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| سطر ۴۴: |
سطر ۴۴: |
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| | == تفسیر آیه == | | == تفسیر آیه == |
| − | <tabber> | + | <tafsir sura="5" ayeh="104" /> |
| − | تفسیر نور=
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| − | ===تفسیر نور (محسن قرائتی)===
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| − | {{ نمایش فشرده تفسیر|
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| − | وَ إِذا قِيلَ لَهُمْ تَعالَوْا إِلى ما أَنْزَلَ اللَّهُ وَ إِلَى الرَّسُولِ قالُوا حَسْبُنا ما وَجَدْنا عَلَيْهِ آباءَنا أَ وَ لَوْ كانَ آباؤُهُمْ لا يَعْلَمُونَ شَيْئاً وَ لا يَهْتَدُونَ «104»
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| − | و هرگاه به آنان گفته شود: به سوى آنچه خداوند نازل كرده و به سوى پيامبر بياييد، گويند: آنچه پدرانمان را بر آن يافتيم، ما را بس است. آيا هر چند پدرانشان چيزى نمىدانستند و (به حقّ) هدايت نشده بودند (و بيراهه مىرفتند، بايد راه آنان را ادامه دهند؟)
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| − | ===نکته ها===
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| − | شايد آيه مربوط به خرافههايى باشد كه در آيهى قبل آمده بود كه هرگاه به آنان گفته شود دست از اين خرافات برداريد مىگويند: «وَجَدْنا عَلَيْهِ آباءَنا»
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| − | ===پیام ها===
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| − | 1- قرآن، مردم را به پيروى از دستوراتِ خدا و رسول فرامىخواند. تَعالَوْا إِلى ...
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| − | جلد 2 - صفحه 384
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| − | 2- پذيرفتن دعوت اسلام، سبب تعالى و رشد است. (كلمه «تَعالَوْا» به معناى حركت به سمت عُلوّ و رشد است)
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| − | 3- اصل، فرهنگ الهى است، نه فرهنگ پيشينيان. «ما أَنْزَلَ اللَّهُ»
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| − | 4- قرآن به تنهايى كافى نيست، سنّت وسيره و حكومت رسولاللّه هم ملاك عمل است. «تَعالَوْا إِلى ما أَنْزَلَ اللَّهُ وَ إِلَى الرَّسُولِ»
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| − | 5- اهل خرافات و افراد مرتجع و واپسگرا، حاضر به شنيدن حقّ نيستند. «قالُوا حَسْبُنا»
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| − | 6- نه سنّتگرايى اصل است و نه نوگرايى، اصل، علم و هدايت است. «لا يَعْلَمُونَ، لا يَهْتَدُونَ»
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| − | 7- وجدان خود را حاكم كنيم. أَ وَ لَوْ كانَ آباؤُهُمْ ...
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| − | 8- پيروى از افكار جاهلانهى آنان و وفادارى نابجا جايز نيست. «أَ وَ لَوْ كانَ آباؤُهُمْ لا يَعْلَمُونَ»
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| − | 9- تقليد كوركورانه، نشانهى بىعقلى است. «لا يَعْقِلُونَ» در آيهى قبل و تعصب روى نياكان در اين آيه.
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| − | 10- تقليد جاهل از جاهل بىمعناست. وَجَدْنا عَلَيْهِ آباءَنا ... آباؤُهُمْ لا يَعْلَمُونَ
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| − | اثنی عشری=
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| − | ===تفسیر اثنی عشری (حسینی شاه عبدالعظیمی)===
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| − | وَ إِذا قِيلَ لَهُمْ تَعالَوْا إِلى ما أَنْزَلَ اللَّهُ وَ إِلَى الرَّسُولِ قالُوا حَسْبُنا ما وَجَدْنا عَلَيْهِ آباءَنا أَ وَ لَوْ كانَ آباؤُهُمْ لا يَعْلَمُونَ شَيْئاً وَ لا يَهْتَدُونَ (104)
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| − | بعد از آن از حال اين مفسّريان خبر مىدهد:
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| − | وَ إِذا قِيلَ لَهُمْ تَعالَوْا إِلى ما أَنْزَلَ اللَّهُ: و زمانى كه گويند مر ايشان را اى اهل افترا و اصحاب بدعت، بيائيد به متابعت آنچه خدا نازل فرموده از حكم
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| − | «1» اصول كافى، كتاب الايمان و الكفر، جلد دوّم، صفحه 339، حديث 5 و 7.
