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| سطر ۴۶: |
سطر ۴۶: |
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| | == تفسیر آیه == | | == تفسیر آیه == |
| − | <tabber> | + | <tafsir sura="4" ayeh="120" /> |
| − | تفسیر نور=
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| − | ===تفسیر نور (محسن قرائتی)===
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| − | {{ نمایش فشرده تفسیر|
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| − | يَعِدُهُمْ وَ يُمَنِّيهِمْ وَ ما يَعِدُهُمُ الشَّيْطانُ إِلَّا غُرُوراً «120»
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| − | (شيطان) به آنان وعده مىدهد و ايشان را در آرزو مىافكند و شيطان جز فريب، وعدهاى به آنان نمىدهد.
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| − | أُولئِكَ مَأْواهُمْ جَهَنَّمُ وَ لا يَجِدُونَ عَنْها مَحِيصاً «121»
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| − | آنانند كه جايگاهشان دوزخ است و از آن راه گريزى نيابند.
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| − | ===نکته ها===
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| − | «محيص» از «حيص» به معناى عدول و صرف نظر كردن است.
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| − | وقتى آيهى 135 آلعمران در مورد بخشايش گناهان از سوى خداوند نازل شد ابليس با فريادى يارانش را جمع كرد و گفت: با توبهى انسان، همهى زحمات ما ناكام مىشود. هر يك سخنى گفتند. يكى از شياطين گفت: هر گاه كسى تصميم به توبه گرفت، او را گرفتار آرزوها و وعدهها مىكنم تا توبه را به تأخير اندازد. ابليس راضى شد. «1»
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| − | هم خدا و هم شيطان وعده دادهاند، ولى وعدهى الهى راست «وَ لَنْ يُخْلِفَ اللَّهُ وَعْدَهُ» «2» و وعدههاى شيطان جز دروغ و فريب چيز ديگرى نيست. «وَ ما يَعِدُهُمُ الشَّيْطانُ إِلَّا غُرُوراً»
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| − | نشانهى وعدههاى شيطان، دعوت به تنگ نظرى و فساد است. در آيهى ديگر مىخوانيم:
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| − | «الشَّيْطانُ يَعِدُكُمُ الْفَقْرَ وَ يَأْمُرُكُمْ بِالْفَحْشاءِ» «3»
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| − | «1». تفسير صافى.
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| − | «2». حج، 47.
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| − | «3» بقره 268.
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| − | جلد 2 - صفحه 168
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| − | ===پیام ها===
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| − | 1- دلبستگى به آرزوها، افتادن در دام فريب شيطان است. «يَعِدُهُمْ وَ يُمَنِّيهِمْ»
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| − | 2- آنان كه به ديگران- حتّى به كودكان- وعدهى دروغ مىدهند، كارى شيطانى مىكنند. «وَ ما يَعِدُهُمُ ...»
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| − | 3- دوزخ، براى گروهى جايگاه ابدى و خلود است. «مَأْواهُمْ جَهَنَّمُ وَ ...»
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| − | 4- تهديد به كيفر، يكى از شيوههاى جلوگيرى از فساد است. «مَأْواهُمْ جَهَنَّمُ»
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| − | 5- از همهى ناگوارىهاى دنيا مىتوان گريخت، ولى از عذاب آخرت هرگز! «لا يَجِدُونَ عَنْها مَحِيصاً»
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| − | 6- در آخرت، برگشت امكان ندارد، پس تا از دنيا نرفتهايم از بدىها برگرديم. «لا يَجِدُونَ ...»
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| − | اثنی عشری=
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| − | ===تفسیر اثنی عشری (حسینی شاه عبدالعظیمی)===
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| − | {{نمایش فشرده تفسیر|
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| − | يَعِدُهُمْ وَ يُمَنِّيهِمْ وَ ما يَعِدُهُمُ الشَّيْطانُ إِلاَّ غُرُوراً (120)
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| − | يَعِدُهُمْ وَ يُمَنِّيهِمْ: وعده مىدهد ايشان را شيطان به آنچه وفا نكند، و در آرزو مىافكند ايشان را به چيزهائى كه به آن نرسند و نيابند؛ بسا شود به همين وعدههاى كاذبه و آمال و امانى تدليسه، مرگ دريابد و دست انسان از عمل خالى باشد. وَ ما يَعِدُهُمُ الشَّيْطانُ إِلَّا غُرُوراً: و وعده نمىدهد ايشان را شيطان، مگر فريب و خداع و مكر و حيل، كه عبارت است از اظهار نفع در آنچه متضمن ضرر است. به صورت، نفع به مردمان مىنمايد، و آن يا به خاطر باطله و وساوس فاسده است، و يا به لسان اولياى خود.
