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| سطر ۴۸: |
سطر ۴۸: |
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| | == تفسیر آیه == | | == تفسیر آیه == |
| − | <tabber> | + | <tafsir sura="4" ayeh="20" /> |
| − | تفسیر نور=
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| − | ===تفسیر نور (محسن قرائتی)===
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| − | {{ نمایش فشرده تفسیر|
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| − | وَ إِنْ أَرَدْتُمُ اسْتِبْدالَ زَوْجٍ مَكانَ زَوْجٍ وَ آتَيْتُمْ إِحْداهُنَّ قِنْطاراً فَلا تَأْخُذُوا مِنْهُ شَيْئاً أَ تَأْخُذُونَهُ بُهْتاناً وَ إِثْماً مُبِيناً «20»
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| − | و اگر خواستيد همسرى بجاى همسرى انتخاب كنيد ومال فراوانى به آنان داده باشيد، از او چيزى مگيريد. آيا مىخواهيد با بهتان و گناه آشكار، آن را بازپس گيريد؟!
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| − | ===نکته ها===
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| − | «قنطار» به معناى مال زياد كه مانند پل و قنطره وسيلهى بهرهبردارى است.
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| − | در دوران جاهليّت، بعضى همين كه مىخواستند همسر ديگرى بگيرند، به همسر اوّل تهمت مىزدند تا او در فشار قرار گيرد و مهريه خود را ببخشد آنگاه شوهر او را طلاق مىداد، سپس از همان مهرِ برگردانده شده، همسر ديگرى مىگرفت. آيه، اين سنّت جاهلى را نكوهش مىكند.
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| − | ===پیام ها===
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| − | 1- ازدواج مجدّد از نظر اسلام مجاز است. «اسْتِبْدالَ زَوْجٍ مَكانَ زَوْجٍ»
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| − | جلد 2 - صفحه 40
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| − | 2- طلاق، به دست مرد است. «أَرَدْتُمُ اسْتِبْدالَ زَوْجٍ»
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| − | 3- مهريه زياد، اشكالى ندارد، گرچه سفارش به مهريه كم شده است. «آتَيْتُمْ إِحْداهُنَّ قِنْطاراً»
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| − | 4- مالكيّت انسان در چهارچوب قوانين الهى، محدوديّت ندارد. «قِنْطاراً»
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| − | 5- اسلام، حامى حقوق زن است و ازدواج دوّم را به قيمت ضايع كردن حقّ همسر اوّل منع مىكند. «فَلا تَأْخُذُوا مِنْهُ شَيْئاً»
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| − | 6- زن، حقّ مالكيّت دارد و مهريّه، بىكم وكاست بايد به او تحويل شود.
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| − | «فَلا تَأْخُذُوا مِنْهُ شَيْئاً»
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| − | 7- اگر شخصى به حقّ، مالك شد، نمىتوان مالش را اگرچه زياد باشد از او گرفت. فَلا تَأْخُذُوا ...
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| − | 8- يكى از بدترين انواع ظلم، گرفتن مال مردم، همراه با توجيه كردن و تهمت زدن و بردن آبروى آنان است. «أَ تَأْخُذُونَهُ بُهْتاناً وَ إِثْماً»
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| − | اثنی عشری=
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| − | ===تفسیر اثنی عشری (حسینی شاه عبدالعظیمی)===
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| − | {{نمایش فشرده تفسیر|
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| − | وَ إِنْ أَرَدْتُمُ اسْتِبْدالَ زَوْجٍ مَكانَ زَوْجٍ وَ آتَيْتُمْ إِحْداهُنَّ قِنْطاراً فَلا تَأْخُذُوا مِنْهُ شَيْئاً أَ تَأْخُذُونَهُ بُهْتاناً وَ إِثْماً مُبِيناً «20»
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| − | شأن نزول: مروى است كه در اول اسلام اگر شخصى زن صاحب جمالى مىديد، زن خود را به ناشايست و فحش نسبت مىداد و او را مىرنجانيد، تا آنكه زن به تنگ آمده، از سر مهر مىگذشت و مرد او را طلاق مىگفت؛ حق تعالى منع آن فرمود:
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| − | تفسير اثنا عشرى، ج2، ص: 384
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| − | وَ إِنْ أَرَدْتُمُ اسْتِبْدالَ زَوْجٍ مَكانَ زَوْجٍ: و اگر خواهيد شما به واسطه كراهت از صحبت زوجات، بدون وقوع نشوز و فاحشه، از آنها طلب بدل كردن زنى بجاى زن ديگر، وَ آتَيْتُمْ إِحْداهُنَّ قِنْطاراً: و داده باشيد يكى از ايشان را كه داعيه طلاق او داريد، مال بسيارى به جهت مهر، فَلا تَأْخُذُوا مِنْهُ شَيْئاً: پس فرا مگيريد و اخذ نكنيد از آنچه دادهايد چيزى را، خواه اندك باشد يا بسيار.