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| − | تفسير اثنا عشرى، ج3، ص: 192
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| − | حلال و حرام وَ إِلَى الرَّسُولِ: و بيائيد به اطاعت پيغمبرى كه بيان كننده آن حكم است قالُوا حَسْبُنا ما وَجَدْنا عَلَيْهِ آباءَنا: گويند از غايت جهل، كه كافى است ما را آنچه يافتيم پدران خود را بر آن. اين بيان، قصور تدبر، و بسيارى غرور آنها است در تقليد و نداشتن دليل بر آن. أَ وَ لَوْ كانَ آباؤُهُمْ لا يَعْلَمُونَ شَيْئاً وَ لا يَهْتَدُونَ: آيا بس است ايشان را آنچه يافتهاند پدران خود را بر آن، اگرچه پدرانشان نمىدانستند چيزى را و راه نمىيافتند به طريق حق، يعنى ايشان جاهل و گمراه بودند و تقليد آنها نافع نيست، بلكه تقليد عالم و هادى مىبايد كرد تا او را از وادى تقليد به سر حد تحقيق رساند بوسيله اظهار حجج بينه و دلايل واضحه.
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| − | تبصره- آيه شريفه دليل است بر فساد تقليد و عدم جواز عمل در شيئى از امور دين بدون حجت و دليل. و نيز دلالت دارد بر وجوب معرفت و علم بر هر فردى بقدر فراخور حال و احتياج خود در تكاليف الهيه، زيرا حق تعالى بيان احتجاج فرموده بر اهل تقليد به آنكه مىدانند معرفت ندارند به آنچه مىگويند.
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| − | توضيح- اين عدم جواز تقليد، در اصول دين است، اما در فروع، بر هر مسلمان مكلفى لازم است پيروى و تقليد مجتهد حىّ اعلمى را نمايد، چنانچه توقيع امام عصر دالّ بر اين است.
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| − | روان جاوید=
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| − | ===تفسیر روان جاوید (ثقفى تهرانى)===
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| − | وَ إِذا قِيلَ لَهُمْ تَعالَوْا إِلى ما أَنْزَلَ اللَّهُ وَ إِلَى الرَّسُولِ قالُوا حَسْبُنا ما وَجَدْنا عَلَيْهِ آباءَنا أَ وَ لَوْ كانَ آباؤُهُمْ لا يَعْلَمُونَ شَيْئاً وَ لا يَهْتَدُونَ (104)
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| − | ترجمه
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| − | و چون گفته شود مر ايشانرا بيائيد بسوى آنچه فرستاد خدا و بسوى پيغمبر (ص) گويند بس است ما را آنچه يافتيم بر آن پدران خود را آيا و اگر چه باشند پدران آنها كه ندانند چيزى را و نه راه يابند.
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| − | تفسير
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| − | بيان است از براى حصر دليل آنها در تقليد كه بطلانش اوضح از بطلان عقائد آنها است و دليل است بر بطلان عقائد و قصور عقلشان ..
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| − | اطیب البیان=
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| − | ===اطیب البیان (سید عبدالحسین طیب)===
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| − | وَ إِذا قِيلَ لَهُم تَعالَوا إِلي ما أَنزَلَ اللّهُ وَ إِلَي الرَّسُولِ قالُوا حَسبُنا ما وَجَدنا عَلَيهِ آباءَنا أَ وَ لَو كانَ آباؤُهُم لا يَعلَمُونَ شَيئاً وَ لا يَهتَدُونَ (104)
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| − | و زماني که گفته شد باين كفار و مشركين که بيائيد و اقبال كنيد بسوي آنچه خداوند در قرآن مجيدش نازل فرمود و بسوي پيغمبرش در آنچه بيان ميفرمايد و دستور ميدهد در جواب گفتند ما را كافيست آنچه پدران ما ميگفتند و عمل ميكردند آيا اگر پدران آنها علم نداشتند و از روي جهالت و ناداني مشي ميكردند و در ضلالت و گمراهي بودند و هدايت نميشدند باز هم متابعت آنها را ميكنيد.
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| − | جلد 6 - صفحه 484
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| − | وَ إِذا قِيلَ لَهُم قائل وجود مقدّس نبوي صلّي اللّه عليه و آله و سلّم و مؤمنين که در مقام هدايت و ارشاد بودند و ضمير لهم كفار و مشركين تَعالَوا تعال از اسماء افعال است بمعني آمدن يعني بيائيد بمعني پذيرفتن و قبول نمودن و زير بار رفتن است إِلي ما أَنزَلَ اللّهُ قرآن مجيد يعني قبول كنيد و تصديق نمائيد که اينکه كتاب عزيز از جانب خداوند عالم براي هدايت بشر نازل شده و بدستوراتش عمل كنيد و از مخالفتش پرهيز نمائيد وَ إِلَي الرَّسُولِ و مشرف شويد خدمت رسول و تصديق كنيد رسالت او را و اطاعت كنيد فرمايشات او را.
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| − | قالوا در جواب مسلمين گفتند (حَسبُنا ما وَجَدنا عَلَيهِ آباءَنا) ما بطريقه آباء خود مشي ميكنيم هر چه گفتند قبول ميكنيم و هر چه كردند ميكنيم و همين ما را بس است.