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| − | توضيح: غرور، منشأ اكثر آفات و شرور، و اصل معنى آن فريب خوردن و فريفته شدن به شبهه و خدعه شيطان و ايمن شدن از عذاب رحمن و مطمئن گشتن به امرى كه موافق هوى و هوس و ملايم طبع است، منبع هر هلاكتى و سر چشمه هر شقاوتى غرور و غفلت است. و به اين سبب پيغمبر صلّى اللّه عليه و آله و سلّم فرموده: خوشا خواب زيركان و افطار كردن ايشان، كه چگونه مغبون كرده بيدارى احمقان و سعى و اجتهاد ايشان را؛ چه حمق، موجب غرور به بيدارى و اجتهاد مىگردد، هر آينه به قدر ذرهاى از عمل متقين، بهتر است از عملى كه روى زمين را مملو گرداند از مغرورين.
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| − | و از حضرت امام جعفر صادق عليه السّلام منقول است به اين مضمون كه:
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| − | مغرور در دنيا مسكين، و در عقبى مغبون و خاسر است؛ چه عوض كرده بهتر را به زبون. «1» و تعجب مكن از خود، بسا شود كه فريفته شوى به مال و صحت بدن و طول
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| − | «1» سفينة البحار، جلد 1، صفحه 311.
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| − | تفسير اثنا عشرى، ج2، ص: 583
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| − | عمر و اولاد و اصحاب خود، و افتخار كنى به علم و نسب، و بسا گمان كنى نصيحت خلق مىنمائى و حال آنكه فى الحقيقه قصد مدح خود دارى، و يا نفس را به تكلف بر عبادت بدارى، در صورتى كه خداى تعالى اخلاص در عمل را از تو خواسته.
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| − | اقسام مغرورين: بدان كه اهل غرور، بسيار و سبب غرور آنها غفلت است. و اشاره اجماليه به طوايف مغرورين مىشود:
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| − | 1- كسانى كه منكر حشر و نشرند.
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| − | 2- اشخاصى كه به زعم خود وعيد انبياء را از جهت تخويف دانند و عقابى در آخرت نباشد.
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| − | 3- كسانى كه گويند لذات دنيا يقين، و عقوبت آخرت مشكوك، و يقين ترك كرده نشود به شك.
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| − | 4- اشخاصى كه معصيت كنند و گويند خدا غفور و رحيم است.
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| − | 5- جماعتى كه گمان نمايند دنيا نقد و آخرت نسيه، و نقد بهتر از نسيه است.
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| − | 6- گروهى كه مغرورند به عمل خود و غافلند از آفات آن.
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| − | 7- طايفهاى كه مغرورند به علم، و تصور كنند حد كمال را واجد هستند و هيچكس معلومات آنها را دارا نيست.
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| − | 8- كسانى كه عالم و عامل هستند لكن غافلند از طهارت قلبيه از اخلاق رذيله، و گمان تنزع و تقدّس را نموده، خود را مستحق ثواب جزيل دانند.
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| − | 9- جماعتى كه مغرورند، كه اصل، طهارت باطن و امارت دل است، تابع وساوس شيطانيه شده، منحرف از طريقه مستقيمه شريعت گرديدهاند و خود را عارف باللّه خوانند.
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| − | 10- گروهى كه مغرورند به عبادت، و گمان كنند فاق العابدينند.
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| − | 11- مغرورين به زهد، و مزعمين به اينكه شفيع خلقند روز قيامت.
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| − | 12- مغرورين به مال.
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| − | تفسير اثنا عشرى، ج2، ص: 584
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| − | 13- مغرورين به رياست و جاه.
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| − | 14- مغرورين به اولاد و احفاد.
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| − | 15- جماعتى كه بعضى نامشروعات را عبادت خدا پنداشته، آنها را بجا آورند و به واسطه آنها توقع آمرزش دارند.
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| − | 16- اهل تصوف كه طوايف بسيارند، و در ضمن تفسير آيات، مشروحا بيان خواهد شد.
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| − | روان جاوید=
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| − | ===تفسیر روان جاوید (ثقفى تهرانى)===
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| − | يَعِدُهُمْ وَ يُمَنِّيهِمْ وَ ما يَعِدُهُمُ الشَّيْطانُ إِلاَّ غُرُوراً (120)
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| − | ترجمه
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| − | وعده ميدهد ايشانرا و در آرزو مياندازد آنها را و وعده نميدهد ايشانرا مگر بفريب..