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| − | طعن: فخر رازى و ابن ابى الحديد و ساير محدثان خاصه و عامه نقل نمودهاند كه: روزى عمر در خطبهاى گفت: اگر بشنوم زنى در صداق خود زياده از مهر زنان پيغمبر صلّى اللّه عليه و آله و سلّم گرفته، آن را پس خواهم گرفت! (به نقل ديگر در بيت المال گذارم.) زنى برخاست، گفت: خدا تو را رخصت اين كار نداده، فرمايد: وَ آتَيْتُمْ إِحْداهُنَّ قِنْطاراً فَلا تَأْخُذُوا مِنْهُ شَيْئاً. عمر گفت: همه مردم داناتر و فقيهترند از عمر، حتى زنان پرده نشين. «1» بنابراين كسى كه تا اين درجه جاهل به احكام اللّه باشد، چسان قابليت منصب امامت را خواهد داشت؟
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| − | بعد از آن، بر سبيل انكار و توبيخ خطاب مىفرمايد كه: أَ تَأْخُذُونَهُ بُهْتاناً وَ إِثْماً مُبِيناً: آيا مىگيريد چيزى از آن زن به باطل و ستم و جرمى ظاهر و گناهى هويدا؟
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| − | روان جاوید=
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| − | ===تفسیر روان جاوید (ثقفى تهرانى)===
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| − | {{نمایش فشرده تفسیر|
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| − | وَ إِنْ أَرَدْتُمُ اسْتِبْدالَ زَوْجٍ مَكانَ زَوْجٍ وَ آتَيْتُمْ إِحْداهُنَّ قِنْطاراً فَلا تَأْخُذُوا مِنْهُ شَيْئاً أَ تَأْخُذُونَهُ بُهْتاناً وَ إِثْماً مُبِيناً «20»
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| − | ترجمه
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| − | و اگر خواستيد بدل نمائيد زنى را بجاى زنى و داده باشيد يكى از آنان را مال بسيار پس نگيريد از آن چيزى را آيا ميگيريد آنرا به بهتان زدن و گناه آشكار.
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| − | تفسير
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| − | در مجمع از صادقين عليهما السلام نقل نموده كه قنطار يك پوست گاو پر از طلا است و گفته شده است كه معمول بود وقتى مردمى خواست زن خود را طلاق بدهد و زن تازه بگيرد بزن قديم خود تهمت مىبست براى آنكه او مجبور شود چيزى
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| − | جلد 2 صفحه 36
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| − | از مهر خود واگذار كند و طلاق بگيرد و آنمرد آنمال را صرف در اختيار عيال جديد كند و خداوند از اين عمل منع فرمود و استفهام براى انكار و توبيخ است.
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| − | اطیب البیان=
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| − | ===اطیب البیان (سید عبدالحسین طیب)===
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| − | {{نمایش فشرده تفسیر|
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| − | وَ إِن أَرَدتُمُ استِبدالَ زَوجٍ مَكانَ زَوجٍ وَ آتَيتُم إِحداهُنَّ قِنطاراً فَلا تَأخُذُوا مِنهُ شَيئاً أَ تَأخُذُونَهُ بُهتاناً وَ إِثماً مُبِيناً «20»
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| − | و اگر خواستيد زن را رها كنيد و زن ديگر بجاي او بگيريد و مهريه آن زن را يك قنطار طلا دادهايد حق نداريد شيئي از آن مهريه را پس بگيريد آيا پس ميگيريد آن را که بهتان و معصيت آشكار است.
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| − | تفسير قنطار در ذيل آيه شريفه در سوره آل عمران آيه 75 گذشت وَ مِن أَهلِ الكِتابِ مَن إِن تَأمَنهُ بِقِنطارٍ يُؤَدِّهِ إِلَيكَ الاية و گذشت که كنايه از مال كثير است نه خصوصيتي براي قنطار باشد.
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| − | و مراد از استبدلال در وَ إِن أَرَدتُمُ استِبدالَ زَوجٍ مَكانَ زَوجٍ طلاق دادن سابق و تزويج لاحقه است.
