح قاف بمعنى قصّد و قصص بكسر جمع آنست.
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| − | اطیب البیان=
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| − | ===اطیب البیان (سید عبدالحسین طیب)===
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| − | {{نمایش فشرده تفسیر|
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| − | ساءَ مَثَلاً القَومُ الَّذِينَ كَذَّبُوا بِآياتِنا وَ أَنفُسَهُم كانُوا يَظلِمُونَ (177)
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| − | بد مثلي است آن قومي را كساني که تكذيب بآيات ما كردند و بودند که بنفوس خود ظلم ميكردند.
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| − | ساء مثلا اصل مثل بد نيست حال مكذبين که منطبق با اينکه مثل ميشود بد است القَومُ الَّذِينَ كَذَّبُوا بِآياتِنا كفار و مشركين و معاندين و مخالفين و منكرين تماما مكذّب بآيات الهي هستند.
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| − | وَ أَنفُسَهُم كانُوا يَظلِمُونَ بدستگاه خداوند لطمه وارد نميشود
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| − | (هر چه هست از قامت ناساز بياندام ما است || و رنه تشريف تو بر بالاي كس كوتاه نيست)
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| − | البته هر عملي اثري دارد
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| − | ان خيرا فخير و ان شرا فشر
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| − | برگزیده تفسیر نمونه=
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| − | ===برگزیده تفسیر نمونه===
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| − | {{نمایش فشرده تفسیر|
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| − | (آیه 177))- در این آیه و آیه بعد در واقع یک نتیجه کلی و عمومی از سرگذشت «بلعم» و علمای دنیاپرست گرفته، نخست میگوید: «چه بد مثلی دارند آنها که آیات ما را تکذیب و انکار کردند» و چه بد عاقبت و سرنوشتی در انتظار آنهاست (ساءَ مَثَلًا الْقَوْمُ الَّذِینَ کَذَّبُوا بِآیاتِنا).
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| − | ولی آنها به ما ظلم و ستم نمیکردند، بلکه «بر خویشتن ستم روا میداشتند» (وَ أَنْفُسَهُمْ کانُوا یَظْلِمُونَ).
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| − | چه ستمی از این بالاتر که سرمایههای معنوی علوم و دانشهای خویش را که میتواند باعث سر بلندی خود آنها و جامعههایشان گردد در اختیار صاحبان «زر» و «زور» میگذارند و به بهای ناچیز میفروشند.
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| − | سایر تفاسیر=
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| − | سایرتفاسیر این آیه را می توانید در سایت قرآن مشاهده کنید:
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| − | ==تفسیر های فارسی==
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| − | ==={{ترجمه تفسیر المیزان|سوره=7 |آیه=177}}===
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| − | ==={{تفسیر خسروی|سوره=7 |آیه=177}}===
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| − | ==={{تفسیر عاملی|سوره=7 |آیه=177}}===
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| − | ==={{تفسیر جامع|سوره=7 |آیه=177}}===
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| − | ==تفسیر های عربی==
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| − | ==={{تفسیر المیزان|سوره=7 |آیه=177}}===
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| − | ==={{تفسیر مجمع البیان|سوره=7 |آیه=177}}===
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| − | ==={{تفسیر نور الثقلین|سوره=7 |آیه=177}}===
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| − | ==={{تفسیر الصافی|سوره=7 |آیه=177}}===
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| − | ==={{تفسیر الکاشف|سوره=7 |آیه=177}}===
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| − | </tabber>
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| | ==پانویس== | | ==پانویس== |