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| − | تفسير
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| − | شيطان بوعده خود وفا نميكند و آرزوهائيكه بوسوسه ايجاد مينمايد
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| − | جلد 2 صفحه 129
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| − | در بنى آدم بآنها نائل نميشوند و پس از آنكه از او گله كنند چرا چنين كردى با كمال وقاحت ميگويد خودت كردى مگر عقل نداشتى ميخواستى فريب مرا نخورى مگر انبيا و اوليا و علما نگفتند من با شما دشمنم تو بقول دشمنت گوش دادى و بوعده او مغرور شدى و نصيحت دوست را نشنيدى و بوعده او مطمئن نشدى با اين درجه حماقت باز متوقعى فريب نخورى.
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| − | اطیب البیان=
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| − | ===اطیب البیان (سید عبدالحسین طیب)===
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| − | {{نمایش فشرده تفسیر|
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| − | يَعِدُهُم وَ يُمَنِّيهِم وَ ما يَعِدُهُمُ الشَّيطانُ إِلاّ غُرُوراً (120)
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| − | وعدههاي شيطان يكي وعده فقر است که اگر اموال خود را صرف وجوه بريه از زكاة و خمس و صله و دستگيري از فقراء و ساير مبرات كنيد فقير ميشويد الشَّيطانُ يَعِدُكُمُ الفَقرَ بقره آيه 268، و يكي وعده توبه است که بالاخره توبه ميكني و خدا ميبخشد و وعدههاي ديگر که قبلا از قول خودش نقل كرديم که
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| − | جلد 6 - صفحه 214
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| − | گفت إِنَّ اللّهَ وَعَدَكُم وَعدَ الحَقِّ وَ وَعَدتُكُم فَأَخلَفتُكُم در سوره ابراهيم آيه 22، يَعِدُهُم وَ يُمَنِّيهِم و آمال و آرزوهاي دور و دراز بشما تزريق ميكند که هميشه در دنيا هستيد و بايد خوش و خرم باشيد و بهر درجه که رسيديد قانع نشويد از مال و منال و رياست و جاه و منصب.
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| − | وَ ما يَعِدُهُمُ الشَّيطانُ إِلّا غُرُوراً غرور گول و فريب است که انسان بخود مغرور ميشود لكن حقيقت ندارد، سم را بخيال شهد مينوشد، ضرر را بگمان نفع تحصيل ميكند، شر را بتوهم خير مرتكب ميشود، قبيح را بصورت حسن جلوه ميدهد، معصيت را بر عبادت اختيار ميكند، كفر را بر ايمان ترجيح ميدهد فسق را بهتر از عدالت ميپندارد، ظلم را فخر و مباهات ميكند، معروف را منكر ميشمارد، منكر را معروف ميداند و هكذا و البته كسي که فريب شيطان را بخورد.
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| − | برگزیده تفسیر نمونه=
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| − | ===برگزیده تفسیر نمونه===
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| − | {{نمایش فشرده تفسیر|
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| − | (آیه 120)
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| − | در این آیه چند نکته که به منزله دلیل برای مطلب سابق است بیان شده: «شیطان پیوسته به آنها وعده های دروغین می دهد، و به آرزوهای دورو دراز سرگرم می کند ولی جز فریب و خدعه، کاری برای آنها انجام نمی دهد» (یعِدُهُم وَ یمَنِّیهِم وَ ما یعِدُهُمُ الشَّیطانُ إِلّا غُرُوراً).
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| − | سایر تفاسیر=
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| − | سایرتفاسیر این آیه را می توانید در سایت قرآن مشاهده کنید:
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| − | ==تفسیر های فارسی==
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| − | ==={{ترجمه تفسیر المیزان|سوره=4 |آیه=120}}===
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| − | ==={{تفسیر خسروی|سوره=4 |آیه=120}}===
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| − | ==={{تفسیر عاملی|سوره=4 |آیه=120}}===
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| − | ==={{تفسیر جامع|سوره=4 |آیه=120}}===
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| − | ==تفسیر های عربی==
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| − | ==={{تفسیر المیزان|سوره=4 |آیه=120}}===
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| − | ==={{تفسیر مجمع البیان|سوره=4 |آیه=120}}===
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| − | ==={{تفسیر نور الثقلین|سوره=4 |آیه=120}}===
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| − | ==={{تفسیر الصافی|سوره=4 |آیه=120}}===
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| − | ==={{تفسیر الکاشف|سوره=4 |آیه=120}}===
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| − | </tabber>
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| | ==پانویس== | | ==پانویس== |