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| − | أَ وَ لَو كانَ آباؤُهُم لا يَعلَمُونَ شَيئاً دوره جاهليت و دور افتادن از انبياء و اخلاق رذيله و عادات خبيثه و اعمال قبيحه که چه اندازه در ميان آنها رواج داشت بلكه جهل سر تا سر دنيا را گرفته بود.
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| − | وَ لا يَهتَدُونَ و زير بار هدايت نميرفتند و گوش بفرمايشات انبياء و صلحاء نميدادند و نصايح آنها را اعتناء نميكردند آيا همچه اشخاصي را متابعت ميكنيد و همين براي شما كافيست.
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| − | و اينکه آيه در مذمّت تقليد است که كور كورانه بدوي دليل و منطق و برهان فقط براي اينكه پدران ما بودند متابعت ميكنيد و ادلّه واضحه روشن و معجزات باهرات را كنار ميگذاريد بلكه حكم عقل را هم سركوب ميكنيد اينکه نيست جز عصبيت و عناد و هوي پرستي و خود خواهي و اطاعت شيطان و امروز هم اينکه مرض مزمن در سر تا سر مملكت رواج بسزا دارد که بيك ديگر نگاه ميكنند اروپا و امريكا و هوي پرستان را تقليد و اطاعت ميكنند و ابدا اعتنايي بدين و قرآن و علماء ندارند
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| − | جلد 6 - صفحه 485
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| − | بلكه از آنها معرض و بآنها بد بين و با آنها عداوت مينمايند و همچنين متابعين اهل بدع مثل عامه عميا در متابعت بدعتهاي خلفاء و بني اميه و بني العباس و مثل صوفيه در متابعت اقطاب و مراشد خود و مثل متابعت عوام در اختراعات پيشينيان خود مخصوصا زنها در وفيات و اعراس و غير اينها بالجمله تقليد اهل ضلال بايد انسان تمام كارهاي خود بالاخص در امر دين از روي منطق و عقل و دليل و برهان از مأخذ صحيح از انبياء و اوصياي انبياء و نوّاب ائمه اطهار علماء اعلام باشد که بتواند فرداي قيامت در پيشگاه احديت اقامه حجت نمايد و معذور باشد.
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| − | برگزیده تفسیر نمونه=
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| − | ===برگزیده تفسیر نمونه===
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| − | (آیه 104)
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| − | در این آیه اشاره به دلیل و منطق آنها در این تحریم های نابجا و بی مورد کرده، می گوید: «هنگامی که به آنها گفته شود به سوی آنچه خدا نازل کرده و به سوی پیامبر صلّی اللّه علیه و آله بیایید، آنها از این کار سر باز زده، می گویند همان رسوم و آداب نیاکان ما، ما را بس است»؟ (وَ إِذا قِیلَ لَهُم تَعالَوا إِلی ما أَنزَلَ اللّهُ وَ إِلَی الرَّسُولِ قالُوا حَسبُنا ما وَجَدنا عَلَیهِ آباءَنا).
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| − | در حقیقت خلافکاریها و بت پرستیهای آنها از یک نوع بت پرستی دیگر یعنی تسلیم بدون قید و شرط در برابر آداب و رسوم خرافی نیاکان سر چشمه می گرفت قرآن صریحا به آنها پاسخ می گوید: که «مگر نه این است که پدران آنها دانشی نداشتند و هدایت نیافته بودند» (أَ وَ لَو کانَ آباؤُهُم لا یعلَمُونَ شَیئاً وَ لا یهتَدُونَ).
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| − | بنابراین، کار شما مصداق روشن تقلید «جاهل» از «جاهل» است که در می زان عقل و خرد بسیار ناپسند می باشد!
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| − | سایر تفاسیر=
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| − | سایرتفاسیر این آیه را می توانید در سایت قرآن مشاهده کنید:
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| − | ==تفسیر های فارسی==
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| − | ==={{ترجمه تفسیر المیزان|سوره=5 |آیه=104}}===
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| − | ==={{تفسیر خسروی|سوره=5 |آیه=104}}===
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| − | ==={{تفسیر عاملی|سوره=5 |آیه=104}}===
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| − | ==={{تفسیر جامع|سوره=5 |آیه=104}}===
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| − | ==تفسیر های عربی==
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| − | ==={{تفسیر المیزان|سوره=5 |آیه=104}}===
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| − | ==={{تفسیر مجمع البیان|سوره=5 |آیه=104}}===
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| − | ==={{تفسیر نور الثقلین|سوره=5 |آیه=104}}===
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| − | ==={{تفسیر الصافی|سوره=5 |آیه=104}}===
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| − | ==={{تفسیر الکاشف|سوره=5 |آیه=104}}===
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| − | </tabber>
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| | ==پانویس== | | ==پانویس== |