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| − | و مراد از وَ آتَيتُم إِحداهُنَّ قِنطاراً مهريه سابقه است که مطلقه شده.
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| − | فَلا تَأخُذُوا مِنهُ شَيئاً توضيح كلام در موضوع طلاق، يك موقع شوهر ميخواهد طلاق دهد اگر قبل از دخول باشد نصف مهر را بايد بدهد، و اگر دخول كرده تمام مهر مستقر ميشود و مورد آيه همين است که دخول شده باشد بقرينه كلمه (افضي) در آيه بعد که كنايه از دخول است، و در اينکه صورت يك دينار حق ندارد پس بگيرد و همين است مفاد فَلا تَأخُذُوا مِنهُ شَيئاً.
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| − | و مراد از بهتان امري است بر خلاف حق و واقع چه در كلام و چه در غير كلام از روي تعجب ميفرمايد أَ تَأخُذُونَهُ بُهتاناً و البته اينکه ظلم گناه بزرگيست خصوصا در حق زوجه مطلقه که بيكس و بدون نفقه و كسوه ميشود لذا ميفرمايد وَ إِثماً مُبِيناً
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| − | جلد 5 - صفحه 43
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| − | و يك موقع زن ميخواهد طلاق بگيرد يك مقدار از مهريه يا تمام آن را يا چيز ديگري بزوج بذل ميكند که او را طلاق دهد و اينکه طلاق خلعي است و شوهر حق رجوع ندارد مگر آنكه زن رجوع در بذل كند.
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| − | برگزیده تفسیر نمونه=
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| − | ===برگزیده تفسیر نمونه===
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| − | (آيه 20)
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| − | '''شأن نزول:'''
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| − | پيش از اسلام رسم بر اينکه بود که اگر ميخواستند همسر سابق را طلاق گويند و ازدواج جديدي كنند براي فرار از پرداخت مهر، همسر خود را به اعمال منافي عفت متهم ميكردند، و بر او سخت ميگرفتند، تا حاضر شود مهر خويش را که معمولا قبلا دريافت ميشد بپردازد، و طلاق گيرد، و همان مهر را براي همسر دوم قرار ميدادند.
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| − | آيه نازل شد و اينکه كار زشت را مورد نكوهش قرار داد.
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| − | '''تفسير:'''
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| − | اينکه آيه نيز براي حفظ قسمت ديگري از حقوق زنان نازل گرديده و ميگويد: «و اگر تصميم گرفتيد که همسر ديگري به جاي همسر خود انتخاب كنيد و مال فراواني (به عنوان مهر) به او پرداختهايد، چيزي از آن را نگيريد» (وَ إِن أَرَدتُمُ استِبدالَ زَوجٍ مَكانَ زَوجٍ وَ آتَيتُم إِحداهُنَّ قِنطاراً فَلا تَأخُذُوا مِنهُ شَيئاً).
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| − | سپس اشاره به طرز عمل دوران جاهليت در اينکه باره که همسر خود را متهم به اعمال منافي عفت ميكردند نموده، ميفرمايد: «آيا براي باز پس گرفتن (مهر) زنان متوسل به تهمت و گناه ميشويد» (أَ تَأخُذُونَهُ بُهتاناً وَ إِثماً مُبِيناً).
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| − | يعني، اصل عمل، ظلم است و گناه، و متوسل شدن به يك وسيله ناجوانمردانه و غلط، گناه آشكار ديگري است.
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| − | سایر تفاسیر=
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| − | سایرتفاسیر این آیه را می توانید در سایت قرآن مشاهده کنید:
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| − | ==تفسیر های فارسی==
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| − | ==={{ترجمه تفسیر المیزان|سوره=4 |آیه=20}}===
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| − | ==={{تفسیر خسروی|سوره=4 |آیه=20}}===
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| − | ==={{تفسیر عاملی|سوره=4 |آیه=20}}===
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| − | ==={{تفسیر جامع|سوره=4 |آیه=20}}===
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| − |
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| − | ==تفسیر های عربی==
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| − | ==={{تفسیر المیزان|سوره=4 |آیه=20}}===
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| − | ==={{تفسیر مجمع البیان|سوره=4 |آیه=20}}===
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| − | ==={{تفسیر نور الثقلین|سوره=4 |آیه=20}}===
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| − | ==={{تفسیر الصافی|سوره=4 |آیه=20}}===
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| − | ==={{تفسیر الکاشف|سوره=4 |آیه=20}}===
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| − | </tabber>
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| | ==پانویس== | | ==پانویس== |